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शैलबाला शतक 
शैलबाला शतक नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह छन्द! शैलबाला-शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में हैं। इन चौबीस कवित्तों में प्रारम्भिक आठ कवित्त (शैलबाला शतक: एक एवं शैलबाला शतक: दो) काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं। पिछली छः प्रविष्टियों (शैलबाला शतक: एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः) में इन चौबीस कवित्त छन्दों को प्रस्तुत किया जा चुका है। इसके बाद की प्रविष्टियाँ सवैया छंद में रची गयी हैं, जो क्रमशः प्रस्तुत हैं। शैलबाला शतक – 7, 8, 9  के बाद प्रस्तुत है अगली कड़ी-
Shailbala-Shatak-10

ई दुनिया मोटरी टकटोरैले एक तोंहिं पोटरी देखवइया
दीन निहारि होंकारि के धावैलू जइसे पेन्हाइल कामद गइया
लाख असीसैलू जूड़े रहा हमरो उमरी ले जिया मोर भइया
पंकिल कै कहिया हरबू दुख नाचै सिरे साढ़े साती अढ़इया ॥६१॥

आपन जामल लाख गदाई न माई कबौं सुत खाईं में भेंजी
कइसे मतारी दुखारी तनय तजि आनन ढॉंकि परी सुख सेजी
छोड़े बनी नाहिं पंकिल जेकर जायल पोवल उहै सहेजी
बउरहवा डुहुरै बम्हना तूँ बना जननी मत काठ करेजी ॥६२॥

दीन मलीन गलीन गलीन फिरीं रिनियाँ पट अन्न न आँटत
अम्ब ओराय रही जिनिगी नित पेवन पै पुनि पेवन साटत
ना जेकरे चलहू क सहूर ते सौ पुरुखा उदघाटत डाँटत
पंकिल कै दुख देखि दयामयि कइसे करेज तोहार न फाटत ॥६३॥

पूत करोरन तोर धरा बिच हौं सबते पर अम्ब अनारी
बूझि परै कछु लाभ न हानि हनी निज हाँथहिं आपु कुदारी
ई सुखवा छिनिहा कबहूँ मत चाटि जियीं तोरि जूठन थारी
पंकिल के बूझिहा बेटवा अस भइया के भूलि न जइहा मतारी ॥६४॥

सोच में फूलत बा पेटवा बेटवा कहिके कहिया टेरबू तूँ
भूलि सुपन्थ कुपंथ में धावत लाल के बॉहिन में घेरबू तूँ
अंक ले ऑचर से मुँह पोंछ दुलारि हिये की व्यथा हरबू तूँ
पंकिल के रखबू पजरा नाहिं माई कबौं मॅुहवॉं फेरबू तूँ ॥६५॥

तूँ थकबू तोर पउवाँ पिराई न मो सम नीच मिली धरनी में
अंगनि अंगनि अवगुन व्यापल माहुर घोरल बा करनी में
ऊबत ना नख से शिख डूबल भोग की भीषण बैतरिनी में
कवनों बिधान रचा मन पंकिल लीन रहै शिव की घरनी में ॥६६॥

तूँ छिपि गइलू पराइ कहाँ फुसिलाइ के माई थमाइ खेलवना
पौरुष का छिपलैं तोंहसे मोर अम्बर चूमी कि बाँगुर बौना
साटि हिये सुत के सिगरी निशि अम्ब बितावै ले ओदे बिछौना
कइसे सहाई मतारी के पंकिल पूत क मउवत बेटी क गौना॥६७॥

काने मुहें तेलवा डलले मुँहवाँ ओरमाइ का बइठल बाटू
की अघ मेटै क बानि बिसारि निवारि सनेह उमइठल बाटू
मानल जालू महा सोझिया पर पूतै पै रूठ के अँइठल बाटू
पंकिल से के अघी जेकरे हियरे मल पोंछै के पइठल बाटू ॥६८॥

पाहन जौ तोंहऊॅं बन जइबू त माई क नाँव ओराई धरा से
के बिलखात निरीह बेटउवा कै आँस हरी अँगुरी अँचरा से
दूसर के मोर मेंटी पियास सबै सुर धोख धुआँ बदरा से
पंकिल कै कहलो सुनलो अब माफ करा मत जा पॅंजरा से ॥६९॥

गाढ़े सकेते तोहिं एक आँटैलू अइसन माई मिली कहाँ मोही
के सुत कै तकतै मॅुंह जीही ले अँवटल दूध कटोरी में जोही
लाख नलायक बा बेटवा पर राखे बनी चाहे काटी बकोटी
पंकिल की तजि के ममता न बना मतवा अब तू निर्मोही ॥७०॥

तूँ जोड़तै थकबू जननी अघ मोर कबौं गिनले न ओराई
छाला पड़ी तोहरे कर में पतरी नरमी अँगुरी घिसि जाई
बेंची ला मॉंस सदा तोहरै शशिशेखर की घरनी मोर माई
पाछिल चूक बिसारि के पंकिल पूत के ला गोदिया में उठाई ॥७१॥

सूखल जाला सदा बचवा बचवा कहतै मुँहवाँ तोर माई
देंह करोर धरे पर भी कबहूँ करजा न तोहार भराई
लाख उधातम कै सुत पोसैलू पूत बदै तन खून जराई
खूँटहिं के बल नाचत बाछा हौं पंकिल पूत तोहार तूँ माई ॥७२॥

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