सावित्री Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम् https://blog.ramyantar.com/category/नाटक/savitri हिंदी ब्लॉग। साहित्य, भाषा, संस्कृति, लोक व शास्त्र से संयुक्त। कविता, कहानी, समीक्षा, निबन्ध, नाटक एवं अनुवाद का सहज प्रकाशन। लोक साहित्य का रंग भी। Tue, 08 Nov 2022 05:34:57 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.2 https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/03/cropped-favicon-4-32x32.png सावित्री Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम् https://blog.ramyantar.com/category/नाटक/savitri 32 32 सावित्री: यम-सावित्री संवाद https://blog.ramyantar.com/2013/01/%e0%a4%af%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6.html https://blog.ramyantar.com/2013/01/%e0%a4%af%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6.html#comments Sat, 12 Jan 2013 22:46:00 +0000 यम-सावित्री संवाद: पंचम दृश्य (जंगल का दृश्य। सत्यवान के हाथ में कुल्हाड़ी, कन्धे पर गमछा, सावित्री के हाथ में टोकरी और पानी का बर्तन) सत्यवान:...

The post सावित्री: यम-सावित्री संवाद appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.

]]>
सती सावित्री का यह विशिष्ट चरित्र कालजयी है। नारी की अटूट व दृढ़ सामर्थ्य का अप्रतिम उदाहरण है। प्रस्तुत नाट्य प्रविसावित्री-सत्यवान ष्टि वस्तुतः नारी की महानता का आदर है, सहज स्वीकार है। इस प्रविष्टि में सत्यवान के प्राण लेकर यमराज प्रस्थान करना चाह रहे हैं। सावित्री अत्यन्त दुःख में है, पर विवेकवान है, प्रज्ञावान है। वह यमराज के साथ हो लेती है, यम विचलित हो उठते हैं। यम-सावित्री संवाद का अनूप प्रभाव प्रकट करती है यह प्रविष्टि। सावित्री-1, सावित्री-2, सावित्री-3, सावित्री-4 एवं सावित्री-5 से आगे।

यम-सावित्री संवाद: पंचम दृश्य

(जंगल का दृश्य। सत्यवान के हाथ में कुल्हाड़ी, कन्धे पर गमछा, सावित्री के हाथ में टोकरी और पानी का बर्तन)

सत्यवान: सुखदायिनी! टोकरियों में पहले फल भर लिया जाय, फिर समिधा काटता हूँ। (वृक्ष पर चढ़ता है और लकड़ियाँ काट के गिराने लगता है।)

सावित्री: जीवनधन! आप के सभी अभिशापों का अवसान हो, आपके शरीर से स्वेद बह रहा है। अच्युत आपके सभी परितापों को हिमस्नात कमलिनी मुस्कान बना दें। आप इस निसर्ग धरा पर अमृत पीकर निर्भय हो जाँय।

चित्र:अर्द्धेन्दु बनर्जी; स्रोत:Kamat’s Potpourri

चित्र:अर्द्धेन्दु बनर्जी; स्रोत:Kamat’s Potpourri

सत्यवान: (सिर सहलाते हुए) प्रिये! आज परिश्रम के कारण मेरे सिर में दर्द होने लगा है। सारा शरीर टूट रहा है। कलेजे में भी बड़ी पीड़ा है। इस समय मैं अपने आप को अस्वस्थ सा पा रहा हूँ। ऐसा जान पड़ता है कि अब तो खड़े रहने की भी शक्ति नहीं रह गयी है। कल्याणी! अब मैं सोना चाहता हूँ।

(सावित्री सत्यवान को संभालती है और सत्यवान धरा पर सो जाते हैं। सावित्री पानी लाती है, पानी के छींटे मारती है। सहसा अत्यन्त तेजस्वी पुरुष दिखायी देता है। वह सूर्य-सा तेजस्वी है। लाल वस्त्र पहने हुए है, शरीर का रंग साँवला है, हाथ में गदा और पाश है, स्वरूप भयानक है। सत्यवान के पास खड़ा हो वह उसी को देख रहा है।)

सावित्री:(उस दिव्य पुरुष को देख खड़ी हो जाती है) प्रणाम महापुरुष! आप कोई देवता जान पड़ते हैं, क्योंकि आपका शरीर मनुष्य-सा नहीं है ।

यमराज: देवि! मैं और कोई नहीं, साक्षात मृत्यु का देवता यमराज हूँ। तुम पतिव्रता और तपस्विनी हो, अतः मैं तुमसे वार्ता कर सकता हूँ। तुम्हारे पति की आयु समाप्त हो चुकी है। अब मैं बहुत विलम्ब नहीं कर सकता, मैं इसे लेने आया हूँ। 

सावित्री: हे देवाधिदेव! मैंने तो सुना है कि जीवों को लेने के लिए आप के दूत आते हैं। आप स्वयं कैसे पधारे हैं?

यमराज: सत्यवान परम धर्मात्मा है। यह दूतों द्वारा ले जाने योग्य नहीं है। 

(इतना कहकर अँगूठे के आकार वाला जीव कलेजे से निकाल लेते हैं और उसे पाश में बाँधकर दक्षिण दिशा की ओर चल देते हैं। दुःख से आतुर सावित्री यमराज के पीछे चल पड़ती है।)

यमराज: सावित्री! तू कहाँ! अरे तू लौट। अब जा, इसका दाह संस्कार कर। पति सेवा के ऋण से मुक्त हो चुकी है और पति के पीछे-पीछे जहाँ तक आना चाहिए, आ चुकी है।

सावित्री: भगवन! जहाँ मेरे पतिदेव जायें, वहाँ मुझे भी जाना चाहिए। आपकी दया से मेरी गति कुंठित नहीं हो सकती। नारी के लिए पति का अनुसरण ही सनातन धर्म है। आप तो जानते हैं यह लोक विश्रुति है कि “भर्तृनाथा हि नार्यः”।

यमराज: सावित्री! तेरी धर्मानुकूल युक्ति-युक्त बातें सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। सहज पुरुष हृदय में कोमलता कैसे आ गयी? मैं जानता हूँ कि तू सविता की तपस्या से प्राप्त की गयी है। अतः मैं द्रवित होकर तुम्हें एक वर देना चाहता हूँ। सत्यवान के अलावा कोई एक वर माँग ले।

सावित्री: देव! मेरे श्वसुर के नेत्र की ज्योति नष्ट हो गयी है, अतः वह ज्योति उनको पुनः प्राप्त हो और वे बलवान तथा तेजस्वी हो जायें।

यमराज: तथास्तु! अब तू लौट जा सुकुमारी। थक जायेगी।

सावित्री: पति के समीप रहते हुए मुझे किसी प्रकार की थकावट नहीं हो सकती। प्राणनाथ के अतिरिक्त मेरा और कौन आश्रय है! उन्हें छोड़कर क्या पतिव्रता की कोई और गति होगी। मैं उनके साथ ही चलूँगी। पति का संग और सत्पुरुष का संग, मुझे इस युगल लाभ से वंचित न करें देव!

यमराज: सावित्री! तुम्हारी बातें इतनी धर्मप्रिय और सत्य सार हैं कि मैं इसे परम-प्रिय और हितकर स्वीकार कर रहा हूँ। एक नारी गृहप्रपंच से जकड़ी होकर भी, इतने उन्नत भाव में स्नात हो, यह तो दुर्लभ है। मैं तुम्हें देखकर बार बार यह चाहता हूँ कि सत्यवान को छोड़कर  कोई दूसरा वर माँगो।

सावित्री: प्रभु! मेरे श्वसुर का खोया हुआ राज्य उन्हें फिर उपलब्ध हो जाये और वे राजमद में ग्रसित होकर कभी धर्म पथ से विचलित न हो।

यमराज: चलो, दे दिया! अब तो तू लौट जा।

 (सावित्री पीछे-पीछे लगी है। वस्त्र विश्रृंखलित है, केशराशि कटि तक बिखर गयी है।)

यम एवं सावित्री: चित्र-नन्दलाल बोस

यम एवं सावित्री: चित्र-नन्दलाल बोस

सावित्री: देव आप सारी प्रजा का नियमन करने वाले हैं। अतः आपका यम नाम पड़ा। हे श्रेष्ठ! मैंने यह भी सुना है कि मन, वचन और क्रिया द्वारा किसी भी प्राणी का प्रतिद्रोह न कर के, सब पर समान रूप से दया करना और दान देना ही महापुरुषों का सनातन धर्म है। यूँ तो संसार के सभी पुरुष यथाशक्ति कोमलता का आश्रय ग्रहण करते हैं किन्तु महापुरुष तो महापुरुष होता है। वह तो अपने पास आये शत्रु पर भी दया करता है।

