29 जनवरी 2010

स्वलक्षण-शील

’महाजनो येन गतः..’ वाला मार्ग
भरी भीड़ वाला मार्ग है
नहीं रुचता मुझे,
जानता हूँ 
यह रीति-लीक-पिटवइयों की निगाह में 
निषिद्ध है, अशुद्ध है ।

चिन्ता क्या ! 
मेरी इस रुचि में (या अरुचि में)
बाह्य और आभ्यन्तर,
प्रेरणा और व्यापार की साधु-मैत्री है । 

मैं हठी हूँ, 
जानता हूँ क्षिप्र भी हूँ
तो क्या !
सोचता ही हूँ कहाँ मैं 
निन्दा और स्वीकृति, विधि और निषेध को
साहसी हूँ ,
औ’ विजेता हूँ 
लोक-लज्जा से उफनती भीरुता का ।

मैं स्वलक्षण-शील हूँ ।

20 जनवरी 2010

आया है प्रिय ऋतुराज ...

“वसंत एक दूत है विराम जानता नहीं,
संदेश प्राण के सुना गया किसे पता नहीं ।
पिकी पुकारती रही पुकारते धरा गगन,
मगर कभी रुके नहीं वसंत के चपल चरण ।”

वसंत प्रकृति का एक अनोखा उपहार है । आधी फरवरी से आधे अप्रैल तक का समय वसंत का समय है । इसमें स्वतः ही वृक्षों में फूल तथा जल एवं वनस्पतियों में सुगंध आ जाती है । न जाने क्या हो जाता है कि शिशिर के घोर संताप से संत्रस्त प्रकृति वसंत ऋतु के आते ही अपना नूतन श्रृंगार करने लगती है । यह ऋतु फाल्गुन में जन्म लेती है , चैत्र में जवान होती है और वैशाख बीतते पुनः अपने विश्राम में चली जाती है । आज ही नहीं जब से मनुष्य ने आँखें खोली हैं , वसंत का हर्षोल्लास उसे हँसाता, खिलाता और प्रफुल्लित करता रहा है । इस भूमंडल का सभ्य, असभ्य और उन्नत, अवनत प्रत्येक मानव इस ऋतु में स्वाभवतः आनन्दमग्न होकर अपने हृदय की आनन्द राशि बिखेरने के लिये उतावला हो जाता है । कविकुल गुरु कालिदास ने ’सर्वं प्रियं चारुतरं वसंते ’ से अपनी रमणीक रचना का श्रृंगार किया है ।

प्राचीन काल से अनेकों अनेक उत्सव इस ऋतु में आयोजित होने के लिये कतार बाँध कर खड़े हो जाते हैं । जिस दिन यह ऋतु सर्वप्रथम इस भूमंडल पर अवतरित होती थी उस दिन सुवसंतक उत्सव मनाया जाता था । यह वसंत पंचमी का ही प्रतिनिधि था । वसंत में लाल वस्त्र और लाल पुष्प धारण करने का आम रिवाज था , इसके लिये पुष्पावचायिका नाम से एक उत्सव मनाया जाता था । मदनोत्सव, अशोकोतंसक आदि उत्सवों के नाम प्राचीन ग्रंथों में भरे पड़े हैं । कुछ-कुछ जरूर होने लगता है इस ऋतु में , इसलिये संस्कृत साहित्य और हिन्दी साहित्य में भी इस ऋतु के अगणित गीत गाये गये हैं । स्वागत में दोनों हाथ उठाकर कवियों ने कहा है -

"जय वसंत रसवंत सकल सुख सदन सुहावन
मुनि मन मोहन भुवन तीन जिय प्रेम गुहावन ।"

याद आ जाती है जन-जन को बीती हुई रसवंती घड़ी । यह दौड़ते हुए वसंत का समक्ष होकर आलिंगन करने का बाहु-प्रसरण क्या भुलाये भूल सकता है -

