सावित्री-1, सावित्री-2 एवं सावित्री-3 से आगे……

तृतीय दृश्य

(महाराजा अश्वपति का राजदरबार। बन्दी विरद गान कर रहे हैं। आमोद-प्रमोद का हृदय हारी दृश्य। देवर्षि नारद का प्रवेश।)

नारद: नारायण! नारायण!
महाराजा: देवर्षि के चरणों में राजदरबार सहित अश्वपति का प्रणाम स्वीकार हो। आसन ग्रहण करें देवर्षि।

(सावित्री का गुरुदेव के साथ प्रवेश। सावित्री महाराज और देवर्षि को प्रणाम करती है।)

नारद: सौभाग्यशालिनी हो पुत्री।
महाराजा: कल्याण हो पुत्री।

यह प्रस्तुति

इस ब्लॉग की नाट्य प्रस्तुतियाँ करुणावतार बुद्ध (1,2,3,4,5,6,7,8,9,10) एवं सत्य हरिश्चन्द्र (1,2,3,4,5,6,7,8,9) उन प्रेरक चरित्रों के पुनः पुनः स्मरण का प्रयास हैं जिनसे मानवता सज्जित व गौरवान्वित होती है। ऐसे अन्याय चरित्र हमारे गौरवशाली अतीत की थाती हैं और हमें अपना वह गौरव अक्षुण्ण रखने को प्रेरित करते हैं। चारित्रिक औदात्य एवं समृद्धि के पर्याय ऐसे अनेकों चरित्र भारतीय मनीषा की अशेष धरोहर हैं जिन्होंने अपनी प्रज्ञा, अपनी महनीयता एवं अनुकरणीय विशेषताओं से इस देश व सम्पूर्ण विश्व को चकित किया । ऐसा ही अनोखा नाम है सती सावित्री। सावित्री का यह विशिष्ट चरित्र कालजयी है। नारी की अटूट व दृढ़ सामर्थ्य का अप्रतिम उदाहरण है। प्रस्तुत नाट्य प्रविष्टि वस्तुतः नारी की महानता का आदर है, सहज स्वीकार है।