यमराज: कल्याणी! जैसे क्षुधित को अन्न मिले, त्रिषित को जल मिले और चिर रोगी को अमृत समान औषधि मिल जाय, वैसे ही तुम्हारे धर्मानुकूल वचनों को सुनकर मुझे खुशी-खुशी सत्यवान के जीवन को छोड़कर कोई तीसरा जो भी वर माँगो स्वीकार है।

सावित्री: देव! आप धर्मराज हैं, आप दाता हैं और मैं दया की पात्रा हूँ। मेरे पिता अश्वपति को कोई पुत्र नहीं है, उन्हें भी औरस पुत्र देने की कृपा करें।

यमराज: मुझे बरबस कोई तुम्हारी हाँ में हाँ मिलाने को प्रेरित कर रहा हूँ। चलो! यह भी दे दिया। हे नारी रत्न! मेरी बात मान लो। बहुत दूर आ गयी हो। आगे का मार्ग किसी मानव के लिए असम्भव है। अब तो लौट जा।

सावित्री: महाराज! मेरी एक-दो बातें और सुन लीजिए। एक तो मैं पति के समीप हूँ, अतः दूरी का तो कोई नाम ही नहीं और न मुझे उसका अनुभव हो रहा है। दूसरी बात आप विवस्वान सूर्य के पुत्र हैं और वैवष्वत्‌ कहलाते हैं। सब पर समान न्याय करने वाले होते हैं। आप तो सज्जन शिरोमणि हैं, आप कृपा के जलधर हैं, करुणा के सागर हैं। और क्या इसमें भी दो राय है कि संतों के साथ सात कदम चल ही दिया जाय तो मित्रता हो जाती है- “सतां हि सप्तपदेशु मैत्री”। अतः आप मेरे परम सुहृद भी हुए। आप सन्त हैं, कृपालु हैं, सुहृद हैं, न्यायी हैं, धर्मराज हैं इसलिए आप पर विश्वास करके आप से कुछ कहने का साहस करती हूँ।

यमराज: तूने जो बातें कहीं, वैसी आज तक मैंने किसी के मुँह से नहीं सुनी। अतः मेरी प्रसन्नता और बढ़ गयी है। अब तो सत्यवान के अतिरिक्त कोई चौथा वर भी माँग ले।

सावित्री: हे परमात्मन्! मुझे भी कुल की वृद्धि करने वाले सौ औरस पुत्रों की जननी होने का सौभाग्य प्रदान करें। वे सभी बलवान और पराक्रमी हों।

यमराज: तेरी यह अभिलाषा भी पूर्ण हो। मेरी प्रिय बालिके अब तो तू लौट जा।

सावित्री: हे परम सुहृद परमात्मा! सद्पुरुषों का मन सदा धर्म में ही लगा रहता है और सद्पुरुषों के संग की गई चर्चा कभी व्यर्थ नहीं जाती। संतो से किसी को भय नहीं लगता। सद्पुरुष तो अपने बल से सूर्य को भी समीप बुला लेते हैं। आप तो सनातन सदाचार के प्रणेता हैं। भूत-भविष्य के आधार हैं। अपने प्रभाव से आपने धरती को धारण किया है। आप जैसे केवल आप ही हैं। 

यमराज: सावित्री! मैं परम प्रसन्न हूँ। तुम्हारी बातें ज्यों-ज्यों सुनता हूँ, त्यों-त्यों मेरी श्रद्धा बढ़ती जाती है। मन उमग रहा है। माँग ले कोई और वर।

सावित्री: भगवन! अब तो आप सत्यवान के जीवन का ही वरदान दे दीजिए! इससे आपके सत्य और धर्म दोनों की रक्षा होगी। मेरा सौभाग्य बढ़ेगा और आप का सुयश बढ़ेगा। आपने मुझे सौ पुत्रों का वर दिया है, बिना पति के पुत्र की संभावना कैसे होगी देव?

(यमराज सिर पर हाथ रख लेते हैं। कुछ देर के लिए मौन हो जाते हैं और फिर हाथ वरद मुद्रा में उठा बोल पड़ते हैं-)

सावित्री द्वारा यमराज से सत्यवान के प्राण का वरदान

सावित्री-यमराज

यमराज: देवि! यह मेरी तीसरी पराजय है। एक बारा हारा था ऋषि पुत्र मारकण्डेय से और उसे अमरत्व का वरदान मिला। दूसरी बार हारा ऋषि-पुत्र नचिकेता से, वह मेरी यमपुरी से अमरत्व का ज्ञान लेकर चिरंजीवी हो लौटा। और तीसरी बार हारा नारी सावित्री से। मेरे पास से तुमने अपने पति को प्रेम से छीन लिया है। मैं हारा हूँ लेकिन प्रसन्नता से, खेद से नहीं। नियम में बँधा हुआ आज नियम तोड़ दे रहा है। वचनबद्ध यमराज तुम्हें तुम्हारा पति दे रहा है। जा! सावित्री नाम को पतिव्रता की रेखा में सबसे ऊँची कर दे। आज की तिथि से तुम्हारे पति को चार सौ वर्षों की आयु दे रहा हूँ। पुत्रि पवित्र किये कुल दोऊ– अपने पिता और अपने पति दोनों को सनाथ कर देने वाली सावित्री तुम्हारी जय हो!

(सावित्री की आँखें बन्द हैं। दोनों नेत्रों से प्रसन्नता के आँसू टपक रहे हैं।)

(पर्दा गिरता है) 

—समाप्त—

The post सावित्री: यम-सावित्री संवाद appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.

]]>
https://blog.ramyantar.com/2013/01/%e0%a4%af%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6.html/feed 1
सावित्री: सत्यवान का वन-गमन https://blog.ramyantar.com/2013/01/savitri5.html https://blog.ramyantar.com/2013/01/savitri5.html#comments Wed, 02 Jan 2013 18:00:00 +0000 सत्यवान का वन-गमन (महाराजा द्युमत्सेन की पवित्र स्थलीय आश्रम जैसी व्यवस्था। सावित्री पति के साथ सुख पूर्वक निवास करती है। आभूषण उतार कर रख देती...

The post सावित्री: सत्यवान का वन-गमन appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.

]]>

चारित्रिक औदात्य एवं समृद्धि के पर्याय ऐसे अनेकों चरित्र भारतीय मनीषा की अशेष धरोहर हैं जिन्होंने अपनी प्रज्ञा, अपनी महनीयता एवं अनुकरणीय विशेषताओं से इस देश व सम्पूर्ण विश्व को चकित किया । ऐसा ही अनोखा नाम है सती सावित्री। सावित्री का यह विशिष्ट चरित्र कालजयी है। नारी की अटूट व दृढ़ सामर्थ्य का अप्रतिम उदाहरण है। प्रस्तुत नाट्य प्रविष्टि वस्तुतः नारी की महानता का आदर है, सहज स्वीकार है। इस प्रविष्टि में सावित्री सत्यवान के वन-गमन से विचलित है। उसे बार-बार सत्यवान के अंतिम दिवस का स्मरण हो रहा है। वह सत्यवान की अकाल-मृत्यु की भविष्यवाणी के सत्य होने की आशंका से विचलित है एवं अत्यन्त क्लान्त अनुभव कर रही है। सावित्री-1, सावित्री-2, सावित्री-3 एवं सावित्री-4 से आगे। 

सत्यवान का वन-गमन

(महाराजा द्युमत्सेन की पवित्र स्थलीय आश्रम जैसी व्यवस्था। सावित्री पति के साथ सुख पूर्वक निवास करती है। आभूषण उतार कर रख देती है और गैरिक वसना हो जाती है। पति सास-ससुर की सेवा कर उन्हें प्रसन्न रखती है।  इस प्रकार वह अभाव में भी भाव  का सृजन कर स्वयं संतुष्ट रहती और पूजनीयों को भी संतुष्ट और सुखी रखती। सावित्री उस निर्जन को भी अपनी उपस्थिति से नंदन-वन बना देती है।)

