Tuesday, February 21, 2017

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शैलबाला शतक – ६

शैलबाला शतक भगवती पराम्बा के चरणों में वाक् पुष्पोपहार है। यह स्वतः के प्रयास का प्रतिफलन हो ऐसा कहना अपराध ही होगा। उन्होंने अपना स्तवन सुनना चाहा और यह कार्य स्वतः सम्पादित करा लिया। यह उक्ति सार्थक लगी- जेहि पर कृपा करहिं जन जानी/कवि उर अजिर नचावहिं बानी।” शैलबाला शतक के प्रारम्भ में माता के रौद्र रूप का अष्टक विलसित है किन्तु वहाँ क्रोध की आग नहीं करुणा का दूध बह रहा है।

शैलबाला शतक के चार और कवित्त प्रस्तुत हैं! करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह कवित्त! शतक में शुरुआत के आठ कवित्त काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं। पिछली पाँच प्रविष्टियाँ सम्मुख हो चुकी हैं आपके। शैलबाला-शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में हैं। यह प्रविष्टि अंतिम चार कवित्त छंदों की प्रस्तुति है। इसके बाद की प्रविष्टियाँ सवैया छंद में रची गयी हैं, जो क्रमशः शीघ्र ही प्रकाशित होंगी। इन प्रविष्टियों के साथ बाबूजी के स्वर में इनका पाठ भी संयुक्त है।

जीवन निररथक मोर बीतल जात मात
कृशगात बिलखात फिरत जग झंझावात में
सुख सम्पति संचय रत वंचित नित होत जात
उलझि अकारथ सुत तात मात भ्रात में
स्वाती कै पानी बन के बरसा तू भवानी
पापी पंकिल पपीहरा के आनन सुखात में
मूढ़ मन मृग नइयाँ भटकि भटकि मरत अम्ब
लोटै दा अपने मंजु चरननि जलजात में ॥२१॥

देखि सुनि कोटि मत माथा चकरात मोर
देवता करोरन बीच केके हम भजबै
सब सुर चाहत सेवकाई पहुनाई सेवा
सम्पति अधिकाई हम कौने भॉंति गॅंजबै
जेके जवन भावै आपन डफली उठावै
आपन आपन राग गावै हम कॉंहें के बरजबै
हम तै सुखकारी शिवमानस विहारी
हिमशैलजा मतारी कै दुआरी नाहिं तजबै॥२२॥

एको बेर आपन पद पंकज देखाय देतू
हमके चढ़ाय निज लीला सुधि पालकी
बॉंहिन के हिंडोला में झुलावा दुलरावा मत
ख्याल करा पंकिल कपूत के कुचाल की
एतना अपने रंग बीच बोरा चभोरा हमै
तोहॅंके छोड़ आवै सुधि आज की न काल की
पंकिल झूमि गावै जस ताली बजावै बोलै
जय जय हिमशैलसुता शंकर शशि भाल की॥२३॥

हउवैं के गनेश के रमेश के दिनेश इन्द्र
बरम्हा बिशुन कोटि देव जानि कछु हम ना
जेकरे पर माई मोरि दाहिनदयाल रहबू
ओह सुत के सौ सौ जमराजो कै गम ना
आउर सुख सम्पति हमैं दिहा चाहे छीन लिहा
एतना मोर जीवनधन होखै कबौं कम ना
रोय रोय तोहरे आगे अम्मा रोज बिनवल करै
पंकिल बेटउवा बउरहवा दीन बम्हना ॥२४॥

कब सुधिया लेइहैं मन के मीत

सहज, सरल, सरस भजन। बाबूजी की भावपूर्ण लेखनी के अनेकों मनकों में एक। छुटपन-से ही सुलाते वक़्त बाबूजी अनेकों स्वरचित भजन गाते और सुलाते। लगभग सभी रचनायें अम्मा को भी याद होतीं और उनका स्वर भी हमारी नींद का साक्षी हुआ करता। बड़े होने पर यह सब अलभ्य, हम सब अकिंचन। इन्हें सँजो रहा हूँ बारी-बारी। कई हैं-इनमें से एक यहाँ –

कब सुधिया लेइहैं मन के मीत- प्रेम नारायण ’पंकिल’

कब सुधिया लेइहैं मन के मीत, साँवरिया काँधा।

कहिया अब बजइहैं बँसुरी, दिनवा गिनत घिसलीं अँगुरी
केतना सवनवाँ गइलैं बीत, साँवरिया काँधा॥१॥

