प्रसंगवश Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम् https://blog.ramyantar.com/category/प्रसंगवश हिंदी ब्लॉग। साहित्य, भाषा, संस्कृति, लोक व शास्त्र से संयुक्त। कविता, कहानी, समीक्षा, निबन्ध, नाटक एवं अनुवाद का सहज प्रकाशन। लोक साहित्य का रंग भी। Tue, 03 Mar 2026 17:00:23 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.2 https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/03/cropped-favicon-4-32x32.png प्रसंगवश Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम् https://blog.ramyantar.com/category/प्रसंगवश 32 32 डायोजिनीज़ (Diogenes) का एक प्रेरक प्रसंग https://blog.ramyantar.com/2021/10/diogenes-inspirational-story.html https://blog.ramyantar.com/2021/10/diogenes-inspirational-story.html#respond Sun, 17 Oct 2021 04:34:49 +0000 https://blog.ramyantar.com/?p=3819 डायोजिनीज़ (Diogenes) के जीवन से जुड़ा यह प्रेरक प्रसंग शान्तचित्त रहने के अभ्यास को रेखांकित करता है। मनुष्य का स्वभाव है, प्रत्येक परिस्थिति एवं कार्य...

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डायोजिनीज़ (Diogenes) के जीवन से जुड़ा यह प्रेरक प्रसंग शान्तचित्त रहने के अभ्यास को रेखांकित करता है।

मनुष्य का स्वभाव है, प्रत्येक परिस्थिति एवं कार्य के प्रति अपनी धारणा बनाना। अभाव में भी स्वभाव न छूटता है। विपन्नता में भी मन विनय की डोर नहीं पकड़ता है। प्रतिक्रिया उसका स्वभाव है।

वह व्यक्ति जो संसार की, मन की इसी पकड़ से छूटना चाहता है, निस्पृह जीवन के अनन्य अभ्यासों में स्वयं को खपा देता है। फिर वह हर परिस्थिति के लिए तैयार होता है, विनम्र होकर। हर प्रतिक्रिया का सहज स्वीकार उसका हेतु होता है।


डायोजिनीज़ (Diogenes) का शान्तचित्त रहने का अभ्यास

यूनान का एक प्रसिद्ध तत्त्ववेत्ता डायोजिनीज़ (Diogenes), जो कि सुकरात का शिष्य था, अपना जीवन एक माँद में ही बिता लेता था। वह अपने रहने के लिए घर बनाना आवश्यक नहीं समझता था।

एक बार किसी युवक ने उसे देर तक एक पत्थर की मूर्ति से भीख माँगते देखा। उस युवक ने पूछा – “डायोजिनीज़! भला पत्थर की मूर्ति से तुम क्यों भीख माँगते हो? क्या वह तुमको भीख दे देगी?”

डायोजिनीज़ ने उत्तर दिया, “मैं इस मूर्ति से भीख माँगकर किसी पुरुष से भीख न देने पर शान्तचित्त रहने का अभ्यास कर रहा हूँ।”

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ग्रीष्म गरिमा: कवि सत्यनारायण- दो https://blog.ramyantar.com/2012/06/1-2.html https://blog.ramyantar.com/2012/06/1-2.html#comments Wed, 06 Jun 2012 19:00:00 +0000 ग्रीष्म शृंखला में ब्रजभाषा से निकली यह ग्रीष्म गरिमा  आपके सम्मुख है, कवि हैं अल्पज्ञात कवि सत्यनारायण। पहली कड़ी के बाद आज दूसरी कड़ी- ग्रीष्म-गरिमा...