सत्यवान: (एकान्त विश्राम स्थल में) हे मेरी चिरकाम्या! तुम नहीं होती तो यहाँ पर कौन मुझको खोजता! भरी भरी यह नर्म हथेली चिर अमरता का आश्वासन कहाँ से दे पाती। तुम्हारे इस दर्शन से मेरे ऊपर सकल चराचर की ममता उमड़ आयी है। तुम्हारे सानिध्य में मैं अकिंचन अनन्त निःसीम हो गया हूँ।

सावित्री: हे मेरे हृदयेश्वर! तुम ही मेरे प्राणों की सर्व स्वहारिणी पुकार  हो। कोई यह नवीन संयोग नहीं है। विश्वास करो प्रिय! रात की निस्तब्धता को चीर कर कोई अनजाना स्वर गूँज उठता था। वह तुम्हारा स्वर ही तो था। शैया पर छितरी अलस मेरी लटों को यदि कोई स्पर्श किया होता तो मैं भूल से भी यह नहीं सोचती  कि ढीठ सपने उनींदी पलकें चूमने आये हैं। यह तुम्हीं तो आते थे। गवाक्ष की अर्गला पार कर कोई पद्मगंध पास आती तो मैं भरम नहीं जाती थी कि सलोनी चाँदनी गदरा गयी है। स्वरों के पीछे छिपे पदचाप, सिहरनों के पार की अंगुलियों के स्पर्श में तुम्हीं तो नित्य आते थे हमारे पास तक।

सत्यवान: वरानने! तुमने मेरी श्वासों में इतना ज्वार भर दिया है कि इस जीर्ण-शीर्ण कन्था में, मोती ही समा नहीं रहा। मेरे भग्न सितार के तार-तार को तुमने कस कर जन्म-जन्म के बिसरे गीत को जगा दिया है। मनसिज और मनसिज दहन शंकर की चिर गोपन लीला का भेद आज समझ में आ गया है।  हे मेरी तापसी प्रिये! मैं तुम्हें तन-मन-प्राण-आत्मा के सारे ही धरातलों पर प्रेम में, वासना में, पावन में, अपावन में, नाश में, सृजन में, अपने समस्त में आज मैं तुमको समस्त ही पा गया। तुम्हारी बाहों के ममतामय बन्धन में असीम और अनन्त समा गया है, चाहे वह कहीं हो।

सावित्री: रात्रि काफी बीत चुकी है। अब शयन करें। आपके श्री चरणों को प्रणाम करती हूँ।

(सत्यवान शयन के लिए जाते हैं। सावित्री को नारद की बात भूलती नहीं। वह चिन्तित होकर मौन आकाश की ओर देखती है।)

सावित्री: (स्वगत) अब तो प्राणनाथ के जीवन का एक ही दिन शेष रह गया है। वज्र हृदय! कल का दिन मेरी अग्निपरीक्षा का दिन होगा। सूर्योदय होने में बस एक प्रहर ही बाकी है। (आँखें हथेलियों से ढक कर फफक कर रो पड़ती है, फिर बेसुध हो जाती है।)

(सत्यवान का प्रवेश। सावित्री को बेसुध देख कर जगाता है।)

सत्यवान: प्रिये! (चौंक कर सावित्री जगती है) क्या बात है प्रिये! तुम्हारा जी कुछ अनमना-सा लग रहा है। जाओ, थोड़ा विश्राम कर लो, मैं समिधा चुनने जा रहा हूँ।

सावित्री: नहीं  नाथ! आज आप अकेले न जाँय। मैं भी आपके साथ चलूँगी।

सावित्री नाटक का मंचन: रम्यांतर यूट्यूब चैनल

सत्यवान: प्रिये! वन का रास्ता बहुत कठिन है। तुम वन में पहले कभी नहीं गयी हो और इधर व्रत और उपवास ने तुम्हें दुर्बल बना दिया है। तुम पैदल न चल सकोगी।

सावित्री: उपवास से मुझे कोई कष्ट और थकावट नहीं है। चलने के लिए  मन में उत्साह है इसलिए रोकिए मत। मध्याह्न की अलस बेला में जब उदासी कुंज-कुंज फेरा डालेगी तो मैं तुम्हारी स्वर लहरी में स्वर मिलाकर शून्यता को बाँसुरी बना दूँगी। दिवा-रात्रि में तुम्हारा साथ नहीं छोड़ूँगी, नहीं छोड़ूँगी।
सत्यवान: यदि तुम्हें चलने का उत्साह है तो प्रिये!  मैं नहीं रोकूँगा, किन्तु माता-पिता से आशीर्वाद तो ले लो।

(सत्यवान के माता पिता विराजमान हैं। सावित्री उनके चरणों को छूकर जाने को तैयार हो जाती है।) 

सावित्री: पिता श्री! आज मुझे नाथ के साथ वन जाने की अनुमति दें।

द्युमत्सेन: तुम जब से बहू बन कर आयी हो, तब से अब तक किसी बात के लिए याचना की हो, मुझे स्मरण नहीं। अतः आज तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी हो जानी चाहिए। अच्छा बेटी, तू जा!

(सावित्री आज्ञा पाकर पति के साथ वन की ओर चल देती है। उसके मुख पर हँसी थी किन्तु हृदय में दुःख की आग जल रही थी।) 

(पर्दा गिरता है) 

The post सावित्री: सत्यवान का वन-गमन appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.

]]>
https://blog.ramyantar.com/2013/01/savitri5.html/feed 5
सावित्री: विवाह निश्चय https://blog.ramyantar.com/2012/12/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b9-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%af.html https://blog.ramyantar.com/2012/12/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b9-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%af.html#comments Wed, 19 Dec 2012 09:19:00 +0000 सावित्री: विवाह निश्चय: तृतीय दृश्य (महाराजा अश्वपति का राजदरबार। बन्दी विरद गान कर रहे हैं। आमोद-प्रमोद का हृदय हारी दृश्य। देवर्षि नारद का प्रवेश।) नारद:...

The post सावित्री: विवाह निश्चय appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.

]]>
चारित्रिक औदात्य एवं समृद्धि के पर्याय ऐसे अनेकों चरित्र भारतीय मनीषा की अशेष धरोहर हैं जिन्होंने अपनी प्रज्ञा, अपनी महनीयता एवं अनुकरणीय विशेषताओं से इस देश व सम्पूर्ण विश्व को चकित किया। ऐसा ही अनोखा नाम है सती सावित्री। सावित्री का यह विशिष्ट चरित्र कालजयी है। नारी की अटूट व दृढ़ सामर्थ्य का अप्रतिम उदाहरण है। प्रस्तुत नाट्य प्रविष्टि वस्तुतः नारी की महानता का आदर है, सहज स्वीकार है। सावित्री-1, सावित्री-2 एवं सावित्री-3 से आगे।

सावित्री: विवाह निश्चय: तृतीय दृश्य

(महाराजा अश्वपति का राजदरबार। बन्दी विरद गान कर रहे हैं। आमोद-प्रमोद का हृदय हारी दृश्य। देवर्षि नारद का प्रवेश।)

नारद: नारायण! नारायण!
महाराजा: देवर्षि के चरणों में राजदरबार सहित अश्वपति का प्रणाम स्वीकार हो। आसन ग्रहण करें देवर्षि।

(सावित्री का गुरुदेव के साथ प्रवेश। सावित्री महाराज और देवर्षि को प्रणाम करती है।)

नारद: सौभाग्यशालिनी हो पुत्री।
महाराजा: कल्याण हो पुत्री।

नारद: राजन! आपकी यह कन्या कहाँ से लौट रही है? अब तो यह अभिषेक योग्य हो गयी है। आपने अभी तक इसका विवाह नहीं किया?

महाराजा: देवर्षि! इसी कार्य के लिए मैंने इसे भेजा था। यह अभी-अभी लौटी है। अब इसी के मुख से सुनिए देवर्षि!