"फेरि वैसे कुंजन में गुंजरन लागै भौंर
फेरि वैसे क्वैलिया कुबोलन ररै लगीं ।
फेरि वैसे पातन में पूरि गौ पराग पीत
फेरि त्यौं पलासन में आगि सी बरै लगी ॥
फेरि वैसें पपिहा पुकारै लागै नन्दराम
फेरि वैसें धाम-धाम सौरभ भरै लगी ।
फेरि वैसे उधमी बसंत विस्वासी आयौ
फेरि वैसें डारन में डाक-सी परैं लगी ॥"

वसंत का एक संदेश , आमंत्रण, बुलावा यदि किसी को याद है तो जीवन में जरा और व्याधि दोनों का पलायन स्वतः हो जाता है । किसी के लिये तरसना, किसी के लिये हरषना , किसी को सर्वस्व समर्पित करना, किसी से सर्वस्व याचना करना - ये जिंदगी के पालने हैं जिस पर वासंती ऋतु प्राणों को सुलाती रहती है -
"सखि ! आयो वसंत रितून को कंत, चहूँ दिसि फूल रही सरसों
------------
परसों के बिताय दियो बरसों, तरसों कब पाँय पिया परसों ।"


परिवर्तन के झोंके बौरे वसंत की गज़ब की अंगड़ाई लेकर आते हैं , इसलिये यदि कहीं  कोई आह उठती हो तो वह भी इतनी वासंती होती है कि दर्द मीठा गाने लगता है -

"को बचिहैं एहि बैरी बसंत ते आवत यों बन आग लगावत
बौरति ही करि डार है बौरी भरे विष बैरी रसाल कहावत ।
ह्वैहैं करेजन की किरचें कवि देव जू कोकिल कूक सुनावत
बीर की सों बलबीर बिना उड़ि जायेंगे प्राण अबीर उड़ावत ॥"

’बनन में बागन में बगरयौ बसंत है ’ की धमक किसे नहीं सुनाई पड़ जाती ! तुलसी का ’मनहु मुएहु मन मनसिज जागा ’ का बिंब सामने खड़ा हो जाता है । लगता है आज धनुष लिये हुए काम वन में विचर रहा है - ’सम्प्रति काननेषु सधनुर्विचरित मदनः’ । और क्या कहा जाय - "चिड़ियों के चहचहे को बाजा बनाकर , प्रेम के रस से मतवाली कोकिलायें गीत गा रही हैं । वन के अंतःपुर की कामिनी रूपी लता आचार्य वायु के उपदेश से अभिनय कर रही है । इस लता को वृक्ष अपने फूलों से हर्षित होकर पल्लव रूपी अंगुलियों से फुसला रहे हैं । श्रीमान वसंत के आते ही हार जैसा सफेद पाला फौरन गायब हो गया” -
"आतोद्यं पक्षिसंघास्तरुरसमुदिताः कोकिला गावन्ति गीतं
वाताचार्योपदेशादभिनयति लता काननान्तःपुरस्त्री ।
तां वृक्षाः साधयन्ति स्वकुसुमहृषिताः पल्लवग्रांगुलीभिः
श्रीमान प्राप्तो वसन्तस्त्वरितमपगतो हारगौरस्तुषारं ॥"

शिशिर रूपी बुढ़ापे से जर्जर, संवत्सर की सुन्दरी वसंती जवानी हिमरूपी रसायनखाने से लौटकर फिर उसके पास आ जाती है । एक सहृदय को लग रहा है - " हिलती कोपलों से नाचते हुए वृक्षों वाला और फूली लताओं से लिपटा हुआ वन यौवन पर आ रहा है । तिलक वृक्ष पर बैठी कोयल जूड़े-सी लग रही है और कुन्द के फूल पर बैठा भौंरा कामिनी के कटाक्ष का काम कर रहा है । कहीं नये उभरे छोटे स्तनों वाली कन्या की तरह कमलिनी साँवली कलियों-सी शोभित है , कहीं वसंत के वायु-समूह रति-श्रम के पसीने से भरे स्त्री के पीन-स्तनों के स्पर्श की धूर्तता करते बह रहे हैं -"तिलकि शिरसि केशपाशायते कोकिलः कुन्दपुष्पेस्थितः स्त्रीकटाक्षायते षटपदः ...."

