7 जून 2012

ग्रीष्म-1: ग्रीष्म-गरिमा-2

ग्रीष्म श्रूंखला में ब्रजभाषा से निकली यह ’ग्रीष्म-गरिमा’ आपके सम्मुख है, कवि हैं अल्पज्ञात कवि ’सत्यनारायण’। पहली कड़ी के बाद आज दूसरी कड़ी -

ग्रीष्म-गरिमा

जबै अटकत आपस में बंस, द्रोह दावानल पटकत आय ।
खटकि चटकत करिवे निज ध्वंस, नसत पल भर में बर बिसाय ॥१४॥

सदाँ अपनी धुन में दरसाय, पायकें कहूँ जलासय तीर ।
उड़ति बैठति पुनि उड़ि-उड़ि जाय, बिकल अति मधु-माखिन की भीर ॥१५॥

करति ना कोकिल निज कल गान, भ्रमर गुंजन सौ सूनी कुंज ।
परत पद तर पजरत पाषान, जरत परसत पिपीलिका पुंज ॥१६॥

ताप बस ह्वै अत्यंत अधीर, कहूँ कुलिलत नहिं बछरा गाय ।
द्र मन तर पी प्याऊ कौ नीर, फिरति जिय-जरनि तऊ ना जाय ॥१७॥

रेत सों बाहिर भुरसत पाम, तजत डरपत छिन भर कों धाम ।
प्रबल धमका की पारत धाम, परै छाती नहिं करिवे काम ॥१८॥

निरुद्यम निस्सहाय अति दीन, निबल सहि सकत न तेरी ज्वाल ।
उपासे प्यासे बसन बिहीन, लगत जल प्रान तजत तत्काल ॥१९॥

मित्र कों तपत देखि असहाय, लुकन नीचे तुमसों डरि होय ।
हिमालय हिम जब जाति पराय, जगत करुना न तऊ तव जीय ॥२०॥

यदपि पीवत जन कृत्रिम तोय, प्यास प्रबला तोऊ नहिं जाय ।
कंठ की सीतलता गई खोय, रह्यौ रसना में रस ना हाय ॥२१॥

करत छिरकाव न पूरत आस, गरम निकसत धरती सों भाप ।
चमेली पट्ल पुहुप नित पास, तऊ तव अटल रूप सों ताप ॥२२॥

लगीं खस-टटियाँ छिरकी जात, खिंचत खस पंखा तिनके संग ।
नैक नोकर के झोखा खात, घुसत तुम वहाँ बड़े बेढंग ॥२३॥

कबहुँ चंदन घिसि धारत अंग, करत सेवन उसीर करपूर ।
बगीचन बागन घोंटत भंग, तबहुँ नहिं होय शांति भरपूर ॥२४॥

सेत कारि पीरी अरु लाल, लाइ कें तुम आँधी परचंड ।
उखारत जर सों वृक्ष विसाल, गिरावत तिनकौ गर्व अखंड ॥२५॥

गगन में गगन रही अति छाय, लखत नहिं नील बरन आकास ।
दुरत निकरत पुनि पुनि दुरिजाय, नखत दल करत न प्रबल प्रकास ॥२६॥

सुधाकर सुधा करनि फैलाइ, करति कछु मटमली सी जोति ।
यदपि नैनन कों अति सुखदाइ, तऊ मनचीती तृप्ति न होति ॥२७॥

कछुक जब रजनी होत व्यतीत, अटनि पै ले सितार मिरदंग ।
गवावत-गावत सुंदर गीत, भंग तऊ करत सबै तुम रंग ॥२८॥

स्वदेसी मलमल मल-मल धोय, संदली ताकों सुघर रँगाय ।
पहरि ताकी धोती तिय कोय, रमत परि तबहुँ न कष्ट नसाय ॥२९॥

उठें खटिया सों नित परभात, ब्यारि हू सीरी-सीरी खात ।
उमस सों तबहूँ सिर चकरात, सोचिए पढ़न लिखन फिर बात ॥३०॥

न भावत असन-बसन बन-बाग, अलप घर घरनी सों अनुराग ।
खुले तव पाइ अनुग्रह भाग, कमायो सेतमेंत बैराग ॥३१॥

प्रफुल्लित सबरे आक-जवास, जरे तन हरे-हरे पटसाज ।
तुम्हैं कुसुमांजलि सहित हुलास देत, स्वीकार करो महाराज ॥३२॥

---- कवि सत्यनारायण

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हाल बड़ा बेहाल, सुना है गर्मी आयी

Avinash Chandra ने कहा…

वाह! आनंदित हुआ मन!

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