वाराणसी के शासक ब्रह्मदत्त को अपने दोषों के संबंध में जानने की इच्छा थी । उसने राजभवन के सेवकों से लेकर जनपद की प्रजा तक सब से प्रश्न किये ; किन्तु किसी को उसमें कोई त्रुटि नहीं दिखी ।

निराश ब्रह्मदत्त हिमालय पहुँचा । वन्य पर्वत के रमणीय एकान्त में एक साधु का आश्रम था । राजा वहाँ गया तो साधु ने उसका स्वागत कर उसे कंदमूल फल भेंट किये ।

ब्रह्मदत्त ने फल चखे और मुग्ध होकर बोला, ” आर्य, इन फलों में दिव्य स्वाद है । ये इतने मधुर क्यों हैं ?”

साधु ने सहज स्वर में उत्तर दिया, ” फल इसलिये मधुर हैं कि शासक धर्मनिष्ठ है।”

ब्रह्मदत्त को विश्वास न हुआ । “शासक अधर्मी हो तो क्या फल मीठे न होंगे ?”

“नहीं वत्स । शासक अधर्म में प्रवृत्त होता है तो फल ही नहीं तैल, मधु और शर्करा भी अपना स्वाद त्याग देते हैं । उनका रस सूख जाता है ।”

ब्रह्मदत्त राजधानी लौटा तो उसके मन में साधु का उत्तर घुमड़ रहा था । उसने इसका निर्णय करने की ठानी और प्रजा पर भयंकर अत्याचार किये । कुछ दिनों के बाद वह उसी साधु के आश्रम पर पहुँचा । साधु ने पूर्ववत उसे फल भेंट किये । किन्तु इस बार वे नीरस और कड़वे थे ।

“आर्य ये फल तो निःस्वाद हैं”, ब्रह्मदत्त ने आश्चर्य से कहा ।

साधु गंभीर हो उठा, ” तब तो अवश्य ही शासक पापिष्ठ हो गया, यह उसी के अधर्म का प्रभाव है ।”

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यह कथा हमेशा से मन को छूती है । सोचता हूँ – क्या सच में फलों के स्वाद बदल गये थे या मन ही…। और क्या स्वभाव इतनी शीघ्रता से बदल सकता है ?

# ’भारती’ के एक अंक से साभार |