यह उत्सव का परिवेश सँजोये ऋतु जगह-जगह फूलों की दुकान सजवा देती है । ऋतु की सर्वोत्तमता केवल उल्लास में नहीं, स्वास्थ्य की संजीवनी में भी छिपी है । यह वरदान है जन-जन के लिये । नाना प्रकार के पुष्पों की सुगंधित पवन से प्राणदायिनी शक्ति उत्पन्न हो जाती है, पाचन शक्ति बढ़ जाती है , मन का विषाद मिट जाता है, नवीन चेतना अँगड़ाई लेने लगती है , कार्य-क्षमता में सहज वृद्धि हो जाती है । इस तरह प्रभावशाली ढंग से यह ऋत अपने आगोश में लेती जाती है । जो हूक उठती है, उसे रक्त-संचार का नवीनीकरण मान लें तो अतिशयोक्ति नहीं । खून के बीच जमा थक्का (क्लॉटिंग) टूटना ही टूटना है । एक कवि ने कहा है -

"क्यों सहिहैं सुकुमारि ’किसोर’, अली कल कोकिल गावन दै री
आवत ही बनि है घर कंतहि, बीर बसंतहि आवन दै री ।"

उस आनंद को कौन छीन सकता है जब एक ही साथ इस ऋतु में नंदलाल और गुलाल दोनों ब्रजबाला की ओर दौड़ पड़े थे । पद्माकर की उस नायिका की आँखों से रंग तो निकला किन्तु रंगरेज नहीं निकल पाया -"ए री मेरी बीर ! जैसे तैसे इन आँखिन ते / कढ़ि गौ अबीर पै अहीर तौ कढ़ै नहीं ।"
'कंत बिन कैसे ये बसंत ऋतु बीतैगो ’ का उन्मेष ही उस धन्यता का जन्मदाता है जो इस ऋतु के लिये सर्वग्राह्य सुख है -"धनि वे वनिता मनिता जग में सजि कंत के संग वसंत जो खेलती।"

इस वसंत को बेहद प्यार देते हुए कोई भी इस पर बलिहारी हो जाता है । वसंत का हम अभिनन्दन करते हैं । यह हमें बोध दे रहा है -

"आज आया है प्रिय ऋतुराज, सजा है स्वागत का सब साज
कर रहा नवजीवन संचार, भर रहा मन में मोद अपार  ।
मिला है अवसर अति अनुकूल समय है सचमुच मंगल मूल
करें नवयुवक देश कल्याण हरें पर-पीर, ’दान दें’ प्राण ।"

वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें ! 

18 जनवरी 2010

सौन्दर्य लहरी - 2

’सौन्दर्य-लहरी’ संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है । आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य । निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ’सौन्दर्य-लहरी’ में । उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा । अब यह आपके सामने प्रस्तुत है । ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ - सा प्रयास है यह । अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें । सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता । मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है । उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा । जो सहेजूँगा, यहाँ लाकर रख दूँगा । साभार। पहली के बाद आज दूसरी कड़ी --

अमरेन्द्र भाई ने पिछली पोस्ट पर टिप्पणी की थी -"आपसे उम्मीद रखने के अलावा और क्या कर सकता हूँ.."। बाद में दूरभाष की बातचीत में इन छन्दों को छन्दबद्ध रूप में लिखने की इच्छा की ! हमारे लड़कपन को समझ लिया था इन्होंने, मतलब थोड़ी प्रशंसा के बाद कुछ भी कराया जा सकता है अबोध से ! और हम भी बावले ! छिछली नौका ले उतर ही पड़े थे - सो यह प्रयास आपके सामने है । कौन-सा छन्द है, यह तो छन्दबद्ध लोग ही बतायेंगे । प्रयास सुन्दर लगा तो अंगुलि निर्देश करियेगा, किस राह चलूँ ! पहली और यह दूसरी दोनों प्रविष्टियाँ आपके सम्मुख हैं -
त्वदन्यः पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगणः
त्वमेका नैवासि प्रकटित वराभीत्यभिनया,
भयात् त्रातुं दातुं फलमपि च वांछासमधिकं
शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ ॥4॥

