सावित्री-1 से आगे….

द्वितीय दृश्य 

(वन प्रान्तर का दृश्य। पक्षियों का मधुर संगीत गुंजायमान है। दूर मन्दिरों की घंटियाँ एवं शंख-ध्वनि सुनायी पड़ रही है।)
सावित्री: (भ्रमण करते हुए) देखो प्रातःकालीन बेला समुपस्थित है। प्रभात का ग्वाल-बाल उदयाचल से रश्मियों की सुरभी हाँके लिए चला आ रहा है। पखेरू उसे अपना स्वर सुना-सुना कर इस भूमि का पथ दिखा रहे हैं। किरण-धेनुएँ तिमिर को चरते हुए बढ़ी आ रही हैं। वसुन्धरा कितनी मुग्धा गोप-वधूटी बनी हँस-हँस कर उससे गले मिल रही है। आलोक का क्षीर सर्वत्र ढरक गया है कोने-कोने में। 

अमात्य: हाँ सुपुत्री! अभी तो कितने गगनचुम्बी महलों के चाँद की नींद ही नहीं खुली होगी। पर वन प्रान्तर में अजीब प्राणवत्ता है। सरवरों में स्वर्ग बरसने लगा है। 
गुरुदेव: किन्तु यही उत्सुकता है राजकन्ये! कि इस वन की ओर चरणान्यास करने को उद्यत हो गयी?
सावित्री चित्र:गणेश आचार्य

इस ब्लॉग की नाट्य प्रस्तुतियाँ करुणावतार बुद्ध (1,2,3,4,5,6,7,8,9,10)एवं सत्य हरिश्चन्द्र (1,2,3,4,5,6,7,8,9) उन प्रेरक चरित्रों के पुनः पुनः स्मरण का प्रयास हैं जिनसे मानवता सज्जित व गौरवान्वित होती है। ऐसे अन्याय चरित्र हमारे गौरवशाली अतीत की थाती हैं और हमें अपना वह गौरव अक्षुण्ण रखने को प्रेरित करते हैं। चारित्रिक औदात्य एवं समृद्धि के पर्याय ऐसे अनेकों चरित्र भारतीय मनीषा की अशेष धरोहर हैं जिन्होंने अपनी प्रज्ञा, अपनी महनीयता एवं अनुकरणीय विशेषताओं से इस देश व सम्पूर्ण विश्व को चकित किया । ऐसा ही अनोखा नाम है सती सावित्री। सावित्री का यह विशिष्ट चरित्र कालजयी है। नारी की अटूट व दृढ़ सामर्थ्य का अप्रतिम उदाहरण है। प्रस्तुत नाट्य प्रविष्टि वस्तुतः नारी की महानता का आदर है, सहज स्वीकार है।

सावित्री चित्र:जयलक्ष्मी सत्येन्द्र


यह प्रस्तुति सावित्री के उस स्वयंवर को रेखांकित कराने व स्मरण कराने का भी एक प्रयास है जो सही अर्थों में स्वयंवर कहे जाने योग्य है। सावित्री का यह सम्मानित कथानक स्वयंवर को नवीन अर्थ देने वाला है। उस युग और संप्रति वर्तमान युग का भी अकेला उदाहरण। स्वयंवर का तो यथार्थतः अर्थ ही है न, स्वयं का वर- “स्वयं वरतीति स्वयंवरः”; अर्थात् कन्या अपने वर का स्वयं वरण करती है। किन्तु क्या इतिहास का कोई भी स्वयंवर केवल कन्या की इच्छा के साथ सम्पन्न हुआ है? पिता की आज्ञा व इच्छा सिर चढ़कर बोलती है। प्रतियोगिताओं का आयोजन, सामर्थ्य का प्रदर्शन, क्षमताओं का आँकलन – यह सब अप्रत्यक्षतः कन्या की इच्छाओं के अस्वीकार के दुष्चक्र ही तो हैं। अस्वीकार हो भी तो अन्ततः स्वीकार करना पड़ता है कन्या को। जानकी का पछताना स्मरण करें- “अहह तात दारुण हठ ठानी/ समझत नहिं कछु लाभ न हानी।” किन्तु सावित्री का स्वयंवर अनोखा है। वह भाग कर नहीं, त्याग कर नहीं, हठ कर नहीं, रूठ कर नहीं बल्कि गुरुजनानुमोदित विधि से स्वयं पति को चुनने निकल पड़ती है और चयन भी ऐसा कि काल को भी हथजोड़ी करनी पड़ती है। नारी महिमा मंडित होती है। यह नाट्य प्रस्तुति भी इसलिए ही की नारी की महानता स्मरण रहे। उसकी भावनाओं का समादर हो और जो रमणी संशय, शंका, सोच, शोक और संकोच में घुटती रहती है, उसके द्रुत विलंबित क्षण को शिखरणी बना दिया जाय। प्रविष्टि इसलिए भी कि यह प्रहणीय हो, मननीय हो और धारणीय हो। 