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ग्रीष्म शृंखला में ब्रजभाषा से निकली यह ग्रीष्म गरिमा  आपके सम्मुख है, कवि हैं अल्पज्ञात कवि सत्यनारायण। पहली कड़ी के बाद आज दूसरी कड़ी-

ग्रीष्म-गरिमा

जबै अटकत आपस में बंस, द्रोह दावानल पटकत आय ।
खटकि चटकत करिवे निज ध्वंस, नसत पल भर में बर बिसाय ॥१४॥
सदाँ अपनी धुन में दरसाय, पायकें कहूँ जलासय तीर ।
उड़ति बैठति पुनि उड़ि-उड़ि जाय, बिकल अति मधु-माखिन की भीर ॥१५॥
करति ना कोकिल निज कल गान, भ्रमर गुंजन सौ सूनी कुंज ।
परत पद तर पजरत पाषान, जरत परसत पिपीलिका पुंज ॥१६॥
ताप बस ह्वै अत्यंत अधीर, कहूँ कुलिलत नहिं बछरा गाय ।
द्र मन तर पी प्याऊ कौ नीर, फिरति जिय-जरनि तऊ ना जाय ॥१७॥
रेत सों बाहिर भुरसत पाम, तजत डरपत छिन भर कों धाम ।
प्रबल धमका की पारत धाम, परै छाती नहिं करिवे काम ॥१८॥
निरुद्यम निस्सहाय अति दीन, निबल सहि सकत न तेरी ज्वाल ।
उपासे प्यासे बसन बिहीन, लगत जल प्रान तजत तत्काल ॥१९॥
मित्र कों तपत देखि असहाय, लुकन नीचे तुमसों डरि होय ।
हिमालय हिम जब जाति पराय, जगत करुना न तऊ तव जीय ॥२०॥
यदपि पीवत जन कृत्रिम तोय, प्यास प्रबला तोऊ नहिं जाय ।
कंठ की सीतलता गई खोय, रह्यौ रसना में रस ना हाय ॥२१॥
करत छिरकाव न पूरत आस, गरम निकसत धरती सों भाप ।
चमेली पट्ल पुहुप नित पास, तऊ तव अटल रूप सों ताप ॥२२॥
लगीं खस-टटियाँ छिरकी जात, खिंचत खस पंखा तिनके संग ।
नैक नोकर के झोखा खात, घुसत तुम वहाँ बड़े बेढंग ॥२३॥
कबहुँ चंदन घिसि धारत अंग, करत सेवन उसीर करपूर ।
बगीचन बागन घोंटत भंग, तबहुँ नहिं होय शांति भरपूर ॥२४॥
सेत कारि पीरी अरु लाल, लाइ कें तुम आँधी परचंड ।
उखारत जर सों वृक्ष विसाल, गिरावत तिनकौ गर्व अखंड ॥२५॥
गगन में गगन रही अति छाय, लखत नहिं नील बरन आकास ।
दुरत निकरत पुनि पुनि दुरिजाय, नखत दल करत न प्रबल प्रकास ॥२६॥
सुधाकर सुधा करनि फैलाइ, करति कछु मटमली सी जोति ।
यदपि नैनन कों अति सुखदाइ, तऊ मनचीती तृप्ति न होति ॥२७॥
कछुक जब रजनी होत व्यतीत, अटनि पै ले सितार मिरदंग ।
गवावत-गावत सुंदर गीत, भंग तऊ करत सबै तुम रंग ॥२८॥
स्वदेसी मलमल मल-मल धोय, संदली ताकों सुघर रँगाय ।
पहरि ताकी धोती तिय कोय, रमत परि तबहुँ न कष्ट नसाय ॥२९॥
उठें खटिया सों नित परभात, ब्यारि हू सीरी-सीरी खात ।
उमस सों तबहूँ सिर चकरात, सोचिए पढ़न लिखन फिर बात ॥३०॥
न भावत असन-बसन बन-बाग, अलप घर घरनी सों अनुराग ।
खुले तव पाइ अनुग्रह भाग, कमायो सेतमेंत बैराग ॥३१॥
प्रफुल्लित सबरे आक-जवास, जरे तन हरे-हरे पटसाज ।
तुम्हैं कुसुमांजलि सहित हुलास देत, स्वीकार करो महाराज ॥३२॥
—- कवि सत्यनारायण

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ग्रीष्म गरिमा: कवि सत्यनारायण- एक https://blog.ramyantar.com/2012/06/1-1.html https://blog.ramyantar.com/2012/06/1-1.html#comments Tue, 05 Jun 2012 09:06:00 +0000 गर्मी की बरजोरी ने बहुतों का मन थोर कर दिया है, मेरा भी। वसंत का मगन मन अगन-तपन में सिहुर-सा गया है। कोकिल कूकने से...

