30 दिसम्बर 2009

शायद, आज मैं मिलूँगा तुमसे !

ज सुबह धूप जल्दी आ गयी
नन्दू चच्चा को
महीने भर का काम मिल गया
छप्पर दुरुस्त हो गया
आज बगल वाली शकुन्तला का
"सर्दी नहीं पड़ेगी" की भविष्यवाणी
फेल हो गयी - पन्ना बाबा चहक उठे

रेखवा की अम्मा ने
पहली बार ओढ़ ली शाल
और आज पहली बार
लछमिनियाँ ने बेच दिया पूरा अमरूद

कोआपरेटिव पर आज मिलने लगी खाद
किसी का सिर नहीं फूटा किरासन की लाइन में
जॉब-कार्ड पर पहली बार अंकित हुआ काम
सोहन भईया ने बो दिया गेंहूँ
धान घर आ गया आज

अखबार में पढ़ा - "दो घंटे अधिक रहेगी बिजली "
आज पहली बार बाजार साफ किया सफाईकर्मी ने
आज प्रधान जी ने नहीं कटने दिया एक पेड़

बाहर की धूप मेरे आँगन में उतर आयी
मन का धुँआ गुम हो गया कहीं
शुभ संभाव्य की प्रस्तावना ने रोमांच दिया
अन्तर में सज गया सुभाषित
आज मेरे आँवले के वृक्ष ने टपकाये कुछ फल
खिल गया सुर्ख लाल गुलाब पहली बार पौधे पर
मन हुआ उल्लसित

शायद
आज मैं मिलूँगा तुमसे !


 Photo Source : Google

27 दिसम्बर 2009

करुणावतार बुद्ध - 8



कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक
देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं
मानवता की चेतना का संस्कार
करने हेतु । पुराने पन्नों में अनेकों
बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर
पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने
को प्रेरित करते हैं । इनकी अमित
आभा धरती को आलोकित करती
है, और ज्ञान  का प्रदीप उसी से
सम्पन्न होकर युगों-युगों तक
मानवता का कल्याण करता रहता
है । करुणावतार बुद्ध के ऐसे ही  
महानतम चरित्र को उद्घाटित करतीं 
प्रविष्टियाँ नाट्य-रूप में प्रस्तुत हैं । 
करुणावतार बुद्ध- , , , 4, 5 ,6, 7

के बाद प्रस्तुत है आठवीं कड़ी....


करुणावतार बुद्ध 
जारी.....

ब्राह्मण - इतनी विकलता क्यों वैरागी ? परास्त पौरुष और आत्मघाती अधैर्य के वशीभूत क्यों हो गये ? तुम्हारा मन तो जैसे नदी के दूसरी ओर के अँधियार के सदृश हो गया है । कहने के लिये उस पार, सहने के लिए इस पार ! अरे तरुणतापस ! कुछ दिन रहो हमारे पास ! यज्ञाग्नि की ऊष्मा से अपनी जड़ता जाड़ को तोड़ने का यत्न करो ! सत्संगति की सुरभि से अपनी जीवन बगिया मँह-मँह करो !

सिद्धार्थ - जगत की जिस जटिल पहेली  ने मुझे आक्रान्त कर लिया है, उसे निर्मूल करें ब्राह्मण देव ! दुख है तो क्यों है और वह मिटे कैसे ? व्यापक विश्वयातना से त्राण कैसे मिले ? आप मेरी विकलता समझें ! मुझे दिशा दें । मेरा आलोक बनें । मेरी विचलित उद्विग्न मति को स्तिथ प्रज्ञा का पाथेय दें ।

ब्राह्मण - मनुष्य की बुद्धि बहुत थोड़ी दूर तक देख सकती है । जीवन की अखिल योजना परमात्मा के हाथ है । उसी को पूरी ज्यामिती का पता है । हमारे सम्पूर्ण जीवन के पूर्ण चक्कर को वह, केवल वही देख सकता है । पता नहीं कितने युगों से किस-किस रूप में हमारे जीवन की धारा बहती चली आ रही है । पता नहीं कैसे कैसे व्यतिरेक, विषमता, बाधा, दुख, आनंद, पुलक आदि में प्रवहित होती चली जा रही है और अनंत अंबुधि के वक्षस्थल में अपने को लय करके अपने स्रोत में सुख से सो जायेगी । हमारे इस जन्म के पहले भी तो हमारा जीवन-प्रवाह था और मृत्यु के अनंतर भी तो वह बना रहेगा । क्या उसे हम समग्र रूप में देख सकते हैं ? हमारा देखना अधूरा है, अपूर्ण है, अस्त-व्यस्त है, खंडित है, विकृत है । अतः ’क्या’, ’कैसे’, ’क्यों’ की हम व्यर्थ चिन्ता करके व्यग्र क्यों हों ? भविष्य को जिसने रचा है, वही उसकी सँभाल भी करेगा । तुम जिस गोरखधंधे में उलझे हो, जिस उलझन को सुलझाना चाहते हो उसमें और उलझना, सिर खपाना बच्चों-सी मूर्खता नहीं तो और क्या है !

दूसरा ब्राह्मण - और अरे सुदर्शन ! जन्म-मरण के चक्रव्यूह को बेधने वाला अभिमन्यु कभीं पैदा ही नहीं हुआ । जिसने इसे रचा है, वही इसका रहस्य जानता है और उसी के साथ हम भीतर प्रवेश भी कर सकते हैं । प्रभु की शरण लो ! उसके प्रकाश के बिना इस घोर तिमिर में एक डग आगे बढ़ना खतरे से खाली नहीं है । हृदय में उसकी मूर्ति, चित्त में उसकी स्मृति, प्राणों में उसकी प्रीति - यही तेरे प्रश्न का उत्तर है, तेरी समस्या का समाधान है, तेरी उलझन की सुलझन है । जिस प्रभु  ने गर्भ से तुम्हारी रक्षा की, जो प्रतिपल तुम्हें सम्हाल रहा है, क्या वह भविष्य में तुम्हें निराधार छोड़ देगा ? एक पल भी उसके सहारे के बिना तुम टिक सकोगे ? अतः उसकी चरण शरण ही कल्याणी है ।


सिद्धार्थ - हाय रे , नर की दुर्बलता, दुर्दशा ! वह बुरी तरह भाग रहा है शान्ति के लिये, आनंद के लिये, परितृप्ति के लिये और मिलता है उसको बदले में दुख, अशांति, ज्वाला, विछोह ! नहीं समझ पा रहा हूँ आपकी प्रभु, परमात्मा, ईश्वर, आत्मा, समर्पण, सत्संग, प्रार्थना, परिक्रमा, शोध, बोध, विज्ञान, विश्वास, नीति, अनीति की बातें । अव तक कहाँ सोया है वह यदि परमात्मा है तो ! अब तक क्यों खोयी है वह यदि आत्मा है तो ! अब तक क्यों निरानंद हैं दिशायें यदि वह आनंद है तो ! आप का यह यज्ञ-विधान, कर्मकाण्ड, वाह्याचार, आपकी स्वाहा-स्वधा - सब आपको मुबारक हो ! मेरा समाधान यहा नहीं है । मेरे चरण इस परिक्रमा के लिये नहीं बने हैं । बहुत हो गया । वसुधे तेरी पीर की प्रकृति ये हविष्य-भोजी पंडे-पुजारी नहीं जान सकते हैं । जगत दुखहारी यदि कोई ’हरि’ है तो हमें अपना परिचय दे, परिचय दे !
(दोनों हाथ उठाकर फूट-फूट कर रोने लगते हैं । )

ब्राह्मण - अरे योगी ! दीख पड़ने वाली विपरीतता और प्रतिकूलता में जब ’जीवनधन राम’ का छिपा हुआ हाथ दिख जाय तो फिर हँसे बिना नहीं रह पाओगे ! स्वांग में छिपे हुए देवता का सभी रूप हृदय को लुभाने वाला है । चाहे वह जिस रूप में आये, उसके चरण सदैव तुम्हारे हृदय पर ही रहेंगे । यह तो युद्ध-क्षेत्र है प्यारे ! यह तो कर्मभूमि है ! इसमें कैसा घबराना ? तुम उसके विराट अभिनय के एक पात्र हो ! बैठो मेरे पास ! "महाजनो येन गतः सपंथा ।"