सावित्री: तात! शाल्व देश में एक धर्मात्मा राजा थे। उनका नाम द्युमत्सेन है। वे पहले राज्य करते थे, किन्तु पीछे उनकी आँख अन्धी हो गयी। उस समय इनका पुत्र बहुत छोटा था। शत्रुओं को आक्रमण करने का मौका मिल गया। पड़ोस के शत्रु राजा ने उनका राज्य छीन लिया । तब वे गोद में बालक लिए पत्नी के साथ वन में चले गए और वहाँ उत्तम नियमों का पालन करते हुए तपस्या में लग गए। उनके पुत्र सत्यवान जो राज्य में जन्म लेकर तपोवन में पले और बढ़े हैं, सर्वथा मेरे योग्य है। अतः मैंने अपने मन से उन्हीं को अपना वर स्वीकार किया है।

नारद:(चौंक कर) राजन! यह तो बड़े खेद की बात हो गयी। सावित्री ने बड़ी भूल की है । बेचारी जानती नहीं थी इसीलिए उत्तम गुणों से युक्त सत्यवान का वरण कर लिया। इस राजकुमार के माता-पिता सदा सत्य बोलते हैं। इसलिए ब्राह्मणों ने उसका नाम सत्यवान रख दिया।

महाराजा:(नारद से) क्या इस समय भी माता-पिता के प्रति भक्ति रखने वाला सत्यवान तेजस्वी, बुद्धिमान, क्षमावान और शूरवीर है।

नारद: नारायण! नारायण! महाराज अश्वपति! आप ने पूछा है इसलिए कहने में संकोच नहीं करूँगा। द्युमत्सेन का वह पुत्र परमवीर, तेजस्वी, सूर्य के समान प्रतापवान, वृहस्पति के सदृश बुद्धिमान, इन्द्र के समान वीर, पृथ्वी की भाँति क्षमाशील, ययाति के समान उदार, चन्द्र के समान नयनाभिराम और अश्वनी कुमारों के समान रूपवान है। वह जितेन्द्रिय, विनयी, पराक्रमी, सत्यप्रतिज्ञ, मिलनसार, ईर्ष्या रहित, लज्जाशील और तेजस्वी है।

महाराजा:(आश्चर्य से) मुनिवर! आपने तो उसे समस्त गुणों का भण्डार बता दिया। उसमें कोई दोष भी है क्या?

नारद: राजन! दोष तो उसमें एक ही है। जिसने समस्त गुणों को ढँक लिया है। दोष भी साधारण नहीं है। उसे किसी भी प्रयत्न द्वारा मिटा देना असंभव है। आज से ठीक एक वर्ष बाद उसकी आयु समाप्त हो जायेगी। उसे देह त्याग करना पड़ेगा राजन्!

महाराजा:(व्यग्र होकर) मेरी नयनपुतरी, बेटी सावित्री! तुम फिर से यात्रा करो और दूसरे किसी योग्य वर का वरण करो। उसकी आयु थोड़ी है । वह एक ही वर्ष में शरीर त्याग देगा।

नारद: पुत्री! पिता की इच्छा को समझो। पति-विहीन जीवन कैसा जीवन?

सावित्री: मुनिवर! प्रातःकालीन दैदीप्यमान किरण-सी उस राजपुत्र की छवि को मैंने अपनी प्राणों की अंतर्गुहा में बंद कर लिया है। उसकी गुनगुनी गरमाहट से मेरे अन्दर का कोना-कोना पिघल रहा है। अब मेरा पूर्णकाम, आप्तकाम, परम काम वही होगा। अपनी समर्पण गर्भा प्रीति की मरणभेदी लौ से उस भंगुर में भी अमर यौवन का रसायन , यदि नहीं भर दिया तो मेरा सावित्री नाम नहीं।

नारद: सावित्री! तुम सती शिरोमणि हो। निःसंदेह तुम्हारा धार्मिक भाव जीवन और मृत्यु की सीमा से ऊँचा उठ चुका है; पर शुभाशुभ को विचार कर कसौटी पर कस लेना ही चाहिए।

सावित्री: कहाँ कोई विकल्प बचने दिया है ऊपर वाले ने मुनिवर! सच कहती हूँ, मेरा मन मन्दिर और तन मृगछाला हो गया है। मैं बिना वरमाला के ही वरण हो गयी। वरदान, अभिशाप, पुण्य-पाप सबकी कपाल क्रिया हो गयी उसी क्षण जब परस्पर परिचय के लिए हमने एक दूसरे की समीपता स्वीकारी। (पिता की ओर दृष्टिपात करती हुई) पूज्य पिताजी! कन्या एक ही बार किसी को दी जाती है। सत्यवान दीर्घायु हों अथवा अल्पायु, गुणवान हों अथवा निर्गुण, मैंने एक बार उन्हें अपना पति स्वीकार कर लिया। अब दूसरे पुरुष को मैं नहीं वर सकती। अतः मैंने जिस पति का निश्चय किया है उसमें मेरा मन ही प्रमाण है।

नारद:(सहर्ष) महाराज! सावित्री की बुद्धि स्थिर है। इसने धर्म का आश्रय लिया है। इसे किसी प्रकार इस निश्चय से विचलित नहीं किया जा सकता है। सत्यवान में जो जो गुण हैं वो किसी दूसरे पुरुष में हैं ही नहीं। अतः मुझे तो अब यही अच्छा जान पड़ता है कि आप इसका कन्यादान कर दें ।

महाराजा: भगवन्! आप ही मेरे गुरु हैं। आपने जैसा कहा मैं वैसा ही करूँगा।

नारद: सावित्री का विवाह निर्विघ्न समाप्त हो तथा आप सब लोगों का कल्याण हो, इसके लिए यथासाध्य चेष्टा करूँगा। नारायण, नारायण!

(यह कहकर नारद प्रस्थान कर जाते हैं।)

The post सावित्री: विवाह निश्चय appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.

]]>
https://blog.ramyantar.com/2012/12/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b9-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%af.html/feed 5
सावित्री: सत्यवान https://blog.ramyantar.com/2012/12/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8.html https://blog.ramyantar.com/2012/12/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8.html#comments Sun, 09 Dec 2012 22:02:00 +0000 सावित्री व सत्यवान का प्रथम मिलन सावित्री: गुरुदेव! यहीं सरिता तट पर रुक जायें। यहाँ जो जहाँ है सत्य को समर्पित है। सब चिर परिचित...

The post सावित्री: सत्यवान appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.

]]>
इस ब्लॉग की नाट्य प्रस्तुतियाँ करुणावतार बुद्ध (1,2,3,4,5,6,7,8,9,10) एवं सत्य हरिश्चन्द्र (1,2,3,4,5,6,7,8,9) उन प्रेरक चरित्रों के पुनः पुनः स्मरण का प्रयास हैं जिनसे मानवता सज्जित व गौरवान्वित होती है। ऐसे अन्याय चरित्र हमारे गौरवशाली अतीत की थाती हैं और हमें अपना वह गौरव अक्षुण्ण रखने को प्रेरित करते हैं। चारित्रिक औदात्य एवं समृद्धि के पर्याय ऐसे अनेकों चरित्र भारतीय मनीषा की अशेष धरोहर हैं जिन्होंने अपनी प्रज्ञा, अपनी महनीयता एवं अनुकरणीय विशेषताओं से इस देश व सम्पूर्ण विश्व को चकित किया । ऐसा ही अनोखा नाम है सती सावित्री। सावित्री का यह विशिष्ट चरित्र कालजयी है। नारी की अटूट व दृढ़ सामर्थ्य का अप्रतिम उदाहरण है। प्रस्तुत नाट्य प्रविष्टि वस्तुतः नारी की महानता का आदर है, सहज स्वीकार है।


यह प्रस्तुति सावित्री के उस स्वयंवर को रेखांकित कराने व स्मरण कराने का भी एक प्रयास है जो सही अर्थों में स्वयंवर कहे जाने योग्य है। सावित्री का यह सम्मानित कथानक स्वयंवर को नवीन अर्थ देने वाला है। उस युग और संप्रति वर्तमान युग का भी अकेला उदाहरण। स्वयंवर का तो यथार्थतः अर्थ ही है न, स्वयं का वर- ‘स्वयं वरतीति स्वयंवरः’– अर्थात् कन्या अपने वर का स्वयं वरण करती है। किन्तु क्या इतिहास का कोई भी स्वयंवर केवल कन्या की इच्छा के साथ सम्पन्न हुआ है? पिता की आज्ञा व इच्छा सिर चढ़कर बोलती है।

