29 अगस्त 2009

कई बार निर्निमेष अविरत देखता हूँ उसे

कई बार निर्निमेष
अविरत देखता हूँ उसे

यह निरखना
उसकी अन्तःसमता को पहचानना है

मैं महसूस करता हूँ
नदी बेहिचक बिन विचारे
अपना सर्वस्व उड़ेलती है
फिर भी वह अहमन्य नहीं होता
सिर नहीं फिरता उसका;
उसकी अन्तःअग्नि, बड़वानल दिन रात
उसे सुखाती रहती है
फिर भी वह कातर नहीं होता
दीनता उसे छू भी नहीं जाती ।


कई बार निर्निमेष अविरत देखता हूँ उसे
वह मिट्टी का है, पर सागर है -
धीर भी गंभीर भी ।

27 अगस्त 2009

एक शान्त मन ही व्रती होता है ...

आजकल एक किताब पढ़ रहा हूँ - ’आचार्य क्षेमेन्द्र की औचित्य-दृष्टि’ । किताब बहुत पुरानी है - आवरण के पृष्ठ भी नहीं हैं, इसलिये लेखक का नाम न बता सकूँगा । इस पुस्तक में लेखक की भाषा और शैली के चमत्कार से हतप्रभ हूँ - प्रस्तुति विलक्षण है । पूरा पढ़ सकने के बाद इसके आश्रय से कुछ ब्लॉग-प्रविष्टियाँ लिखने की तीव्र इच्छा हो रही है । फिलहाल पुस्तक के परिशिष्ट से एक टिप्पणी लिख रहा हूँ -
 मन की शान्ति व्रत साधना से सिद्ध नहीं हुआ करती; एक शान्त मन ही, उलटे, स्वभावतः - गृहे-वाSरण्ये वा - व्रती होता है - इन दो बोध-कथा-सूत्रों से तुलनीय -

1)
एक भले आदमी ने दुनिया के प्रलोभनों से मुक्ति पाने के लिये वानप्रस्थ ले लिया ।
रात होती और एक कुहुमुखी आकर अपना राग छेड़ देती ।
साधु जी ने युक्ति सोच ली । कोयल आत्मविस्मृति में, अगले दिन, अपना सर्वस्व उड़ेल रही थी - जंगल में मंगल ला रही थी, कि योगी जी ने फूस की कुटिया को, बाहर से, बन्द कर दिया और आग लगा दी !
लोगों ने आकर पूछा - "क्या हुआ? यह आग कौन पापी लगा गया?"
"मैंने लगायी थी; और किसने ? कुटिया गयी तो क्या हुआ; कोयल का तो कक्ख न रहा । मैं खुश हूँ ।"
2)
बहावलपुर में एक पीर रहा करते थे । मुसलमान थे । एक हिन्दू व्यापारी तीर्थ, व्यापार के लिये बाहर जाते हुए पीर साहब से आशीर्वाद लेने आया और अपना घर उन्हीं के सुपुर्द करता गया ।
इस अर्से में पीर साहब खुद, दिन में एक बार, उसके घर जाते और जो काम शहर का होता, सती के लिये, कर आते; किसी चेले से उन्होंने कुछ नहीं करवाया ।
महीनों बाद जब यह भक्त व्यापारी घर लौट रहा था, वह दूर से क्या देखता है - कि पीर साहब के कंधे पर एक पुराना चर्खा है और वो बन्द दर पर, बाहर, चुप इंतजार में खड़े हैं । उसका सिर श्रद्धा से झुक गया ।
कुछ महीने और बीत गये । व्यापारी, एक नया मकान बनवाकर, गृह-प्रवेश के लिये फिर उसी विभूति के क़दमों में हाज़िर हुआ । पीर साहब अपने सारे ’कुल’ समेत पहुँचे । बतासे बाँटे गये । एक बतासा पीर साहब ने भी थाली से उठा लिया; उसी वक्त एक मुहम्मदी ने अदब से जताया - " पीर साहब, आज तो रमजान है; आप का रोजा है । -;"
- "रोजा तोड़ा जा सकता है, एक प्यारे का दिल नहीं" और पीर साहब ने बतासा मुँह में डाल दिया ।
संदर्भ तो यही था : -
"अत्र वल्कलजुषः पलाशिनः पुष्परेणु(भर)भस्म-भूषिताः ।
(लोल) भृंगवलया-Sक्षमालिकास् तापसा इव विभान्ति पादपाः ॥"
[ये वल्कल, यह भस-सी पुष्परज, ये मंडराते भ्रमर :
--- स्वयं शान्त-पूत मन को अचेतन पलाशों में भी व्रतोचित तपस्विता तथा अन्तःशुचिता ही गोचर होती है ।]


25 अगस्त 2009

दिनों दिन सहेजता रहा बहुत कुछ ...