सिद्धार्थ - मैं बंधन-क्रंदन कुछ भी नहीं मानूँगा । दिशा नहीं देखूँगा, दिन-क्षण नहीं गिनूँगा । मैं तो उद्दाम पथिक हूँ ।
(आँखें मूँद लेते हैं । अंतराल में पूर्वदृष्टा तपस्विनी प्रकट दिखायी पड़ती है । वह आगे बढ़ने का अंगुलि निर्देश करती है । उसकी मधुर प्रेरक हँसी में अमृत-वर्षण है । सिद्धार्थ बड़बड़ाने लगते हैं - )
नई दिशा का स्वर्ण द्वार खुलने में अभी कितनी देर है । बचें या मरें, नाव खे कर पार ले जाना है । पृथ्वी का जितना दुःख है, पाप है, जितना अमंगल है, जितनी हिंसा है, जितना हलाहल है - सब तरंगित हो उठे हैं मेरे सामने । फिर भी नाव खे कर ले चलनी है । अखिल विश्व के दुख-दुरितों के हाहाकार में अनंत आशा को चित्त में लेकर जाना है, जाना है, आगे जाना है ।
(तपस्विनी फिर मुस्करा कर अंगुलि का इशारा करती है ।)
ब्राह्मणों रख दो अपनी निन्दा-स्तुतिवाणी ! रखे रहो अपने साधुत्व का अभिमान ! मुझे प्रलय-पयोधि पार करना है । नये सृजन की नई विजय-ध्वजा फहराना है ।

ब्राह्मण - चेतो तरुण वयस ! ’हरिं नराः भजंति येति दुस्तरं तरंतिते।" हठवादी नहीं बनो !

सिद्धार्थ - (आँखें बंद किये ) आदेश आया है । बन्दरगाह का समय समाप्त हुआ । अज्ञात समुद्र के तीर पर अज्ञात है वह देश । वहीं के लिये प्रचण्ड आह्वान जग उठा है । टूट पड़े आँधी, उमड़े तूफान, सिद्धार्थ को तीर पार कर अज्ञात देश जाना है ।
(तपस्विनी मुस्करा कर अँगुलियाँ हिला रही है। सिद्धार्थ उस मंदस्मित में खो गये हैं ।)

अगली प्रविष्टियों में जारी....

Photo Source: Scan from Frontline (Dec.18, 2009).

24 दिसम्बर 2009

जब हो जाये दिवसान्त शान्त (गीतांजलि का भावानुवाद )

If the day is done, if birds sing no more,
if the wind has flagged tired,
then draw the veil of darkness
thick upon me, even as
thou hast wrapt the earth with
the coverlet of sleep and
tenderly closed the petals of
the drooping lotus at dusk.

From the traveller, whose sack of
provisions is empty before the
voyage is endedm whose garment
is torn and dust-laden, whose
streingth is exhausted, remove
shame and poverty, and renew
his life like a flower under the
cover of thy kindly night.

(R. N. Tagore : Geetanjali)



ब हो जाये दिवसान्त शान्त हो विहग काकली छन्द प्रभो
अठखेली करते मारुत की हो जाय गिरा श्लथ मन्द प्रभो
जब अखिल धरित्री निद्रा के अम्बर में लिपटी लेटी हो
नत शिर मृदु सरसिज पंखुड़ियाँ मुद्रित दृग धुन्ध लपेटी हों ।

तब देना गहन तिमिर अंचल मेरे आनन पर खींच प्रभो
उस यात्री को निज रजनी की करुणा से देना सींच प्रभो
यात्रान्त पूर्व जिसका समस्त पाथेय बोझ हो रीत गया
यात्रा के क्रम में जीर्ण शीर्ण हो गया नाथ हो वसन नया ।

हो धूलि धूसरित पट जिसका सब शक्ति गयी हो छीज प्रभो
उस यात्री की हर लेना लज्जा दैन्य नाम की चीज प्रभो
कर देना उसका प्राणनाथ प्रिय ’पंकिल’ पुनः नवल जीवन
जैसे हो कोई खिला समन है यही प्रार्थना जीवन धन ।

(पंकिल : मेरे बाबूजी )

22 दिसम्बर 2009

अधूरी कविता ...

एक पन्ना मिला । पन्ने पर फरवरी २००७ लिखा है, इसलिये लगभग तीन साल पहले की एक अधूरी कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ । अधूरी इसलिये कि उस क्षण-विशेष की संवेदना और भाव-स्थिति से अपने को जोड़ नहीं पा रहा और इसलिये भी कि एक प्रविष्टि का काम हो जायेगा ....
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दौड़ो !
आओ !
बटोर लो !
मेरे अन्तर में
गहुआ कर फूल उठा है पारिजात-वन,

दृष्टि मेरी,
मेरी जिह्वा
और गमन मेरा
झोरता है पुष्प-तरु को 
बिखर जाता है सुन्दर हरसिंगार चहुँओर !

पारिजाती हो गया है अस्तित्व मेरा
सहला रही है सृष्टि को यह गंध ।

20 दिसम्बर 2009

करुणावतार बुद्ध -7


कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक
देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं
मानवता की चेतना का संस्कार
करने हेतु । पुराने पन्नों में अनेकों
बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर
पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने
को प्रेरित करते हैं । इनकी अमित
आभा धरती को आलोकित करती
है, और ज्ञान  का प्रदीप उसी से
सम्पन्न होकर युगों-युगों तक
मानवता का कल्याण करता रहता
है । करुणावतार बुद्ध के ऐसे ही  
महानतम चरित्र को उद्घाटित करतीं 
प्रविष्टियाँ नाट्य-रूप में प्रस्तुत हैं । 
करुणावतार बुद्ध- , , , 4, 5 ,6 के 
बाद प्रस्तुत है सातवीं कड़ी....


करुणावतार बुद्ध

(पंचम दृश्य)

(राजकुमार सिद्धार्थ गहन निराशा और विषाद के बोझ में दबे मंथर गति बढ़े जा रहे हैं । स्थान अज्ञात, दिशा अज्ञात और लक्ष्य अप्राप्त है । अभी वही वन प्रांतर है )

सिद्धार्थ - सारी रात अज्ञात पथ पर भटकता रहा । सोच रहा था पर्याप्त दूरी को मेरे चरण नाप चुके होंगे, किन्तु दिनमणि की किरणों में साफ दिख रहा है कि अभीं तो वही बीहड़ वन-वीथि  है । अभी वही तरु-संकुल वनप्रांतर है जहाँ अनजाने कहाँ खोया, सोया द्वंद्वाक्रांत मन शाश्वत सुख की तलाश में तड़प रहा है । लगता है मैं स्वयं से ही मात खा गया हूँ अब और अपनी ही धमनियों के उबलते रक्त से स्नान कर रहा हूँ ।

(कुछ ही दूरी पर एक तरु-तृणाच्छादित पर्ण कुटीर से छनकर कुछ स्वर सुनायी पड़ रहे हैं । कुछ वैदिक कर्मकाण्डरत द्विज शास्त्र-चर्चा में रत हैं । यज्ञ के धुँएं का आवर्त दृश्य हो रहा है । सिद्धार्थ स्वतः ही उधर पग बढ़ा देते हैं । इन्हें याज्ञिक ब्राह्मणों का दल घेर लेता है ।)

ब्राह्मण - अरे ओ तरुण तपस्वी,  आ जा हमारे साथ ! किस कुटुम्ब की भरी-पूरी कोख में शून्यता भरी है तुमने । तुम तो अदभुत पुरुष लग रहे हो । घुँघुराली भ्रमरवत अलकें चन्द्र-भाल को चूम रही हैं । कर्णांतदीर्घ लोचन हैं । आजानुबाहु, विशाल वक्ष और वृषभ-स्कंध तुम्हारे महापुरुष होने की कहानी कह रहे हैं । देख रहा हूँ तुम्हारे उत्तम ज्योतिषीय लक्षण । अपना परिचय दो ! ओ अनाहूत अभ्यागत ! हमारी उत्सुकता शान्त करो ।