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गर्मी की बरजोरी ने बहुतों का मन थोर कर दिया है, मेरा भी। वसंत का मगन मन अगन-तपन में सिहुर-सा गया है। कोकिल कूकने से ठहरी, भौरा गुंजरित होने से, फिर अपनी क्या मजाल कि इस बउराती लूह के सामने हम अपने दरबे में न दुबुक जाँय। उचक-उचक झरोखे से झाँकते हैं और अकुलाये मन को समझाते हैं कि घाम भी तो  काम का है। सुरजू को दोष काहें? बात तो समझने की है।

घाम के मारे अति घबराय, फिरत मारे चहुँ जीवन काज
एक थल अपनी बैर बिहाय, नीर ढिंग पीवत मृग-मृगराज॥

दरबे में हों तो विचारने का मौका मिलता है, झरोखे खुलते हैं और लगे-लगे हाथ कुछ सूत्र आते हैं। गर्मी की यह ’टोन’ कुछ समझाती-सी मालूम पड़ती है। सोचता हूँ गर्मी की यह प्रचंडता विरस करनी चाहे तो….गिरिजेश भईया हर बार की तरह फिर कोंचते हैं। मन कचकचाने-सा हो आता है जैसे। फिर याद-सा आता है, मन रसाभासी है, वसन्त रस का स्थायी अभ्यासी है।  ललचता हुआ मन है यह। गर्मी की तपन में अंगराग-चंदन मलते प्रिय के कर्म में दुबके हुए वसन्त-रस को पहचानता है यह। खस की टाँटी से छन कर मधुर हो गयी हवा में बहक कर आए हुए वसन्त रस की साध है इसे। गर्मी की तपन में स्वेद का शीतल स्वाद चखती देंह-युग्म की फिसलन के बीच रिसता हुआ वह वसन्त-रस अभीष्ट है इसका। मन बउराह है, ’आनन्दवर्द्धन’ के स्वर में पुकार उठा है… सचमुच यदि विरस न ही होना चाहो तो इतना करना कि अपने रस को सँभालना, च्युत न होने देना। स्थायी होने देना; बदल मत देना उसे किसी और रस से, ठहराना –

विरोधी वाऽविरोधी वा रसोऽगिंनि रसान्तरे।
परिपोषं न नेतव्यः तेन स्याद् अविरोधिता॥

कोंच-वान को धन्यवाद! कई बार ध्वनि की ओजस्विता चरित्र एवं कर्म की ओजस्विता को उकसाया करती है। सो ग्रीष्म की यह तपन, स्वेद-श्लथ बदन, रस-चन्दन (आनन्दवर्द्धन भी) और धकेलती कोंच- ये ईंधन पर्याप्त हैं अन्तर की आग को भड़काने के लिए। गर्मी बनी रही तो यह ग्रीष्म चर्चा होती रहेगी। फिलहाल ब्रजभाषा से निकली यह ग्रीष्म गरिमा आपके सम्मुख है। कवि हैं अल्पज्ञात कवि सत्यनारायण।

ग्रीष्म गरिमा : कवि सत्यनारायण

कँपत चर-अचर सकल लखि याहि, प्रभो परताप ताप के धाम।
सीत-मद-हरन सरन-प्रद पाहि, तिहारे चरन कमल परनाम ॥१॥

देखि तव दारुन दुपहर दर्स, छांह हू तकत छांह के हेत।
हियन आकर्षत कित हू हर्ष, लता-बनिता-कबिता नहिं देत ॥२॥

