28 जून 2009

तुम्हें सोचता हूँ निरन्तर...

तुम्हें सोचता हूँ निरन्तर
अचिन्त्य ही चिन्तन का भाव बन जाता है
ठीक उसी तरह,
जैसे, मूक की मोह से अंधी आँखों में
आकृति लेते हैं अनुभूति के बोल,
जैसे,किसी प्रेरणा की निःशब्द गति भर देती है
सुगन्ध से मेरी अक्रिय संवेदन-दृष्टि को,
जैसे फूट पड़ता है ठंडे पानी का सोता
किसी निस्पन्द शिला से,
और जैसे, मृत्यु के माथे पर
जीवन के ओज-रस से भरे फूल खिलते हैं ।

ऐसे ही मैं
सोचता हूँ तुम्हें निरन्तर ।

27 जून 2009

टिप्पणी अदृश्य होकर करते हैं हम ...

आशीष जी की यह पोस्ट पढ़कर टिप्पणी नियंत्रण का हरबा-हथियार (मॉडरेशन) हमने भी लगाया ही था कि पहली टिप्पणी अज्ञात साहब की ही आ गयी । रोचक है, और उपयोगी भी । कितना सच्चा अर्थ पकड़ा है उन्होंने मेरी कविता का ? आप भी देखें -

26 जून 2009

सही कहा तुमने.....

वर्ष अतीत होते रहे
पर धीरज न चुका
और न ही बुझा
तुम्हारा स्नेह युक्त मंगल प्रदीप,

महसूस करता हूँ-
तुम समय का सीना चीर कर
यौवन के रंगीले चित्र निर्मित करोगे,
एक कहानी लिखोगे, जिसमें होगा
स्नेह-स्वप्न-जीवन का इतिवृत्त,
और प्रतीक्षा में डबडबायी मेरी आँखें
पोंछ दोगे अपने मधु अधरों से ।

सही कहा तुमने
अदृश्य होते हैं हाँथ अनुग्रह के ।

24 जून 2009

रमणियों की ठोकर से पुष्पित हुआ अशोक (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा )

180px-Sita-Ashok_(Saraca_asoca)_flowers_in_Kolkata_W_IMG_4146 वृक्ष-दोहद की संकल्पना के पीछे प्रकृति के साथ मनुष्य का वह रागात्मक संबंध है जिससे प्रेरित होकर अन्यान्य मानवीय क्रिया-कलाप वृक्ष-पादपों पर आरोपित कर दिये जाते रहे हैं । प्रकृति के साथ मनुष्य के  यह रागात्मक वस्तुतः उसके आनन्द को और व्यापक बनाते हैं । मनुष्य के अन्तर्निहित भावों की अभिव्यक्ति इसी कारण प्रकृति के माध्यम से होने लगी और अनेकों इच्छायें (पूर्ण-अपूर्ण) विभिन्न क्रियाकलापों में दृष्ट होने लगीं । वृक्ष-दोहद का सम्बन्ध वृक्षों में असमय/अ-ऋतु ही पुष्प के उदगम से लिया जाता रहा है । आश्चर्यजनक है कि स्त्रियाँ जो स्वयं उर्वरता और प्रजनन के लिये उत्तरदायी हैं, विपरीततः  अपनी विभिन्न क्रियाओं से वृक्षों को गर्भित करती हैं, पल्लवित-पुष्पित करती हैं । वृक्ष-दोहद की क्रिया के अन्तर में मुझे सहज स्वाभाविक गर्भिणी स्त्रियों की सामान्य उत्कंठा दिखायी पड़ती है जो स्वतः में अनूभूत होने वाले उस विरल अनुभूति-व्यापार को अपने सामने, अपने से इतर कहीं घटित होते देखना चाहती हैं । प्रकृति से अच्छा साधन उन्हें कहाँ मिलेगा ?

 
विज्ञान की अननन्तर सिद्ध सैद्धांतिकी कि वृक्षों में जीवन है  और वह संवेदित भी होते हैं, साहित्य की कल्पनाशीलता से घुलमिल कर एक रुचिकर प्रसंग वृक्ष-दोहद के रूप में हमारे सामने उपस्थित है । वृक्ष-दोहद के संबंध  में प्राचीन साहित्य-शिल्प में जिन वृक्षों का उल्लेख है, उनमें सबसे प्रिय और महत्वपूर्ण वृक्ष ’अशोक’ है । कहते हैं, सुन्दर स्त्रियों के पदाघात (पैरों के प्रहार ) से अशोक में पुष्प खिल आते हैं, और पैर भी कैसे ? किंकिणि-नूपूर-सज्जित, कुमकुम लेपित । नूपूर-सज्जित रमणियों के वाम पैर ही वृक्ष में आघात देते हैं और अशोक पुष्पित हो उठता है । उत्कीर्ण मूर्तियों में अशोक दोहद की क्रिया सम्पादित करती यक्षिणियाँ अपने वाम पैरों से ही आघात करती मालूम पड़ती हैं ( A.K. Coomarswami - Yaksa) |
 
