Tuesday, February 21, 2017

Free Verse

Home Poems Free Verse
Free verse Poetry

कल-आज आजकल

आज तुम     
मेरे सम्मुख हो,
मैं तुम्हारे ‘आज’ को
‘कल’ की रोशनी में देखना चाहता हूँ।

देखता हूँ
तुम्हारे ‘आज का कल’
‘कल के आज’ से
तनिक भी संगति नहीं बैठाता।

कल-आज
आजकल
समझ में नहीं आते मुझे।

एक गाँव

10

सड़क उसके बीच से गुजरती है
गुजरते हैं सड़क पर चलने वाले लोग
पर थोड़ा ठहर जाते हैं,
दम साध कर खड़ा है वह
कुछ तो आकर्षण है उसमें कि
सड़क से गुजरने वाला हर आदमी
ठहर कर निरख ही लेता है उसे।

उसने सजा रखे हैं न जाने कितने
लाल,पीले,गुलाबी और उजले
रंगों से रंगे घर,
घरों के बाहर लगे हैं फ़ूल
और उन फूलों को घेरती हुई दीवार,
और फिर एक दरवाजा है वहां-
दीवारों के बीच,
न तो वह पिछड़ा है
और न ही अत्याधुनिक
उसके घरों में गूंजते हैं दूरदर्शन
व केबिल के कार्यक्रम,
पर रामलीला भी खेली जाती है
उसके मंचों पर और
उसके खेतों में लगे शामियानों में होती है नाच भी,
बड़ी मोहक है उसकी छवि।

अभी कल ही तो देखा था उसे..
हम जब बढ़े थे उसकी ओर, तो वह
धीर और शान्त स्वागत कर रहा था
उसके स्नेह से बंध गये थे हम,
वह हमारे स्वागत में
अपने पूरे लाव-लश्कर – उसके वृक्ष, कतारों में सजे घर,
स्वच्छ तालाब, प्राथमिक पाठशाला, आम के बगीचे, उसके निवासी –
के साथ उपस्थित था।

जब हम उसे छोड़कर लौटने लगे
कुछ वक्त बाद
हमने महसूस किया उसकी जीवंतता को,
उसके हांथ हिल रहे थे – वृक्षों के कम्पन में
मुस्कराया था वह – हमारे लिये – सुहानी धूप में
और
चल दिये थे हम उस गांव से
अपनी बाज़ार के लिये
उस गांव से गुजरती सड़क पर।

वहाँ भी डाकिया होगा?

7
enveloppen
enveloppen (Photo credit: Wikipedia)

क्यों ऐसा होता था
कि डाकिया रोज आता था
पर तुम्हारा लिखा हुआ पत्र
नहीं लाता था।

क्यों ऐसा होता था
कई बार
कि जब भी मैंने
डाकिये से माँगा तुम्हारा पत्र
उसने थमा दिये मनीआर्डर के रुपये
जो पत्रिकाओं, अखबारों में छपी
कविताओं के पारिश्रमिक थे
कि उसके कहने पर
कि एक जरूरी लिफाफा है तुम्हारे नाम
मैं पहुँचता था डाकघर तो
वह थमा देता था एक लिफाफा
किसी लिखित परीक्षा, साक्षात्कार का।

क्यों ऐसा होता था
बार बार
कि उसकी लाई हुई पत्रिकाओं,
पुस्तकों के सूची-पत्रों में
हर पंक्ति मुझे तुम्हारी लिखी हुई
पाती जैसी दिखती थी
कि उसकी लायी अनेक रसीदों में
अंकित जोड़-घटाव
मुझे अपने जीवन के
जोड़-घटाव मालूम पड़ते थे।

क्यों ऐसा होता था
हर बार
कि निराश होकर
कि अब नहीं आयेगा तुम्हारा पत्र
छटपटाते हुए यह बताने के लिये
कि जिस पते पर रख छोड़ा था तुमने मुझे,
अभी भी मैं वहीं हूँ,
मैं जब भी लिख कर
छोड़ने जाता था पत्र डाकघर में
सोचने लगता था
वहाँ भी डाकिया होगा?

और ……अंधेरा

Under The Cloak Of Darkness
(Photo credit: MarianOne)

आज फिर
एक चहकता हुआ दिन
गुमसुमायी सांझ में
परिवर्तित हो गया,
दिन का शोर
खामोशी में धुल गया,
रात दस्तक देने लगी।

हर रोज शायद यही होता है
फिर खास क्या है?

शायद यही, कि
मेरे बगल में
मर गया है मनुष्य – उसकी अन्त्येष्टि,
कुछ दूर लुट गयी लड़की- उसका सिसकना
और …. .अंधेरा।

छोटी सी कविता

विश्वास के घर में
अमरुद का एक पेंड़ था
एक दिन
उस पेंड़ की ऊँची फ़ुनगी पर
एक उल्लू बैठा दिखा,
माँ ने कहा- ‘उल्लू’
पिता ने कहा- ‘अशुभ, अपशकुन’,
फ़िर
पेंड़ कट गया।

अब, उल्लू
तीसरी मंजिल की
मुंडेर पर बैठता है।

बस में बैठी एक युवती

14
Woman
Woman (Source: in.com)

देखा मैंने,
चल रही थी ‘बस’।
विचार उद्विग्न हो आये
विस्तार के लिये संघर्ष कर रहे
संकीर्ण जल की भाँति।