प्रकट नहीं करती हो देवी, दिया हुआ वरदान अभय
अन्य देवता पर हाथों से देने का करते अभिनय ।
भय-त्राता हैं, फल देते हैं वांछाधिक, जो हुआ शरण
शरणप्रदायिनि! परम निपुण हैं वरदायी तव सुहृद चरण॥4॥
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हरिस्त्वामाराध्य प्रणत जन सौभाग्यजननीम्
पुरा नारी भूत्वा पुररिपुमपि क्षोभमनयत्,
स्मरोऽपि त्वां नत्वा रति नयन लेह्येन वपुषा
मुनीनामप्यंतः प्रभवति हि मोहाय महताम् ॥5॥

तेरा ही आराधन करके, शरणागत सौभाग्य प्रदायिनी !
पुरा काल में हरि ने हर को क्षुब्ध किया धर रूप मोहिनी,
रति नयनास्वादित अनंग भी तेरे ही चरणों के बल से
मुनियों के मन को मथने में भी समर्थ है मोह-प्रबल से॥5॥
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धनुः पौष्पं मौर्वी मधुकरमयी पंचविशिखाः
वसंत सामंतो मलयमरदायोधन रथः,
तथाप्येकः सर्वं हिमगिरिसुते कामपिकृपां
अपांगात्ते लब्ध्वा जगदिदमनंगो विजयते ॥6॥


यद्यपि उसका कुसुम-धनुष है, धनु-गुण भी है चंचरीक-मय
पंच सुमन-शर, मलयानिल-रथ, औ’ वसंत के साथ अभय,
मार विजित करता समष्टि को, तो वह तेरे ही सम्बल से
हिमगिरि-पुत्री! तव नेत्र-कोर से निःसृत करुणा के बल से!॥6॥

15 जनवरी 2010

शिशिर-बाला

साढ़े छः बजे हैं अभी । नींद खुल गयी है पूरी तरह । पास की बन्द खिड़की की दरारों से गुजरी हवा सिहरा रही है मुझे । ओढ़ना-बिछौना छोड़ चादर ले बाहर निकलता हूँ । देखता हूँ आकाश किसी बालिका के स्मित मधुर हास की मीठी किरणों से उजास पा गया है । सोचता हूँ, कौन मुस्करा रहा है अभी ! शशक-सा ठिठकता हूँ, निरखता हूँ, फिर चलने लगता हूँ । मन में एक उपस्थिति की प्रतीति निरन्तर कर रहा हूँ । ठिठक-ठिठक-सा जा रहा हूँ - कौन खड़ा है सामने ? जल की सरसिज कलिका-सी अँगड़ाई लेती कौन खड़ी है वहाँ ! मन के सरोवर की मरालिनी-सी कौन है वहाँ ! मैं उत्कंठित हूँ , चेतना अ-निरुद्ध सोच रही है । पूछना चाह रहा हूँ, ’धुंध के भीतर छिपी तुम कौन हो ?’ कौन हो तुम आँसुओं की भाषा की तरह मूक !