Savitri and Satyavanप्रतियोगिताओं का आयोजन, सामर्थ्य का प्रदर्शन, क्षमताओं का आँकलन- यह सब अप्रत्यक्षतः कन्या की इच्छाओं के अस्वीकार के दुष्चक्र ही तो हैं। अस्वीकार हो भी तो अन्ततः स्वीकार करना पड़ता है कन्या को। जानकी का पछताना स्मरण करें- “अहह तात दारुण हठ ठानी/ समझत नहिं कछु लाभ न हानी।” किन्तु सावित्री का स्वयंवर अनोखा है। वह भाग कर नहीं, त्याग कर नहीं, हठ कर नहीं, रूठ कर नहीं बल्कि गुरुजनानुमोदित विधि से स्वयं पति को चुनने निकल पड़ती है और चयन भी ऐसा कि काल को भी हथजोड़ी करनी पड़ती है। नारी महिमा मंडित होती है। यह प्रस्तुति भी इसलिए ही की नारी की महानता स्मरण रहे। उसकी भावनाओं का समादर हो और जो रमणी संशय, शंका, सोच, शोक और संकोच में घुटती रहती है, उसके द्रुत विलंबित क्षण को शिखरणी बना दिया जाय। प्रविष्टि इसलिए भी कि यह प्रहणीय हो, मननीय हो और धारणीय हो। सावित्री-1 एवं सावित्री-2 से आगे। 

सावित्री व सत्यवान का प्रथम मिलन

सावित्री: गुरुदेव! यहीं सरिता तट पर रुक जायें। यहाँ जो जहाँ है सत्य को समर्पित है। सब चिर परिचित सा लग रहा है। ये फूल, यह लहराता वृक्ष, ये सूखी वन की लकड़ियाँ, यह नदी का कूल- सब मुझे रोक रहे हैं। लग रहा है, यहाँ का पवन मुझमें ही प्रशस्त  हो रहा है । आकाश झुक कर मेरी हथेलियों पर लिख रहा है कि किसी भी सीमांतिनी का विवश अश्रु तेरा बने। विजेता भी विथकित हो तुम्हें अपनी पराजय सौंप सुखी हो जाये। धरित्री कह रही है कि तुम्हारा बाहुल्य सृष्टि की दुख-काया को अपने में समेट ले।

(दूर सत्यवान को लकड़ी काटता देखकर) कृपया उस ओर हमें ले चलें जहाँ एक दिगम्बर पादप पर एक तापस तरुण की कुल्हाड़ी गिर रही है। गुरुदेव! लग रहा है कि एक-एक चोट से कोई संगीत निकल कर बह रहा है। वनस्पति स्वयं को उस दिव्य वपुष के आगे समर्पित कर सनाथ हो रही है।

(सभी उसी ओर चलकर वृक्ष के पास आते हैं जहाँ सत्यवान तन्मयता से काष्ठ-संचयन कर रहा है।)

अमात्य: हे सुदर्शन सौम्य बालक! प्रातः-प्रातः तुम इस काष्ठ-संचय कार्य में तल्लीन हो। हम उत्सुकतावश इस प्रदेश का मार्ग तुमसे ही पूछने के लिए यहाँ रुके हैं।

सत्यवान: हे भद्र वपुष! इसके पूर्व कि आपको इस वनान्तर का मर्ग प्रशस्त करूँ, मैं आपका परिचय जान सकता हूँ?

अमात्य: प्रिय! मद्रदेशाधिवासी मैं धर्मप्राण राजा अश्वपति का अमात्य हूँ। यह सुलक्षणा पुत्री उनकी तनया है और आप गुरुदेव हैं। राजा की अनुशंसा के अनुकूल हम देशाटन, प्रकृति दृश्यावलोकन एवं विशेष रूप से तीर्थ दर्शन के लिए निकले हैं।

सावित्री: हे पुरुष श्रेष्ठ!   इस तपोवन के अवलोकन की हमारी उत्सुकता हमें बरबस यहाँ ठिठक जाने को बाध्य कर गयी। यदि आपको कष्ट न हो तो, क्या आप हमें अपना परिचय देने की कृपा करेंगे? और आगे को निकलते हुए मार्ग को स्पष्ट करेंगे?

गुरुदेव: पुत्र! इसे अन्यथा न लेते हुए हमारी जिज्ञासा शान्त करने का अनुग्रह करो।

सत्यवान: (विनीत भाव से) पहले मैं पूजनीय गुरुकल्प, आप को एवं समस्त श्रेष्ठ जनों को सादर प्रणाम करता हूँ। इस सुलक्षणा देवि का भी विनीत अभिनन्दन है। आप हमारे अतिथि हैं। कृपया हमारी विश्राम-स्थली में प्रविष्ट होकर हमारा आतिथ्य स्वीकार करके आगे प्रस्थान करें। वहीं बात होगी।

गुरुदेव: समय स्वल्प है।  आगे दूर निकलना है, क्षमा करें, हम प्रसन्न हैं। अपने परिचय से हमारि उत्सुकता को शान्त करो मधुवचन-प्रवीण कुमार!

सत्यवान: हे देवता! शाल्व देश के भूपाल द्युमत्सेन का तनय हूँ। शत्रु से आक्रान्त हो वन में तात चरण में आश्रय लिया। मैं शिशु था, तब से अब तक की उम्र तप साधना में व्यतीत की है। समय ने सुविधाओं पर ग्रहण लगा दिया किन्तु संयम और संतोष से समय का अतिक्रमण कर रहे हैं। यही हमारा संक्षिप्त आत्मकथ्य है। आपने अपनत्व की चादर ओढ़ा दी, इसलिए मुखर हो गया। क्षमा करें, आपका जो क्षेमकारी मन है उससे उपकृत हूँ। मैं पूज्यवर के सामने  होकर वार्तालाप कर रहा हूँ, यह मेरा दोष है। आप……(बीच में सावित्री रोकती है।)

सावित्री: महानुभाव! आप अपने को चिन्त्य क्यों समझ रहे हैं? कालो हि दुरितक्रमः। भले ही  थोथे समुद्र के आवेश में वेगवती नदी की शक्ति खो गयी हो किन्तु हमें लग रहा है, पुण्य परम्परा के जल में प्रवाहित आप एक दीप होंगे। यात्रायें फिर आरम्भ होंगी, अप्राप्त से प्राप्त की दिशा में। हे विरल विभूति! क्या मैं यह जान सकती हूँ कि आपने इतना दुख सहा कैसे?

सत्यवान: हे शुभार्ये! विडम्बना  यह है कि आदमी का सपने का ही संसार बना हुआ रहता है। आदमी ने संसार को सच मान लिया है और उसे ही सुख का निमित्त समझ लिया है। बंद आँखों से देखा जाने वाला स्वप्न तो अलग है, पर संसार भी एक स्वप्न ही है। स्वप्न की माया निराली है। हमारी मूर्च्छा इतनी गहरी है कि हम स्वप्न-संसार का ही आनन्द ले रहे हैं। असल में चित्तवृत्तियों का दास बने रहना स्वप्न में ही तो जीना है न सुमुखि! मैं गतानुगतिक के अखिल प्रपंच को स्वप्न समझकर सुखी हूँ।

सावित्री: आप कभी अशान्त नहीं हो जाते?

सत्यवान: देवि! तृष्णा, आसक्ति और उत्तेजना इनसे ही चित्त के अवनति के द्वार खुलते हैं। शान्ति का स्रोत हमारे भीतर ही है। आवश्यकता पूर्ति के लिए श्रम करता हूँ, किसी भी बात की गाँठ  नहीं बाँधता। स्वामित्व मन पर करता हूँ, इसलिए अशान्त नहीं होता हूँ।

सावित्री: आपकी वाणी में मर्म को छू लेने की एक लोल लहर है। फूलों के फेन और कुलिश के रज मिश्रित गढ़न ऐसी मिलती कहाँ है?

सत्यवान: आपकी सुधा-वर्षिणी दृष्टि और आह्लादिनी वाणी मुझे अकिंचन से और अकिंचन बनाती चली जा रही है। कल तक जो सुरभि मुझे छेड़ जाती थी। हृदय से सटकर कोई कल्पना विश्राम करती थी। मधुनिशा वसुन्धरी रस कलश उठाये पथ पर आगे बढ़ने को उत्सुक होती थी, वह करवटें बदले, इसके पूर्व ही आपकी करुणा से स्नात हुआ मैं अपने नीड़ में लौट रहा हूँ। अपने परिचय की भूमिका में उतरा ही था कि मधुभरी साँसें सिहर कर रोम-रोम सहलाने लगीं। मैं इस अम्लान पावनी के विनयावनत क्षमा याची हूँ। पिता प्रतीक्षा में होंगे। चलूँ ।

सावित्री: पिता तो मेरे भी प्रतीक्षा में होंगे। चलूँ, (दोनों एक दूसरे को अंतरंग दृष्टि से देखते हैं) आगे समय आयेगा कि आपसे या आपका आतिथ्य रूप ग्रहण करे।

गुरुदेव: पुत्री! अभी आगे भी तो चलना है!