कहिया घूमि खोरी-खोरी, करिहैं कृष्ण माखन चोरी
हँसि के लेइहैं सबके मनवाँ जीत, साँवरिया काँधा॥२॥

हाय कब कदम की छहियाँ, फिरिहैं श्याम दे गलबहियाँ
मुरली में गइहैं मधुरी गीत, साँवरिया काँधा॥३॥

विकल बाल गोपी ग्वाले, कहाँ काली कमलीवाले
जोरि काहें तोरी पंकिल प्रीति, साँवरिया काँधा॥४॥
 

हम तोंहसे कुल बतिया कहली…

समय को रोका नहीं जा सकता। जो है उसका आनन्द से उपयोग करो। बादल को बाँध कर खेती नहीं होती। किस अनुकूल की प्रतीक्षा कर रहे हो। जो मिला वह खूब मिला है। अब नहीं तो कब? इसलिए किसी भी काल-विशेष के लिए कोई चीज निर्धारित न करो। जो ’उसने’ दिया वह प्रसाद छक कर खाओ। हर समय तुम्हारा है। ज़िन्दगी का ज़वाब ज़िन्दगी से दो। किसी का मुँह मत जोड़ो। किसी के साथ या संगठन का मुखापेक्षी न बनो। है, वह है। होगा, उसकी चिन्ता नहीं। अस्ति ही पर्याप्त है। भविष्यति अभी अजन्मा है, उसकी कौन फिक्र करे। इसलिए बचा है वही रचा है, अन्यथा सब क्षयमाण है। फिर दाँत निपोरना पड़ेगा। सब कुछ उपयोगितावादी ही नहीं, आनन्दवादी भी ज़िन्दगी का एक अध्याय है। इस पन्ने को आद्यन्त पढ़ो। पोथी बेठन में बाँधकर रखोगे तो तेरे न होने पर कोई तेरे होने की यादगारी न रखेगा। गाओ, गीतों से ही ज़िन्दगी का स्वागत होगा। उपलब्ध आनन्द की जय हो, जय हो।

भोजपुरी की यह कविता रस-रस यही तो ध्वनित करती है। देशज लिखाई में असली बात। विहँस-विहँस पढ़िए, मजा तो पीने में आएगा…सिवान का विस्तार, गोइंठा की चमक और लेंहड़ा भर मगज में भरने वाली बातें- खूब खूब आनन्द।

Picture: Evoltheft     Source: DeviantART

हम तोंहसे कुल बतिया कहली सौ बार इहै मंठा महली
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा? 

समसै सिवान में खेत खेत के जोड़ रहल बा लगल डगर 
जइसे छरहरी पतुरिया के करिया कपार पर माँग सुघर
भईया एक्कै रहिया पर तूँ चोरवा अगोर के का करबा –
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा ॥१॥

आपन तोहार केहू नइखै, भइयै नटई दबोच डलिहैं 
तोहरै मेहरी बेटवा कपार कै, एक-एक बार नोंच घलिहैं 
माटी ऊसर भइले पर ढेला फोर फोर के का करबा – 
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा ॥२॥

तोहूँ चाभा राबड़ी खीर, ई मउज उड़ावत बा दुनिया 
का हाय-हाय कइले बाड़ा, मरदो बनला धोबी-धुनिया
कान्हीं पर लादल ना जाई, धन जोर-जोर के का करबा-
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा ॥३॥

अपनै में कुकुरन के पिल्लन-अस बे-मतलब गुर्राला का
जोगी हो जा या भोग करा, बिच्चै में फँस चिल्लाला का 
पियहीं वाला चल जइहैं तब रस घोर घोर के का करबा –
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा ॥४॥

आखिर एक दिन लटकानी में छाती पर चढ़ जाई मेहरी
तूँ छान फूँक के बना मस्त, फूटै सरवा कुण्डा-डेहरी
मस्ती के चल गइलै पर छाती झोर-झोर के का करबा –
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा ॥५॥

कर्हिआईं पर खांची दबलै गोइंठा बिनले से का होई
जियलै भर बा आछो-आछो मुअले पर तोहरे के रोई
दुलहिन के मुअले पर पगलू, तूँ गाँठ जोर के का करबा –
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा ॥६॥

आवा धुरकंडल देंह, धूर में एक पकड़ फिर बाजीं जा 
आनन्द तबै जब साली हँस के पूछ उठै “ई का जीजा?”    
सूखल रोटी में आपन दाढ़ी बोर-बोर के का करबा –
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा ॥७॥