आगे बढ़ता हूँ, निपट रही है धुंध । थोड़ी उजास दिखती है-बाहर भी, भीतर भी । चिन्तन चल रहा है, कौन है वह ! क्या उषा के अरुणिम गवाक्ष से झाँकता सविता है या आलिंगन में समा जाने की व्याकुलता सँजोती बाहों की तन्मय कविता है वह ! कौन है वह ? नेत्रों का आभास पा रहा हूँ - मधु प्याले ढरक रहे हैं । कौन खड़ा है वहाँ ? कल्पना के अनगिन रूप बन-सज रहे हैं । सजग देख रहा हूँ, नवल नील परिधान युक्त आकृति । मुग्ध हो रहा हूँ । निहार रहा हूँ वह अकृत्रिम रूप । अभी प्रारम्भ ही हुए आषाढ़ की सजल घटा-सी श्यामल लटें बिखराये, फेन की तरह उजले दाँतों में चंचल छिटक रहा अंचल-कोर दबाये, अपने चपल हाथों से बार-बार खिसकते अरुण-दुशाले को सम्हालते कोई खड़ा है वहाँ ! अरुणाभ अधर और चन्द्र की विमल विभा से भी छाला पड़ जाने वाली कोमल तन वाली वह कौन खड़ी है वहाँ ! कैसे बखानूँ वह अप्रतिम रूप ? झुकी हुई आँखें हैं, उज्ज्वल तन, जैसे पूर्णिमा की रात ही मुदिता होकर सामने आ खड़ी है । आँकने के बाहर है यह सौन्दर्य ।

मन चहक-चषक में भर लेना चाहता है वह मधु-रूप । चितवन आकर ठहर गयी है भीतर । फिर-फिर निहारता हूँ । कहीं यह मेरे मन के कुसुमित कानन की तरुणी अभिलाषा तो नहीं । कहीं यह मेरी छुपी हुई प्यास, मुझ व्यथित-तृषित चातक की स्वाति-सलिल पिपासा तो नहीं । क्यों बावला हो रहा हूँ मैं ! मैं भ्रमित मतवाला वसंत क्यों हो रहा हूँ ? कौन है, कौन है वहाँ ?

मैं अभागा, दुबका रह जाता था निद्रा-गलियारों में । आज बाहर आया हूँ, तो दिख रहा है यह अनुपम सौन्दर्य । तुम जो भी हो खड़ी, यूँ ही बाँटती रहो अपनी मदिर चितवन । चाह नहीं कि मुझे अंक भरो, सुमन माल पहनाओ, जलद-दामिनी-सी गले लगो । बस ऐसे ही खड़ी रहो अपने पूरेपन के साथ, सम्पूर्ण सौन्दर्य-विस्तार समेटे । मन संतुष्ट है । प्रश्न भी कहीं पिछलग्गू हो गया है तुम्हारे सौन्दर्य-सम्मुख - कौन हो तुम?

यूँ ही खड़ा रह गया हूँ देर तक । नहीं जानता कौन है वहाँ, पर लगता है शिशिर ही रूप धर आ खड़ी है । दुर्निवार है तुम्हारा सम्मोहन शिशिर-बाला !

7 जनवरी 2010

तरुणाई क्या फिर आनी है ..

तरुणाई क्या फिर आनी है !
चलो, आओ !
झूम गाओ
प्रीति के सौरभ भरे स्वर गुनगुनाओ

हट गया है शिशिर का परिधान
वसंत के उषाकाल में
पुलकित अंग-अंग संयुत
झूमती हैं टहनियाँ रसाल की
और नाचता है निर्झर
गिरि शिखरों से उतर-उतर
कहता है - तरुणाई क्या फिर आनी है !

झाग भरी बरसाती नदी-से
उद्धत हैं झूमते प्रसून हर्ष-बाग-बाग बाग के
कोयल मदमाती कुहुक रही
भौंरा आनन्द गीत गा रहा
प्रिय आ देखो ! नभ-विस्तर में
अनिल गंध लुटा, गा रहा -
तरुणाई क्या फिर आनी है !

खग-कलरव गूँज रहा
आओ ! प्राण इनमें लहरा दें
चू रहा अमर-आसव वासंती
आओ ! गटगट पी जायें
चिर-संग-भाव का आश्रय लेकर
परिणय का सागर उफनाता है
गाता है - तरुणाई क्या फिर आनी है !