(१)
दिनों दिन सहेजता रहा बहुत कुछ
जो अपना था, अपना नहीं भी था,
मुट्ठी बाँधे आश्वस्त होता रहा
कि इस में सारा आसमान है;
बाद में देखा,
जिन्हें सहेजता रहा क्षण-क्षण
उसका कुछ भी शेष नहीं,
हाँ, जाने अनजाने बहुत कुछ
लुटा दिया था मुक्त हस्त-वह सारा
द्विगुणित होकर मेरी सम्पदा बन गया है ।

**************************************

(२)
मैं ऐसा क्यों हूँ ?
कि मैं हर बार अपना अस्तित्व
लगा देता हूँ दाँव पर,
कूद जाता हूँ समन्दर में
केवल यह जानने के लिये, कि
कोई तो है जो मुझे बचाने आयेगा,
और यह सच पता चल सकेगा
कि वह तो सिद्धहस्त है
किसी को भी बचा सकने में ।

23 अगस्त 2009

तीज पर सुनिये एक झूला गीत..

तीज पर्व पर गाये जाने वाला झूला-गीत सुनिये । अभी अचानक ही यू-ट्यूब पर भ्रमण करते पा गया -



21 अगस्त 2009

मैं समर्पित साधना की राह लूँगा...


मुझसे मेरे अन्तःकरण का स्वत्व
गिरवी न रखा जा सकेगा
भले ही मेरे स्वप्न,
मेरी आकांक्षायें
सौंप दी जाँय किसी बधिक के हाँथों

कम से कम का-पुरुष तो न कहा जाउंगा
और न ऐसा दीप ही
जिसका अन्तर ही ज्योतिर्मय नहीं,
फिर भले ही
खुशियाँ अनन्त काल के लिये
सुला दी जायेंगी किसी काल कोठरी में,
या कि चेतना का अजस्र संगीत
मूक हो जायेगा निरन्तर,
या मन का मुकुर चूर-चूर हो जायेगा
क्षण-क्षण प्रहारों से

मैं समर्पित साधना की राह लूँगा
नियम-संयम से चलूँगा-
यदि चल सकूँगा ।

19 अगस्त 2009

हजारी प्रसाद द्विवेदी की रचनाओं में मानवीय संवेदना (जन्मदिवस - १९ अगस्त पर विशेष )

हजारी प्रसाद द्विवेदी (फोटो : वेबदुनिया से साभार )

ऋग्वेद में वर्णन आया है : ‘शिक्षा पथस्य गातुवित’, मार्ग जानने वाले , मार्ग ढूढ़ने वाले और मार्ग दिखाने वाले, ऐसे तीन प्रकार के लोग होते हैं। साहित्यिकों की गणना इस त्रिविध वर्ग में होती है। सबसे अधिक योग्यता मैं उनकी मानता हूँ जो मार्ग ढूंढ़ने वाले होते हैं, जो नये मार्ग खोजते हैं, बहुत हिम्मत से आगे बढ़ते जाते हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी मानव संवेदना की अटवी में कुछ ऐसे ही मार्ग-संधानकर्त्ता की पृष्ठभूमि रचने वाले साहित्यकार हैं जहाँ है सब के केन्द्र के मनुष्य, उसका संघर्ष, उसकी जिजीविषा और ‘मानव तुम सबसे सुन्दरतम’ की अप्रतिहत आस्था। ‘अशोक के फूल’ की ये पंक्तियाँ द्विवेदी जी के मानवीय संवेदना के चितेरे होने का प्रतिफलन ही तो हैं -
Justify Full
‘‘समूची मनुष्यता जिससे लाभान्वित हो, एक जाति दूसरी जाति से घृणा न करके प्रेम करे, एक समूह दूसरे समूह को दूर रखने की इच्छा न करके पास लाने का प्रयत्न करे, कोई किसी का आश्रति न हो, कोई किसी से वंचित न हो। इस महान उद्दे’य से ही हमारा साहित्य प्रणोदित होना चाहिये।’’


मानव संवेदनाओं के सहभागी के रूप में, उसके चितेरे साहित्यकार के रूप में हजारी प्रसाद द्विवेदी यह उद्घोषित करते हुये दीखते हैं कि जीवन किस प्रकार का है, यह हमें नहीं देखना चाहिये। जहाँ उत्तम जीवन है, वहीं उत्तम विचार संभव है -यह तो सामान्य नियम हुआ । लेकिन किसी कारण अन्दर अन्दर एक चिन्तन प्रवाह होता है, तद्नुसार वाह्य का जीवन नहीं बनता। फिर भी अन्तर में परम रमणीय उन्नत विचार हो सकते हैं। दुनियाँ में सब कुछ कार्य-कारण के नियम से चलता, तो भगवान को कोई तकलीफ नहीं देनी पड़ती । आरोग्यवान शरीर में आरोग्यवान मन हो, इस सामान्य नियम के लिये असंख्य अपवाद हुये हैं और होंगे। द्विवेदी जी संसार में बरतने वाले सामान्य जनों के लिये अत्यंत प्रेम रखकर, चित्त में उनके लिये पक्षपात रखकर सर्वोत्तम साहित्य का सृजन करने वाले कालजयी रचनाकार हैं - उनमें मानवीय संवेदना के लिये विकारों से परिपूर्ण निर्लिप्तता है। उनमें बुखार के प्रति हमदर्दी दिखाने वाले वैद्य का लक्षण है। बुखार को ठीक पहचान कर उसके निवारण के लिये दवा भी बताते हैं -