जै दिन ई जिनगी रही, बिपत तोहरे संगे रहबै करिहैं 
तूँ केतनों हमके गारी दा, पंकिल अइसे कहबै करिहैं 
आवा हमरे संगे गावा, लेंहड़ा बटोर के का करबा – 
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा ॥८॥

—प्रेम नारायण पाण्डेय ’पंकिल’ 

मंठा महली-(मुहावरा) बार-बार दोहराना। गुर गोंइठा होना-(मुहावरा) सब कुछ बिगड़ जाना। दाँत निपोरना-पछताना। समसै– सम्पूर्ण। करिया कपार– काले सिर पर। नटई-गला। कुकुरन के पिल्लन-अस– कुत्ते के बच्चों की तरह। मेहरी-मेहरारू, पत्नी। सरवा- साला(एक गाली)। कर्हिआईं-कमर। गोइंठा-उपला। आछो-आछो– मुँहदिखाई, प्रशंसा। धुरकंडल देंह-धूल धूसरित शरीर। गारी-गाली। लेंहड़ा बटोरना-भीड़ जुटाना।

टपकि जइहैं हो हमरे आँखी कै लोरवा

टपकि जइहैं हो हमरे आँखी कै लोरवा ।

जेहि दिन अँगना के तुलसी सुखइहैं 
सजनि कै हथवा न मथवा दबइहैं 
कवनो सुहागिन कै फुटिहैं सिन्होरवा-
टपकि जइहैं हो हमरे आँखी कै लोरवा ॥१॥

जहिया बिछुड़ि जइहैं मितवन के टोली 
सुनबै न बचवन की तोतरि बोली 
छुटि जइहैं जेहि दिनवाँ माई के कोरवा – 
टपकि जइहैं हो हमरे आँखी कै लोरवा ॥२॥

जहिया पियइहैं न बछरु के गइया 
मरि जइहैं बेटवा जे खींचै बकइयाँ 
सुगवा मिलइहैं न सुगिया से ठोरवा – 
टपकि जइहैं हो हमरे आँखी कै लोरवा ॥३॥

जेहि दिन उमरिया क ई रंग उतरी 
सुख होइहैं सपना उलटि जइहैं पुतरी
असमय में झरि जइहैं आमें के टिकोरवा – 
टपकि जइहैं हो हमरे आँखी कै लोरवा ॥४॥

हरियर घसिया में लगिहैं जो आगी 
पानी लेहले बदरा अकसवा में भागी 
सखिया कै नथिया चोराइ लीहैं चोरवा –
टपकि जइहैं हो हमरे आँखी कै लोरवा ॥५॥

कइसे ई पंकिल के कटिहैं बिपतिया 
सटि आव सजनी सुनाव कुछ बतिया
लगलै बिलइहैं जवानी कै जोरवा – 
टपकि जइहैं हो हमरे आँखी कै लोरवा ॥६॥  

प्रेम नारायण पाण्डेय ’पंकिल’  

आँखी कै लोरवा– आँख के आँसू। सिन्होरवा– सिन्दूरदान(पात्र)। माई के कोरवा– माँ की गोद। बछरू-बछड़ा।
बकइयाँ– घुटरुन(घुटने के बल चलना)। ठोरवा– चोंच। अकसवा-आकाश। बिलइहैं– समाप्त होना। 

शैलबाला शतक – ५

प्रस्तुत हैं चार और कवित्त!  करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह चार प्रस्तुत कवित्त! शतक में शुरुआत के आठ कवित्त काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं।  पिछली तीन प्रविष्टियाँ सम्मुख हो चुकी हैं आपके। शैलबाला-शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में हैं। शेष सवैया छंद में रचे गए हैं। क्रमशः प्रस्तुतियाँ शैलनन्दिनी के अनगिन स्वरूप उद्घाटित करेंगी। आज पाँचवीं प्रस्तुति। पिछली प्रविष्टियाँ:एक, दो, तीन, चारऑडियो: एक, दो, तीन, चार

तोहरै शक्ति भक्ति कै भरौसा हौ प्रधान अम्ब
आउर कुछ रखल हौ न राह में न राही में
देखतै हऊ भूँजि भूँजि भरता निकाल लेत
पंकिल कै काम औंटि मोह की कराही में
हॉंफत तनय पर अपने अॅंचरा कै बयार करा
रखले रहा करुना कलपद्रुम की छॉंहीं में
केसे मॅुह बाईं हम कहॉं कहॉं धाईं अब
दोहाई दुर्गा माई कै उठावा निज बाहीं में॥१७॥