सावित्री: पूज्यवर! अब कौन-सी यात्रा? लौट चलें। अन्वय के ज्वार में व्यतिरेक विलीन हो गया । जो होना था हुआ, जो करना था किया, शेष वार्ता फिर कभी। (मंत्री समूह सावित्री के साथ जाने को तैयार)

सत्यवान: सर्व सर्वत्र को प्रणाम कर रहा हूँ। धृष्टता क्षमा हो!

सावित्री: आशीष दो, वरेण्य पुरुष! आज का परिचय-प्रभात चिर अमर रहे। (सभी का प्रस्थान, सत्यवान स्तब्ध खड़ा)

सत्यवान: (स्वगत) चले गए वे लोग। क्या देता परिचय उन्हें अपना। आँखें फाड़-फाड़ कर देख रहे थे मुझे वे लोग। कभी डबडबायी आँखों से, कभी निरीह और कभी प्रश्न भरी आँखों से, तो कभी विस्मय और सन्देह से नहायी उत्ताल आँखों से। किसी दुःस्वप्न-रात्रि की कहानी का नायक रहा मैं। जिसे इतिहास ने विस्मरण की झोली में डाल दिया है। अब चलो सत्यवान! अपनी राह पकड़ो। जाने पहचाने से अनजान और अनजान से जाना पहचाना बन जाता है कोई।

(कुटिया की ओर प्रस्थान कर जाता है।)

The post सावित्री: सत्यवान appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.

]]>
https://blog.ramyantar.com/2012/12/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8.html/feed 8
सावित्री: स्वप्न और औत्सुक्य https://blog.ramyantar.com/2012/12/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a8-%e0%a4%94%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af.html https://blog.ramyantar.com/2012/12/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a8-%e0%a4%94%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af.html#comments Sun, 02 Dec 2012 23:09:00 +0000 द्वितीय दृश्य (वन प्रान्तर का दृश्य। पक्षियों का मधुर संगीत गुंजायमान है। दूर मन्दिरों की घंटियाँ एवं शंख-ध्वनि सुनायी पड़ रही है।) सावित्री:(भ्रमण करते हुए)...

The post सावित्री: स्वप्न और औत्सुक्य appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.

]]>
इस ब्लॉग की नाट्य प्रस्तुतियाँ करुणावतार बुद्ध (1,2,3,4,5,6,7,8,9,10) एवं सत्य हरिश्चन्द्र (1,2,3,4,5,6,7,8,9) उन प्रेरक चरित्रों के पुनः पुनः स्मरण का प्रयास हैं जिनसे मानवता सज्जित व गौरवान्वित होती है। ऐसे अन्याय चरित्र हमारे गौरवशाली अतीत की थाती हैं और हमें अपना वह गौरव अक्षुण्ण रखने को प्रेरित करते हैं। चारित्रिक औदात्य एवं समृद्धि के पर्याय ऐसे अनेकों चरित्र भारतीय मनीषा की अशेष धरोहर हैं जिन्होंने अपनी प्रज्ञा, अपनी महनीयता एवं अनुकरणीय विशेषताओं से इस देश व सम्पूर्ण विश्व को चकित किया । ऐसा ही अनोखा नाम है सती सावित्री। सावित्री का यह विशिष्ट चरित्र कालजयी है। नारी की अटूट व दृढ़ सामर्थ्य का अप्रतिम उदाहरण है। प्रस्तुत नाट्य प्रविष्टि वस्तुतः नारी की महानता का आदर है, सहज स्वीकार है।

यह प्रस्तुति सावित्री के उस स्वयंवर को रेखांकित कराने व स्मरण कराने का भी एक प्रयास है जो सही अर्थों में स्वयंवर कहे जाने योग्य है। सावित्री का यह सम्मानित कथानक स्वयंवर को नवीन अर्थ देने वाला है। उस युग और संप्रति वर्तमान युग का भी अकेला उदाहरण। स्वयंवर का तो यथार्थतः अर्थ ही है न, स्वयं का वर- स्वयं वरतीति स्वयंवरः– अर्थात् कन्या अपने वर का स्वयं वरण करती है। किन्तु क्या इतिहास का कोई भी स्वयंवर केवल कन्या की इच्छा के साथ सम्पन्न हुआ है? पिता की आज्ञा व इच्छा सिर चढ़कर बोलती है। प्रतियोगिताओं का आयोजन, सामर्थ्य का प्रदर्शन, क्षमताओं का आँकलन- यह सब अप्रत्यक्षतः कन्या की इच्छाओं के अस्वीकार के दुष्चक्र ही तो हैं। अस्वीकार हो भी तो अन्ततः स्वीकार करना पड़ता है कन्या को। जानकी का पछताना स्मरण करें- “अहह तात दारुण हठ ठानी/ समझत नहिं कछु लाभ न हानी।” किन्तु सावित्री का स्वयंवर अनोखा है। वह भाग कर नहीं, त्याग कर नहीं, हठ कर नहीं, रूठ कर नहीं बल्कि गुरुजनानुमोदित विधि से स्वयं पति को चुनने निकल पड़ती है और चयन भी ऐसा कि काल को भी हथजोड़ी करनी पड़ती है। नारी महिमा मंडित होती है। यह प्रस्तुति भी इसलिए ही की नारी की महानता स्मरण रहे। उसकी भावनाओं का समादर हो और जो रमणी संशय, शंका, सोच, शोक और संकोच में घुटती रहती है, उसके द्रुत विलंबित क्षण को शिखरणी बना दिया जाय। प्रविष्टि इसलिए भी कि यह प्रहणीय हो, मननीय हो और धारणीय हो। सावित्री-1 से आगे। 

द्वितीय दृश्य

(वन प्रान्तर का दृश्य। पक्षियों का मधुर संगीत गुंजायमान है। दूर मन्दिरों की घंटियाँ एवं शंख-ध्वनि सुनायी पड़ रही है।)

सावित्री:(भ्रमण करते हुए) देखो प्रातःकालीन बेला समुपस्थित है। प्रभात का ग्वाल-बाल उदयाचल से रश्मियों की सुरभी हाँके लिए चला आ रहा है। पखेरू उसे अपना स्वर सुना-सुना कर इस भूमि का पथ दिखा रहे हैं। किरण-धेनुएँ तिमिर को चरते हुए बढ़ी आ रही हैं। वसुन्धरा कितनी मुग्धा गोप-वधूटी बनी हँस-हँस कर उससे गले मिल रही है। आलोक का क्षीर सर्वत्र ढरक गया है कोने-कोने में। 

अमात्य: हाँ सुपुत्री! अभी तो कितने गगनचुम्बी महलों के चाँद की नींद ही नहीं खुली होगी। पर वन प्रान्तर में अजीब प्राणवत्ता है। सरवरों में स्वर्ग बरसने लगा है। 

गुरुदेव: किन्तु यही उत्सुकता है राजकन्ये! कि इस वन की ओर चरणान्यास करने को उद्यत हो गयी?

सावित्री: गुरुदेव! चलते चलें, चलते चलें! आपसे कहने में कैसी लाज? रात्रि की अन्तिम बेला में जैसे जगी ही हूँ और स्वप्न देखती हूँ कि यही वह स्थल है जहाँ से मुझे कोई पुकार रहा है – “मैं कब से जाग रहा हूँ तुम्हारी प्रतीक्षा में। तुम्हारे आने की बाट जोह रहा हूँ, पर तुम अब तक नहीं आयी।”

(गुरुदेव  साश्चर्य उसका मुख देखते रहते हैं। सभी समुत्सुक होकर पूछने लगते हैं।)

अमात्य: फिर क्या हुआ पुत्री? 