अशोक को कुसुमित करने की इस क्रिया के अनेकों उदाहरण हमारे साहित्य में व्याप्त हैं । राजशेखर की काव्यमीमांसा में इसका उल्लेख है । हमारे विश्व-प्रसिद्ध कवि कालिदास के समस्त काव्य में वसंत-उत्सव के बहाने, अथवा मदनोत्सव के बहाने अशोक को कुसुमित करने की क्रिया का वर्णन है । कुमारसंभव में वसंत का वर्णन करते हुए कवि अशोक को स्कंध पर पल्लवित और कुसुमित बताता है; मेघदूत में भी यक्ष के माध्यम से वह इस क्रिया का उल्लेख करा देता है कि "अशोक तो यक्षिणी के वामपाद का अभिलाषी है" । कालिदास की रचना ’मालविकाग्निमित्र” के तृतीय अंक की सारी कथा ही मालविका के पदाघात से अशोक को पुष्पित करने की क्रिया को केंद्र बना कर रची हुई है ।
 
ashok ke phool मदनोत्सव में कामदेव की अभ्यर्थना के पश्चात अशोक को पुष्पित करने की क्रिया विस्तार से वर्णित है मालविकाग्निमित्र में । सामान्यतः होता यही है कि कोई सुन्दर स्त्री अपने समस्त श्रृंगार के साथ, पैरों में अलक्तराग और नूपुर सजा कर, हाथों में अशोक के पल्लव के गुच्छे पकड़कर  अपने बायें पैर से अशोक वृक्ष पर आघात करती है । अशोक नूपुर-ध्वनि से उल्लसित होकर अपने कंधे पर ही फूल उठता है । इस मादक क्रिया को अपनी लेखनी से और मादक बना दिया है कालिदास ने ।
 
ashok ke phool1हेम-पुष्प (स्वर्ण वर्ण के फूलों से लदा हुआ )  और तामृपल्लव के नाम से विख्यात अशोक एक सदाबहार वृक्ष है । सदैव हरा रहने वाला । सदैव हरा तो कामदेव ही है । मन, तन, सृष्टि और जीवन- सब की हरीतिमा हर क्षण बनाये रखने वाला और कौन है सिवाय कामदेव के । इसलिये ही यह अशोक भी समस्त शोक को हरने वाला है । खयाल करिये कि कामदेव के पंच बाणों में एक अशोक ही है ।
 

380px-SungaYaksa इसे विचित्र संयोग कहें या अशोक की महत्ता को स्थापित करने वाला ईश्वरीय विधान कि यह बौद्ध और जैन दोनों धर्मों के प्रवर्तकों के जीवन से संयुक्त होकर इन धर्मों के लिये श्रद्धा और आदर का पात्र बना । कहते हैं, शाक्य रानी महामाया ने लुम्बिनी के उपवन में इसी वृक्ष के नीचे बुद्ध को जन्म दिया । कथायें कहतीं है, कि रानी माया अपने उपवन में विहार कर रहीं थी और तनिक क्लांत होकर वह एक अशोक वृक्ष के नीचे आकर विश्राम करने लगीं । तभी अचानक ही विचित्रतः अशोक की शाखायें झुकने लगीं, और उन्होंने एक शाखा पकड़ ली । तत्क्षण ही रानी माया के दक्षिण भाग से महात्मा बुद्ध का अवतरण हो गया । जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर के संबंध में भी कहा जाता है कि वैशाली में इसी प्रकार के वृक्ष के नीचे बैठकर   उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया ।

 

YVMN_Building_AshokaTree_2www.genv.net  seअशोक सदा हरित रहने वाला २५ से ३० फुट उंचा, अनेकों शाखाओं युक्त घना व छायादार वृक्ष होता है । देखने में कुछ कुछ मौलश्री के वृक्ष-सा । सम्पूर्ण भारतवर्ष में इसकी बहुतायत है । पत्ते लंबे, गोल व नोंकदार होते हैं । कोमल अवस्था में इन पत्तों का रंग लाल, फिर गहरा हरा हो जाता है ।  बहुत औषधीय गुण भी हैं इसमें - यह बांझपन का कष्ट हरता है, मातृत्व देता है; रक्त प्रदर में, मूत्र के रोगों में चिकित्सा में सहायक होता है ; गर्भाशय की अंतःसतह (एण्डोमेट्रीयम) व डिम्ब ग्रंथि (ओवरी) के ऊतकों पर लाभकारी प्रभाव डालता है और गुर्दे के दर्द एवं पुरुषों में अण्डकोष-सूजन की चिकित्सा में सहायक होता है ।

 

वैज्ञानिक दृष्टि डालें तो अशोक में कई जैव-सक्रिय पदार्थ पाये जाते हैं । मुख्यतः टैनिन्स, कैटेकाल, इसेन्शियल आयल, हिमेटॉक्सिलीन, ग्लाइकोसाइड, सौपोनिन्स, कैल्शियमयुक्त कार्बनिक यौगिक और लौह खनिजयुक्त कार्बनिक यौगिक । आधुनिक वैज्ञानिक मत कहते हैं कि अशोक की छाल का निष्कर्ष गर्भाशय को उत्तेजित करता है । इसके प्रयोग से गर्भाशय की संकुचन दर बढ़ जाती है और यह संकोचन अधिक समय तक बना रहता है । ऐलोपैथिक संश्लेषण औषधि की अपेक्षा इसका प्रभाव हानिरहित माना जाता है । वैज्ञानिकों ने अशोक की त्वचा में कुछ ऐसे संघटकों की खोज भी की है, जो कैंसर का होना रोकते हैं ।

 
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# वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प की यह चर्चा जारी रहेगी……किंचित अगला पड़ाव अमलतास होगा

23 जून 2009

हमारा जो है अपना आप(गीतांजलि का भावानुवाद)

He whom I enclose with my name is weeping
in this dungeon. I am ever busy building
this wall and around; and as this wall goes
up into the sky day by day I lose sight of
my true being in its dark shadow.