अम्मा अन्नपूरना अपरना तोहिं पंकिल कै
बीना बना बादक बना राग बना रागिनी
आखिर महॅंतारी बिना बिपदा के निवारी
हम तै दुखिया सुत कहतै रहब आपन जठरागिनी
पंकिल के मति की मलिकाइन बना गउरा माई
चाहे बनावा बड़भागिनि अभागिनी
मत मुँह फेरा अम्ब एको बेर हेरा
जुगल चरनन में बसेरा दा महेश अरधांगिनी॥१८॥

कै कै बेर अम्मा खेल कइके देख लेहले हऊ
केतना भोग भोगली हम अपने बल बूती में
लालची लबार बेसुमार सुख चाहीं पर
सरबस चढ़वली नाहिं शंकर शिवदूती में
सुनीला तूं देखतै भर में कायाकलप कइ देलू
वैभव बिखेर देलू भोला की भभूती में
अक्किल लगावा पंकिल तोहरे बिना विकल रहै
माथा मोर टिकल रहै माता तोरि जूती में॥१९॥

सुख कै सुख हऊ सकल आनॅंद कै आनॅंद हऊ
तैंतिस कोटि सुर में सरबोत्तम गिनन जालू तूँ
बेटवा के बैरिन बदे बज्जर अस कठोर हऊ
सुत कै दुख देखि मोमनइयॉं पिघल जालू तूँ
पंकिल निकम्मा आखिर हउवैं अम्मा तोहरै पूत
काहें के बचाय के निगाह निकल जालू तूँ
चेहरा मोर फीका अब लगावा नेह टीका तनि
बताय दा तरीका जासे मइया पिघल जालू तूँ॥२०॥
——————————————-

भूँजि भूँजि भुन-भुन कर;  औंटि अत्यधिक उबालना;  निवारी निवारण करना;  गउरा माई- गौरी माँ;  कै कै बेर न जाने कितनी बार;  लबार- बहुत बोलने वाला;  सरबस- सर्वस्व;  मोमनइयॉं- मोम की भाँति ।

शैलबाला शतक – ४

प्रस्तुत हैं चार और कवित्त!  करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह चार प्रस्तुत कवित्त! शतक में शुरुआत के आठ कवित्त काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं।  पिछली तीन प्रविष्टियाँ सम्मुख हो चुकी हैं आपके। शैलबाला-शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में हैं। शेष सवैया छंद में रचे गए हैं। क्रमशः प्रस्तुतियाँ शैलनन्दिनी के अनगिन स्वरूप उद्घाटित करेंगी। प्रविष्टि में बाबूजी की ही आवाज में इन कवित्तों का पाठ भी प्रस्तुत है।पिछली प्रविष्टियाँ : एक, दो, तीन पिछले ऑडियो: एक, दो, तीन

कोमल कोमल अॅंगुरिन कै पोर मोरे पलकन पर
फेरि फेरि पंकिल के जननी जगवले जा
अइसन गुनवन्ती माई पाइ दुबराईं काहें
दुखिया के नेह कै मलाई चभवले जा
काहें करेजवा कठोर कइ के बइठल हऊ
अम्ब अपने दुधवा कै लजिया बचवले जा
आवा आवा अम्मा अपने बेटा कै बॉंह गहा
बोला बतियावा खेलावा दुलरवले जा॥१३॥

बरम्हा तोहरे दुअरे कर जोर मुँह जोहल करैं
नाच गड़थइया तूँ नचाय देलू भोला के
जगपालक हरि के जोगनिद्रा में सुताय देलू
अॅंगुरी पर नचावल करैलू सृष्टि गोला के
ढरैलू तब करुना कै अथाह सिन्धु बन जालू
कोपै लू रण में तब तोहरे आगे होला के
सुत बेसहारा के मतारी कै बल होला
एको बेर देख लेतू पंकिल के झोला के ॥१४॥

तोहरै अवलम्ब जगदम्ब हौ विशाल हमैं
लेलू तूं उबार केतनो भारी विस्फोट में
कहहू के परै न अपने आप पलक झॅंप जाले
जग जननी ऑंखिन के पुतरी की चोट में
काहूँ भॉंति राखा पर दाहिन दयाल रहा
पंकिल पगला के हर परिस्थिति बड़ छोट में
आपन नेह चारा बेसहारा के चूँगावल करा
दुखिया के रखा अम्मा अॅंचरा की ओट में॥१५॥