आकर बैठो, रख दो अधरों पर
इस रसाल तरु के नीचे, रस भरे अधर
काँपे हिय, कंपित तन औ’
रात्रि अँधेरी रहे खड़ी फिर सहज मौन
बिछ गये फूल, पैरों को सहलाते तिनके
आकाश चितेरा ढाँक छुपा हमको बहकाता
कहता जाता है -तरुणाई क्या फिर आनी है !

भर लो उर में सुरभि प्रेम-मद
मौन विलक्षण से खेलो
मंदस्मित का मोहपाश फेंको
मेरी हथेलियों को अपने हाँथों में ले लो
और फिर छेड़ो तान - निशा के स्वागत हित
बिना गीत के कहाँ कर्म यह संपादित,
स्वर मुखरित हो - तरुणाई क्या फिर आनी है !

चित्र साभार : गूगल

3 जनवरी 2010

करुणावतार बुद्ध - 9


कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक
देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं
मानवता की चेतना का संस्कार
करने हेतु । पुराने पन्नों में अनेकों
बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर
पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने
को प्रेरित करते हैं । इनकी अमित
आभा धरती को आलोकित करती
है, और ज्ञान  का प्रदीप उसी से
सम्पन्न होकर युगों-युगों तक
मानवता का कल्याण करता रहता
है । करुणावतार बुद्ध के ऐसे ही  
महानतम चरित्र को उद्घाटित करतीं 
प्रविष्टियाँ नाट्य-रूप में प्रस्तुत हैं । 
करुणावतार बुद्ध- 1, 2, 3, 4, 5 ,
6,7 , 8 के बाद प्रस्तुत है नौवीं 
कड़ी......

करुणावतार बुद्ध
जारी...
(ब्राह्मण उन्हें नहीं छोड़ते, घेर लेते हैं .. सिद्धार्थ आगत चेष्टा स्फूर्त उठ जाते हैं । )

सिद्धार्थ - क्या भवितव्य है ? ये वैदिक विशद अनुष्ठान, यह कुटिल कर्मकाण्डीय वितंडावाद -  आह ! मुझे कहीं चैन नहीं ! कहाँ पथ है, कौन-सा पाथेय है !

ब्राह्मण - तरुण तापस ! तुम्हें हमारी बात मृषा लग रही है ? ब्राह्मणों का विरद  विस्मृत है तुम्हें ? देखो, ब्राह्मण का संकल्प बड़ा वजनदार होता है । मेरे साथ प्रारब्ध और पुरुषार्थ के खेल खेलो !

सिद्धार्थ - ब्राह्मण नाम किसका है ? क्या जीव ब्राह्मण है ? क्या देंह ब्राह्मण है ? क्या जाति ब्राह्मण है ?  क्या ज्ञान ब्राह्मण है, क्या कर्म ब्राह्मण है ? अथवा, क्या धार्मिक व्यक्ति ब्राह्मण है ? जीव ब्राह्मण है, ऐसा हो नहीं सकता , यदि हो सकता तो सभी शरीरों को ब्राह्मण मानना पड़ेगा ।  देंह ब्राह्मण है, ऐसा भी नहीं हो सकता, चाण्डाल से लेकर अन्य मनुष्यपर्यन्त सबके शरीर पंचभौतिक होने से एकरूप ही हैं । जाति ब्राह्मण है, ऐसा भी नहीं हो सकता, विभिन्न जाति वाले प्राणियों से अनेक जातिवाले बहुत से महर्षि उत्पन्न हुए हैं । तो क्या ज्ञान ब्राह्मण है ? नहीं ! बहुत से क्षत्रिय आदि अन्य भी परमार्थ को जानने वाले तत्वज्ञ हुए हैं । कर्म ब्राह्मण है, ऐसा भी नहीं, सभी प्राणियों को कर्मों से प्रेरित होकर क्रिया करते देखा जाता है ।फिर क्यों ब्राह्मण-ब्राह्मण रटे जा रहे हो ! ब्राह्मण नाम किसका है ? मैं चला, आप अपनी ब्राह्मणी लकुट कमरिया सम्हालें !