‘‘डरना किसी से भी नहीं । लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं।’’

‘‘जो मेरा सत्य है वह यदि वस्तुत: सत्य है, तो वह सारे जगत का सत्य है, व्यवहार का सत्य है, परमार्थ का सत्य है - त्रिकाल का सत्य है।’’

‘‘देख बाबा, इस ब्रह्माण्ड का प्रत्येक अणु देवता है, त्रिपुर सुन्दरी ने जिस रूप में तुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है, उसी की पूजा कर।’’ (बाणभट्ट की आत्मकथा)

श्री रामदरश मिश्र ने कहा है- ‘‘आखिर सर्जना है क्या ? वह मनुष्य के भावों, संवेदनाओं और विचारों की एक कलात्मक अन्विति है। लेकिन पंडित जी की सर्जना यहीं रुकती नहीं , वे इससे बड़ी सर्जना करते हैं- वह है मानवीय जिजीविषा, विश्वास और मूल्यों की सर्जना। उनके शोध भी, उनकी आलोचना भी, उनके उपन्यास भी, उनके निबंध भी, उनके भाषण भी, उनकी बातचीत भी, उनका व्यवहार भी उसी मनुष्य की खोज और सृष्टि करते हैं जो गतिशील है, जो अपनी अपार जिजीविषा को लिये हुये इतिहास की दुर्गम घाटियाँ पार करता आ रहा है।......वे मानव धर्म की स्थापना मनुष्य के आदर्शों का सरलीकरण करके नहीं करते, उसे उसके द्वंद्व में देखते हैं। मनुष्य के भीतर पशु और देवता का द्वंद्व चलता रहता है, चलता आ रहा है। उसके भीतर की प्राकृतिक पशुता बार-बार सिर उठाती है किन्तु उसका अर्जित देवत्व बार-बार उसे नीचे ढकेलता है। नाखून पशुता की निशानी हैं। नाखून बार-बार बढ़ते हैं, मनुष्य बार-बार उन्हें काटता है। वह नहीं चाहता कि उसकी पशुता उसपर हावी हो जाय। नाखून के बढ़ने और काटने का संघर्ष लगातार चला आ रहा है और पंडित जी विश्वास व्यक्त करते हैं कि कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़े, मनुष्य एक दिन इन्हें काटकर ही रहेगा।

द्विवेदी जी मानवीय संवेदना के ‘भावानुभावव्यभिचारीभावसंयोगात्रसनिष्पित्त:’ के स्वयंसिद्ध रसवादी साहित्यकार हैं - "There is always a difference between an eager man wanting to read a book and a tired man wanting a book to read". हजारी प्रसाद जी समय को आक्रांत करते हैं, समय काटते नहीं। मानव संवेदना की किताब का इतना उत्सुक वाचक हिन्दी साहित्य में तो दुर्लभ ही है, विश्व साहित्य में भी शायद विरला ही मिले। उनके साहित्य में वस्तुनिष्ठा है, जीवन निष्ठा है और साथ-साथ लोकनिष्ठा है। द्विवेदी जी मानवीय संवेदना को समेटे हुये जब मनुष्य और सृष्टि का स्पर्श करते हैं तो जड़ वस्तु जड़ नहीं रह जाती और मनुष्य निरीह प्राणी नहीं रह जाता-

‘‘जीना चाहते हो? कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो; वायुमण्डल को चूसकर, झंझा-तूफान को रगड़कर, अपना प्राप्य वसूल लो; आकाश को चूमकर अवकाश की लहरी में झूमकर उल्लास खींच लो। कुटज का यही उपदेश है -

भित्वा पाषाणपिठरं छित्वा प्राभंजनीं व्यथाम्
पीत्वा पातालपानीयं कुटजश्र्चुम्बते नभ: ।

दुरन्त जीवन-शक्ति है! कठिन उपदेश है। जीना भी एक कला है। लेकिन कला ही नहीं, तपस्या है। जियो तो प्राण ढाल दो जिन्दगी में, मन ढाल दो जीवनरस के उपकरणों में।’’यह एक अनूठी कला है, एक निराली रसिकता है, जिसे हजारी प्रसाद जी ने आत्मसात किया।