कॉंहें बदे माई महटियाइल हऊ बेटा तोहार
कींचड़ में परल करत छपर छपर हौ
कौने दिन खातिर रोक रखले हऊ केकरे बदे
उर में जवन तोहरे बहत करुना निर्झर हौ
कबौं नाहिं कतहॅूं अस सुनल गयल जग जननी
कौनो महतारी कै करेजा बज्जर हौ
दुअरे ठाढ़ पंकिल गोहार करै दुर्गा माई
देखा बम्हना कै कवनों दूसर नाहिं घर हौ॥१६॥
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अॅंगुरिन- अँगुलियाँ; दुबराईं- दुबला होना/कृश होना; चभवले- छक के खिलाना; ढरैलू- करुणायुक्त होना; कोपै- क्रोधयुक्त होना; मतारी/महतारी- माँ; महटियाइल हऊ- उदासीन हो; बज्जर-वज्र; गोहार करै- पुकारना; बम्हना-ब्राह्मण।

क्रमश:………

शैलबाला शतक – ३

प्रस्तुत हैं चार और कवित्त !  करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह चार प्रस्तुत कवित्त! शतक में शुरुआत के आठ कवित्त काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं।  पिछली दो प्रविष्टियाँ सम्मुख हो चुकी हैं आपके। शैलबाला-शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में हैं। शेष सवैया छंद में रचे गए हैं। क्रमशः प्रस्तुतियाँ शैलनन्दिनी के अनगिन स्वरूप उद्घाटित करेंगी। प्रविष्टि में बाबूजी की ही आवाज में इन कवित्तों का पाठ भी प्रस्तुत है। पिछली प्रविष्टियाँ : एक, दोपिछले ऑडियो: एक, दो

लोटै दा अपने दुआरी महतारी हमैं 
तोहरै बल पर पंकिल कै बनल लाम काफ हौ
खोज कै खियावल पियावल दुलरावल करा
बड़ा दुरदुरावल हई लेई पूँजी साफ हौ 
विपदा कै मारल झोंकारल विषयानल कै 
बोली बकार बंद सहत हूँफ हाँफ हौ 
तोहरै हौ भरोसा दिव्य भोजन परोसा अम्ब
माई किहाँ बेटवा कै हजार खून माफ हौ ॥९॥
रोज ई दरिद्दर काऊगुद्दर उड़ावल करी 
लेबू मोर माई हिसाब पाई-पाई कब 
टूटल मोर डोंगी के जमोंगी बड़ा रोगी हई 
देबू दुख बूझि अपने हाथ से दवाई कब 
अइसे दुखधनिहा बीच जिनगी ओराई का
सनेहमई माई बदे आई रोवाई कब 
बार-बार माथे पर मतारी कै हथोरी फिरी 
हाय माय पंकिल कै ऊ दिन आई कब ॥१०॥
अईसन मोर घटलीं कमाई बेहयाई चढ़ी
सब बिधि छाई हीनताई बल तेज में 
काजर के घर में दाग लागल हजार जब 
लेबू तू उबार रहि पाइब परहेज में 
पंकिल अधमाई में समाई अरुझाई बुद्धि 
कब सुख पायी माई बाँहिन की सेज में 
लोटा सोंटा ले के तोहार बेटा भीख माँगै चली 
कईसे हूक उठी ना मतारी के करेज में ॥११॥
बामै का बिधाता बाता बाता हिलि जात काहें
तोहरे अछत माता बरदाता सुखदायिनी 
कोमल पद पंकज धूरि धूसर निज जूती अपने 
पूत के कपारे रख देतू सुरवंदिनी 
तोंहईं दुरदुरइबू महँटियइबू जगत जननी तब 
कईसे कहल जईबू सर्वोत्तम कृपालुनी 
कइसे देखि जाई दुख माई बड़ा मोही हऊ 

पंकिल के अँचरा तरे राखा शैलनन्दिनी ॥१२॥

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दुआरी- द्वार पर; लाम काफ- बाह्य प्रदर्शन;  दुरदुरावल- उपेक्षित किया हुआ; झोंकारल- जलाया हुआ; बोली बकार- आवाज; हूँफ हाँफ- डांट फटकार; दरिद्दर-दरिद्र; काऊगुद्दर उड़ावल- किसी के आने के शगुन के रूप में कौवा उडाना; जमोंगी-बचाना,सुरक्षित रखना; दुखधनिहा-घोर कष्ट; ओराई-समाप्त होना; मतारी- मां; अधमाई- नीचता; अरुझाई – उलझी हुई; लोटा सोंटा ले के-खाली हाथ हो जाना (भीख मांगने की मुद्रा);  करेज- कलेजा; बामै- विपरीत; बाता बाता – हड्डी-हड्डी; तोहरे अछत-तुम्हारे होते हुए; कपारे- सिरपर; महँटियइबू-ध्यान न देना ।