सिद्धार्थ - वन्दनीय देव ! मेरा परिचय आप इतना ही समझ लें कि मैं मनोरथों के निर्गंध पुष्प एकत्र करने वाला व्यथित प्राण युवा पुरुष हूँ । कभी कहीं का राजा बनने वाला मैं, जब विश्व पीड़ा पुकारने चली आयी, तो उसका त्राण करने दौड़ पड़ा । पुर, परिजन छोड़ते नहीं थे । उनकी अनगढ़ अर्गला तोड़ कर निर्जन निशा में खुले आकाश के नीचे निकल आया हूँ । मैं चिर सुख का अमृत-कलश खींच लाने के लिये निकला हूँ , दिशा-दिशा में उड़ जाना चाहता हूँ इस निमित्त । आकुल हैं प्राण धरती को जरा, व्याधि, विपन्नता, मरण से मुक्त करने के लिये ।

ब्राह्मण - हे राजकुमार ! कर्म प्रशंसनीय़ वही हो सकता है जो किसी प्रशंसनीय़  उद्देश्य का साधक हो । तुम्हारी थकी हुई वाणी बता रही है कि तुम्हारे बार-बार द्वार थपकाने पर भी तुम जो ढूँढ़ रहे थे , वह मिला नहीं । फैली हुई तेरी अँजुरी में दिव्य-वरदान का सुमन खिला नहीं । क्या द्वार सभी जानते हो ? मरुभूमि में पानी की खोज में इधर-उधर दौड़ना बुद्धिमानी का काम नहीं । जगत के स्वरूप को पहचानने का यत्न करो । जब वह झूठा प्रमाणित हो जाय तो अपनी कार्यशैली को तदनुरुप बनाने का प्रयास करो । प्रकृति के चिरन्तन, शाश्वत नियमों से सब आबद्ध हैं । काल-चक्र की गति से कौन बचा है ?



सिद्धार्थ - विप्रवर ! यदि मेरी वीणा भग्नतंतु है, तो क्यों ? क्यों मस्तक झुका हुआ है, चरण विजड़ित हैं ? मेरा जहाँ कोई नहीं है वहाँ से क्यों लगता है कोई मुझे पुकार रहा है ? मुझे बताओ ! मैं अगणित जन्मों में कहाँ-कहाँ जन्मा हूँ , किन-किन लोकों की यात्रा की है, किन-किन सुख-दुखों से दो चार हुआ हूँ ! कैसे समाप्त होगी यह विश्व-वेदना ? कौन करेगा ?

ब्राह्मण - ओ तरुण ! तूँ यहाँ आँखों के नीर से नहीं, शान्ति से खेल । तूँ यहाँ विषाद से नहीं, आह्लाद से पुलकित हो ! स्वप्न की गोद में नहीं, सत्य के कंधे पर बैठ । पश्चाताप का नहीं, प्रेम का आलिंगन कर ! तुझे वियोग का बटोही नहीं, संयोग का तीर्थंकर बनना चाहिये ।न जाने कब से कितनी मृत्युओं के द्वार को लाँघता यह जीवन चलता आया है । न जाने कितनी बार और इस मृत्यु के पार-द्वार जाना पड़ेगा । दीख पड़ने वाली विपरीतता और प्रतिकूलता में जब ’जीवन-धन’ का छिपा हुआ हाथ दिख जाये तो फिर हँसे बिना रहा कैसे जायेगा ! यह तो युद्धक्षेत्र है प्यारे ! यह तो कर्मभूमि है न ! इसमें घबराये कि गये ! 

भविष्य की ओर से निश्चिन्त हो जाना ही वर्तमान को आनंदमय बनाना है । हमें देखो ! हमारी इस निश्चिन्तता और अलमस्ती की तह में प्रभु पर अखंड निर्भरता है । उसकी वात्सल्यमयी गोद में अपने को डाल देना है । उसके विशाल वक्षस्थल में अपने को छुपाकर, सब ओर से आँखें मूँदकर, माँ की छाती का दूध पीना है, और लोक-परलोक सब भूल जाना है । जननी से एकाकार हो जाना है । यहाँ जगत या जगत व्यथा को स्मरण करने का कैसा यत्न ! माँ के स्तन से मुँह लगाया कि संसार मिटा, फिर भविष्य की निगोड़ी चिन्ता और लोक-परलोक का अस्तित्व ही कहाँ रहा ? तुम तो सदा-सदैव उसकी शीतल गोद में सुरक्षित हो । वह तुम्हें अपनी छाती में छिपाये हुए चुम्बनों की वर्षा से तुम्हारे रोम-रोम को नहला रही है । भविष्य के गर्भ में क्या है, भावी क्या है, इसकी चिन्ता करने वाले हम कौन ?

सिद्धार्थ -  हर दिन की पुनरावृत्ति एक हानि जैसी लग रही है, जैसे उसने कुछ मेरा छीन लिया । आज फिर आकर वह कल की कहानी में जुड़ गया । हे विप्रवर ! सामने क्षणिक सुख की मृगमरीचिका दिखाकर दुख के आवर्त में डुबो देने वाले दिन को जी करता है हाथ बढ़ाकर पकड़ लूँ, और उसकी छाती चीरकर समयातीत आनंद की अक्षय थाती हथिया लूँ ।  यह देखिये सामने, कितने स्वाधीनभाव से फुदक रहा है यह शुक ! उसे भय नहीं है । इतने पास आकर वह चारा चुग रहा है । यह स्वाधीनता उसकी निजी सम्पत्ति है । इसने यह मुक्तता, यह अभय कहाँ से पाया ? जिधर फुदक-फुदक कर जाना चाह रहा है, उधर जा रहा है । क्या यह सच बखान रहा है कि समय को मत कोसो । समय सुन्दर है ।

ब्राह्मण - तुम्हारा वह परम आराध्य कौन है जिसके हित यह योगी वाला फेरा है । तुम्हारी वह वेदना क्या है जो तुम्हारी वाणी में गूँज रही है ? तुम्हारी स्मृति में वह कौन है जो तुम्हारे संकल्पों को मथ रहा है ? प्रेम से भी मधुर तुम्हारी कौन-सी निधि है ? बताओ तो सही वासना से विसु्ध और विछोह से गीली अपनी उपलब्धि-तृषा को !

सिद्धार्थ - विप्र ! मैं उस निरपेक्ष तत्व को कौन-सी भाषा दूँ  जिसकी मुझे खोज है । वह हमारी परिभाषा में नहीं बँध सकता । सीमा से असंपृक्त उस महाकाश की टोह लेना चाहता हूँ, जिसमें दिशायें जन्म लेती हैं और काल बहता है । जिसमें सृजन, प्रलय, बन्धन, अंधकार, पाप, पुण्यादि सब तिरोहित हो जाते हैं । मुझे दुःखान्तक खेल का अंत और सुःखान्तक खेल का प्रकाश करने वाले सर्व-सर्वत्र के जागरण की ललक है, तृषा है, व्यथा है । क्या मुझे उस लोक का दर्शन करा देंगे ! मैं तो आगत विगत अनागत के उस उत्स को आक्रान्त कर देना चाहता हूँ जिससे दुःखान्त लीला की कल्लोलिनी प्रवहमान है ।
अगली प्रविष्टियों में जारी......