‘मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है’ में यह कहते हुये कि ‘साहित्य केवल बुद्धि विलास नहीं है, वह जीवन की उपेक्षा करके नहीं रह सकता’, उन्होंने यह संवेदित कर दिया है -‘‘साहित्य के उपासक अपने पैर के नीचे की मिट्टी की उपेक्षा नहीं कर सकते। हम सारे बाह्य जगत् को असुन्दर छोड़कर सौन्दर्य की सृष्टि नहीं कर सकते। सुन्दरता सामंजस्य का नाम है। जिस दुनिया में छोटाई और बड़ाई में, धनी और निर्धन में, ज्ञानी और अज्ञानी में आकाश-पाताल का अंतर हो, वह दुनिया बाह्य सामंजस्यमय नहीं कही जा सकती और इसीलिये वह सुन्दर भी नहीं है। इस बाह्य असुन्दरता के ‘ढूह’ में खड़े होकर आन्तरिक सौन्दर्य की उपासना नहीं हो सकती। हमें उस बाह्य असौन्दर्य को देखना ही पड़ेगा। निरन्न, निर्वसन जनता के बीच खड़े होकर आप परियों के सौन्दर्य-लोक की कल्पना नहीं कर सकते। साहित्य सुन्दर का उपासक है, इसीलिये साहित्यिक को असामंजस्य को दूर करने का प्रयत्न पहले करना होगा, अशिक्षा और कुशिक्षा से लड़ना होगा, भय और ग्लानि से लड़ना होगा। सौन्दर्य और असौन्दर्य का कोई समझौता नहीं हो सकता। सत्य अपना पूरा मूल्य चाहता है। उसे पाने का सीधा और एकमात्र रास्ता उसकी कीमत चुका देना ही है। इसके अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता नहीं है।’’

द्विवेदी जी ‘फ्रायड’ के Homo-Psycologicus (मन:प्रधान मानव) को नहीं जानते। वे ‘मार्क्स’ के Homo-Economicus (अर्थस्य पुरुषोदास) को नहीं पहचानते। वे बुद्धिवादियों के Homo-Shapian (बुद्धिप्रधान मानव) से भी वाकिफ नहीं हैं। वे एक सामान्य समन्वित मानव की सावित इन्सान की जिन्दगी का जायका पहचानते हैं। उनका रचनाकार जिजीविषा में मशगूल है और यही उनकी मानवीय संवेदना की यथार्थ वैज्ञानिकता है। द्विवेदी जी अपनी रचना में जीवन की सुगंध का अनुभव करना चाहते हैं, जीवन की प्रतिष्ठा देखना चाहते हैं। उपनिषद का अभिवचन है -- ‘‘अन्नमयं हियोम्यमन: आपोमया: प्राणा: तेजोमय वाक् ।’’ मनुष्य का तेज उसकी वाणी में प्रकट होता है। वह तेज हृदय की भावना से आता है, जीवन की प्रतीतियों से उत्पन्न होता है। ये प्रतीतियाँ जितनी व्यापक और उदात्त होंगी, उनका आशय जितना भव्य और सुन्दर होगा, उतना सुमांगल्य और सौमनस्य सिद्ध होगा। श्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी’ ने लिखा है कि -

‘‘जिन लोगों ने द्विवेदी जी को भाषण देते हुये देखा होगा उन्होंने खुद उनके व्यक्तित्व में भी इस छटपटाहट को जरूर लक्ष्य किया होेगा।......मनुष्य द्विवेदी जी की दृष्टि में चित् का स्फुरण है। इस मनुष्य में उनकी आस्था कभी खंडित नहीं होती। वे मनुष्य की जय-यात्रा में अखंड विश्वास रखते हैं।’’ मानवीय संवेदना के इस चितेरे को उस साहित्य को साहित्य कहने में ही संकोच होता है ‘जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गतिहीनता, परमुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके।’’


जैनेन्द्र कुमार ने कहा है कि,‘‘मुझको सूझता है कि साहित्य वह है, जिसमें हित सत् के साथ है। ‘हित’ के साथ जो ‘स’ लगा है, उसे सत् का प्रतीक हम मान लें। सत् और हित इन दोनों को साथ रखना बड़ी कला है। साहित्य की और शायद जीवन की कला वही है।’’ द्विवेदी जी ने मानवीय संवेदना के प्रस्तुतीकरण में सच में ही ‘सत्’ को ‘हित’ के साथ बनाये रखा है, और यह भाव अनन्त काल तक हमें संवेदित करता रहेगा, क्योंकि साहित्य तो कभीं असमर्थ हुआ नहीं है, हो नहीं सकता। जीवन निष्ठा और साहित्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी में एकरूप हो गये हैं। मानवीय संवेदना की चित्त में जो गहरी अनुभूति हुयी है, वह भाषा में सुन्दर रूप लेकर अपनी नित्यता को प्रतिष्ठित करना चाहती है। श्री नामवर जी ने इस तथ्य को बड़ी सदाशयता से स्वीकार किया है -