सावित्री: स्पष्ट सुन रही थी मैं। मुख तो अलक्षित था किन्तु वाणी एकदम स्पष्ट थी, “उषा नित्य आती है और अपने प्रिय के चरणों पर दीपक जला कर चली जाती है। उपवन के फूलों को चुन कर मैं प्रतिदिन तुम्हारे स्वागत के लिए खड़ा रहता हूँ इसी धूलधूसरित पथ पर। धीरे-धीरे प्रातःकाल बीत जाता है। फूल भी उदास होकर सूखने लगते हैं। पर तुम नहीं आती। संध्या को पक्षी लौटने लगते हैं, पथिक अपनी गंतव्य को जाने लगते हैं, मेरी आशान्वित आँखें उस भीड़ में तुम्हें ढूढ़ती हैं, पर तुम नहीं मिलती। कमल भी रो-रो कर अपनी आँखें बन्द कर लेते हैं, फिर भी तुम नहीं आतीं। मैं चमकते हुए गर्म आँसू के कुछ मोती सँजोये उदास कुटी में लौट आता हूँ।”

गुरुदेव: अरे! दक्षिण विलोचन फड़क रहे हैं राजकन्ये! तब क्या हुआ? 

सावित्री: पूज्यवर! बता नहीं सकती वह कौन-सा स्वर था, जो मेरे एकाकी अंतर में प्रतिध्वनित हो उठा। मैं पगली-सी हो गयी। दौड़ पड़ी वहीं, जहाँ से कोई मुझे पुकार रहा था। एक स्वरूप झाँकने लगा। मैंने कहा, लो आ गयी मैं। हठात् बरबस मेरे बोल कढ़े, “मैं सब कुछ भर लायी हूँ चंचल आँचल में। अपना जीवन स्वप्न, कोमल कल्पना और स्वर्णिम संसार लुटा रही हूँ।”(कुछ रुककर) पूज्यवर! केवल टकटकी बाँधे देखता रह गया था वह!  जैसे उसकी आँखे कह रही थीं, “नहीं सँजो सकता इतना वैभव, नहीं सह सकता इतना आकर्षण।” मैंने कहा, “सम्हाल लो ना मेरा वैभव। बदले में मैं केवल एक भीख माँगती हूँ। मेरी एक ही चाह है-तुम्हारे मधुर कोमल चरणों पर अपनी सारी लघुता समेटे मिट कर अमिट हो जाऊँ। बोलो हे महादानी! देते हो मुझे मेरी भीख?”

गुरुदेव: अहा! परम अद्भुत। 

सावित्री: पूज्यवर! उसने अपने अधर पल्लव खोले। कहा, “ओ चिरन्तनी! बहुत आभारी होकर तुम्हारा स्वागत करता हूँ। मुझे विश्वास था मेरी शाश्वती को मेरे पास लौटना ही होगा। हम दोनों मात्र एक व्यक्ति, एक सत्ता न रहकर अपने समय की सबसे बड़ी घटना बन जायेंगे। हमारे जीवन का अध्याय एक अविश्वसनीय घटना होगी। एक महारुदन को महामहोत्सव बना देने वाली ही परम-पुरुष की सुखान्तक लीला। मैं तुम्हारे लिए अपना द्वार खोले खड़ा हूँ। अरे सत्यवती! अरी मेरी आनंद की मंत्रावली! अरी मेरी आसक्ति की पदावली! अरी ओ मेरे विनय की प्रार्थना! पूरी मानवता के लिए सृष्टि मात्र के लिए तुम्हारा कीर्तन स्वर्ग का प्रवेश द्वार स्वीकार हो जाएगा। इससे कम कदापि नहीं, कदापि नहीं।” मैं कुछ बोल पाती तब तक नींद खुल गयी। (सभी विस्मयाति मुग्ध हैं।) 

अमात्य: गुरुदेव! नीलकण्ठ महादेव का मन्दिर समीपस्थ है। क्यों ना उनके दर्शन का लाभ लिया जाय!

गुरुदेव: बेटी सावित्री….. (बीच में ही)

सावित्री: जो आज्ञा गुरुदेव। 

(सभी मन्दिर को प्रस्थान करते हैं।)

The post सावित्री: स्वप्न और औत्सुक्य appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.

]]>
https://blog.ramyantar.com/2012/12/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a8-%e0%a4%94%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af.html/feed 2
सावित्री: भूमिका https://blog.ramyantar.com/2012/12/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be.html https://blog.ramyantar.com/2012/12/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be.html#comments Fri, 30 Nov 2012 23:51:00 +0000 प्रथम दृश्य (मद्र नरेश अश्वपति का राजभवन। राजा रानी वार्तालाप करते हुए)  महारानी : मेरे छत्रपति! हदय वल्लभ! मेरी जीभ पर हमेशा स्पंदित होता है...

The post सावित्री: भूमिका appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.

]]>
इस ब्लॉग की नाट्य प्रस्तुतियाँ करुणावतार बुद्ध (1,2,3,4,5,6,7,8,9,10) एवं सत्य हरिश्चन्द्र (1,2,3,4,5,6,7,8,9) उन प्रेरक चरित्रों के पुनः पुनः स्मरण का प्रयास हैं जिनसे मानवता सज्जित व गौरवान्वित होती है। ऐसे अन्याय चरित्र हमारे गौरवशाली अतीत की थाती हैं और हमें अपना वह गौरव अक्षुण्ण रखने को प्रेरित करते हैं। चारित्रिक औदात्य एवं समृद्धि के पर्याय ऐसे अनेकों चरित्र भारतीय मनीषा की अशेष धरोहर हैं जिन्होंने अपनी प्रज्ञा, अपनी महनीयता एवं अनुकरणीय विशेषताओं से इस देश व सम्पूर्ण विश्व को चकित किया । ऐसा ही अनोखा नाम है सती सावित्री। सावित्री का यह विशिष्ट चरित्र कालजयी है। नारी की अटूट व दृढ़ सामर्थ्य का अप्रतिम उदाहरण है। प्रस्तुत नाट्य प्रविष्टि वस्तुतः नारी की महानता का आदर है, सहज स्वीकार है।

 

यह प्रस्तुति सावित्री के उस स्वयंवर को रेखांकित कराने व स्मरण कराने का भी एक प्रयास है जो सही अर्थों में स्वयंवर कहे जाने योग्य है। सावित्री का यह सम्मानित कथानक स्वयंवर को नवीन अर्थ देने वाला है। उस युग और संप्रति वर्तमान युग का भी अकेला उदाहरण। स्वयंवर का तो यथार्थतः अर्थ ही है न, स्वयं का वर- स्वयं वरतीति स्वयंवरः– अर्थात् कन्या अपने वर का स्वयं वरण करती है। किन्तु क्या इतिहास का कोई भी स्वयंवर केवल कन्या की इच्छा के साथ सम्पन्न हुआ है? पिता की आज्ञा व इच्छा सिर चढ़कर बोलती है।The tale of Satyavan and Savitri is a popular story of love and sacrifice

प्रतियोगिताओं का आयोजन, सामर्थ्य का प्रदर्शन, क्षमताओं का आँकलन- यह सब अप्रत्यक्षतः कन्या की इच्छाओं के अस्वीकार के दुष्चक्र ही तो हैं। अस्वीकार हो भी तो अन्ततः स्वीकार करना पड़ता है कन्या को। जानकी का पछताना स्मरण करें- “अहह तात दारुण हठ ठानी/ समझत नहिं कछु लाभ न हानी।” किन्तु सावित्री का स्वयंवर अनोखा है। वह भाग कर नहीं, त्याग कर नहीं, हठ कर नहीं, रूठ कर नहीं बल्कि गुरुजनानुमोदित विधि से स्वयं पति को चुनने निकल पड़ती है और चयन भी ऐसा कि काल को भी हथजोड़ी करनी पड़ती है। नारी महिमा मंडित होती है। यह प्रस्तुति भी इसलिए ही की नारी की महानता स्मरण रहे। उसकी भावनाओं का समादर हो और जो रमणी संशय, शंका, सोच, शोक और संकोच में घुटती रहती है, उसके द्रुत विलंबित क्षण को शिखरणी बना दिया जाय। प्रविष्टि इसलिए भी कि यह प्रहणीय हो, मननीय हो और धारणीय हो। प्रस्तुत है पहली कड़ी। 


प्रथम दृश्य

(मद्र नरेश अश्वपति का राजभवन। राजा रानी वार्तालाप करते हुए) 

महारानी : मेरे छत्रपति! हदय वल्लभ! मेरी जीभ पर हमेशा स्पंदित होता है सावित्री नाम रूपी आनंद। मालव नरेश की कन्या अपने किस सुकृत की सराहना करूँ कि सविता शक्ति ने अपने वर से मुझे महनीया माँ बना दिया है। ऐसी सावित्री सुपुत्री की जननी बनने का सौभाग्य दिया है। स्मरण है प्रिय! जब हम अष्टादश वर्ष यावत तपोनिरत थे तो तपोम्लान हमारे मुख पर कोई बाँसुरी रख गया। उस मुहूर्त में मेरा मुख रक्त पलाशवर्णी हो गया था। काया अक्लांत हो गयी, माधुर्यपूर्ण रोमांच से खुल गयीं मेरी आत्मा की आँखे। आश्चर्य शिथिल हो गयी मैं। स्मरण है न? 