17 दिसम्बर 2009

सौन्दर्य लहरी

’सौन्दर्य-लहरी’ संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है । आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य । निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ’सौन्दर्य-लहरी’ में । उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा । अब यह आपके सामने प्रस्तुत है । ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ - सा प्रयास है यह । अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें । सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता । मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है । उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा । जो सहेजूँगा, यहाँ लाकर रख दूँगा । साभार।








शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं ।
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ॥
अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरंच्यादिभिरपि ।
प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ॥१॥

शिव निस्पंदित,निष्क्रिय हैं
यदि नहीं शक्ति के साथ ।
यदि शक्ति सहित हैं तो
रच देंगे अतुल, अगाध;
जब शिव स्वयं विष्णु-ब्रह्म के साथ
तुम्ही को पूजित करते
किस प्रकार तब अकृत-पुण्य जन
योग्य बनेंगे
सहज तुम्हारे आराधन के ॥१॥










तनीयांसं पांसुं तव चरण पंकेरुहभवं ।
विरिंचिःसन्चिन्वन् विरचयति लोकानविम् ॥
वहत्येनं शौरिः कथमपि सहस्रेण शिरसां ।
 हरः संक्षुद्यैनं भजति भसितोद्धूलन विधिम् ॥२॥
सहेजकर तुम्हारे पद-पंकज के
किंचित रज कण  
रच देते हैं अविकल सृष्टि
यह सुन्दरतम, विमुग्ध हो ब्रह्म,
कैसे-कैसे सहस्र मस्तकों पर सम्हालते
सजाते हैं विष्णु शेष-रूप हो
औ’ भस्म बनाकर समो लेते हैं 
हर (शिव) स्व-तन पर । 
तव-चरणों की धूल है
अखिल  ब्रह्माण्ड॥२॥









अविद्यानामंतस्तिमिर-मिहिर द्वीपनगरी।
जडानां चैतन्य स्तबक मकरंद स्रुतिझरी॥
दरिद्राणां चिंतामणि गुणनिका जन्मजलधौ ।
   निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपु वराहस्य भवति ॥३॥

तुम भानु-द्वीप की नगरी हो
मूढ़-हृदय के अंधकार को,
चेतना-गुच्छ हो जड़मति को 
जिनसे झर-झर पराग-उल्लास झरे, 
हो दीन-पतित को 
चिंतामणि गर-माल
औ’ अगाध सागर मे जकड़े जन को 
जन्म-मरण के
हो मुर-रिपु वराह के मुख-सी !॥३॥








जारी....


15 दिसम्बर 2009

तेहिं तर ठाढ़ि हिरनियाँ ....

म्मा गा रही हैं - "छापक पेड़ छिउलिया कि पतवन गहवर हो..." । मन टहल रहा है अम्मा की स्वर-छाँह में । अनेकों बार अम्मा को गाते सुना है, कई बार अटका हूँ, भटका हूँ स्वर-वीथियों में । कितनों को संगी बना लिया है अम्मा के गीतों से उठाकर, कितनों के गले मिल रोया हूँ, कितनों का विरह अपने प्राणों में भर लिया है, कितनों के उपालंभ सहे हैं,  कितनों की गालियाँ और महसूस किया है न जाने कितनों की टीस । अम्मा लगातार गाये जा रही हैं, स्वर भरभरा रहा है - "तेहिं तर ठाढ़ि हिरनियाँ मनइ मन अनमन हो " । अम्मा के स्वर काँपते नहीं थे पहले या शायद अम्मा ऐसे गीत नहीं गाया करती थीं पहले या मेरे भीतर पहले अब-सी संवेदना की कोंपलें नहीं फूटी थीं । अम्मा तो गाती थीं, मैं सुनता नहीं था । आज सुन रहा हूँ, अम्मा का स्वर काँपने लगा है । अम्मा के गीत की हिरनी अम्मा की आत्मा में उतर आयी है जैसे , उसका विरह घहरा कर गिर गया है अम्मा पर । गीत का हिरन मार दिया गया है । हिरनी की आशंका सही हो गयी है । अम्मा गा रही हैं - "मचिया बइठैलीं रानी कौशिला हरिनी अरजि करैं हो"...। चावल से कंकड़ निकालते हाँथ अचानक ही जुड़ जाते हैं अम्मा के, मैं पास सरक आता हूँ । अम्मा गाये जा रही हैं- "रानी! माँस त सींझै ला रसोईयाँ खोलड़ि मोहिं बकसऽ हो..."। 

अम्मा मेरी ओर देख रही हैं, होंठ काँप रहे हैं, हाथ जुड़े हुए ही हिलने लगे हैं , मैं घबरा रहा हूँ । लग रहा है रानी कौशिल्या का सामंती अस्तित्व मुझमें समा गया है । हिरनी अरज कर रही है - "खोलड़ि मोहिं बकसऽ हो..." । मैं और भी विकंपित ! क्या होगा खोलड़ी का ? अम्मा शोकविह्वल असहाय भाव से क्रन्दन करती हिरनी का चित्र देख रही हैं । प्रार्थना के स्वर सुन रही हैं हिरनी से, मुझे सुना रही हैं -"खोलड़ी त धरब निकुंज बन मन समुझाइब हो / समुझि समुझि बनवाँ चरबै जानबि हरिना बइठल हो.." । अम्मा सिहर रही हैं , आँखों में आकर ठहर गयी है बूँद । इस बूँद का खारापन कौशिल्या के आचरण में उतर गया है जैसे। स्वर सुन रहा हूँ - कौशिल्या बोल रही हैं - "बाउरि भइलू हरिनियाँ..." । अम्मा ठहर गयी हैं , प्राणों में छायी करुणा दुबक गयी है क्षण भर के लिये । कौशिल्या का इनकार अम्मा के स्वर को कठोर बना रहा है -"सगरे अजोध्या के राम दुलरुवा डफिया मढ़इहैं हो ..." ।  हिरनी का अस्तित्व लुट चुका है । असहाय भाव से विसूर रही है । उसकी दुनिया सूनी है । पर औचक ! घड़ा फूट गया हो जैसे, ठहरा हुआ करुण भाव पुनः बह निकला है, असहायता जैसे सहाय्य हो गयी है । अम्मा आँसू पोंछ रही हैं ..."जैसे सुन्न हमरो निकुंज बन अउर बृंदावन हो..." । मैं अंत सुनने को उत्सुक हूँ । सामंती व्यवस्था का पूरा चित्र आँखों के सामने घूम रहा है । तुलसी बाबा से इत्तेफाक नहीं करने का मन कर रहा है - "जे मृग राम के मारे, ते तन तजि सुरलोक सिधारे..." । हिरनी सोहर से निकल कर सामने खड़ी हो गयी । राम के जन्म का हिसाब माँग रही है । कौशल्या के मोद का सच दिखा रही है । मैं सिर झटकता हूँ - अम्मा गा रही हैं -"जैसे सुन्न हमरो निकुंज बन अउर बृंदावन हो / रानी! वइसे सुन्न होइहैं अजोध्या रमइया बिनु हो..."।

 

छापक पेड़ छिउलिया कि पतवन गहवर हो
तेहिं तर ठाढ़ि हिरनियाँ मनइ मन अनमन हो ॥१॥
[छिउली पेड़ की घनी छाँव के नीचे खड़ी हिरणी मन से अनमनी है । ]

का मरलीं जल की मछरिया कि नाहीं बनवा सावज हो
काहें तूँ ठाढ़ि हिरनिया मनइ मन अनमन  हो  ॥२॥
[हिरण उसे यूँ अनमना देखकर पूछता है -  "क्या सभी तालाब सूख गये जिससे सारी मछलियाँ मर गयीं (जल कहाँ मिलेगा अब ?) या सभी वन के तृण-पात सूख गये (चरने को क्या मिलेगा ?) कि तुम इस तरह अनमनी होकर खड़ी हो । ]

नाहिं मरलीं जल की मछरिया, नाहीं बनवाँ सावज हो
कौशिला रानी बाड़ीं गरभ से हरिना-हरिना करैं हो  ॥३॥
[हिरणी कहती है - "न तो तालाब सूख गये हैं, और न ही वन-प्रांतर तृण-रहित हुआ है । मैं तो उदास इसलिये हूँ कि कौशिल्या रानी गर्भवती हैं, और वो बार-बार खाने के लिये हिरण के मांस की इच्छा कर रहीं हैं । रानी तुम्हें मरवा डालेंगी । ]

मचिया बइठैलीं रानी कौशिला हरिनी अरजि करैं हो
रानी! माँस त सींझै ला रसोईयाँ खोलड़ि मोहिं बकसऽ हो ॥४॥
[हिरण मार दिया जाता है । दुःखी हिरणी सभा में बैठी हुई रानी कौशल्या से प्रार्थना करती है कि हिरण तो मार डाला गया । उसका मांस ही न रसोईं में पकेगा, मुझे कृपा करके उसकी खाल दे दी जाय ! ]