पसीना पौंछत बारहिं बार, पसीजत तोऊ सारे अंग।
कलित कुम्हिलात हियौ की हार, उड़त सब मुख मंडल कौ रंग ॥३॥

हरति तव ज्वाल रसा-रस आय, सरित सरवर सब सूखे जात।
बात बस बारि बहत, भय पाय, मनहुँ तिन थर-थर काँपत गात ॥४॥

तपनिसों सुधिबुधि तजि कहुँ जाय, मोर जब पैठत पाँख पसारि।
दुरत ता नीचे बिषधर आय, विकल प्रानननि कौ मोह बिसारि ॥५॥

घाम के मारे अति घबराय, फिरत मारे चहुँ जीवन काज।
एक थल अपनी बैर बिहाय, नीर ढिंग पीवत मृग-मृगराज ॥६॥

लार टपकत जा की अकुलात, स्वान अति हाँफत जीभ निकारि।
बिलाई कढ़ि समीप सों जात, तऊ नहिं बोलत ताहि निहारि ॥७॥

तरनि कौ तापत तरुन प्रताप, बिबस तरुनी गन तजि संकोच।
निबारति बसन आपसों आप, नहिं कुछ अनघेरिन कौ सोच ॥८॥

उत सों इत, इतसों उत जात, निरखि निरसात सुहात न ठाम।
कृपा तो चिपचिपात सब गात, न पावत छिनक कहुँ विस्राम ॥९॥

चूम मुख दिना गए द्वै-चार, प्यार करि पावति परम प्रमोद।
मात सोइ तव बस सकल बिसार, उतारति निज बालक कों गोद ॥१०॥

राह चलिबौ नहिं तनिक सुहाय, मचकि मसका तब मारें देत।
पथिक पंछी पादप तर धाय, लेत सीरक तब आवत चेत ॥११॥

तपत रवि सहस किरन बिकराल, चील्ह चींहरत गगन मड़राय।
भभकि भुव उगिलत दावा ग्वाल, लूअ की लपट झकोरा खाय ॥१२॥

महिष सूकर गन तालन जाहिं, न्हात लोटत अति हिय हरसात।
कीच सनि मुदित महामन माहिं, मनहुँ तन लगि चंदन सरसात ॥१३॥

ग्रीष्म गरिमा के शेष बचे छन्द अगली प्रविष्टि में प्रकाशित होंगे।

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वैवाहिक सप्तपदी: वर वचन https://blog.ramyantar.com/2011/09/blog-post_03.html https://blog.ramyantar.com/2011/09/blog-post_03.html#respond Sat, 03 Sep 2011 07:00:00 +0000 वैवाहिक सप्तपदी: वर वचन हौं गृह-ग्राम रहौं जब लौं तब लौं ही तू साज सिंगार सजौगी।भाँतिन-भाँति के हास-विलास कुतूहल क्रीड़ा में राग रचौगी।पै न रहूँ...

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पढ़ने के लिए बहुत दिनों से सँजो कर रखी अपने प्रिय चिट्ठों की फीड देखते-देखते वाणी जी की एक प्रविष्टि पर टिप्पणी करने चला। उस प्रविष्टि में वैवाहिक सप्तपदी का उल्लेख था, सरल हिन्दी में उसे प्रस्तुत करने की चेष्टा भी। इस वैवाहिक सप्तपदी को हिन्दी-काव्य रूप में सुनने पढ़ने की इच्छा से बाबूजी के पास पहुँचा। बाबूजी ने मेरी प्रार्थना स्वीकार कर इसे हिन्दी काव्य-रूप दिया जो सुनने और समझने की दृष्टि से अत्यन्त सहज और प्रिय लगा  मुझे। इस पूरी वैवाहिक सप्तपदी (वर-कन्या वचन) को आप के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। पिछली प्रविष्टि  में कन्या वचन की प्रस्तुति बाद आज वर वचन। आभार।