शैलबाला शतक – २

माँ के काली स्वरूप की अभ्यर्थना के चार कवित्त पुनः प्रस्तुत हैं। इस शतक में शुरुआत के आठ कवित्त काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं।  रौद्र-रूपा काली के सम्मुख दीन-असहाय बालक पुकार रहा है। माँ इस रूप में भी ममतामयी है..किसी भी स्वरूप में माँ है! प्रारंभिक चार कवित्त पहली प्रविष्टि में आ चुके हैं।
इस प्रविष्टि मे बाबूजी की ही आवाज में इन कवित्तों का पाठ भी प्रस्तुत है । किसी अन्य की अपेक्षा बाबूजी का यह पाठ मुझे बेहतर लगा । पिछली प्रविष्टि को भी प्लेयर लगा कर अपडेट कर रहा हूँ।

घण्टा शूल मूसल हल कुलिष कृपान बान 
शंख सेल चक्र अस्त्र सस्त्रन कै कमाल हौ
घुमरि घुमरि घहरि घहरि घेरि घेरि घालि घालि 
घमकति घमसान घूंसा चालति भूचाल हौ
नोंचति निकारति निथारि गारि डारति माँस 
आनन पसारि लास लीलति मुँह लाल हौ
पंकिल की सुधारे ही बनैगी मातु खप्परवारी 
एक तू मतारी दूजै बाम्हन कै सवाल हौ।।5।।

खल खल खल हॅंसति हहाति हठियाति हूँफि 

हुमकति हुंकारति मद ढारे जाति प्याली में
पियति पियावति पसावति रकत पोतति अंग 
खंडति खल खंड खंड एक ही भुजाली में
उछरि उछारति बिदारति खल पाटति थल 
छीलि हाड़ चाम माँस डालति जुगाली में
हर्षित मुनि साधक सिद्ध बरसत प्रसून देव 
पंकिल बजावत करताल खुसिहाली में ।।6।।

बाजत खटाखट खट लटकत गल मुण्डमाल 

नाटक विकराल काल खेलति खल खण्डिका
टप टप टप टपकत हुताषन रसनासो रकत 
लहर लहर लहरति सिर उर्ध्वकेश झण्डिका
भैरवि भयावनि भयहारिनि भवभामिनि भली 
सब सुख दात्री धात्री धर्मध्वज दण्डिका
संसय सोक समनी शंभु रमनी पुत्र पंकिल को 
चरन सरन दो भवानी रणचण्डिका ।।7।।

मुख द्युति से मलिन होति अगिनित शरदिंदु ज्योति 

बिलसति चपला सी अरि नीरद घटान में
अरुणिम पद पंकज पलोटत अज विष्णु इन्द्र
बार बार धारत रज शंकर जटान में
सकल सुरन के गुन नाम हूँ हेरानो तेरो 
विरद निसानों यश ध्वज फहरान में
चूक हरि भर उर में भगति की अचूक हूक 
फूँक मंत्र संजीवनी पंकिल के प्रान में ।।8।।

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5) घुमरि घुमरि-चक्कर लगाकर;  घालि घालि-चोट देकर;  घमकति-पीट देना;  निथारि-निस्तेज करना; गारि डारति-निचोड़ देना;  लास-शव; मतारी- माँ ।
6) हहाति-ठठा कर हँसना;  हुमकति-कस कर मारना; पसावति-निथारना;  रकति-रक्त; भुजाली-तलवार;  उछरति उछारति-उछ्लना उछालना ;  बिदारति-खंड खंड करना, विदीर्ण करना;  जुगाली-चबा-चबा कर खाना, पगुराना ।
7) खल खण्डिका-शत्रुओं का नाश करने वाली ;  रसना सो-जीभ से; धात्री-धारण करने वाली; सोक समनी-शोक का नाश करने वाली; संभु रमनी-शंभु-प्रिया, पार्वती ।
8) नीरद  घटान-बादल की घटा में ; पलोटत-दबाना ;  धारत-धारण करना; जटान-जटा; सकल सुरन-समस्त देवता;  विरद निसानों-विरद का डंका, यश का डंका ; भगति-भक्ति ।
 क्रमशः–