खोलड़ी त धरब निकुंज बन मन समुझाइब हो
समुझि समुझि बनवाँ चरबै जानबि हरिना बइठल हो ॥५॥
[मैं अपने हिरण की खाल को ही वन में अपने साथ रखकर अपने मन को समझा लूँगी, और यह प्रतीति करते हुए कि मेरा हिरण मेरे सम्मुख बैठा है, वन में चर लिया करुँगी । ]

बाउरि भइलू हरिनियाँ कि केइ बउरवलस हो
सगरे अजोध्या के राम दुलरुवा डफिया मढ़इहैं हो ॥६॥
[रानी रुष्ट हो जाती हैं । कहती हैं - हिरणी ! क्या तुम पागल हो गयी हो ! या किसने तुम्हें यह सब सिखा दिया है  ! तुम्हारे हिरण की खाल से तो सम्पूर्ण अयोध्या के दुलारे राम को खेलने के लिये खंजड़ी (डफली) बनेगी । खाल भी तुम्हें नहीं मिलेगी ]

जैसे सुन्न हमरो निकुंज बन अउर बृंदावन हो
रानी! वइसे सुन्न होइहैं अजोध्या रमइया बिनु हो ॥७॥
[हिरणी दुखित हो कर शाप देती है कि हे रानी ! जैसे तुमने मेरे वन और मन के वृंदावन को सूना कर दिया है हिरण के बिना, वैसे ही यह अयोध्या इस राम के बिना सूनी हो जायेगी । ]

13 दिसम्बर 2009

करुणावतार बुद्ध -6



कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक
देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं
मानवता की चेतना का संस्कार
करने हेतु । पुराने पन्नों में अनेकों
बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर
पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने
को प्रेरित करते हैं । इनकी अमित
आभा धरती को आलोकित करती
है, और ज्ञान  का प्रदीप उसी से
सम्पन्न होकर युगों-युगों तक
मानवता का कल्याण करता रहता
है । करुणावतार बुद्ध के ऐसे ही  
महानतम चरित्र को उद्घाटित करतीं 
प्रविष्टियाँ नाट्य-रूप में प्रस्तुत हैं । 
करुणावतार बुद्ध- , , , 4, 5 के 
बाद प्रस्तुत है छ्ठवीं कड़ी.....

करुणावतार बुद्ध

पिछली प्रविष्टि से आगे...
सिद्धार्थ - यह कौन-सा अतलान्त स्पर्श मेरे मन-प्राणों को छूकर चला गया है ! यह कैसा मृदुल स्पर्श मेरे सिर को शीतलता प्रदान कर रहा है !  यह किसका चुम्बन मेरे कपोलों से आ जुड़ा है ! लगता है मेरी जन्मदात्री माँ और पालनहार पिता, दोनों मेरे समीप आ गये हैं । ओ ज्योतिर्मय स्वर ! मैं तुम्हें नमन करता हूँ । तुम्हारी पंक्तियाँ ध्वनित कर रही हैं - "मुझे शब्द दो !" तुम्हारे शब्दों की टेर जैसे मुझे घेर कर कह रही है - "मुझे अर्थ दो", और अर्थ उत्कंठित होकर गुहार कर रहे हैं - "मुझे सार्थकता दो !" तुम्हारी दृष्टि मुझे सहला-सहला कर कह रही है - ’दृष्टि को विस्तार दो ! क्षण को विराट बना दो ! कर्मधारय बनो ! ओ रे, अव्ययीभाव, द्वंद्व को निस्तार दे दो !’
नहीं, नहीं, ऐसे अब हम नहीं रहेंगे । एक पल भी और अब हम नहीं सहेंगे । अब नहीं मुड़ेंगे , न किसी तट से जुड़ेंगे । आगे बढ़ेंगे, बढ़ेंगे, बढ़ेंगे ।

(वनदेवता की वाणी तरु-तरु, तृण-तृण से अनुगुंजित होती है । सिद्धार्थ अवाक खड़े रह जाते हैं । उनकी आँखों से दो बूँद छलक जाती है ।)



वनदेवता - महामना ! समय के रंध्र से अपने विजय-रथ को निकालो ! तुम्हारे अनेक जन्मों के पुण्य तुम्हारे मर्त्य-जीवन में यश और वैभव बन कर उगे थे । तुम्हारे पूर्व-जन्मों की कृतियाँ ही इन लोकों में बिखरी हैं । तुम्हारे तप की स्मृतियाँ, तुम्हारे धर्म की पताकायें अनेक लोकों में लहरायेंगी । तुम्हारे पूर्वजन्म के कलुष, संशय, काम-क्रोध, मोह, लोभ के संस्कार जो तुम्हारे मर्त्य जीवन की अर्गलायें थीं, वे अब स्वप्न की तरह बिखर जायेंगी ।  तुम्हारा चैतन्य-विलास विश्व की अज्ञान से अंधी आँखों का काजल होगा । ओ तेजस्वी तनय ! तुम्हें आशीर्वाद दूँ इस के पूर्व मेरा सजल प्रणाम स्वीकार करो !

सिद्धार्थ - मैं अखिल धरा की पीड़ा का शमन कर सकूँ, यह वर दो । सारा संसार दुखी है, दुखमोचन कर सकूँ ।

वनदेवता - ओ विभूति ! तुम चले ही इसीलिये हो । सब होगा, सब होगा । तुम्हारे चरण नहीं हारेंगे । बढ़े चलो,चढ़े चलो । तिमिर-गुहा को चीर-चीर ज्योति-पंथ प्रशस्त करो ! जो पिछली मोड़ पर छूट गये, जो तपती रेत से घबरा कर ठिठक गयेम ओ पथिक ! उन सबके लिये तूँ आज राह ढूँढ़ दे ।

(अरुणोदय आसन्न है । प्रातः विहंग की ध्वनि सुनायी पड़ती है । सहसा वन-प्रांतर अदृश्य हो जाता है । ब्राह्मणों की एक जोड़ी पुष्करिणी में स्नान कर सिद्धार्थ के समीप आ जाती है ।)

पहला ब्राह्मण - ओ बटोही ! पलभर तो ठहर, जरा मेरी भी सुन लो ! तुम राजकुमार हो, मुझे पता है । यह भी पता है कि तुम किस पीड़ा का वरण किये त्वरित चरण चले जा रहे हो । सुनो, सुनो ! जीवन की शाश्वत मान्यतायें जीवन की आदर्शोन्मुखी भावना से ही संभावित हैं । वैष्णवी वृत्ति लेकर भक्ति-मार्ग का वरण करो ! ईश्वरावलम्बन ही मार्ग है ।

दूसरा ब्राह्मण - चिन्तन की बंजर भूमि में क्यों कदमताल करने चल पड़े हो ! हरि से नेह लगाओ ! "हरि से लागा रहु रे भाई, तेरी बनत-बनत बन जाई !"

सिद्धार्थ - मेरे प्रश्नों का उत्तर दो विप्रवर ! क्या रोग, जरा, व्याधि  दुख को मिटाना मानव का अभिप्रेत नहीं ! क्या तुम यह कर सकते हो ? अब शास्त्रार्थ का समय नहीं है ।

(सिद्धार्थ उनसे हाँथ छुड़ा, मुक्त होकर आगे बढ़ जाते हैं ।)

अगली प्रविष्टियों में जारी ...



11 दिसम्बर 2009

स्वर अपरिचित ...