वैवाहिक सप्तपदी: वर वचन

हौं गृह-ग्राम रहौं जब लौं तब लौं ही तू साज सिंगार सजौगी।
भाँतिन-भाँति के हास-विलास कुतूहल क्रीड़ा में राग रचौगी।
पै न रहूँ घर तो न अभूषण पेन्होगी तूँ परधाम रहोगी।
प्रानप्रिये ये करो प्रन तूँ हमरी पहली बतिया न तजौगी ॥१॥

श्री हरि विष्णु चतुर्भुज अग्नि औ ब्राह्मण देव की साक्षी गहौगी।
वान्धव-बंधु जे मंडप राजत औ ध्रुवतारा की ओट लहौगी।
ये हरि पावक भूसुर बान्धव औ ध्रुव पाँचो की साख रखोगी।
प्रानप्रिये ये करो प्रन तूँ हमरी दुसरी बतिया न तजौगी ॥२॥

जीवनसंगिनि, तूँ निज चित्त को मेरे हि चित्त में जोरि रखोगी।
मेरे ही तूँ मन के अनुकूल रहोगी नहीं प्रतिकूल बहोगी।
टारोगी नाहिं कहा हमरो तुम सुन्दरि मेरी ही बाट गहौगी।
प्रानप्रिये ये करो प्रन तूँ हमरी तिसरी बतिया न तजौगी ॥३॥

जा बिधि होय हमें परितोष सोई हृदयेश्वरि काज करौगी।
लीन रहौगी तूँ मेरी ही भक्ति में मेरी ही नित्य तूँ तृप्ति चहौगी।
आदर में हमरे न कुटुम्बिन की तूँ कबौं कोतहाई करौगी।
प्रानप्रिये ये करो प्रन तूँ हमरी चौथी बतिया न तजौगी ॥४॥

भामिनि, साँचहि साँच कहौं मोरि बातिन को तूँ सचेत सुनौगी।
सूनो लगै घरनी के बिना घर शांति वहीं तूँ जहाँ पै रहौगी।
‘पंकिल’ नैनन की पुतरी बिसवास करौ मेरो बाम गहौगी।
प्रानप्रिये ये करो प्रन तूँ हमरी पचईं बतिया न तजौगी ॥५॥

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वैवाहिक सप्तपदी: कन्या वचन https://blog.ramyantar.com/2011/09/blog-post-7.html https://blog.ramyantar.com/2011/09/blog-post-7.html#respond Thu, 01 Sep 2011 23:53:00 +0000 वैवाहिक सप्तपदी: कन्या-वचन देवनि देवि अनेकन पूजि कियो जग जीवन पुण्य घना। निज अर्चन वंदन पुण्य-प्रताप ते पायौ तुम्हें अब हौं सजना। तुम सौम्य सदा...

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आज पढ़ने के लिए बहुत दिनों से सँजो कर रखी अपने प्रिय चिट्ठों की फीड देखते-देखते वाणी जी की एक प्रविष्टि पर टिप्पणी करने चला। उस प्रविष्टि में वैवाहिक सप्तपदी का उल्लेख था, सरल हिन्दी में उसे प्रस्तुत करने की चेष्टा भी। इस वैवाहिक सप्तपदी को हिन्दी-काव्य रूप में सुनने पढ़ने की इच्छा से बाबूजी के पास पहुँचा। बाबूजी ने मेरी प्रार्थना स्वीकार कर इसे हिन्दी काव्य-रूप दिया जो सुनने और समझने की दृष्टि से अत्यन्त सहज और प्रिय लगा मुझे। इस पूरी वैवाहिक सप्तपदी (वर-कन्या वचन) को आप के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। वाणी जी की प्रविष्टि पर टिप्पणी का मसला भी हल हो गया इससे। आभार। आज कन्या वचन। 

वैवाहिक सप्तपदी: कन्या-वचन

देवनि देवि अनेकन पूजि कियो जग जीवन पुण्य घना।
निज अर्चन वंदन पुण्य-प्रताप ते पायौ तुम्हें अब हौं सजना।
तुम सौम्य सदा रहना जो गृहस्थ को जीवन हौ दुख-सुक्ख सना।
तब बाम तुम्हारे बिराजुंगी मैं, सजना हमरी पहली बचना ॥१॥