नारद: राजन! आपकी यह कन्या कहाँ से लौट रही है? अब तो यह अभिषेक योग्य हो गयी है। आपने अभी तक इसका विवाह नहीं किया?
महाराजा: देवर्षि! इसी कार्य के लिए मैंने इसे भेजा था। यह अभी-अभी लौटी है। अब इसी के मुख से सुनिए देवर्षि!
Savitri and Satyavanसावित्री: तात! शाल्व देश में एक धर्मात्मा राजा थे। उनका नाम द्युमत्सेन है। वे पहले राज्य करते थे, किन्तु पीछे उनकी आँख अन्धी हो गयी। उस समय इनका पुत्र बहुत छोटा था। शत्रुओं को आक्रमण करने का मौका मिल गया। पड़ोस के शत्रु राजा ने उनका राज्य छीन लिया । तब वे गोद में बालक लिए पत्नी के साथ वन में चले गए और वहाँ उत्तम नियमों का पालन करते हुए तपस्या में लग गए। उनके पुत्र सत्यवान जो राज्य में जन्म लेकर तपोवन में पले और बढ़े हैं, सर्वथा मेरे योग्य है। अतः मैंने अपने मन से उन्हीं को अपना वर स्वीकार किया है।
नारद: (चौंक कर) राजन! यह तो बड़े खेद की बात हो गयी। सावित्री ने बड़ी भूल की है । बेचारी जानती नहीं थी इसीलिए उत्तम गुणों से युक्त सत्यवान का वरण कर लिया। इस राजकुमार के माता-पिता सदा सत्य बोलते हैं। इसलिए ब्राह्मणों ने उसका नाम सत्यवान रख दिया।
महाराजा: (नारद से) क्या इस समय भी माता-पिता के प्रति भक्ति रखने वाला सत्यवान तेजस्वी, बुद्धिमान, क्षमावान और शूरवीर है।
नारद: नारायण! नारायण! महाराज अश्वपति! आप ने पूछा है इसलिए कहने में संकोच नहीं करूँगा। द्युमत्सेन का वह पुत्र परमवीर, तेजस्वी, सूर्य के समान प्रतापवान, वृहस्पति के सदृश बुद्धिमान, इन्द्र के समान वीर, पृथ्वी की भाँति क्षमाशील, ययाति के समान उदार, चन्द्र के समान नयनाभिराम और अश्वनी कुमारों के समान रूपवान है। वह जितेन्द्रिय, विनयी, पराक्रमी, सत्यप्रतिज्ञ, मिलनसार, ईर्ष्या रहित, लज्जाशील और तेजस्वी है।
महाराजा: (आश्चर्य से) मुनिवर! आपने तो उसे समस्त गुणों का भण्डार बता दिया। उसमें कोई दोष भी है क्या?
नारद: राजन! दोष तो उसमें एक ही है। जिसने समस्त गुणों को ढँक लिया है। दोष भी साधारण नहीं है। उसे किसी भी प्रयत्न द्वारा मिटा देना असंभव है। आज से ठीक एक वर्ष बाद उसकी आयु समाप्त हो जायेगी। उसे देह त्याग करना पड़ेगा राजन्!
महाराजा: (व्यग्र होकर) मेरी नयनपुतरी, बेटी सावित्री! तुम फिर से यात्रा करो और दूसरे किसी योग्य वर का वरण करो। उसकी आयु थोड़ी है । वह एक ही वर्ष में शरीर त्याग देगा।
नारद: पुत्री! पिता की इच्छा को समझो। पति-विहीन जीवन कैसा जीवन?
सावित्री नाट्य का विद्यालय-छात्रों द्वारा भावपूर्ण मंचन
सावित्री: मुनिवर! प्रातःकालीन दैदीप्यमान किरण-सी उस राजपुत्र की छवि को मैंने अपनी प्राणों की अंतर्गुहा में बंद कर लिया है। उसकी गुनगुनी गरमाहट से मेरे अन्दर का कोना-कोना पिघल रहा है। अब मेरा पूर्णकाम, आप्तकाम, परम काम वही होगा। अपनी समर्पण गर्भा प्रीति की मरणभेदी लौ से उस भंगुर में भी अमर यौवन का रसायन , यदि नहीं भर दिया तो मेरा सावित्री नाम नहीं।
नारद: सावित्री! तुम सती शिरोमणि हो। निःसंदेह तुम्हारा धार्मिक भाव जीवन और मृत्यु की सीमा से ऊँचा उठ चुका है; पर शुभाशुभ को विचार कर कसौटी पर कस लेना ही चाहिए।
सावित्री: कहाँ कोई विकल्प बचने दिया है ऊपर वाले ने मुनिवर! सच कहती हूँ, मेरा मन मन्दिर और तन मृगछाला हो गया है। मैं बिना वरमाला के ही वरण हो गयी। वरदान, अभिशाप, पुण्य-पाप सबकी कपाल क्रिया हो गयी उसी क्षण जब परस्पर परिचय के लिए हमने एक दूसरे की समीपता स्वीकारी। (पिता की ओर दृष्टिपात करती हुई) पूज्य पिताजी! कन्या एक ही बार किसी को दी जाती है। सत्यवान दीर्घायु हों अथवा अल्पायु, गुणवान हों अथवा निर्गुण, मैंने एक बार उन्हें अपना पति स्वीकार कर लिया। अब दूसरे पुरुष को मैं नहीं वर सकती। अतः मैंने जिस पति का निश्चय किया है उसमें मेरा मन ही प्रमाण है।
नारद: (सहर्ष) महाराज! सावित्री की बुद्धि स्थिर है। इसने धर्म का आश्रय लिया है। इसे किसी प्रकार इस निश्चय से विचलित नहीं किया जा सकता है। सत्यवान में जो जो गुण हैं वो किसी दूसरे पुरुष में हैं ही नहीं। अतः मुझे तो अब यही अच्छा जान पड़ता है कि आप इसका कन्यादान कर दें ।
महाराजा: भगवन्! आप ही मेरे गुरु हैं। आपने जैसा कहा मैं वैसा ही करूँगा।
नारद: सावित्री का विवाह निर्विघ्न समाप्त हो तथा आप सब लोगों का कल्याण हो, इसके लिए यथासाध्य चेष्टा करूँगा। नारायण, नारायण!
(यह कहकर नारद प्रस्थान कर जाते हैं।)

क्रमशः—