बीती रात
मैंने चाँद से बातें की ।
बतियाते मन उससे एकाकार हुआ ।
रात्रि  के सिरहाने खड़ा चाँद
तनिक निर्विकार हुआ ,
बोला -
"काल का पहिया न जाने कितना घूमा
न जाने कितनी राहें मैं स्वयं घूमा
और इस यात्रा में
- जीवन से मृत्यु की अविराम-
सब कुछ हुआ ज्ञात
नहीं शेष कोई धाम
पर आज मिल गया है
अपिरिचित-सा एक  स्वर
सिहर रहे हैं कर्ण-कुहर ।"

"देखता हूँ सृष्टि का विस्तार,
चतुर्दिक
मूर्छना के भाव में सिमटी हुई धरती-
तरु-तृण-पात के स्नेह से
नीर-निधि-उछ्वास तक ,
अनगिनत आयाम हैं इस मूर्छना के ।"

"मैंने सुन लिया है स्वर अपरिचित
मृत्यु के भी पार का ।
मैं अकंपित, अ-श्लथ यात्रा अविराम लेकर
सहज ही निर्मित करुँगा मार्ग ।
मुक्त होगा मार्ग वह,
नींव होगी चेतना की ।
जायेगा वह मार्ग
प्राची के ठौर ।"

9 दिसम्बर 2009

करुणावतार बुद्ध -5


कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक
देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं
मानवता की चेतना का संस्कार
करने हेतु । पुराने पन्नों में अनेकों
बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर
पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने
को प्रेरित करते हैं । इनकी अमित
आभा धरती को आलोकित करती
है, और ज्ञान  का प्रदीप उसी से
सम्पन्न होकर युगों-युगों तक
मानवता का कल्याण करता रहता
है । करुणावतार बुद्ध के ऐसे ही  
महानतम चरित्र को उद्घाटित करतीं 
प्रविष्टियाँ नाट्य-रूप में प्रस्तुत हैं । 
करुणावतार बुद्ध- , , , 4 के बाद 
प्रस्तुत है पाँचवीं कड़ी......

करुणावतार बुद्ध 

(चतुर्थ दृश्य )

(सिद्धार्थ तीव्र गति से चले जा रहे हैं । गहन रात्रि है । सहसा आकाश में बादल उमड़ आते हैं, और रिमझिम बूँदाबादी होने लगती है । वे बलात खिंचे-से चले जा रहे हैं, कोई स्वर जैसे उन्हें पुकार रहा है )

वनदेवता - चलो सिद्धार्थ ! तुम्हें वहाँ तक जाना है, जहाँ निखिल यात्रा विश्राम बन कर थम गयी है । जहाँ दिशाओं का स्वप्न नहीं जगा है । जहाँ काल अपने पंख समेट कर सोया है और जहाँ जीवन अमृत का छन्द बना गुंजरित है । तुम्हारी यात्रा वहाँ तक है ।

सिद्धार्थ - ओ अमृतकंठ ! कोई अंध ज्वाला मेरे प्राणों में लिपटी जा रही है । क्षण भर पहले का स्फुरित पद-न्यास श्लथ हो गया है । पर मैं चल निकला तो चल निकला । निशीथिनी तमिस्रा के दुकूल में धरती लेटी है । पावसी घन चातक को रुलाये दे रहा है । बूँदों से प्रक्षालित पौधे मन मारे नमित खड़े हैं । जुगनू ऐसे लग रहे हैं जैसे तड़ित तरुओं के प्राण निकल रहे हों । बरबस मुझे कोई गहन वन में खींचे चले जा रहा है । गौतम की गति को कौन और क्यों प्रभावित कर रहा है ! यह कैसी कल्पनातीत अवस्थिति है, जैसे काल ने सम्पूर्ण वेग से अपना रथ चला दिया है और मैं इस निविड़ता में बहा चला जा रहा हूँ ।

वनदेवता - ओ ब्रह्माण्ड  को ज्योतित करने निकले अमल ज्योतिपुंज ! ओ अनंत के अभ्र ! अपनी तृषित धरती को अमृत दो । बोध-स्रोतस्विनी की सदानीरा धारा सृष्टि को नहला दो । कृतार्थ कर दो जगत की चिर अभिलषित निर्वाण-पीठिका को ! कुछ ही कदमों पर एक तपस्विनी का कुटीर तुम्हारी प्रतीक्षा में कब से मुक्त कपाट है । दो प्रवीण ब्राह्मण तुम्हारे संग चलकर पथ-दर्शन करेंगे । मैं वनदेवता तुम्हारा आह्वान कर रहा हूँ ।


(एक पर्ण-कुटीर दृष्टिगत होती है । वहीं एक मंदस्मिता श्वेतकेशा श्वेतवसना दिव्य नारी बैठी हैं । सिद्धार्थ सादर प्रणाम करके साश्चर्य उस रात्रि में ज्योतित करती  नारी-मूर्ति को निहारने लगते हैं ।)

सिद्धार्थ - ओ ज्योतिर्मयी ! कौन हो तुम ? ओ तरल स्नेहा ! कौन हो तुम ?

तपस्विनी - वत्स ! अभी मैं तुम्हारा वह पता हूँ, जिसे तुम नहीं जानते । मैं वह नेपथ्य हूँ जिसे तुम्हारी आँखें अभी देख नहीं पातीं । सुनो !  मैं तुम्हारे जीवन के महाकाव्य की सरस पंक्ति हूँ । तुम मेरा परिचय स्वतः ही पा जाओगे जब कभीं कोमल कातर कामनाओं से तुम्हारा पद्मगात्र कलुषित होने लग जायेगा, जब क्षुद्र विजय-पराजय का हर्ष-विषाद तुम्हारे करुणा-कलित अंतर को तृषित कर देगा । मैं उस तपोदेश की आत्मा हूँ जहाँ अपावन अश्रु नहीं उगते । मैं उस शून्य की रत्नगर्भा धरित्री हूँ, जहाँ आलिंगन का सुख नहीं । उस निर्वेद की तटवासिनी हूँ जहाँ स्मृतियों का मेला नहीं लगता । तुम्हें तुम्हारी संपदा की खबर देने को ही इधर खींच लिया कि दिग्भ्रमित न होना ।

सुनो सत्यसंध ! तुम अनेकों बार इन नक्षत्र लोकों के यात्री रहे हो । सुनो बोधरूप ! अगणित लोकों में तुम्हारे असंख्य परिचित तुम्हारे तेज-वलय में विलीन हो उठे हैं । मैं तुम्हारे अभिनंदन में ही खड़ी थी । निर्भय होकर आगे बढ़ो । बाधाओं की भीड़ मिलेगी - संगी मत बन जाना ! अकेलेपन का बल पहचानना । मैं साथ रहूँगी । मैं तुम्हारे अनंत जीवन की तपस्या हूँ । मैं तुमसे कभी अलग नहीं हूँ । मेरा परिचय तो तुम्हें मिलेगा ही जब तुम परम-पुरुष के संकल्पों के साथ एकाकार हो जाओगे । फिर क्या रह जायेगा तुम्हारे लिये पाना । तुम्हें मेरा परिचय तब मिल जायेगा जब तुम मेरे सर्वरूप के महातीर्थ में निमज्जित हो जाओगे । मैं तुम्हारे पीछे लगी रहूँगी तुम्हारी सुदक्षिणा संगिनी । उठो, चलो !

यह लो, तुम्हारे श्रद्धालु उर, करुणार्द्र चित्त, विरक्त प्राण के बदले यह ज्योतियों की माला है । इसकी दिव्य सुरभि न तुम्हें थकने देगी , न भ्रमित होने देगी । सुनो ! जो प्रतीत होता है, वह पूर्ण नहीं होता ।  चले चलो ! विरमो मत !

(अदृश्य हो जाती है । सिद्धार्थ विमुग्ध हैं ।) 

अगली प्रविष्टियों में जारी....

6 दिसम्बर 2009

प्राणों के रस से सींचा पात्र : बाउ (समापन किस्त)


गिरिजेश भईया का चिट्ठा,
स्वनाम कृतघ्न आलसी का
चिट्ठा । यहाँ पहुँचते ही 
होंगे -अवाक ! टिप्पणी को 
विचारेंगे, होंगे किंकर्तव्य-
विमूढ़ । अगिया बैताली और
स्थितप्रज्ञ-दोनों एक साथ ।
बिलकुल बाउ की तरह !
बाउ, माने भईया का बनाया
एक शोख और सुर्ख चित्र !
बाउ, माने लंठई का असली
फॉर्मेट !बाउ,माने ’महालंठ-
चर्चा’ का चरित्र नहीं, ’लंठ-
महाचर्चा’का केन्द्रीय-चरित्र।
यह चरित्र भीतर उतर गया,
जो बाहर आया, आपके लिये
यहाँ । बाउ-सर्जक को नमन!