शैलबाला शतक

जीवन में ऐसे क्षण अपनी आवृत्ति करने में नहीं चूकते जब जीवन का केन्द्रापसारी बल केन्द्राभिगामी होने लगता है। मेरे बाबूजी की ज़िन्दगी की उसी बेला की उपज है ’शैलबाला शतक’! अनेकों झंझावातों में उलझी हुई जीवन की गति को जगदम्बा की ही शरण सूझी। अभाव-कुभाव-दुर्भाव में विक्षिप्त स्वभाव को शैलबाला के बिना कहाँ से सम्बल मिलता ! इसलिए सहज वाणी में सहज प्रवाह को सरस्वती की सनकार मिली! अपनी लोकभाषा में माँ का स्तवन-वन्दन-आत्मनिवेदन और समर्पण का जो ज्वार उमड़ा वह थमने का नाम नहीं ले रहा था । कहीं कोई बनावट नहीं, कोई सजावट नहीं, कोई दिखावट नहीं..बस बिछ गया तो बिछ गया अपनी माई के चरणॊं में। जैसे हर पंक्ति आशीर्वाद होती गयी और माँ की वन्दना से निहाल होते गये बाबूजी । अपने से अपनी बात का यह सहज स्वाभाविक उच्छलन ही है ’शैलबाला शतक’

चमकि चमकि चहलि चहलि चोटी धै चपेटै चण्डी
बोटी बोटी काटै अरि चमूँ हाँफै हँकर हँकर
भरति कुलाँचा अरि ढाँचा ढाहि खाँचा करै
नाचा करै फिरकी सी पिवति लहू डकर डकर
तरकति तड़ित सी हेलि खेलति कबड्डी अरि
हड्डी गुड्डी चूरि करति ताकत सुर टकर टकर
ऐसो लरवइया हाय दइया नाहिं देख्यौ गयो
’पंकिल’ को उबारो मोरि मैया बाँह पकर पकर ।।1।।
करति कलेवा हय हाथिन को करेजा चाभि
दाबति दरेरति दबेरति झपट्टा में
झोरति झॅंकोरति मुँह फोरति मरोरति अंग
तोरति अरि खोपड़ी अकूत बल गट्टा में
फेंकरति फुफुकारति मुँह फारति करति अट्टहास
बिलसति बल बट्टा डारि असुरन के ठट्टा में
पंकिल को दया की दवाई दे दोहाई माई
धूमिल मुख मोर पोंछ आपने दुपट्टा में ।।2।।
चोप करि चीरति विकराल रिपु घटाटोप
धावति धमकावति जमावति जग धाक री
सुर रिपु छाती बिहरावति पकी काँकरी सी
आँतरी निकारि उर मेलति हहा करी
लपकि लपेटि लाख लाखनि को लीलि जाति
भीषण रव पूरित दिगंतर तपाक री
लसत ललाम लोल कालिका कलाप अम्ब
चाहत द्विज ’पंकिल’ पद पंकज की चाकरी ।।3।।
किलकति कराली करवाली मुण्डमाली काली
रुण्ड मुण्ड रौंदति रण भूमि मातु दौरी है
बिथकत ब्रह्माण्ड भट कॅंहरि कॅंहरि घूमि घूमि
भटकत भहरात घिघियात मति बौरी है
बुक्का फारि बुबुक बुबुक बिलखाति बीर
बान वृष्टि झारी अम्ब पारी ज्यों बनौरी है
पंकिल की पीठ पर हॅंथोरी मंजु फेरि फेरि
बाँटा कर दुलार दीन बेटे की चिरौरी है ।।4।।

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१) चहलि चहलि-रौंदकर;  चमूँ-सेना;  कुलाँचा-उछलना,कूदना;  खाँचा-रौंदना;  डकर डकर-गट गट;  हेलि-प्रवेश कर;  टकर-टकर-एकटक,अपलक;  लरवइया-योद्धा ।
२) करेजा-कलेजा;  चाभि-चबाना;  दबेरति-डाँटना;  झंकोरति-झंकोरना; मरोरति-मरोड़ती हुई,उमेठती हुई;  गट्टा-बाँह;  फेंकरति-चिल्लाती हुई;  बिलसति-सुशोभित होती है; बल बट्टा – बल में कमी करके;  ठट्टा में-ठाट-बाट (सेना) में ;  दोहाई-जय जयकार, पुकार ।
३) चोप-क्रोध; बिहरावति-छिन्न-भिन्न करना;  आँतरी-अँतड़ी;  मेलति-पहन लेना;  दिगंतर –सभी दिशाओं में, चारों ओर;  लसत-अच्छा लगना;  लोल-चंचल;  कलाप-कार्य।
४) करवाली-तलवार-युक्त;  दौरी-दौड़ी;  बिथकत-विखंडित;  भट-वीर;  कँहरि-कँहरि-कराहते हुए;  भहरात-लड़खड़ाते हुए;  घिघियात-चिल्लाते हुए ;  बुक्का फारि-मुँह फाड़-फाड़ कर;  बुबुक-बुबुक--हिचकी लेकर,सिसकी लेकर; बान-बाण;  हंथोरी-हथेली; चिरौरी-प्रार्थना ।