I take pride in this great wall, and I plaster it
with dust and send lest a least whole
should be left in this name; and for all
the care I take I lose sight of my true being.
(R.N.Tagore : Geetanjali)


हमारा जो है अपना आप ।
वह इस काल कोठरी में बैठा कर रहा विलाप ॥

मैं तो व्यस्त सदैव चतुर्दिक रचने में प्राचीर
ज्यों-ज्यों प्रतिदिन उठता नभ में इसका दीर्घ शरीर
त्यों-त्यों खोता निज निजता सह तम छाया संताप
हमारा जो है अपना आप ।

इसी महत प्राचीर बीच सर्जित करता अभिमान
सिकता रज लेपित करता हो रंच न छिद्र विधान
इसी ध्यान में खो देता ’पंकिल’ निजता की छाप
हमारा जो है अपना आप ।

21 जून 2009

चुईं सुधियाँ टप-टप

चुईं सुधियाँ टप-टप
आँखें भर आयीं ।

कैसे अवगुण्ठन को खोल
तुम्हें हास-बंध बाँधा था
कैसे मधु रस के दो बोल
बोल सहज राग साधा था,

हुई गलबहियाँ कँप-कँप
साँसे बढ़ आयीं ।


कैसे उन आँखों की फुदकन
महसूसी थी मन के आँगन
कैसे मधु-अधरों का कंपन
गूँज गया हृदय बीच स्वर बन,

स्नेहिल अनुभूतियाँ पग-पग
अन्तर लहराई ।

19 जून 2009

हमसब की हरकतें : सच्ची-सच्ची

डिग (Digg) पर सफर करते हुए उसके आर्ट्स एंड कल्चर (Art & Culture) वर्ग से इस रोचक चित्रावली का लिंक मिला । कल्पनाशीलता और उसके प्रस्तुतिकरण दोनों ने लुभाया । मूल ब्लॉग से साभार, आपके सम्मुख भी ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ इन्हें -

 

Relaxing Hub image001

 

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जरा कुछ बताइये ना, कितना देखा अपना सच, अपनी हरकत ! 

17 जून 2009

यह हँसी कितनी पुरानी है ?

                 हँसते हुए यह कभी नहीं सोचा था, कि यह हँसी कितनी पुरानी है और किसका अनुकरण कर मानव की हँसी की प्रवृत्ति विकसित हुई होगी ?  खींसे निपोरकर, दाँत दिखाते हुए हँसना, खिलखिलाते हुए तोंद हिलाते हुए हँसना, आवाज निकालते चिल्लाते हुए हँसना आदि - कहाँ से सीख लिया हमने ? कभी खयाल ही नहीं किया था इस बात का । पर बहुत कुछ भेद खुला मैरीना डेविला रॉस (Marina Davila Ross)और उनके सहयोगियों के ताजा शोध के खुलासे से । यह शोध करेंट बॉयलॉजी के नवीनतम अंक में प्रकाशित हुआ है, जो यह स्पष्ट करता है की आदमी की हँसी की उत्पत्ति 10 से 16 मिलियन (100 से 160 लाख ) वर्ष पहले उन सामान्य रूप से मनुष्य के अंतिम पूर्वज गिने जाने वाले वनमानुषों के साथ ही हो गयी थी । 

Bonobo Bonobo GorillaGorilla chimpanzeeChimpanzee Orangutan
Orangutan

                अभी तक हमने चिड़ियाघरों में यह देखा है कि मनुष्य का यह निकट सम्बंधी किस प्रकार मनुष्य की अनेकों योग्यतायें धारण करता है ।चिम्पाजी, बोनोबस, ऑरंगुटान या गुरिल्ला किसी का भी निरीक्षण करने पर यह देखा जा सकता है उनके चेहरे की अभिव्यक्ति और सामाजिक अन्तर्क्रियायें अधिकांशतः मानवोचित हैं । इस शोध ने अब यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि अन्यान्य क्रियाओं एवं व्यवहारों के अतिरिक्त एक अन्य व्यवहार भी ऐसा है जो मनुष्य और गैर-मनुष्य के मध्य समान है, एक जैसा है - वह है हँसी ।

 
                    मरीना डेविला रॉस (Marina Davila Ross)  और उनके सहयोगियों ने अपने अध्ययन में शिशु और युवा गुरिल्लाओं, चिम्पाजियों, ऑरंगुटान, बोनोबस और मनुष्यों में गुदगुदाने या चुटकी काटने पर होने वाले शब्दोच्चारण (tickle-induced vocalizations)  को रिकॉर्ड और विवेचित किया है, और समानता पायी है । यह समानतायें इस विचारधारा का समर्थन करती  हैं कि हँसी एक संवेगात्मक अभिव्यक्ति है जो इन पाँचो प्रजातियों में समान रूप से व्याप्त है ।
 
रॉस के अध्ययन के अनुसार, इन सामान्य अंतिम पूर्वजों की हँसी संभवतः लघु श्रेणी की लम्बी-धीमी पुकार में निहित थी । मनुष्य की हँसी का अपना विशेष गुण, जैसे लगातार आवाज का गुंजित करना, आदि शायद हमारे पूर्वजों की विभिन्न मुद्राओं या प्रस्तुतियों के अनुकरण का परिणाम होगा ।
 
