ग्रीष्म श्रूंखला में ब्रजभाषा से निकली यह ’ग्रीष्म-गरिमा’ आपके सम्मुख है, कवि हैं अल्पज्ञात कवि ’सत्यनारायण’। पहली कड़ी के बाद आज दूसरी कड़ी -
ग्रीष्म-गरिमा
जबै अटकत आपस में बंस, द्रोह दावानल पटकत आय ।
खटकि चटकत करिवे निज ध्वंस, नसत पल भर में बर बिसाय ॥१४॥
सदाँ अपनी धुन में दरसाय, पायकें कहूँ जलासय तीर ।
उड़ति बैठति पुनि उड़ि-उड़ि जाय, बिकल अति मधु-माखिन की भीर ॥१५॥
करति ना कोकिल निज कल गान, भ्रमर गुंजन सौ सूनी कुंज ।
परत पद तर पजरत पाषान, जरत परसत पिपीलिका पुंज ॥१६॥
ताप बस ह्वै अत्यंत अधीर, कहूँ कुलिलत नहिं बछरा गाय ।
द्र मन तर पी प्याऊ कौ नीर, फिरति जिय-जरनि तऊ ना जाय ॥१७॥
रेत सों बाहिर भुरसत पाम, तजत डरपत छिन भर कों धाम ।
प्रबल धमका की पारत धाम, परै छाती नहिं करिवे काम ॥१८॥
निरुद्यम निस्सहाय अति दीन, निबल सहि सकत न तेरी ज्वाल ।
उपासे प्यासे बसन बिहीन, लगत जल प्रान तजत तत्काल ॥१९॥
मित्र कों तपत देखि असहाय, लुकन नीचे तुमसों डरि होय ।
हिमालय हिम जब जाति पराय, जगत करुना न तऊ तव जीय ॥२०॥
यदपि पीवत जन कृत्रिम तोय, प्यास प्रबला तोऊ नहिं जाय ।
कंठ की सीतलता गई खोय, रह्यौ रसना में रस ना हाय ॥२१॥
करत छिरकाव न पूरत आस, गरम निकसत धरती सों भाप ।
चमेली पट्ल पुहुप नित पास, तऊ तव अटल रूप सों ताप ॥२२॥
लगीं खस-टटियाँ छिरकी जात, खिंचत खस पंखा तिनके संग ।
नैक नोकर के झोखा खात, घुसत तुम वहाँ बड़े बेढंग ॥२३॥
कबहुँ चंदन घिसि धारत अंग, करत सेवन उसीर करपूर ।
बगीचन बागन घोंटत भंग, तबहुँ नहिं होय शांति भरपूर ॥२४॥
सेत कारि पीरी अरु लाल, लाइ कें तुम आँधी परचंड ।
उखारत जर सों वृक्ष विसाल, गिरावत तिनकौ गर्व अखंड ॥२५॥
गगन में गगन रही अति छाय, लखत नहिं नील बरन आकास ।
दुरत निकरत पुनि पुनि दुरिजाय, नखत दल करत न प्रबल प्रकास ॥२६॥
सुधाकर सुधा करनि फैलाइ, करति कछु मटमली सी जोति ।
यदपि नैनन कों अति सुखदाइ, तऊ मनचीती तृप्ति न होति ॥२७॥
कछुक जब रजनी होत व्यतीत, अटनि पै ले सितार मिरदंग ।
गवावत-गावत सुंदर गीत, भंग तऊ करत सबै तुम रंग ॥२८॥
स्वदेसी मलमल मल-मल धोय, संदली ताकों सुघर रँगाय ।
पहरि ताकी धोती तिय कोय, रमत परि तबहुँ न कष्ट नसाय ॥२९॥
उठें खटिया सों नित परभात, ब्यारि हू सीरी-सीरी खात ।
उमस सों तबहूँ सिर चकरात, सोचिए पढ़न लिखन फिर बात ॥३०॥
न भावत असन-बसन बन-बाग, अलप घर घरनी सों अनुराग ।
खुले तव पाइ अनुग्रह भाग, कमायो सेतमेंत बैराग ॥३१॥
प्रफुल्लित सबरे आक-जवास, जरे तन हरे-हरे पटसाज ।
तुम्हैं कुसुमांजलि सहित हुलास देत, स्वीकार करो महाराज ॥३२॥
---- कवि सत्यनारायण
मैं क्या हूँ? क्या सुनहली उषा में जो खो गया, वह तुहिन बिन्दु या बीत गयी जो तपती दुपहरी उसी का विचलित पल; या फिर जो धुँधुरा गयी है शाम अभी-अभी उसी की उदास छाया? मैं क्या हूँ? जो सम्मुख हो रही है इस अन्तर-आँगन में वही ध्वनि, या किसी सुदूर बहने वाली किसी निर्झर-नदी का अस्पष्ट नाद? मैं क्या हूँ? बार-बार कानों में जाने अनजाने गूँज उठने वाली किसी दूरागत संगीत की मूर्छित लरी या फिर जिस आकाश को निरख रहा हूँ लगातार,उस आकाश का एक तारा?
मैं क्या हूँ? जानना इतना आसान भी तो नहीं!

2 comments:
हाल बड़ा बेहाल, सुना है गर्मी आयी
वाह! आनंदित हुआ मन!
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निकष रखने वाले हैं आप....सो छिद्रान्वेषण और छुद्र-आलोचना से परे जो कहेंगे सिर आँखों पर। आपकी दुलराती, सहलाती, फटकारती टिप्पणियाँ इस रचनाकार को आत्मस्थ करेंगी। अग्रिम आभार।