Tuesday, February 21, 2017

Love Poems

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तुम्हारी प्रेम-पाती के लिए

Photo: Flickr (Credit: JFXie)

तुम्हारे लिखने में बड़ा हौसला है।

मेरे जीवन के गीत भी तुम्हीं ने लिखे
प्रणय के स्वप्न तुमने ही अंकित कर दिए
और हृदय के उन तारों को, जो
वर्षों से सोये पड़े थे, तुमने ही
अपनी लेखनी से झंकृत कर दिया।

तुम्हारे लिखने में युगों-युगों की प्यास है
पर आतुरता नहीं,
तुम्हारे लिखने में दृढ़ता है
अनंतकाल की गति की।

तुमने लिखा समाज की
अतिरंजना को पददलित कर,
निहार कर भर आँख
अपनी विचार अभिव्यंजना को
और उतार कर अपने अंतस में
जीवन का विंहसित और सुरभित रूप।

तुम्हारा लिखना
जीवन को सजाना, निहारना
उसमें खो जाना है।

सर्वत्र तुम

Photo: Devian Art(Gigicerisier)

मैंने चंद्र को देखा
उसकी समस्त किरणों में
तुम ही दिखाई पड़े
मैंने नदी को देखा
उसकी धारा में तुम्हारी ही छवि
प्रवाहित हो रही थी
मैंने फूल देखा
फूल की हर पंखुड़ी पर
तुम्हारा ही चेहरा नजर आया
मैंने वृक्ष देखा
उसकी छाया में मुझे
तुम्हारी प्रेम-छाया दिखाई पड़ी
फ़िर मैं आकाश की ओर देखने लगा
उसके विस्तार ने खूब विस्तृत अर्थों वाली
तुम्हारी मुस्कान की याद दिला दी
और तब मैंने धरती को देखा
उसके प्रत्येक अवयव में तुम ही
अपनी सम्पूर्ण प्रज्ञा के साथ अवस्थित थे,

मैं सम्मोहित था
मैं स्वयं को देखा
मेरी बुद्धि, आत्मा, हृदय- सब कुछ
तुम्हारे ही प्रकाश से प्रकाशित था,

वस्तुतः वाह्य में भी तुम हो,
अन्तर में भी तुम-
सर्वत्र तुम।

क्यों न मेरा यह हृदय मूक-सा रहने दिया

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क्यों न मेरा यह हृदय
मूक-सा रहने दिया?

क्या करुँ उस अग्नि का
निशि-दिन जले जो इस हृदय में
क्या करुँ उस व्यग्रता का
जा छिपी जो उर-निलय में
क्यों असीमित यह प्रणय
बहु-रूप सा रहने दिया?

तारकों की तूलिका से
रंगा है, वो व्यथा का आकाश है
घन-तिमिर की लहर में
आंसुओं के कमल का आवास है
क्यों न स्मृति-निलय मेरा
शून्य-सा रहने दिया?

क्यों न मेरा यह हृदय
मूक-सा रहने दिया?

तुम ही पास नहीं हो तो..

Candle-Light
Jyoti (Photo credit: soul-nectar)

तुम ही पास नहीं हो तो इस जीवन का होना क्या है?

मेरे मन ने खूब सजाये दीप तुम्हारी प्रेम-ज्योति के
हुआ प्रकाशित कण-कण अन्तर गूंजे गान स्नेह प्रीति के
पर जो यथार्थ थे, स्वप्न हुए, तो अब बाकी खोना क्या है?
तुम ही पास नहीं हो तो इस जीवन का होना क्या है?

तेरे मधु-उपकारों से ही अब तक जीवन चलता आया
तुम हो तब ही प्राण-वायु है, तुममें तम-सा घुलता आया
तुम हो नहीं, कहाँ जीवन है? अब इसको ढोना क्या है?
तुम ही पास नहीं हो तो इस जीवन का होना क्या है?

सोचा था तेरे प्रेम बीज बोऊँगा उर के अंचल में
फ़िर तरु निकलेंगे दीर्घकाय सुख झूलेगा मन चंचल में
पर जब माटी ही उसर हो तो बीजों का बोना क्या है?
तुम ही पास नहीं हो तो इस जीवन का होना क्या है?

मैं हुआ स्वप्न का दास

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Water dream
Water dream (Photo credit: @Doug88888)

मैं हुआ स्वप्न का दास मुझे सपने दिखला दो प्यारे।
बस सपनों की है आस मुझे सपने दिखला दो प्यारे॥

तुमसे मिलन स्वप्न ही था, था स्वप्न तुम्हारा आलिंगन
जब हृदय कंपा था देख तुम्हें, वह स्वप्नों का ही था कंपन,
मैं भूल गया था जग संसृति
बस प्रीति नियति थी, नियति प्रीति
मन में होता था रास, मुझे सपने दिखला दो प्यारे।

सपनों में ही व्यक्त तेरे सम्मुख था मेरा उर अधीर
वह सपना ही था फूट पडी थी जब मेरे अन्तर की पीर,
तब तेरा ही एक सम्बल था
इस आशा का अतुलित बल था
कि तुम हो मेरे पास , मुझे सपने दिखला दो प्यारे।

सोचा था होंगे सत्य स्वप्न, यह चिंतन भी अब स्वप्न हुआ
सपनों के मेरे विशद ग्रंथ में एक पृष्ठ और संलग्न हुआ,
मैं अब भी स्वप्न संजोता हूँ
इनमें ही हंसता रोता हूँ
सपने ही मेरी श्वांस, मुझे सपने दिखला दो प्यारे।