darwin books pages इस अध्ययन की उपलब्धि यह भी है कि यह आदिम गैर-मनुष्यों  के प्रारंभिक उदगारों (nonhuman primates' displays) और मनुष्यों की अभिव्यक्ति (human expressions) के मध्य सातत्यता के सिद्धान्त (Theory of Continuity) के प्रमाणों को भी शामिल कर लेती है - वैसा ही कुछ जैसा चार्ल्स डार्विन ने 1872 में अपनी पुस्तक " द एक्प्रेशन ऑफ इमोशंस इन मैन एंड एनिमल्स ( The Expression of emotions in man and animals) में स्थापित किया था । डार्विन का ग्रंथ केवल विषयवस्तु के लिये ही विख्यात नहीं था बल्कि अपने उन चित्रों और रेखांकनों के लिये भी प्रसिद्ध था, जो मनुष्यों, गैर-मनुष्यों, और आदिम प्रजातियों के मध्य( जब वह असहायता या रोष में अपनी संवेगात्मक अभिव्यक्ति कर रहे होते थे) विचित्र समानताये दिखाते थे । डार्विन ने मनुष्यों और पशुओं के अनिच्छित संवेगों को 1872 के इस ग्रंथ में प्रकाश में लिया था । डार्विन के अनुसार -
We can understand how it is, that as soon as some melancholy state passes through the brain, there occurs a just perceptible drawing down of the corners of the mouth, or a slight raising up of the inner ends of the eyebrows, or both movements combined, and immediately afterwards a slight suffusion of tears … The above actions may be considered as vestiges of the screaming fits, which are so frequent and prolonged during infancy. हम यह समझ सकते हैं कि ऐसा क्यों  होता है कि जैसे ही कोई उदासी या दुख का क्षण हमारे मस्तिष्क से गुजरता है, वैसे ही चेहरे के कोने पर एक स्पष्ट दिखायी देने वाली ड्राइंग उभर आती है, या पलकों की भीतरी सीमा थोड़ा उठ जाती है, या दोनों गतिविधियाँ साथ-साथ होती हैं, और तुरंत ही बाद में थोड़ा आँसुओं का आवेग हो जाता है ….. उपरोक्त क्रियायें अचानक संवेग में चिल्ला उठने के अवशेष चिन्हों की भाँति समझी जा सकती हैं, जो प्रायः दिख जाते हैं और प्रारंभिक अवस्था में बने  रहते हैं  ।
अब जबकि डार्विन की ही राह पर डेविला रॉस ने अपने अध्ययन और विवेचन से यह सिद्ध कर दिया है कि हँसी का यह विलक्षण व्यापार लाखों वर्षों पुराना है, हम जान गये हैं कि हम लाखों वर्षों से हँसे जा रहे हैं, पर हम अभी भी निश्चिततः नहीं जानते- क्यों?
 
आप कहीं मत जाइये, यह देखिये, साथ में हँसे जाइये -
मूल आलेख :
Humans Don’t Have the Last, or Only, Laugh  चित्र साभार : en.wikipedia.org

16 जून 2009

स्त्रियाँ हँसीं और चम्पक फूल गया (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)

 Kavi Samayसाहित्य के अन्तर्गत ’कवि-समय’ का अध्ययन करते हुए अन्यान्य कवि समयों के साथ ’वृक्ष-दोहद’ का जिक्र पढ़कर सहित्य की विराटता देखी । वृक्ष-दोहद का अर्थ वृक्षों में पुष्पोद्गम से है । यूँ तो दोहद का अर्थ गर्भवती की इच्छा है, पर वृक्ष के साथ इस दोहद का प्रयोग फूलों के उद्गम के अर्थ में ही किया जाता है । आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी  ने अपनी पुस्तक ’हिन्दी साहित्य की भूमिका’ में कवि-प्रसिद्धियों के अन्तर्गत वृक्ष-दोहद का सुन्दर विवेचन किया है । उन्होंने स्पष्ट किया है कि ’दोहद’ शब्द ’दौहृद’ शब्द का, प्राकृत रूप है जिसका अर्थ भी मिलता जुलता है । दोहद के सम्बन्ध में आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि "कुशल व्यक्तियों द्वारा वृक्षों-लताओं आदि में जिन पदार्थों और क्रियाओं से असमय, अऋतु में ही फूलों का उदगम करा दिया जाता है, उसे दोहद कहते हैं । यह वृक्ष दोहद मेरे लिये एक विचित्र चीज है । साहित्य और शिल्प में वर्णित, निर्मित यह वृक्ष-दोहद रोचक जान पड़ता है । संस्कृत काव्य में यथास्थान वृक्ष दोहदों का उल्लेख है । कालिदास के ग्रंथों, मल्लिनाथ के ग्रंथ, काव्य-मीमांसा व साहित्य दर्पण आदि शास्त्रीय ग्रंथों में इस वृक्ष दोहद का पर्याप्त उल्लेख है ।

यूँ तो इन ग्रंथों में अशोक, बकुल, तिलक, कुरबक- इन चार ही वृक्षों से सम्बन्धित कवि-प्रसिद्धियाँ मिलती हैं, परन्तु अन्यत्र कुछ स्थानों पर कर्णिकार (अमलतास), चंपक (चंपा), नमेरु(सुरपुन्नाग), प्रियंगु, मंदार, आम आदि वृक्ष-पुष्पों के भी स्त्री-क्रियायों से उदगमित होने के उल्लेख हैं । Hindi Sahity kI bhoomikaa मेरी रुचि अचानक ही इन वृक्षों के सम्बन्ध में बहुत कुछ जानने की तरफ हो गयी, और अपने आस-पास इनमें से कुछ वृक्षों को देखकर मन कल्पनाजनित वही दृश्य देखने लगा जिनमें सुन्दरियों के पदाघात से अशोक के फूल खिल रहे हों,अमलतास स्त्रियों के नृत्य से पुष्पित हो रहा हो, स्त्रियों की गलबहियाँ से कुरबक हँस कर खिल गया हो, चंपा फूल गया हो स्त्रियों की हँसी से चहककर, गुनगुना रही हों स्त्रियाँ और विकसित हो गया हो नमेरु, छूने भर से विकसित हुआ हो प्रियंगु और कुछ कहने भर से स्त्रियों के फूल गया हो मंदार आदि-आदि । 