(सिद्धार्थ उस समाज से विदा लेते हैं । रात्रि का पूर्वार्ध है । रात्रि के अंधेरे की परवाह नहीं करते हुए चले जा रहे हैं । कठोर श्रम से शरीर श्लथ है । फिर भी चलते जा रहे हैं ।  एक अनिर्वच उत्साह भर गया है मन में ! कई रातें,  कई दिन वन-वन भटकते, गिरि गह्वरों की खाक छानते बीतते हैं ।  लक्ष्य अप्राप्त है । द्वंद्व अभी भी गया नहीं है...)

सिद्धार्थ - किस कंदरा से क्लेश-निवृत्ति का रसायन खींच लाऊँ ! किस अटवी से आनंद का अमृत प्राप्त करूँ ! किस उपत्यका से अनासक्ति का श्रोत पाऊँ ! किस नभ से निर्वाण की विद्युत लेखा का आहरण करूँ ! किस सिंधु से सम्यक बोध का संधान पाऊँ ! किस शैल माला से शांति का खजाना तलाशूँ ! प्यासे मृग की तरह दौड़ रहा हूँ । मृगशावक सदृश सुपुत्र छोड़ा, मृगाक्षी जीवनसंगिनी छोड़ी, अमरावती-सी कपिलवस्तु छूटी, पुर छूटा, प्रियजन छूटे - सब छूटे ! छूटा नहीं तो सिद्धार्थ का भटकाव । बंद तो आँखें हैं, पर अमंद कोलाहल का आवर्त जागृत है । क्या करूँ -
"इतो न किंचित, परतो न किंचित
यतो यतो यामि ततो न किंचित ....।"
 प्रातः होने को है ! रात्रि पिशाचिनी-सी थी !   प्राची का लाल मुँह जैसे रक्त-स्नात महाकाल का है । क्षय की विजय पताका लहरा रही है । अक्षय का अवगुंठन हटाने को व्याकुल हूँ । पागल हूँ, पागल ही हूँ मैं । मेरा न गुरु, न प्रकाश, न पंथ !

(सिद्धार्थ व्यथित हैं, तभी भोर के प्रकाश में एक सरोवर दिखता है । स्नान करने को प्रवृत्त होते हैं । देखते हैं, एक गिलहरी बार-बार जल के पास जाती, उसमें अपनी पूँछ डुबाती और फिर पूँछ निकालकर बाहर रेत पर झटक देती है ।  झील को सुखाने का प्रयास है यह उसका , पूछने पर पता लगता है गिलहरी से । सोचने लगते हैं....)

सिद्धार्थ - जब यह तुच्छ नगण्य जीव अपने मनोबल से नहीं डिग रही तो मैं कैसा साधक कि क्लांत-श्लथ हो रहा हूँ ! मर जाऊँगा, पर बिना बोध के विराम नहीं लूँगा ! चलो गौतम - "तपतु" !
(सहसा प्रकाश बिखेरती तपस्विनी दृश्य होती है ।)

तपस्विनी - सिद्धार्थ ! ’मा विरम’, "तपसा देवा मृत्युमुपाघ्नयता" । तपो, तपो, तपो ! मैं जानती हूँ तुम्हारा अभिप्रेत्य ! उन्तीस वर्ष की उम्र में ’यश की धारा’ (यशोधरा) को छोड़ कर आये हो, अब ’धरा का यश’ तुम्हारी बाट जोह रहा है ।

ध्यान से सुनो मेरी बात ! मैं वही रमणी शक्ति हूँ, जो ’विश्वस्य शक्तिः परमासि माया’ है । सूनी कोख महामाया की गर्भगुफा  में तेरा सर्जक मैं ही हूँ । लुम्बिनी वन में वृक्ष की डाल पकड़कर खड़ी हो गयी थी वह और तुम अदभुत बालक सहज ही प्रसूत होकर सत पद चल पड़े थे, और प्रतिपद पर प्रस्फुटित कमल पुष्प खिल गये थे । वहाँ मैं ही थी ! मैंने कहा न कि मैं तुम्हारे जीवन के महाकाव्य की सरस पंक्ति हूँ जो तुमसे अभी अपठित हूँ ।

सिद्धार्थ - हे अदभुत रस की उद्घोषिका ! हर आह में टपकी हुई मेरी विमला सलिल बिन्दु ही तो नहीं हो तुम ?