‘‘प्रसाद जी की श्रद्धा ने तो अपनी स्मिति रेखा से ज्ञान, इच्छा और क्रिया के त्रिपुर को ही आकाश में एकजुट किया था, द्विवेदी जी की सर्जनात्मक कल्पना तो जाने कितनी असम्बद्ध वस्तुओं को एक सूत्र में बाँधती चलती है।’’......‘‘आशय यह है कि वे ‘कोई तैयार सत्य उठाकर हमारे हाथ पर नहीं धरते।’’ जो कुछ भी है वह अपना अनुभूत सत्य। गहरी पीड़ा के बीच से निकले कुछ अनुभव-कण। और ऐसे चमकते हुए कण द्विवेदी जी के निबंधों में यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरे पड़े हैं - कहीं फूलों के ढेर में और कहीं धूल या राख की राशि में।’’(हजारी प्रसाद द्विवेदी:संकलित निबंध : भूमिका)

निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी उस कोटि के रचनाकार हैं जिन्होंने आगत विगत अनागत मानव की संवेदना के हार में गुंथे पुष्पों को अपनी स्वकीय जीवनानुभूति का रस दिया है। ‘विचार-प्रवाह’ के ‘मानव-सत्य’ शीर्षक निबंध में उन्होंने लिखा है -

‘‘जिस काव्य या नाटक या उपन्यास के पढ़ने से मनुष्य में अपने छोटे संकीर्ण स्वार्थों के बन्धन से मुक्त होने की प्रेरणा नहीं मिलती तथा ‘महान एक’ की अनुभूति के साथ अपने-आपको दलित द्राक्षा के समान निचोड़ कर ‘सर्वस्य मूलनिषेचनं’ के प्रति तीव्र आकांक्षा नहीं जाग उठती, वह काव्य और वह नाट्य और वह उपन्यास दो कौड़ी के मोल का भी नहीं है।’’

‘चारु-चन्द्रलेख’ में उन्होंने अक्षोभ्य भैरव से कहलवाया है - ‘‘देख रे, अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र हर समय साथ-साथ नहीं चलते। देवी के चरणों में सिर रखकर शपथ कर कि तू सीधे जनता से सम्पर्क रखेगा, किसी को छोटा और किसी को बड़ा नहीं मानेगा, धरती को बपौती नहीं धरोहर समझेगा, सामन्ती प्रथा का उच्छेद करेगा। ऐसा करके ही तू वीर विक्रमादित्य की परम्परा का उत्तराधिकारी होगा।’’

निश्चय ही श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी मानव संवेदना के अप्रतिम स्रष्टा हैं, जैसा कवि चण्डीदास ने दुहराया -

‘‘शुनह मानुषभाइ
सबार ऊपरे मानुष सत्य
ताहार ऊपरे नाइ।’’

17 अगस्त 2009

सुरूपिणी की मुख मदिरा से सिंचकर खिलखिला उठा बकुल (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)

Maulsari वि समय की प्रसिद्धियों में अशोक वृक्ष के साथ सर्वाधिक उल्लिखित प्रसिद्धि है बकुल वृक्ष का कामिनियों के मुखवासित मद्य से विकसित हो उठना । बकुल वर्षा ऋतु में खिलने वाले पुष्पों मे कदम्ब के पश्चात सर्वाधिक उल्लेखनीय़ पुष्प है । हिन्दी में मौलसिरी के नाम से विख्यात यह पुष्प सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य में अपनी सुगंधि के कारण प्रेम और सौन्दर्य के प्रतीक के रूप में वर्णित है । अपने विशाल आकार, घनी छाया और आमोदमय पुष्पों के कारण यह साधारण जन और कवि दोनों का परम प्रिय है ।



बकुल हिन्दुओं के मध्य एक पवित्र पौधे के रूप में प्रतिष्ठित है एवं अनेकों धर्मग्रंथों व प्राचीन संस्कृत ग्रंथो में इसका अन्यान्य स्थलों पर पर्याप्त उल्लेख है । स्वर्ग-पुष्पों में स्थान प्राप्त यह पुष्प पुराणों में प्रतिष्ठित है । कहते हैं यमुना किनारे इसी बकुल वृक्ष के नीचे खड़े होकर कृष्ण बाँसुरी बजा-बजा कर गोपांगनाओं का मनरंजन किया करते थे । रामायण में वसंत ऋतु में इसका खिलना वर्णित है और महाभारत में भी । ’अय्यर’ (Aiyer) ने अपनी पुस्तक "The antiquity of some field and forest flora of India' (1956) में संकेत किया है कि बकुल गंधमादन पर्वत पर विकसित पुष्प-वृक्षों (रामायण) एवं युधिष्ठिर की राजधानी इन्द्रप्रस्थ में रोपित वृक्षों (महाभारत) में से एक है । वाल्मीकि रामायण में भी पम्पासर वन, लंका के अशोक वन आदि स्थानों पर इस वृक्ष के होने के संकेत है ।

साहित्य में राजशेखर ने इसके वसंत-विकास का वर्णन किया है, इसी संदर्भ में इस कवि प्रसिद्धि का भी समर्थन होता है जिसमें कहा गया है कि बकुल स्त्रियों की मुख मदिरा से सिंचकर पुष्पित हो उठता है -