सुखारी की लुगाई ’परबतिया की माई’ और गजकरना की हालचाल लेने में बाउ ने बेमिसाल ’बैताल पचीसी’ रची है । ब्रिटिश काल की जमींदारी प्रथा का बेखौफ लिफाफा खोला गया है । ’रामे राम, रामे दुइ’ की नपनी से मालिक का बखार भरते सुखरिया और गोंजर की नाई चरणन्यास करते गजकरना को वैतरणी पार कराने वाले बाउ का गरुड़ पुराण जोर से कलेजा दबा कर पढ़ना पढ़ता है । इसकी पूर्णाहुति पर चढ़ावा कम नहीं चढ़ा है ।

’घरघुमनी’ सुरसतिया की शादी की चहलपहल, उठा-पठक, ताक-झाँक इस पूरे लंठ-महाचर्चा की राधेश्याम रामायण है । यह ज्ञेय भी है, साथ में संज्ञेय भी । इस दुरावमिश्रित प्रेमपात्र की वैवाहिक लीला में बाउ ने बेमिसाल महावीरी ध्वजा फहराई है । ठाकुर नाहर सिंह की बराती कूच का नगाड़े पर ऐसा मारू-राग बजा है कि घरौठा के ’जूझे सकल सुभट करि करनी ।" पोखरे के किनारे गोनई नट और बाउ की साधना का साक्षी शीशम का पेड़ कटता है, अगिया बैताली काठी जलती है, मिठाई मिसिर की पुरोहिती चमकती है, बाउ के बैल की घुड़दौड़ होती है, बिरछा, मुन्ना, मनसुख की तीमारदारी परवान चढ़ती है और पँडोही की बिटिया -पूरे गाँव की बिटिया का कन्यादान संपन्न होता है । गाँव के ’ब्याह, उछाह,अनंद’ का यह मनोहारी सजीव वर्णन लंठ महाचर्चा का सुन्दरकाण्ड हो गया है ।

ब्याह के गीतों की अजब गुदगुदी होती है । इस आर्टीफिशियल युग की भोजन-थाली में यह ओरिजिनल सोंधा घी इसे सुस्वादु बना दे रहा है । साहित्य की वर्तमान रचनाधर्मिता में इतना सहज प्रवाह सराहनीय है ।

बाउ के चरित्र रंजन में लेखक की तूलिका ने अद्वितीय कौशल दिखाया है । ’श्रौत और बैताली परम्परा’ का ’मिश्रित समय’ बाउ के चरित्र को अलख-निरंजन बनाने में सोलहो आने सफल हुआ है । अवधूती रंग और फकीरी मस्ती की प्रस्तुति ने जैसे समय के इस स्वभाव की खूँट पकड़ ली है कि वह आगे ही नहीं पीछे भी चलता है । ’बाउ, कुरबानी मियाँ और दशहरा’ शीर्षक में उन्होंने आदमीयत का विजयपर्व मनाया है । गाँव की गोलबंदी की महावीरी ध्वजा आज के माफिया गिरोहों की छाती में गड़कर जैसे लहर-लहर लहरा रही है । वह स्नेह, सौहार्द्र, सामंजस्य और अपनापन अब सपना हो गया है ।

अगहरी गाँव की सामूहिक जीवन-विसर्जन कि वनौषधि-क्रिया राजपूताने के जौहर-व्रत की याद दिला दे रही है । लेखक ने आग से मरण में से राग से मरण का पन्ना बाहर निकाल लिया है । मोहमदीन का प्राणोत्सर्ग पन्नाधाय के बलिदानी तेवर से भी प्रखर हो गया है । कुसुम की कोख बची, तो गाँव बेगाँव होने से बच गये ।

लेखक की सधी लेखनी ने प्रतापी बाउ चर्चा को अर्चा के योग्य बना दिया है । गँवईं गली का ऐसा गुलजार अगोपन किस्सा सुनकर क्या मन मसोस नहीं जाता - कहाँ गये वो लोग ! जरे जेठ की ठंडई और भरे भादों की भइसवारी अभी पुकारे ही चली जा रही है - "और निबाहब भायप भाई’

कुरबानी मियाँ की कलाबाजी और बाउ की बैशाखी ने बैताली परंपरा का बंटाधार करके नट-नगाड़ियों का लँगोट ढीला कर दिया है । हमें ’दिनकर’ का पूछा प्रश्न साक्षात प्रकट दिखायी देने लगता है -

"तुम रजनी के चाँद बनोगे या दिन के मार्तण्ड प्रखर ?
एक बात है मुझे पूछनी फूल बनोगे या पत्थर?
तेल फुलेल क्रीम कंघी से नकली रूप सजाओगे
या असली सौन्दर्य लहू का आनन पर चमकाओगे?
पुष्ट देंह बलवान भुजायें रूखा चेहरा लाल मगर
यह लोगे? या लोगे पिचके गाल सँवारी माँग सुघर ?"

विराट पुरुष बाउ की विलक्षण प्रस्तुति करके लेखक ने चतुर्वर्ण का संपृक्त विलयन तैयार कर दिया है - ’ब्राह्मणोस्य मुखमासीत बाहूराजन्यः कृतः......"। अगर-मगर में लेखक को डगर नहीं भूली है । चौमासे की उफनती सरिता को भी कलित कूल दे दिया है । कैसे ? कुछ तो किसी मन को प्रयाग बना कर -

"आँधियों के बीच त्रिवेणी संगम । उदात्तता की त्रिवेणी से विषपायी आत्मघात की सरस्वती तो लुप्त हो गयी थी । यमुना बची थी-संहार के साँवलेपन को समेटे.....जीवनदायिनी गंगा की धार उमगी ।..."

और सबसे अधिक चुलबुली ग्राम्यभाषा की नजाकत से घेराबन्दी करके, ’भनिति भदेस वस्तु भलि बरनी ।’--

"बोलत काहे नइखे.."
"कहत के बड़ा डर लागता ..."
"सरऊ बड़ी मारब । बोलू..."
"माफ करिह बाबू ! सनेसिया के कार ऐसने होला । कहनाम बा कि असल बाप के बेटा हऊअ त दसहरा के दुपहरिया में नवका दंगल में गड़वा खरिहाने लड़े अइह । तमाशा देखेके मुसमतियो के लेहले अइह"......
"कहि दिहे सबरना के हम त अक्केले आइब, ऊ आपन पूरा खानदान लेहले आई ।"......
"....गजकरना, सबरना.....का जाने केतना बाड़े सौं "।

फिर बारहमासा -

"भादौ गगनगभीर पीर अति हृदय मझारी,
करि के क्वार करार सौत संग फँसे मुरारी,
तजौ बनवारी,....."

धोखाधड़ी, उजड्डपना और विश्वास का खेल इतना जादुई बना दिया है गिरिजेश जी ने कि लगता है जैसे जगनिक फिर से नया आल्हखंड लिखने बैठ गये हैं । इस लंठ महापुराण की चर्चा में इति-वृत्त तो औपन्यासिक है, पर मजा काव्य का आता है । यह कुंज कछारे का ऐसा ललित वेणुवादन है, जिस पर रीझते ही बनता है । निर्मलता ने, नेकनीयती ने, निश्छलता ने, निर्विकारिता ने, निर्लोभ ने, निष्ठा ने, निश्चिंतता ने पूरे समाज की नाक रख ली है - ऐसे सच्चरित्र सुचित्रण की बाट जोह रहा है हमारा हिन्दी समाज । अब बस !