वह ख़त नहीं, दस्तख़त था

Signature

एक कागज़
तुम्हारे दस्तख़त का
मैंने चुरा लिया था,

मैंने देखा कि
उस दस्तख़त में
तुम्हारा पूरा अक्स है।

दस्तख़त का वह कागज़
मेरे सारे जीवन की लेखनी का
परिणाम बन गया।

मैंने देखा कि
अक्षरों के मोड़ों में
जिंदगी के मोड़ मिले,

कुछ सीधी सपाट लकीरें थीं
कहने के लिए कि
सब कुछ ऐसा ही सपाट, सीधा है
तुम्हारे बिना।

मुझे एक ख़त लिखना
गर हो सके,
क्योंकि वह तो ख़त नहीं,
दस्तख़त था।

तेरी याद आ गयी होगी

प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद: चार

A close-shot of Love-Letters
A Close Shot of Handwritten Love-Letters

आँखों से आँसू बह आया, तेरी याद आ गयी होगी।

घबराना मत यह आँसू ही कल मोती बन कर आयेंगे
विरह ताप में यह आँसू ही मन को शीतल कर जायेंगे,
शायद यह आँसू ही पथ हों महामिलन के महारास का –
इस चिंतन से सच कह दूँ ,पलकों पर बाढ़ आ गयी होगी,
तेरी याद आ गयी होगी।

इस आँसू में ही ईश्वर बन प्रेम बहा करता है
इस आँसू में ही प्रियतम का क्षेम रहा करता है,
जब उर में प्रिय छवि बसती, इन आँखों से आँसू बहते है –
नीर बहें प्रिय हेतु कहें भीतर यह बात आ गयी होगी ,
तेरी याद आ गयी होगी।

बोलो कैसे रह जाते हो तुम बिन बोले

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बोलो कैसे रह जाते हो तुम बिन बोले
जब कोई स्नेही द्वार तुम्हारे आकर तेरा हृदय टटोले।

जब भी कोई पथिक हांफता, तेरे दरवाजे पर आए
तेरे हृदय शिखर पर अपनी प्रेम-पताका फहराए,
जब तेरी आतुरता में, कोई भी विह्वल मन डोले-
बोलो कैसे रह जाते हो तुम बिन बोले।

जब भी कोई तुम्हें समर्पित, तुमको व्याकुल कर जाता है
तेरे मन की अखिल शान्ति में करुण वेदना भर जाता है ,
जब भी कोई हेतु तुम्हारे, हो करुणार्द्र नयन भर रो ले-
बोलो कैसे रह जाते हो तुम बिन बोले।

तुम शायद झुंझला जाते हो!

प्रेम पत्रों का प्रेमपूर्ण काव्यानुवाद: तीन

A close capture of hand written love letters.

तुम शायद झुंझला जाते हो!

कर ही क्या सकती हूँ छोड़ इसे हे प्राणाधिक बतलाओ ना
जाने भी दो कृपा करो अब रोष मुझे दिखलाओ ना
‘कसक रह गयी मन में ‘ बात सही ही कह दी तुमने
क्या करती? तब होश कहाँ था? बाँध लिया था तेरी सुधि ने;
तुम आकर सम्मुख नयनों के, मौन मुझे सिखला जाते हो –
तुम शायद झुंझला जाते हो!

जो कभी किसी को नहीं किया मेरी खातिर वह कर बैठे
मैं हुई प्रफुल्लित, किसी अकिंचन को मिलता है वर जैसे
यह अमूल्य उपहार, कहाँ मैं इसका मोल चुका पाउंगी
हो विभोर इस नियति खेल पर रोउंगी, फ़िर मुस्काउंगी;
अपनी अतुल प्रेम राशि से, प्रिय मन को नहला जाते हो –
तुम शायद झुंझला जाते हो!

मैं बात कहाँ वह कह पाती हूँ जिसकी मन में रहती चाह
सिर्फ़ सोचती रह जाती हूँ, नहीं खोज पाती हूँ राह
मेरे मन के सभी भाव तो आंखों से ही पढ़ लेते हो
‘क्या कहनाहै,क्या सुनना है,शब्द मूर्तियाँ गढ़ लेते हो;
‘अभिव्यंजन का प्राण हृदय में’, यह मुझको बतला जाते हो-
तुम शायद झुंझला जाते हो!

यह उजले कागज़ पर जो तुमने कुछ फूल उगाये हैं
इनकी सुरभि-सुधा से ही तो प्राण अभी तक जी पाए हैं
सूख गए यदि फूल , नहीं मिल पायेगा फ़िर त्राण
कभी ऐसा मत करना प्राण! नहीं तो मिट जायेगा प्राण;
तुम अनजान विरह की बातें, कह मुझको दहला जाते हो-
तुम शायद झुंझला जाते हो!

मुझमें जो आनंद विरल है

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intense-joy

मुझमें जो आनंद विरल है
वह तुमसे ही निःसृत था और तुम्हीं में जाकर खोया ।

घूमा करता हूँ हर पल, जीवन में प्रेम लिए निश्छल
कुछ रीता है, कुछ बीता है, झूठा है यह संसार सकल
यह चिंतन जो बहुत विकल है
वह तुझसे ही उलझा था और तुम्हीं से जाकर रोया ।

सच कहता हूँ वृक्ष बनेंगे मेरे अतल प्रेम के बीज
सच कहता हूँ आयेंगे इस छाया में हर प्रेमी रीझ
मेरा यह जो बीज सबल है
वह तुमसे ही पाया था और तुम्हीं में जाकर बोया ।

जो आंसू थे, हास बनेंगे और मगन हम नाचेंगे
और ढालेंगे सभी स्वप्न सच्चाई के सुधि सांचे में
जो मेरा यह विश्वास प्रबल है
वह तुझसे ही उपजा था औ’ तुझमें ही जाकर संजोया।

Photo: Facebook Wall of Pawan Kumar