"नालिंगितः कुरबकस्तिलको न दृष्टो नो ताडितश्च चरणैः सुदृशामशोकः ।
सिक्तो न वक्त्रमधुना बकुलश्च चैत्रे चित्रं तथापि भवति प्रसवावकीर्णः ॥" (काव्यमीमांसा)

जयदेव के गीतगोविंद में भी इस पुष्प के वसंत विकास की चर्चा है । कालिदास इस पुष्प को वसंत और वर्षा दोनों ऋतुओं में वर्णित करते हैं । वस्तुतः यह खिलता तो है वसंत के अंत में और शरत्काल तक खिलता रहता है । शरत्काल तक आते-आते इसके पुष्प मादक गंध से भर जाते हैं । शायद इसीलिये निघंटुकारों ने इसका एक नाम ’शीधुगंध’ रखा है ।bakul ke phool

कालिदास को फूलों का वर्णन बहुत रुचता है । बकुल पुष्प भी कालिदास के काव्य में सर्वत्र उल्लिखित है । रघुवंश में बकुल की सर्वोल्लिखित प्रसिद्धि का उल्लेख है तो अभिज्ञानशाकुंतल में इसी प्रसिद्धि के विवरण के साथ यह सूचना भी कि बकुल के यह पुष्प सूर्यातप से मुरझा कर भी अपनी सुगंध नहीं खोते । कुमारसंभव एवं ऋतुसंहार में इस पुष्प को केसर नाम से व्यवहृत करते हैं कालिदास । मेघदूत की यह पंक्ति तो प्रतिष्ठित है ही -

"रक्ताशोकश्चलकिसलयः केसरश्चात्र कान्तः प्रत्यासन्नौ कुरवकवृतेर्माधवीमण्डपस्य ।
एकः सख्यास्तव सह मया वामपादाभिलाषी कांक्षत्यन्यो वदनमदिरां दोहदच्छद्मनाsस्याः।"
[हे मेघ ! क्रीड़ाशैल पर, कुरबक वृक्षों की पाँत वाले वासन्ती लता-मण्डप के समीप रक्ताशोक एवं सुन्दर बकुल के दो वृक्ष लगे हुए हैं । उनमें से एक रक्ताशोक - मेरे साथ आपकी सखी के बाँए पैर के ताड़न का अभिलाषी है । दूसरा बकुल - प्रफुल्लित होने के लिये आपकी सखी के मुख की मदिरा उच्छिष्ट रूप में चाहता है ।]


Mimusops elengi Linn..

सघन चिकने पत्रयुक्त, सदा हरित मध्यम कद का यह वृक्ष अपेक्षाकृत छोटे और सीधे काण्डस्कण्ध (Trunk) वाला होता है, जिससे शाखा प्रशाखायें निकल कर चारों ओर फैली रहती हैं । पत्तियाँ चिकनी व अग्र पर यकायक नुकीली होती हैं । इसके पुष्प सफेद रंग के तथा अत्यंत सुगंधित होते हैं, जो या तो अकेले या मंजरियों में निकलते हैं । फल (Berry) इसके १ इंच तक लम्बे, कच्चेपन में हरे और पकने पर पीत या नारंग-पीत वर्ण के होते हैं । प्रत्येक फल में एक बीज होता है, जो अंडाकार किन्तु चपटा और चमकीले भूरे रंग का होता है । ग्रीष्म से शरत्काल तक इसमें पुष्प आते हैं, बाद में फल लगते हैं ।



बकुल के पुष्प अपनी मनोरम सुगंध के कारण मनःप्रसादकर होते हैं । गुरु गुण, कटु काषाय, कटु विपाकी, कफपित्तशामक, स्रावस्तम्भक, गर्भाशय शैथिल्यहर, ज्वरघ्न, विषघ्न कर्म वाले बकुल वृक्ष की छाल में टैनिन, रंजक द्रव्य, वैक्स, स्टार्च एवं क्षार या भस्म पायी जाती है । फूलों में एक सुगंधित उड़नशील तैल पाया जाता है । फलमज्जा में शर्करा तथा सैपोनिन की उपलब्धता होती है । यूनानी मतानुसार बकुल के पुष्प गरम और खुश्क तथा फल एवं छाल शीत एवं रुक्ष होते हैं ।

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# वृक्ष-दोहद के बहाने यह वृक्ष-पुष्प चर्चा जारी रहेगी ….

संबंधित प्रविष्टियाँ :
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15 अगस्त 2009

जहाँ पतिततम महादीनतम संस्थित जन अज्ञात रे


Here is thy foot stool and there rest
thy feet where live the poorest,
and lowliest, and lost.

When I try to bow to thee, my obeisance
can not reach down to the depth
where thy feet rest among the poorest,
and lowliest, and lost.

Pride can never approach to where thou
walkest in the clothes of the humble
among the poorest, and lowliest, and lost.