बाउ का चरित्रांकन  ’एक आलसी का चिट्ठा’ की निम्न प्रविष्टियों में  है । आग्रह है कि इन्हें पढ़े, बाउ और खुलेंगे और एक सार्वजनीन चरित्र बन जायेंगे -

लंठ महाचर्चा :  अथ लंठ महाचर्चा, बाउ हुए मशहूर, काहे?  
लंठ महाचर्चा :  बाउ और परबतिया के माई : पहला भाग, अंतिम भाग
लंठ महाचर्चा : बाउ मंडली और बारात एक हजार : भूमिका
लंठ महाचर्चा : बाउ मंडली और बारात एक हजार : पहला दिन- एक और दो
लंठ महाचर्चा : बाउ मंडली और बारात एक हजार : दूसरा दिन - पूर्वपीठिका 
लंठ महाचर्चा : बाउ मंडली और बारात एक हजार : दूसरा दिन - एक और दो
लंठ महाचर्चा : बाउ मंडली और बारात एक हजार : तीसरा दिन- पूर्वपीठिका
लंठ महाचर्चा : बाउ मंडली और बारात एक हजार : तीसरा दिन- एक और दो
लंठ महाचर्चा : बाउ, कुरबानी मियाँ और दशहरा-पूर्वपीठिका : एक और दो
लंठ महाचर्चा : बाउ, कुरबानी मियाँ और दशहरा : एक और दो



आज यह बाउ-आलेख का शेषांश  ’करुणावतार बुद्ध” की अगली प्रविष्टि के स्थान पर प्रस्तुत है । बुद्ध-प्रविष्टि मंगलवार को आयेगी । आगे पूर्वतः रविवार को प्रकाशित हुआ करेगी ।

4 दिसम्बर 2009

प्राणों के रस से सींचा पात्र :बाउ (गिरिजेश भईया की लंठ महाचर्चा)


गिरिजेश भईया का चिट्ठा,
स्वनाम कृतघ्न आलसी का
चिट्ठा । यहाँ पहुँचते ही 
होंगे -अवाक ! टिप्पणी को 
विचारेंगे, होंगे किंकर्तव्य-
विमूढ़ । अगिया बैताली और
स्थितप्रज्ञ-दोनों एक साथ ।
बिलकुल बाउ की तरह !
बाउ, माने भईया का बनाया
एक शोख और सुर्ख चित्र !
बाउ, माने लंठई का असली
फॉर्मेट !बाउ,माने ’महालंठ-
चर्चा’ का चरित्र नहीं, ’लंठ-
महाचर्चा’का केन्द्रीय-चरित्र।
यह चरित्र भीतर उतर गया,
जो बाहर आया, आपके लिये
यहाँ । बाउ-सर्जक को नमन!



’बाउ’ लेखक की पैनी दृष्टि से तराशा और प्राणों के रस से सींचा हुआ एक बड़ा अलबेला पात्र है । यह गर्वीली ग्राम्य गिरा के गंगाजल से पिण्डीकृत गाँव का गोवर्धन है । गल्ले पर रखा हुआ खलिहानी अन्न की राशि बढ़ाता है । अन्नपूर्णामयी ’पयोधरीभूत चतुःसमुद्रा’ कामधेनु है ।  वह गणेश है, भले ही गोबर का । ’बाउर’ बाऊ हुआ हो यह संभावना लग रही है लेकिन ’बाबू’ के बाउ होने की प्रामाणिक मुहर है । गाँव की माटी का यह ’बाबू’ गुदड़ी का लाल है । कचरे में हेराये हीरा को तराश लेने वाली यह श्रौत परम्परा सराहनीय है । ’क्या भूलूँ, क्या याद करुँ’ की ललक में ’भूले बिसरे चित्र’ पर कूँची फेरने लगा तो परती परिकथा उजागर हो गयी । सिद्ध कर दिया है कि "है अपना हिन्दुस्तान कहाँ, वह बसा हमारे गाँवों में । ’विपरीत’ पंचतंत्र की शैली में जैसे ’प्रतिमा नाटक’ लिखा जा रहा हो ।

लेखक जिस ’लंठ’ की चालीसा पारायण करने में मशगूल है, वह नितान्त अपना है । गँवई मनई की भलमंसई, नंगई, हेकड़ई, मुँहफटई, सुघरई की इतनी मनमोहिनी कसीदाकारी का ठाला हो गया था, सो लेखक ने इस अभाव को पूरा किया । चालीस वर्ष के पूर्व के गाँव का यह ’बाउ’, यह पहलवान देखने को क्या आँखें नहीं तरस जायेंगीं । तब की ऐसी ’सेक्सलेस सोसाइटी’ की अकूत मर्दानगी को अकूत दाम देकर भी खरीदा जा सकता है क्या ?

’लंठ’ लट्ठ से बना लगता है, जिसका बखान करते जीभ नहीं थकती । ’सोझघत्ता, बेबाक । लाठ भी लंठ की , लट्ठ की ही गुरुदक्षिणा है-बीच बचाव करने वाला, दूध का दूध पानी का पानी करने वाला । अतिक्रमण करने वाले को लंठ (लट्ठ, लाठ या भोजपुरी में कहें तो लाठा ) ठोंक-ठठा कर ठीक कर देगा । ऐसे हवा-पानी की आपूर्ति से इस क्षेत्र के प्रदूषण को अवश्य ही शाप लगेगा । एतदर्थ ऐसे लोक-लालित्य नैवेद्य का स्वाद छक कर चखाने वाली परोसी थाल देखकर जीभ का पानी टपक जाय तो इसमें आश्चर्य नहीं ।

’बाउ’ जिस कारनामे से मशहूर हुए उसे ’विदुरनीति’ से बचाकर ’चाणक्यनीति’ में शामिल करा दिया है लेखक ने । भरे नाद में चभोरी हुई मरिचा की बुकनी ने कितने रमरतिया का बिना लोटा लिये निपटान बन्द करा दिया, यह क्या साधारण बात है, या बेबात की बात है । ’नारी जने धूर्तता’ की ’भर्तृहरि शतक’ की गंध (दुर्गंध या सुगंध नहीं ) यहाँ मिले बिना नहीं रहती -

 "निषिद्ध जगह अवश्य ताँक-झाँक करनी चाहिये । समाज की बुराइयाँ ऐसे ही जगह में पनपती और फलती और फूलती हैं ।"

अतः अथ लंठ महाचर्चा का प्रथमोध्याय ही सत्यनारायणी कथा की वह पहली शंख है जो पंचमोध्याय के पवित्र चरणामृत और स्वादिष्ट चूरन-हलुआ बटने का निमंत्रण पठा देती है ।

विषय गूढ़ है पर कराहे का गुड़ है, जिसमें ’लिटका’ फंसाने का स्वाद है और इस पर चीनी की चासनी बलिहारी है ।
अभी जारी है .....


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2 दिसम्बर 2009

क्या दूर सुहृद ! प्रियतम ! निराश चित्कार रहा अम्बर अन्तर (गीतांजलि का भावानुवाद)

Art thou abroad on this stormy night
on the journey of love, my friend ?
The sky groans like one in despair.

I have no sleep to-night. Ever and again I open
my door and look out on the darkness, my friend !

I can see nothing before me. I wonder where lies
thy path !

By what dim shore of the ink-black river, by
what far edge of the frowning forest,
through what mazy depth of gloom art
thou threading thy course to come to me,
my friend ?
(Geetanjali :R.N.Tagore)

इस झंझावाती रजनी में स्नेहाविल यात्रा के सहचर
क्या दूर सुहृद ! प्रियतम ! निराश चित्कार रहा अम्बर अन्तर ।

निद्रा विरहित पट खोल सुहृद मैं तिमिर बीच झाँकता रहा
विस्मित विस्फारित नयन खोल खोजता तुम्हारा पंथ कहाँ ?
कुछ भी न सूझ पड़ता आगे हो कहाँ तिमिर में मित्र प्रवर -
क्या दूर सुहृद ! प्रियतम ! निराश चित्कार रहा अम्बर अन्तर ।

मसि तममय किस सरि के तट पर, किस उद्वेलित वन-कोने में
किस गहन धुंध में तुम विलीन हो गये स्वयं को खोने में
क्या मुझ तक आने का ताना बाना बुनते हो पंकिल कर -
क्या दूर सुहृद ! प्रियतम ! निराश चित्कार रहा अम्बर अन्तर ।

(’पंकिल ’- मेरे बाबूजी)
 

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