सावित्री: गुरुदेव! चलते चलें, चलते चलें! आपसे कहने में कैसी लाज? रात्रि की अन्तिम बेला में जैसे जगी ही हूँ और स्वप्न देखती हूँ कि यही वह स्थल है जहाँ से मुझे कोई पुकार रहा है – “मैं कब से जाग रहा हूँ तुम्हारी प्रतीक्षा में। तुम्हारे आने की बाट जोह रहा हूँ, पर तुम अब तक नहीं आयी।” (गुरुदेव  साश्चर्य उसका मुख देखते रहते हैं। सभी समुत्सुक होकर पूछने लगते हैं।)

अमात्य: फिर क्या हुआ पुत्री? 
सावित्री: स्पष्ट सुन रही थी मैं। मुख तो अलक्षित था किन्तु वाणी एकदम स्पष्ट थी, “उषा नित्य आती है और अपने प्रिय के चरणों पर दीपक जला कर चली जाती है। उपवन के फूलों को चुन कर मैं प्रतिदिन तुम्हारे स्वागत के लिए खड़ा रहता हूँ इसी धूलधूसरित पथ पर। धीरे-धीरे प्रातःकाल बीत जाता है। फूल भी उदास होकर सूखने लगते हैं। पर तुम नहीं आती। संध्या को पक्षी लौटने लगते हैं, पथिक अपनी गंतव्य को जाने लगते हैं, मेरी आशान्वित आँखें उस भीड़ में तुम्हें ढूढ़ती हैं, पर तुम नहीं मिलती। कमल भी रो-रो कर अपनी आँखें बन्द कर लेते हैं, फिर भी तुम नहीं आतीं। मैं चमकते हुए गर्म आँसू के कुछ मोती सँजोये उदास कुटी में लौट आता हूँ।” 

गुरुदेव: अरे! दक्षिण विलोचन फड़क रहे हैं राजकन्ये! तब क्या हुआ? 

सावित्री: पूज्यवर! बता नहीं सकती वह कौन-सा स्वर था, जो मेरे एकाकी अंतर में प्रतिध्वनित हो उठा। मैं पगली-सी हो गयी। दौड़ पड़ी वहीं, जहाँ से कोई मुझे पुकार रहा था। एक स्वरूप झाँकने लगा। मैंने कहा, लो आ गयी मैं। हठात् बरबस मेरे बोल कढ़े, “मैं सब कुछ भर लायी हूँ चंचल आँचल में। अपना जीवन स्वप्न, कोमल कल्पना और स्वर्णिम संसार लुटा रही हूँ।” (कुछ रुककर) पूज्यवर! केवल टकटकी बाँधे देखता रह गया था वह!  जैसे उसकी आँखे कह रही थीं, “नहीं सँजो सकता इतना वैभव, नहीं सह सकता इतना आकर्षण।” मैंने कहा, “सम्हाल लो ना मेरा वैभव। बदले में मैं केवल एक भीख माँगती हूँ। मेरी एक ही चाह है-तुम्हारे मधुर कोमल चरणों पर अपनी सारी लघुता समेटे मिट कर अमिट हो जाऊँ। बोलो हे महादानी! देते हो मुझे मेरी भीख?”
गुरुदेव: अहा! परम अद्भुत। 
सावित्री: पूज्यवर! उसने अपने अधर पल्लव खोले। कहा, “ओ चिरन्तनी! बहुत आभारी होकर तुम्हारा स्वागत करता हूँ। मुझे विश्वास था मेरी शाश्वती को मेरे पास लौटना ही होगा। हम दोनों मात्र एक व्यक्ति, एक सत्ता न रहकर अपने समय की सबसे बड़ी घटना बन जायेंगे। हमारे जीवन का अध्याय एक अविश्वसनीय घटना होगी। एक महारुदन को महामहोत्सव बना देने वाली ही परम-पुरुष की सुखान्तक लीला। मैं तुम्हारे लिए अपना द्वार खोले खड़ा हूँ। अरे सत्यवती! अरी मेरी आनंद की मंत्रावली! अरी मेरी आसक्ति की पदावली! अरी ओ मेरे विनय की प्रार्थना! पूरी मानवता के लिए सृष्टि मात्र के लिए तुम्हारा कीर्तन स्वर्ग का प्रवेश द्वार स्वीकार हो जाएगा। इससे कम कदापि नहीं, कदापि नहीं।” … मैं कुछ बोल पाती तब तक नींद खुल गयी। (सभी विस्मयाति मुग्ध हैं।) 
अमात्य: गुरुदेव! नीलकण्ठ महादेव का मन्दिर समीपस्थ है। क्यों ना उनके दर्शन का लाभ लिया जाय!

गुरुदेव: बेटी सावित्री….. (बीच में ही)

सावित्री: जो आज्ञा गुरुदेव। 
(सभी मन्दिर को प्रस्थान करते हैं।)

—क्रमशः-