My heart can never find its way to
where thou keepest company with
the companion less among the
poorest, the lowliest, and the lost.
(R.N.Tagore : Geetanjali)

यहीं तुम्हारी चरण पीठिका यहीं चरण जलजात रे
जहाँ पतिततम महादीनतम संस्थित जन अज्ञात रे ।

चाह रहा नत होना तेरे सम्मुख करुणाधाम
लेकिन तुम तक पहुँच न पाता मेरा नाथ प्रणाम
उस गहराई में स्थित तेरे शरण सुखद पद तात रे -
जहाँ पतिततम महादीनतम संस्थित जन अज्ञात रे ।

वहाँ गर्व की कभीं न हो सकती गति दयानिधान
जहाँ भ्रमण तेरा उदारता का ओढ़े परिधान
दर्शित वहीं तुम्हारा सज्जित दया वसन से गात रे -
जहाँ पतिततम महादीनतम संस्थित जन अज्ञात रे ।

पा न कभीं सकता उर मेरा वह पथ गमन प्रवीण
असहायों के परम सहायक आप जहाँ आसीन
सुहृद रहित के सुहृद वहीं तुम ’पंकिल’ तिमिर प्रभात रे-
जहाँ पतिततम महादीनतम संस्थित जन अज्ञात रे ।
(’पंकिल’ - मेरे बाबूजी )

11 अगस्त 2009

जल ही जीवन का सम्बल है

अप् सूक्त : [जल देवता ]
ऋचा -
शं नो देवीर् अभिष्टय आपो भवन्तु पीतये
शं योर् अभिस्रवन्तु नः ....-
-ऋग्वेद

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जल ज्योतिर्मय वह आँचल है
जहाँ खिला -
वह सृष्टि कमल है
जल ही जीवन का सम्बल है ।

’आपोमयं’ जगत यह सारा
यही प्राणमय अन्तर्धारा
पृथिवी का
सुस्वादु सुअमृत
औषधियों में नित्य निर्झरित
अग्नि सोम मय-
रस उज्ज्वल है ।

हरीतिमा से नित्य उर्मिला
हो वसुन्धरा सुजला सुफला
देवि, दृष्टि दो -
सुषम सुमंगल
दूर करो तुम अ-सुख अमंगल
परस तुम्हारा -
गंगाजल है ।

जल के बिना सभी कुछ सूना
मोती मानुष, चन्दन, चूना
देवितमे,
मा जलधाराओ
’गगन गुहा’ से रस बरसाओ
वह रस शिवतम
उर्जस्वल है

ऋतच्छन्द का बिम्ब विमल है
जल ही जीवन का सम्बल है ।

-छविनाथ मिश्र

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# नया ज्ञानोदय के बिन पानी सब सून विशेषांक से साभार ।

7 अगस्त 2009

पर्यावरण के प्रति प्रेम का अनूठा प्रतीक-बंधन

राखी बीत गयी । बहुत कुछ देखा, सुना, अनुभूत किया - पर एक दृश्य अनावलोकित रह गया, एक अनुभव फिसल गया । मेरे कस्बे सकलडीहा के बहुत नजदीक के एक गाँव की दो बच्चियों ने रक्षाबंधन पर राखी बाँधी , पर किसी मनुष्य की कलाई पर नहीं - अपने लगाये वृक्षों के तनों पर । मेरे अत्यन्त परिचित श्री देवेन्द्र और कमलेश जी की बेटियों निधि और अनन्या ने रक्षाबंधन के दिन अनेकों वृक्ष जो उन्होंने सप्रेम लगाये थे- उनके तनों पर राखी के सूत्र बाँधे । सब कुछ आत्मीय हो गया मनुष्य और प्रकृति के मध्य । १० और ११ वर्ष की इन बच्चियों ने वृक्षों का राग तो तभी महसूस लिया था - जब वह बहुत छोटी थीं और गाँव की मनोहारी प्रकृति में ही घुलमिल कर जीवन की सम्यक शिक्षा के अमोलक सूत्र सीख रही थीं । प्रकृति से अच्छा सिखावनहार कौन ?

"One impulse from a vernal wood
may teach you more of a man
of moral evil and of good
than all the sages can ." (William Wordswoth )
प्रकृति का प्रत्येक स्पंदन उनके हृदय में अभिव्यक्त हो रहा था शायद और बन रहे थे रिश्ते अजाने, अनभिव्यक्त । बच्चियाँ बड़ी हो रहीं थी , वृक्ष और भी आत्मीय हो रहे थे । वृक्ष सहला रहे थे उन्हे, संरक्षित कर रहे थे । अपने आनंद का स्वभाव भर दिया वृक्षों ने उन बच्चियों में ।हृदय में अपनापन, आचरण में सुहृद भाव, जीवन में कृतज्ञता - सब कुछ वृक्षों का दिया ही तो है । त्यौहार आते हैं, बच्चियाँ पेड़ों के साथ झूम उठती हैं । राखी भी आयी - स्नेहानुराग जाग उठा ।पर्यावरणीय रक्षा का संकल्प अभिभूत कर गया इन अबोध बच्चियों को । वृक्ष से बड़ा भाई कौन ? रक्षक कौन ? आत्मीय कौन ? राखी और किसे बँधे ? तो थाल में रोली, अक्षत, चन्दन और राखी लेकर चल पड़ीं अपने सुहृद पेड़ों को राखी बाँधने । मन में प्रिय भाव था और संतुष्टि भी । संतोष भी था कि वे अकेली नहीं इस भावना से संपृक्त । अनिल पुसदकर जी की प्रविष्टि का सन्दर्भ और उसकी प्रेरणा भी तो समानान्तर खड़ी थी ।