 –क्रमशः

हाय दइया करीं का उपाय…

चारु और मैं
इधर संवाद-स्वाद, फिर अवसाद के कुछ क्षणों से गुजरते हुए चारुहासिनी की मनुहार से बाबूजी के लिखे कई गीत यूँ ही गुनगुनाता रहा। अपनी सहेलियों को बाबूजी के लिखे गीतों को गा-गाकर सुनाना और फिर अपनी इस समृद्धि पर इतराना उसकी बाल सुलभ क्रिया हो गयी है इन दिनों। इसी उपक्रम में उसे सुनाये गये दो गीत यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहला गीत अकेली मेरी आवाज में है, जिसमें लक्ष्मण को शक्ति लग जाने के बाद राम की कातर स्थिति का वर्णन है, और उनका विलाप! दूसरा गीत चारुहासिनी के सहयोग से निर्मित मेरे स्वर का परिणाम है! हम दोनों ने सम्हाला है एक दूसरे को बेसुरे होने से (फिर भी कहाँ रोक पाये हैं, और उम्र भी क्या है अभी चारु की, और मैं तो हूँ ही धुरंधर)। 

1. हाय दइया करीं का उपाय

हाय दइया करीं का उपाय, लखन तन राखै बदे ।
घायल भइया गोद रखि बिलखत, राघव करेजवा लगाय,
लखन तन राखै बदे…….॥१॥
अबके विपिन में बिपति मोरि बाँटी, रनबन में होखी सहाय,
लखन तन राखै बदे…….॥२॥
अब के करी बड़का भइया क खोजिया, तनि उठि के देता बताय,
लखन तन राखै बदे…….॥३॥ 
सँग अइला तजि बाप मइया लुगइया, का कहबै जननी से जाय,
लखन तन राखै बदे…….॥४॥ 
जनतीं कि उड़ि जइबा बनि के चिरइया, मर जइतीं माहुर चबाय,
लखन तन राखै बदे…….॥५॥ 
बिरथा जनम दिहलीं तिरिया के खातिर, भाई दुलरुवा गँवाय,
लखन तन राखै बदे…….॥६॥ 
भरि दिन लड़ि थाकल बजरंगी, की कतहूँ गइलैं ओंहाय,
लखन तन राखै बदे…….॥७॥ 
की बिलमवलस रवनवाँ  कै बेटा, की गइलैं रहिया भुलाय,
लखन तन राखै बदे…….॥८॥ 
टप-टप टपकत ’पंकिल’ अँसुवा, झुकि गइलैं मुँहवा झुराय,
लखन तन राखै बदे…….॥९॥ 
वाहि घरी  मारुत सुत अइलैं, गइलीं बिपतिया पराय,
लखन तन राखै बदे…….॥१०॥

2. सखिया आवा उड़ि चलीं ओहि बनवाँ हो ना

सखिया आवा उड़ि चलीं ओहि बनवाँ हो ना ।
जहवाँ टेरैलैं मुरली मोहनवाँ हो ना 
जहवाँ हरि बोलैं सुगना-मयनवाँ हो ना-
सखिया आवा उड़ि चलीं…..॥
उगलैं शरद पुरुनियाँ कै चनवाँ हो ना 
इहवाँ तन उहवाँ उड़ि गइलैं मनवाँ हो ना-
आली बिछपित भइलैं परनवाँ हो ना ॥
लाख रोकै चाहे दुनियाँ जहनवाँ हो ना
तजि भागि चला धनवा-घरनवाँ हो ना-
पग कै रुनझुन बाजैला बजनवाँ हो ना ॥
सासु सुतलीं अगोरले अँगनवाँ हो ना 
कवनों लागी नाहीं सखिया बहनवाँ हो ना-
भावै ’पंकिल’ हरि कै चरनवाँ हो ना ॥