आगे की दो सीटें सुरक्षित-
प्रतिनिधित्व का दिलाने को विश्वास
और दशा उस प्रतिनिधि की-
अवगुंठित, संकुचित और अनिवर्चनीय।

बस का चालक
स्टीयरिंग छोड़
हियरिंग पर ध्यान देता हुआ,
फागुन का महीना –
जिसमें भौजी की खतरे में
पड़ी अस्मिता।

मूक बैठा मैं,
देखता रहा उसे,
वह- बेसहारा, सशंकित, झुकाये सिर,
नाखून कुटकते दाँत और धड़कता हृदय
सुन रही थी कथा
अस्मिता की नग्नता की
अवगुंठित, संकुचित और अनिवर्चनीय।

बस में बैठी एक युवती
कुटकती दाँत
सुन रही थी गीत फागुन-
खो रही थी-
अवगुंठित, संकुचित और अनिवर्चनीय।

कैसे देख पाता?

8
BEHIND WHICH DOOR,
BEHIND WHICH DOOR, (Photo credit: marc falardeau)

गुजरता था मैं जब भी दरवाजे से
खुला रहता था वह,
खड़ा रहता था कोई
मेरी प्रतीक्षा में,
दरवाजे के भीतर से
एक मुस्कराहट चीरती भीड़ को
चली आती थी मेरे पास,
मैं अवश उस मुस्कुराहट से बँधा
रूप-मग्न चलता जाता था
अपने भीतर
एक उजास का अनुभव करते हुए।
उस समय मेरे मन की स्लेट पर
किसी चेहरे की लकीर होती
चेतना में निर्झर का संगीत होता
और दृष्टि में उसका सम्मोहन ।

गुजरता हूँ मैं अब भी दरवाजे से
खुला रहता है वह अब भी,पर
खड़ा नहीं रहता कोई
मेरी प्रतीक्षा में
अपनी मुस्कराहट के साथ ।
दिल में उठ जाती है कसक,
कसकने लगता है हृदय
हर उस चोट की तरह
जो सिहर उठती है
हर पूरबी हवा के झोंके से।
मेरी आँखों में सूनापन
आ कर ठहर गया है।

सोचता हूँ,
आज कोई होता भी
तो कैसे देख पाता उसे?
पहरा है मेरी आँखों के सामने
बहुत-सी आँखों का
लोग, सीमेंट और पत्थरों से
बनी दीवारों की तरह
हमारी आँखों के बीच आ खड़े हैं।

आपका हँसना

15
Smile

आपके हँसने में
छन्द है
सुर है
राग है,
आपका हँसना एक गीत है।

आपके हँसने में
प्रवाह है
विस्तार है
शीतलता है,
आपका हँसना एक सरिता है।

आपके हँसने में
शन्ति है
श्रद्धा है
समर्पण है,
आपका हँसना एक भक्ति है।

आपके हँसने में
स्नेह है
प्रेम है
करुणा है,
आपका हँसना एक भाव-तीर्थ है।

आपके हँसने में
आपका विचार है
अस्तित्व है
रहस्य है,
आपका हँसना स्वयं आप हैं।

मेरे जीवन में
आपकी तरलता है
स्निग्धता है
सम्मोहन है,
मेरा जीना आपका हँसना है।

वह आँसू कह जाते हैं

Tears in Eyes
Source: http://antoniogfernandez.com

मेरा प्रेम
कुछ बोलना चाहता है ।
कुछ शब्द भी उठे थे, जिनसे
अपने प्रेम की सारी बातें
तुमसे कह देने को
मन व्याकुल था ,
पर जबान लड़खडा गयी।
अन्दर से आवाज आयी
“कोई बाँध सका है
कि तुम चले हो बांधने
प्रेम को, शब्दों में।
ठहर गया मैं।

प्रश्न था, प्रेम बोलना चाहता है,
अभिव्यक्त होना चाहता है,
पर प्रेम के पास तो कोई भाषा ही नहीं-
मौन है प्रेम।
तो ऐसी दुविधा में उलझकर
पोर-पोर रो उठे,
आंखों से आंसू झरें
तो आश्चर्य क्या?
आंसू झर पड़ते हैं, जब
गहरी हो जाती है कोई अनुभूति-
प्रेम की अनुभूति- शब्दातीत।

राह मिल गयी……
जो शब्द नहीं कह पाते
वह आँसू कह जाते हैं।

उसकी याद ही अच्छी

9
Flower-Butterfly
Photo: From Facebook-wall of Pawan Kumar

खो ही जाऊं अगर कहीं
किसी की याद में
तो बुरा क्या है?

व्यर्थ ही भटकूंगा- राह में
व्यर्थ ही खोजूंगा- अर्थ को
व्यर्थ ही रोऊंगा- निराशा के लिये,
न पाऊंगा
प्रेम, दुलार और स्नेह का आमंत्रण,
फ़िर डूब जाने को प्रेम में
खो जाने को प्रीति में,
आनन्द के असीम आकाश में उड़ने को
क्यों न मैं खो जाऊं, किसी की याद में।

उस याद का हर रूप ही साकार है
उस याद की आवाज ही झंकार है,
यदि नहीं पाऊं उसे – जो सामने हो
या कि, जिसकी बात सुननी हो मुझे
मैं कहां फ़िर ढूढ़ता उसको फ़िरूं?
फ़िर वही एक रास्ता है याद आया
खो मैं जाऊं क्यों न उसकी याद में!

वह नहीं अच्छा
है उसकी याद ही अच्छी।