महाराज: हाँ, हाँ, प्रिये! सूर्यसुता यमुना की सारूप्यता विशद वारिवाहिनी गंगा की विमलता और त्रिभुवन विजयिनी सरस्वती की स्वरमयी सरसता-इन तीनों रसों की संपृक्त त्रिवेणी सावित्री को देवी ने हमें पुत्री के रूप में प्रदान किया है। उस क्षण की रोमांच लहर से तो मैं आकाश तक विस्तृत हो गया। अधर काँप उठे। हृदय लोक में असंख्य आकांक्षाओं के नक्षत्र जगमगा उठे। मैंने आँसुओं से कृतज्ञता ज्ञापित की। 

महारानी: सविता शक्ति ने कहा था  न, मत रो! मैं स्वयं को तेरी सुता में समाहित कर उसी में लीन हो गयी हूँ।सत्य ही मेरे नाथ! उस बालिका के स्नेह में अब डूब जाने पर भीति का कीचड़ धोकर पवित्र हो गया है मेरा मन।

महाराज:  देवी! हमारे पास उदास पतझड़ की संध्या थी। हम नहीं जानते थे, कैसे इसे उत्सावित किया जाय! अन्तर्वासी कोई बाती उकसा गया। 

महारानी: सावित्री ने हमारी कुक्षि को सनाथ कर दिया। सिद्ध कर दिया मेरी तनया ने कि पुष्प की नहीं, मनुष्य में प्रार्थना की सुगंध होता है।  जब तप से हमारे सत्व का चन्दन-तरु प्रार्थनामय हो जाता है तब मानव गायत्री का सावित्री-वृक्ष पुष्पित होता है। 

महाराज: सावित्री को अंक में दुलराते हुए प्रिये! क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम मंत्र पुरुष हो गयी हो। अहोरात्र! एक शक्तिपाद हमारी देह और मन पर हो रहा है। उसके नेत्र-पलकों पर लटके बालकोचित अश्रु-बिन्दु पंचामृत का स्मरण कराते हैं या नहीं?

महारानी: हे राजाधिराज! उसके अंक में आ जाने से हमारे जीवन में नित्य एक उत्सव उपनिषद लिखा जा रहा है। पता नहीं वह कौन है? जो धड़कनों में समाकर कहे जाता है कि इसका शीघ्र ही अभिषेक होने दो, यह अखिल मानव सृष्टि की अक्षय निधि है। इसको सूर्य होना है। इस तेजस्वी सूर्य को एक व्योम, एक क्षितिज और एक यात्रा के लिए अणु से लेकर ब्रह्माण्ड तक का वैराग्य चाहिए। इसके सतीत्व के माध्यम से सृष्टि ईश्वरत्व प्राप्त करेगी। 

महाराजा: वरानने! आज मैं अपनी इस सम्पदा के कारण अहो भाग्य से भर गया हूँ। पहले तो जहाँ सुमन होते थे, वहाँ नयन जाते थे। अब तो जहाँ दृष्टि जाती है वहीं फूल खिल जाते हैं। क्यों? क्यों ऐसा होता है? 

महारानी: हे स्वामी! सावित्री अब निःसंदेह अभिषेक योग्य हो रही है। वयः संधि स्पष्ट दृष्टिगत है। पहले तो खिलखिलाकर हँसती थी, अब केवल मन्द मुस्कान उसके अधर पल्लवों पर खेल जाती है। उसका बाल सुलभ भोलापन बिसर गया है। निर्जन में पृथु-पल्लवित अवयवों का मुग्ध अवलोकन करती है। क्षण-क्षण करतलों में दर्पण सम्हाल लेती है। तारुण्य जीत रहा है। बचपन पराजय स्वीकार करने को तैयार हो गया है। लगता है चरणों की चंचलता को मदन ने मन को अर्पण कर दिया है। कुछ गुनगुनाती रहती है। अभिषेक के योग्य तो हो ही गयी है आर्य! 

महाराज: समुध्यये! तुम्हारा कथन निःसन्देह अर्थपूर्ण है, किन्तु क्या करूँ। एक सुखद आश्चर्य में पड़ी विवश सी हो गयी है मति हमारी। जो भी उसके सामने आता है, उसके दिव्य तेज से प्रतिहत हो जाता है। उसे देखकर, सब यही कहते हैं, यह मानवी नहीं, देवकन्या है। 

महारानी: सच ही जीवनधन! अभी छिप ही रहा था प्रकाश धीरे धीरे। रजनी पास आ रही थी। मौन मैं किसी गम्भीर विचारधारा में डुबकी लगा रही थी। तब बेटी ने अपनी मृणाल मृदुल अंगुलियों से आकर बन्द कर दी मेरी आँखें। मैं मुदित हो उठी। जब अपनी लली की फूल-सी कोमल काया को हृदय से लगाया तो मुझे लगा, सौन्दर्य खोजने वाली आँखों को सहानुभूति की स्रोतस्विनी में स्नान करना चाहिए। उसके मृदुल मन्द हास की ज्योत्सना में समस्त संसार स्वच्छ तेजपुंज बन गया। 

महाराज: धन्योसि! धन्योसि! अरे देखो-देखो प्रातःकालीन स्नानादि क्रिया से निवृत्त होकर विह्वल-सी तुम्हारी नयन-पुतरी इधर ही द्रुत गति से बढ़ी चली आ रही है। 

(सावित्री का प्रवेश)

सावित्री: माँ! द्वार पर एक भिक्षुक है। सत्कार किया। अन्न दिया तो नकार दिया। कहा, “अन्न प्रिय नहीं।” मैंने मुद्रा संग श्रीफल दिया भी दिया, उसे भी नकार दिया। कहा, “इस ड्यौढ़ी से यह नहीं आना चाहिए। वह बोले जा रहा था। कह रहा था माँ, “अपने को वर दे, श्रेष्ठ! तू अपने को वर दे। मैं यौवन हूँ। वरने को आया हूँ।” क्या यों ही बोल रहा था माँ?

महारानी: चक्षु पुतरी! इस बालू घिरे जल को हम कितने दिन तक सिंधु कहेंगे! न जाने किस अनामा भूमिका में है भिक्षु वह! यौवन भी भिक्षुक है। तिथि के समान वह वरने को आता है। दाता वही जो देकर चिरंजीवी हो जाता है। अपने को दोगी? 

सावित्री: माँ! मैं उसकी आँख बन भर आँख उसको देखना चाहती हूँ। कहीं ना तो नहीं न कर देगा वो? 

महारानी: क्या कह रही हो लाडली! मैंने उदित रवि को अर्घ्य दिया ही इसलिए था कि उसकी तेजोमयी रश्मियाँ मेरी गली में उत्सव बनकर विकीर्ण हो जाँय। पशु-पक्षी, फूल-वनस्पति, विहग सबकी सारभूता सुगन्धि लेकर मेरी संतति प्रिया विलासिनी बनकर सृष्टि को सौभाग्यशाली बनाये। देख मेरी बाले! तुम्हारे हँसते हुए मुख से बड़ी न कोई मेरी प्रार्थना है, न पुकार है। 

(सावित्री सलज्ज विनतवदना खड़ी है।)

महाराज: बेटी! अब तू अभिषेक योग्य हो गयी है। मैं तुम्हें सप्रेम सानन्द आशीर्वादित करता हूँ कि तूँ स्वयं ही अपने योग्य वर की खोज कर ले। जा पुत्री! तेरा प्रस्थान मंगलमय हो। अमात्य और गुरुदेव दोनों तुम्हारे साथ देशाटन पर रहेंगे।

(पर्दा गिरता है)

The post सावित्री: भूमिका appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.

]]>
https://blog.ramyantar.com/2012/12/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be.html/feed 8