इन वृक्षों और फूलों के सम्बन्ध में तलाशने निकला इस अन्तर्जाल पर । जो कुछ मिला वह इस कवि-समय से ताल्लुक तो नहीं रखता था, परन्तु काफी ज्ञानवर्द्धन करने के लिये पर्याप्त था । इन वृक्ष-पुष्पों के वानस्पतिक नामों की खोज ने तो और भी बहुत कुछ हाथ पकड़ा दिया । तो एक भाव मन में जागा । इन वृक्षों और पुष्पों को एक आत्मीय भाव से निरखते हुए इनकी परिचयात्मक चर्चा करूँ, यदि संभव हो तो शास्त्रीय और वैज्ञानिक सन्दर्भों के साथ ।  सब कुछ इसी अन्तर्जाल और संकलित पुस्तकों की सामग्री का ही प्रस्तुतिकरण होगा- मेरा अपना कुछ नहीं ।

15 जून 2009

हार गया तन भी, डूब गया मन भी ।

समय की राह से
हटा-बढ़ा कई बार
विरम गयी राह ही,
मन भी दिग्भ्रांत-सा
अटक गया इधर-उधर ।

भ्रांति दूर करने को
दीप ही जलाया था
ज्ञान का, विवेक का,
देखा फिर
खो गयीं संकीर्णतायें
व्यष्टि औ’ समष्टि की ।

स्व-प्राणों के मोह छोड़
सूर्य ही सहेजा था
उद्भासित हो बैठी, और कौन ?
अन्तर की प्रज्ञा ही;
अंधकार दुबक गया
मेरे अवांछित का,
अंधापन सूरज की
आग में दहक गया ।

राह खुली कौन-सी ?
अतिशय आनन्द की,
हार गया तन भी
डूब गया मन भी ।

14 जून 2009

अपने प्रेम-पत्र में यही तो लिखा मैंने....

"जीवन के रोयें रोयें को
मिलन के राग से कम्पित होने दो,
विरह के अतिशय ज्वार को
ठहरा दो कहीं अपने होठों पर,
दिव्य प्रेम की अक्षुण्णता को
समो लो अपने हृदय में, और
अपने इस उद्दाम यौवन की देहरी पर
प्रतीक्षा का पंछी उतरने दो;
फिर देखो-
मैं बिना बुलाये ही
तुम्हारे द्वार का अतिथि बन कर आऊँगा !"

अपने प्रेम-पत्र में
यही तो लिखा मैंने
विश्वास का दीप जला कर
दिये की वासंती रोशनी में ।

12 जून 2009

"मगर सूर्य को क्यूं लपेटा" ?

अपनी पिछली प्रविष्टि (हे सूर्य : कविता - कामाक्षीप्रसाद चट्टोपाध्याय) पर अरविन्द जी की टिप्पणी पढ़कर वैसे तो ठहर गया था, पर बाद में मन ने कहा कि कुछ बातें इस प्रविष्टि के संदर्भ करना जरूरी है, क्योंकि लगभग यही प्रश्न ज्यों का त्यों मेरे मस्तिष्क में भी इस कविता को पढ़कर उठा था - "मगर सूर्य को क्यूं लपेटा" ? और लगभग इसी तरह की जिज्ञासा की प्रेरणा ने यह प्रविष्टि पोस्ट करा दी थी । आपके सम्मुख है इस उत्प्रेरित मस्तिष्क का चिन्तन ।

प्रस्तुत कविता चिरपरिचित सूर्य की ओर अभीप्सा की आकुलता है । सूर्य निदर्शन है आत्मा का और अनन्त शक्ति सम्पन्न प्रेरक प्राण का । श्रुति का निदर्शन भी है - "सूर्यो आत्मा जगतस्तस्तुथष्च " उस सूर्य की तलाश कोई नवीन नहीं है, वह चिरपरिचित है, बहुपरिचित है । कवि की छटपटाहट है कि वह अपने परम चिरपरिचित की पहचान नहीं कर पा रहा है क्योंकि उत्तरी हवा चल रही है । इस उत्तरी हवा की विवेचना की मांग भी जरूरी थी । उत्तरी हवा अर्थात पूर्व का नहीं, बाद का उच्छलन; पूर्ववर्ती नहीं उत्तरवर्ती संस्कृति की भौतिकवादी धारा ।

वैज्ञानिक का पूर्ण प्रयास है कि ’हार्ट’ को प्लास्टिक का बना देगा और हृदय का काम निष्पन्न हो जायेगा । दृष्टि श्वान की लगा देगा और गयी हुई आँख का कोटा पूरा हो जायेगा । वैज्ञानिक का प्रयास रिक्तता की भरपाई करने का है, पर कवि का जो दर्द है उसकी भरपाई कैसे हो ? हृदय की धड़कन के भीतर उठने वाले उच्छ्वास प्लास्टिकी ह्रुदय दे सकता है क्या ? नैन का आकर्षण, उसका सलोनापन, उसकी अनकही बातों के कह देने का गुर कुत्ते की आँख दे सकती है क्या ? और प्लास्टिक का मन जो ज्योतियों में ज्योति का रूप है - "ज्योतिषांज्योतिरेकम्" उसे चौदह कैरेट सोने में पाया जा सकेगा क्या ?