बावलि कूप तड़ाग परिक्रम यज्ञ महोत्सव की रचना।
सब होत गृहस्थ को धर्मधरा पर जो कछु कर्म करो अपना।
बिन राय लिए हमरी न करो कछु ख्याल सदा यहि को रखना।
तब बाम तुम्हारे बिराजुंगी मैं, सजना हमरी दूसरी बचना ॥२॥

व्रत कर्म उदापन दान विधान की जो कछु शास्त्रन में गणना।
इनमें रमता मन नारिन को ये सुभाव विधाता ने दीन्हीं बना।
इनको मत भंग कभी करना पिय क्रोध उलाहन से बचना।
तब बाम तुम्हारे बिराजुंगी मैं, सजना हमरी तिसरी बचना ॥३॥

पुरुषारथ से उपराजन जो करिहौ अपनो धन धान्य धना।
गज बाजि औ गोधन को पशु वैभव जो कुल बीच वितान बना।
सोइ सारी कमाई जुटाई पिया तुम मोरेहिं हाथन पै रखना।
तब बाम तुम्हारे बिराजुंगी मैं, सजना हमरी चउथी बचना ॥४॥

तू पिय जो पशु हाट में गोधन जइहौ खरीदन जोरी बना।
किनको चुनिबो किनको रखिबो किन बेचनि की करिहौं गणना।
सब पूछिके मोसे करोगे, उल्लंघन ना करिहौ हमरो कहना।
तब बाम तुम्हारे बिराजुंगी मैं, सजना हमरी पँचवी बचना ॥५॥

हीरक मोतिहुँ सोन औ चानी को जो बहु भाँति बन्यो गहना।
सब अंगनि-अंगनि साज सजाई बिबाह कौ आज रच्यौ रचना।
इनको मत लेना उतार कभी प्रिय अंग चढ़्यौ जो तेरौ गहना।
तब बाम तुम्हारे बिराजुंगी मैं, सजना हमरी छठईं बचना ॥६॥

मंगल काज कबौं करिहैं जब भाई घरे बचनी-बचना।
बिन बोले भी मैं पहुँचूँगी तहाँ पिय लै अपनो बँधनी-बँधना।
अपमानित तूँ करना मत ‘पंकिल’ लाज मेरे मन की रखना।
तब बाम तुम्हारे बिराजुंगी मैं, सजना हमरी सतईं बचना ॥७॥

वर वचन अगली प्रविष्टि में-

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रघुवीर सहाय की कविता से सबक लेकर https://blog.ramyantar.com/2008/10/poem-raghuvir-sahay.html https://blog.ramyantar.com/2008/10/poem-raghuvir-sahay.html#comments Tue, 07 Oct 2008 12:17:00 +0000 ठीक ठीक ब्लॉग लिखना शुरू करने के पहले मेरे एक ब्लॉगर मित्र ने मुझे कुछ उलाहने दिए। रघुवीर सहाय की कविता ‘बदलो’ की पंक्तियों को...

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ठीक ठीक ब्लॉग लिखना शुरू करने के पहले मेरे एक ब्लॉगर मित्र ने मुझे कुछ उलाहने दिए। रघुवीर सहाय की कविता ‘बदलो’ की पंक्तियों को उद्धृत कर सारांश दे रहा हूँ-

“उसने पहले मेरा हाल पूछा
एकाएक विषय बदलकर कहा
आजकल का समाज देखते हुए
मैं चाहता हूँ कि तुम बदलो।
फिर कहा कि अभी तक तुम अयोग्य
साबित हुए हो
इसलिए बदलो,
फिर कहा पहले तुम अपने को बदल कर दिखाओ
तब मैं तुमसे बात करूँगा।”

मैंने मित्र की बात सुनी थी। शायद ब्लॉगर बनने की प्रेरणा में उसका भी हाथ हो।

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