तपस्विनी - क्यों घबरा गये ! सुनो, अपना दीपक आप ही बनना है तुमको ! तिमिर का व्यूह भेदना है । कैसा विराम, कैसा विश्राम, कैसी क्लांति, कैसी भ्रांति ! तुम्हारे समान बस तुम्ही हो । पहले ही दिन जिस दिन तुमने जीवन का पहला प्रभात देखा, हर्ष से सर्वप्रथम ताली बजाने वाली मैं ही थी । मैं इस तट पर तो हूँ ही, उस तट पर भी तुमसे फिर भेंट होगी । तुम्हारा मूलाधार हूँ, तुम्हारा सहस्रार हूँ । मैं तुम्हारी इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा हूँ । मैं कौन हूँ, मैं कौन नहीं हूँ, मत पूछो ..!
(तपस्विनी ओझल हो जाती है ।)

सिद्धार्थ - तपस्विनी ने तो हर दुखती रग पर अपनी अँगुली रख दी । चलो मेरे प्राण ! तपो, तपो ! गौतम अब पीछे नहीं मुड़ेगा ।
(आगे बढ़ते हैं, और घने वन में प्रवेश कर जाते हैं ।)

जारी....

1 जनवरी 2010

नये साल में रामजी...

उल्लास की संभावनायें लेकर आता है नववर्ष । न जाने कितनी शुभाकांक्षायें, स्वप्न, छवियाँ हम सँजोते हैं मन में नये वर्ष के लिये । अनगिन मधु-कटु संघात समोये अन्तस्तल में विगत वर्ष का विहंग उड़ जाता है शून्य-गगन में । हम नये फलक के लिये उत्सुक हो उठते हैं । क्या-क्या चाहते हैं, क्या-क्या सोचते हैं, क्या फरियाद है  हमारी हमारे राम से - मेरे प्रिय कवि ’कैलाश गौतम’ की रचना पढ़ें - "नये साल  में रामजी..."

ये साल में रामजी, इतनी-सी फरियाद,
बना रहे ये आदमी, बना रहे संवाद।
नये साल में रामजी, बना रहे ये भाव,
डूबे ना हरदम, रहे पानी ऊपर नाव ।
नये साल में रामजी, इतना रखना ख्याल,
पांव ना काटे रास्ता, गिरे न सिर पर डाल।
नये साल में रामजी, करना बेड़ा पार,
मंहगाई की मार से, रोये ना त्यौहार ।
नये साल में रामजी, कहीं न हो हड़ताल,
ज्यादातर हड़ताल के, अगुवा आज दलाल।
नये साल में रामजी, बिगड़े ना भूगोल,
गैस रसोईं को मिले, गाड़ी को पेट्रोल ।
नये साल में रामजी, सुख बांटे मेहमान,
ज्यों का त्यों साबुत मिले, घर का हर सामान।
नेताओं को रामजी, देना बुद्धि विवेक,
सबका मन हो आईना, नीयत सबकी नेक।
नये साल में रामजी, कटे न मेरी बात,
रंगों की सौगात में, खुशबू हो इफ़रात ।
नये साल में रामजी, पाजी जायें जेल,
बार-बार है प्रार्थना, मिले न उनको बेल।
नये साल में रामजी, दुहरायें ना भूल,
पास न हो प्रस्ताव फिर, कोई ऊलजलूल ।
नये साल में रामजी, सपने हों साकार,
साथ भगीरथ के चले, जैसे जल की धार ।
नये साल में रामजी, ना हो भारत बंद,
हरदम छाया ही रहे, पब्लिक मे आनंद ।

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कविता : ’नवनीत’ जनवरी 2007 से साभार 

चित्र-स्रोत : गूगल
 

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