वर्तमान भौतिक चाकचिक्य और विशिष्ट ज्ञान की आंधी में खोये हुए प्राण की छटपटाहट, आत्मानुसंधान, शिवसंकल्पात्मक मन - यही लेखक की बहुपरिचित सूर्य की सम्पदा है, जो गुम हो रही है, हो गयी है । रहा वह परिचित ही पर अपरिचय की धूल में ऐसा ढंक गया है कि पहचान में नहीं आता । अपने इसी अन्तर्ज्योति की खोज के लिये बेचैनी इस कविता की मूल भावना है । अब कवि बस इतना ही कह कर लम्बी साँस ले रहा है -

"हे बहु-परिचित सूर्य !
नहीं पा रहा हूँ तुम्हें नये सिरे से पहचान,
पहचान नहीं पा रहा ...."
और कविता का प्रारम्भ जिस व्याकुलता से हुआ है, उसका अन्त भी उसी व्याकुलता में दिखता है जब वह फिर पुकारने लगता है, कहाँ हो तुम ? -

"हे सूर्य,
हे बहुपरिचित सूर्य !"
सूर्य आत्मा का, प्राण का प्रतीक है । क्या प्राण का चला जाना वैज्ञानिक लौटा सकता है । उसका Substitute क्या है ? आत्मा मर गयी तो उसका जीवन कैसे देगा ? यही आत्म विभूति, यही प्राणवत्ता ही मानव का स्वरूप है, अपना परम धन है । इसी बहुपरिचित सूर्य को वैज्ञानिक उपलब्धि के बीच में खोज रहा है, और कारण सीधा लग रहा है कि उत्तरी हवा ने सारी गड़बड़ी कर दी है । उत्तर, उत्तर तो है, लेकिन वह मरे हुए का सिर सम्हालने वाली दिशा है । पूर्व दिशा ही प्राण की दिशा है, इसलिये पूर्वी बयार नहीं मिली तो उत्तरी में पहचान खोना, परिचय खोना तो सहज संभव है ।

10 जून 2009

हे सूर्य !

हे बहु-परिचित सूर्य !
नहीं पा रहा हूँ तुम्हें नये सिरे से पहचान,
पहचान नहीं पा रहा ....
उत्तरी हवा चल रही है ।

वैज्ञानिक कहता है-
कृत्रिम-’हार्ट’ बना दूँगा,
आँखें जाँय तो क्या, मृत कुत्ते की आँखें दूँगा ।
और मस्तिष्क भी शायद,
शायद वह भी बदला जा सकेगा !>

परन्तु मन ?
उसका क्या होगा ?
और हृदय ?
उसका क्या होगा ?
(हार्ट तो हृदय नहीं है न !)
हे वैज्ञानिक, विज्ञानवेत्ता,
क्या तुम प्लास्टिकी-मन और सिंथेटिक हृदय दे पाओगे?
हृदय निस्पन्द हो भी तो क्या -
मिल सकेगा सेलोफेन लिपटा (नया) हृदय?
मन जाये तो मिलेगा क्या, रेशमी गाँठ में मन नया -
कागजी नोट और नये पैसों के बदले ?

और क्या तुम्हें भी प्लास्टिक-सिंथेटिक औ’
मन को समझाने वाले चौदह कैरट (सोने) में पा सकूँगा ?
हे सूर्य,
हे बहुपरिचित सूर्य !

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मूल बंगला कविता : कामाक्षीप्रसाद चट्टोपाध्याय;
अनुवाद : रमेन्द्र नाथ बोस
साभार : भारती-13 जून, 1965

6 जून 2009

मास्ति वेंकटेश अय्यंगार : Masti Venkatesh Iyengar

गहन मानवतावाद के पोषक और मानव मात्र में अटूट आस्था रखने वाले कन्नड़ के प्रख्यात साहित्यकार डॉ० मास्ति वेंकटेश अय्यंगार ने कन्नड़ कहानी को उल्लेखनीय प्रतिष्ठा दी । सृजनात्मकता की असीम संभावनाओं से लबरेज ’मास्ति’ (मास्ति का साहित्यिक नाम श्रीनिवास था, और इसी नाम से उन्होंने अपना अधिकांश साहित्य रचा, पर पूरे कर्नाटक में वे ’मास्ति’ के नाम से ही प्रसिद्ध थे, और स्वयं भी इसी नाम से संबोधन उन्हें प्रिय था )  के साहित्य ने कन्नड़ साहित्य को आस्था का साहित्य दिया और शाश्वत मूल्य को अभिव्यक्त करती लेखनी जनप्रिय होती गयी । परमसत्ता की असीम अनुकंपा एवं बुद्धिमत्ता में उनकी असीम श्रद्धा है । इसी श्रद्धा के वातायन से मास्ति निरखते हैं हमारी सांस्कृतिक और नैतिक सर्वोच्चता, और फिर उनकी रचनाओं में अभिव्यक्त होने लगती है जीवन की सार्थकता और अर्थवत्ता । यद्यपि  अनेकों बार संशय होता है मास्ति को पढ़ते हुए कि कहीं शाश्वतता और मूल्यवत्ता को गहराई से कवर करने वाला यह रचनाकार मानुषिक स्वभाव, उसकी नियति और मानुषिक दुर्बलता के प्रति सहानुभुति को अपनी आँखों से ओझल तो नहीं कर रहा !