मैं उनकी इस पवित्र भावना से अभिभूत हूँ । कामना कर रहा हूँ - पर्यावरणीय सन्दर्भ हमारी रोजमर्रा के जीवन के सन्दर्भ बन जाँय, हम व्यथित हों प्रकृति के दुख से, उल्लसित हों प्रकृति के सुख से ।

5 अगस्त 2009

’मैं चिट्ठाकार हूँ, पर........’

मैं चिट्ठाकार हूँ, पर अनूप शुक्ल जैसा तो नहीं , जिनकी लेखनी उनके प्राचुर्य का प्रकाश है । यह प्राचुर्य का प्रभाव ही है न, जिससे मानव अपने को अभिव्यक्त करता है । वह अपने को बहुतों में, क्षुद्र को विराट में प्रतिष्ठित देखना चाहता है । क्या आन्तरिक आकांक्षा ही इस लेखनी के मूल में है ? या आत्माभिव्यक्ति ? ले देकर यह आत्माभिव्यक्ति ही तो मानव का चिरन्तन स्वभाव है । ’बर्क’ (Burke) की मान लें तो "आत्मप्रकाश की भावना ही हर प्रकार की कला का मूल है ।" अनूप शुक्ल जैसा कोई क्यों नहीं ? क्योंकि आत्माभिव्यक्ति का सच्चापन - मतलब उसमें स्वाधीनता का आनन्द और कृत्य का संयम - अनूप शुक्ल हमेशा बरकरार रखते हैं ।


मैं चिट्ठाकार हूँ, पर ज्ञानदत्त पाण्डेय जैसा तो नहीं - जैसा बहुधा होना चाहता हूँ । विषय वस्तु की चाकरी करने वालों की भीड़ में मैं भी हूँ - पर ज्ञानदत्त पाण्डेय क्यों होना चाहता हूँ ? हम दो चीजें ही न निरूपित करते हैं किसी लिखावट में - पहली, लिखा क्या गया है ? और दूसरी, कैसे लिखा गया है ? मतलब रचना का उपादान या विषय-वस्तु, और रचना का रूप । अंग्रेजी में ’मैटर’ (Matter) और ’फॉर्म’ (Form) । मैं सोचता हूँ कई बार कि सारा चिट्ठाजगत ज्ञानदत पाण्डेय को क्यों नहीं पढ़ता , यह जानने के लिये कि उपादान (मैटर) रचना की आत्मा नहीं हो सकता । वह तो स्थिर जगत का अंग है । वह किसी समय, किसी युग, किसी व्यक्ति की संपत्ति नहीं । यह ’मैटर’ तो सबका है, और सब दिनों का है । उसमें अपने या किसी के लिये कोई नवीनता नहीं होती । यह मैटर तो ’मूल्य’ धारण ही करता है तब, जब रचनाकार की आत्मशक्ति उसमें संयुक्त होती है । बाहरी दुनिया से प्राप्त सभी मैटर - अच्छे-बुरे, परिचित-अपिरिचित, क्षुद्र-साधारण- सभी जब रचनाकार की आत्मशक्ति से तुष्ट होकर रचना के आश्रय में आ जाते हैं, तब तत्क्षण ही लगने लगता है, अरे ! यह तो वह नहीं, यह तो कुछ और है, नया कुछ और ।

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’मैं चिट्ठाकार हूँ, पर....’ अगली किन्हीं कड़ियों में सुविधानुसार जारी रहेगा....

2 अगस्त 2009

मैथिली शरण गुप्त के जन्मदिवस (3 अगस्त) पर

हिन्दी साहित्य के उज्ज्वल नक्षत्र राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त का जन्मदिवस है कल । प्रस्तुत है उनका प्रसिद्ध और विख्यात गीत , ’सखि वे मुझसे कह कर जाते !’ - पढ़े भी और सुनें भी ।


सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?

मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को, प्राणों के पण में,
हमीं भेज देती हैं रण में -
क्षात्र-धर्म के नाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

हु‌आ न यह भी भाग्य अभागा,
किसपर विफल गर्व अब जागा?
जिसने अपनाया था, त्यागा;
रहे स्मरण ही आते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
पर इनसे जो आँसू बहते,
सदय हृदय वे कैसे सहते?
गये तरस ही खाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

जायें, सिद्धि पावें वे सुख से,
दुखी न हों इस जन के दुख से,
उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से?
आज अधिक वे भाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

गये, लौट भी वे आवेंगे,
कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे,
रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
पर क्या गाते-गाते?
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

 

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