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Venkatesh_Iyengar © Kamat's Potpourri  
जन्म: 6 जून, 1891- मास्ति, जिला कोलार(कर्नाटक); निधन: 6 जून, 1986; मातृभाषा: तमिल; लेखन: कन्नड़; पुरस्कार/सम्मान: साहित्य अकादेमी पुरस्कार-1968, डी० लिट०-कर्नाटक वि०वि०, फेलो-साहित्य अकादेमी-1974, भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार-1983; प्रमुख कृतियाँ: काव्य-अरुण, मलर, मूकन मक्कलु, मानवी, संक्रान्ति; उपन्यास: चेन्नबसव  नायक, चिक्क वीरराजेन्द्र, सुबण्णा, शेषम्मा; नाटक: यशोधरा, काकन कोटे, पुरंदरदास; आत्मकथा: भाव (तीन भागों में); संपादन: जीवन (मासिक)

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मास्ति वेंकटेश अय्यंगार के मानवतावाद का श्रोत है उनका यह विश्वास कि मानव उस अदृश्य शक्ति के हाथ का खिलौना है । यह अटूट आस्था भाव ही उनके साहित्य की अन्तर्धारा का निर्माण करती है, और यह रचनाकार अपने आत्मकथ्य में बोल पड़ता है - "हमारा साहित्य ईश्वर को स्वीकार करे या नकार दे, यह कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है । ईश्वर के हर्ष और विषाद से हमें कुछ लेना देना नहीं है । हमें तो मनुष्य के सुख-दुख की चिन्ता होनी चाहिये । मनुष्य में ऐसी आस्था दे जो उसे जीवन के सुख-दुख को समान भाव से स्वीकार करने की शक्ति प्रदान करती रहे ।" मानव के प्रति ऐसी आस्था रखने वाला यह सर्जक साहित्य के प्रति कितनी उत्कृष्ट और उदात्त भावना रखता है, इसे भी देखें - " मानव के उत्थान के लिये साहित्य बड़ा सशक्त माध्यम है । वह मनुष्य को पशु से देवता बनाता है । मानवोन्नति के लिये ज्ञान, भक्ति और कर्म तीन मार्ग बताये गये हैं । उनके अलावा चौथा साहित्य मार्ग भी है । साहित्य का मार्ग सर्वोत्तम मार्ग है ।"      

subannaमास्ति के रचनाकर्म की विशेषता है कि वह अपनी अभिव्यक्ति में अत्यन्त सरल और प्रभावी होता है । इस सरलता में मास्ति पिरोते हैं भाव-भावना के मनके और फिर निर्मित होती है अत्यन्त प्राणवंत, अर्थयुक्त रचना प्रक्रिया जिससे मास्ति पाठक को हर क्षण विभोर करते चलते हैं । पाठक तत्क्षण ही समझता है उनका मंतव्य और वस्तुतः यही रचनाकर्म का उद्देश्य ही है । लेखक और पाठक का अन्तराल निर्मित ही नहीं होता मास्ति की रचनायें पढ़ते हुए ।  मास्ति के कृतित्व ने बहुत से महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय कृतियों और पात्रों का सृजन किया है जो सम्पूर्ण कन्नड़ साहित्य में आदर्श रूप में पूर्ण प्रतिष्ठित और समादृत हैं । इस महनीय़ व्यक्तित्व का पुण्य स्मरण !

5 जून 2009

सभ्यताएँ जंगलों का अनुसरण करती रही हैं

"सदा स तीर्थो भवति सदा दानं प्रयच्छति
सदा यज्ञं स यजते यो रोपयति पादपम् ।"
By Planting a single tree one gets as much 'punya' in life as residing eternally in a famous Tirth; always giving 'danas' and always performing Vedic sacrifices.

वृक्षों की जीवन्त उपस्थिति और उनके शाश्वत मूल्य को स्पष्ट करता यह श्लोक अचानक ही विश्व पर्यावरण दिवस पर याद गया अपनी आकांक्षाओं के वशीभूत होकर कितना कुछ विनष्ट करना शुरु कर दिया हमने ! अपने ही पोषक ग्रह का पर्यावरण हम नष्ट करने लगे ! आर्थिक विकास और व्यवसाय का चोला पहनाकर हमने भौतिक सुख सुविधायें जुटाईं और अपनी समाप्त होने वाली आकांक्षा के आग्रह से औद्योगिक समाज निर्मित कर अपनी मिट्टी और अपने पानी को जहरीले रसायनों से प्रदूषित कर डाला

अनियंत्रित आकांक्षा और तर्क-बुद्धि के उन्मत्त उपासक होकर हमने अपने हृदय का असली अंश खो दिया फिर तो प्रकृति से चिरन्तन संयुक्त हमारी रागात्मिका वृत्ति भी क्षीण-सी होने लगी हम वृक्ष काटने लगे, पूरे के पूरे वन भी हमने यह देखा कि वृक्षों के कटान से सब गड्ड-मड्ड हो चला है - हमारे पर्यावरण का संतुलन, मौसम का आना-जाना, हरेपन का सोने जैसी रेत में बदल जाना हमने यह भी देखा कि हमारे साँसो की आवाजाही पर भी इन वृक्षों की नेमत है किताबों में रख छोड़ा हमने ऑक्सीजन और कॉर्बन डाई ऑक्साइड का वृक्षों से जुड़ाव कान-फोड़ू शोर भी कहीं इन्हीं वृक्षों की लताओं में उलझकर रह जाता है, हमारे कान के पर्दे सलामत रहते हैं- यह भी हम भूल गये तापमान बढ़ता रहा नयी शब्दावली ने हमारे ज्ञान का दायरा बढ़ा दिया - हम ग्रीन हाउस प्रभाव जानने लगे पर वृक्ष कटते रहे

औद्योगिक विकास और यांत्रिकता को हमने जी भर कर अपनाया हमें बस यही चाहिये था कि भारत की अर्थवत्ता का निर्माण हो जाय सब कोई ऐश्वर्य की गोद में डूबे उतराये आखिर विज्ञान ने मनुष्य का हित ही तो अपना काम्य रखा था - पर क्या यही अर्थ-संकुचित मानव स्वार्थ हित पता नहीं पर मुझे लगता है हमारे इस यंत्र जगत का इस्पात हमारी आत्मा में उतर गया है दो सौ वर्षों से विज्ञान की उन्नति होती रही, हमारी नैतिक उन्नति ठहरी ही रह गयी विकास की प्रत्याशा ने मानव को जीवन का संघर्ष दिया और बढ़ती आकांक्षा और अहमन्यता ने यांत्रिकता फिर च्युत क्या हुआ मानव-धर्म ही ! जीवन यदि प्रकृति की देन है तो उसके प्रति उत्तरदायित्व का निर्वाह और प्रकृति के धन का संरक्षण ही मानव धर्म हो सकता है

अंत में यह भी याद गया -
"सभ्यताएँ जंगलों का अनुसरण करती रही हैं व अपने पीछे रेगिस्तान छोड़ जाती हैं ।"



3 जून 2009

पाँच पुरुषों की कामिनियाँ

द्रौपदी के पाँच पुरुषों की पत्नी होने पर बहुत पहले से विचार-विमर्श होता रहा है अनेक प्रकार के रीति-रिवाजों और प्रथाओं का सन्दर्भ लेकर इसकी व्याख्या की जाती रही है अपने अध्ययन क्रम में मुझे अचानक ही श्री दुर्गा भागवत का यह लघु-लेख मिल गया पाँच पुरुषों की पत्नी होने की अवस्था में औचक ही एक रहस्य देख लिया है श्री भागवत ने द्रौपदी को लेकर कुछ ऐसा सोच ही नहीं पाया था मैं, मुझे भी यह विचार कुछ नये से लगे 'सारिका' के 15 अक्टूबर,1985 के अंक से ज्यों का त्यों साभार यह लघु-आलेख प्रस्तुत कर रहा हूँ -

"द्रौपदी के पाँच पति थे । इस विषय में अनेक अध्येताओं ने किसी न किसी प्रदेश अथवा जाति में प्रचलित बहुपतित्व की प्रथा का उल्लेख कर उसकी व्याख्या करने का प्रयास किया है । मुझे उन व्याख्यायों की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती । द्रौपदी का इस अवस्था का जो उल्लेख मात्र संयोगवश महाभारत में आ गया है, उसमें मुझे एक रहस्य दृष्टिगोचर होता है । कहना न होगा कि वह रहस्य भी व्यास ने इंगित भर किया है और बात समाप्त कर दी है । कुंती और द्रौपदी सास-बहू हैं । अर्थात समान वंश के संवर्धन का उत्तरदायित्व उठाये हुए हैं । कुंती अपने वरदान के बल पर देवताओं को कामपूर्ति के लिये बुला सकी थी । परम्परा में एक सूक्ति चलती है - " द्रौपदी पाँच पुरुषों के लिये काम्य सिद्ध हुई और कुंती भी ।" इस सूक्ति ने, अनजाने, दोनों के मानसिक व दैहिक साधर्म्य का उल्लेख कर दिया है । दोनों के हृदयों की गढ़न इस विषय में एक समान थी । कुंती की नियोजक संतानों के वंश का पालन-पोषण द्रौपदी जैसी एक नारी करती है - यह मात्र संयोग नहीं है, यह एक अनुक्त संकेत है, जिसे व्यास ने इस प्रकार संकेत किया है कि सामान्यतः समझ में नहीं आ सकता; मुझे तो यही लगता है । क्योंकि इस धागे को जरा और ताना होता तो भी कुंती और द्रौपदी के व्यक्तित्व का समग्र सौंदर्य तथा औचित्य विनष्ट हो जाता । इसीलिये व्यास ने कुंती के इर्द-गिर्द सतत दुख के चक्र को चलाया है और दिखाया है कि द्रौपदी इंद्राणी का अंश है । इंद्र अनेक हैं - इंद्राणी एक है - यह पुरातन संकेत है ; द्रौपदी के संदर्भ में व्यास ने कैसी चतुराई से उसका प्रयोग किया है ! पांडव कुंती के बेटे थे इसी कारण उन्हें द्रौपदी के साथ ऐसा समान संबंध स्थापित करना काम्य जान पड़ा, संभव प्रतीत हुआ - यह भी एक सत्य ही है ।"

चित्र : द्रौपदी - राजा रवि वर्मा की पेंटिंग - विकीपीडिया से साभार

1 जून 2009

कभी तुमने अपनी गली में न झाँका

दूसरों की गली का लगाते हो फेरा
कभी तुमने अपनी गली में न झाँका
तितलियों के पीछे बने बहरवाँसू
कभी होश आया नहीं अपनी माँ का ।

सुबह शाम बैठे नदी के किनारे
चमकते बहुत सीप कंकड़ बटोरे,
सहेजा सम्हाला उन्हें झोलियों में
गया भूल अपना सुनहला कटोरा ।
अमावस में ही जिन्दगी काट डाली
न पाया कभीं पूर्णमासी की राका ।

तुम्हारे बिना तेरा सूना पड़ा घर
तूँ बाहर ही बाहर मचाये तमाशा,
यहाँ से वहाँ चौकड़ी भर रहा है
मरुस्थल में जैसे हिरण कोई प्यासा।
गुणा-भाग लाखों का करता रहा बस
बही में न उसके संदेशे को टाँका ।

अरे जिसको अपना समझकर मगन है
न तेरी दिवाली न तेरी है होली,
किसी और ने ही जलाया है दीपक
किसी और ने की है मीठी ठिठोली ।
न क्यों अपने भीतर में ही पूछ लेते
सफर यह तुम्हारा कहाँ से कहाँ का ।

भले तुम असंभव को कर डालो संभव
औ’ बहती नदी शैल की ओर मोड़ो,
भले बाहु में बाँध लो बादलों को
पकड मुट्ठियों में गगन को निचोडो़।
विवश किन्तु किंचित बिलखते रहोगे
सदा साथ देता है बल वंदना का ।
 

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