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सौन्दर्य लहरी - १९सौन्दर्य लहरी संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है। आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है सौन्दर्य-लहरी में। उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा। अब यह आपके सामने प्रस्तुत है। ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ – सा प्रयास है यह। अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें। सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता। मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है। उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा। जो सहेजूँगा,यहाँ लाकर रख दूँगा। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवींग्यारहवीं, बारहवीं, तेरहवीं, चौदहवीं, पन्द्रहवींसोलहवींसत्रहवीं और अठारहवीं कड़ी के बाद आज प्रस्तुत है उन्नीसवीं कड़ी –


करीन्द्राणां शुण्डान् कनककदलीकाण्डपटली-
मुभाभ्यामूरुभ्यामुभयमपि निर्जित्य भवति।
सुवृत्ताभ्यां पत्युः प्रणतिकठिनाभ्यां गिरिसुते
विधिज्ञे जानुभ्यां विबुधकरिकुम्भद्वयमसि॥81॥
करिवरों के शुण्ड को
कंचन कदलि के खंभ द्वय को
कर दिया करतीं पराजित
 युगल जंघायें तुम्हारी
जानु
जो पति को प्रणति करते
सुवृत्त हुए कठिन हैं
जीतती उनसे
विवुध करि कुम्भ द्वय
हे शैलवाले!

पराजेतुं रुद्रं द्विगुणशरगर्भौ गिरिसुते
निषङ्गौ जङ्घे ते विषमविशिखो बाढमकृत
यदग्रे दृश्यन्ते दशशरफलाः पादयुगली-
नखाग्रच्छद्मानः सुरमुकुटशाणैकनिशिताः॥82॥
काम ने जब प्रथम
चाहा रुद्र को करना पराजित
विजय हित गिरिजे!
तुम्हारी जंघ को तरकस बनाया
बाण अपने द्विगुण उसमें भर दिया फिर
पंचशर ने
चरण अंगुलि नखस्वरूपी
अग्र बाणों के फलक हैं दीखते
अत्यंत ही हैं तीक्ष्ण
सुरगण के मुकुट की शाण पर चढ़कर हुए द्युतिमान
जंघ निषंगिनी हे!

श्रुतीनां मूर्धानो दधति तव यौ शेखरतया
ममाप्येतौ मातः शिरसि दयया धेहि चरणौ
ययोः पाद्यं पाथः पशुपतिजटाजूटतटिनी 
ययोर्लाक्षालक्ष्मीररुणहरिचूड़ामणिरुचिः॥83॥ 
समादृत मूर्धन्य
जिनको उपनिषद रखते स्वशिर पर
गंग शंकर जटाजूट पयस्विनी
पादाम्बु जिनका
विष्णु चूड़ामड़ि अरुण
जिसकी रुचिर युग चरण छवि श्री
वही जननी
निज युगल तुम चरण
मेरे माथ पर भी
द्रवित हो रख दो दयाकर
माँ कृपा करुणामयी हे!

हिमानी हन्तव्यं  हिमगिरिनिवासैकचतुरौ
निशायां निद्राणं निशि च परभागे च विशदौ
वरं लक्ष्मीपात्रं श्रियमतिसृजन्तौ समयिनां 
सरोजं त्वत्पादौ जननि जयतिश्र्चित्रमिह किम्॥84॥
कमल हिम से नष्ट हो जाते
परंतु हिमाद्रि पर भी
पदकमल तेरे सदा छविमान रहते हैं प्रफुल्लित
कमल रजनी बीच हो जाते निमीलित
किन्तु तेरे पदकमल रहते अहर्निशि
विकसमान प्रफुल्ल पुलकित
कमलगण तो हैं रमा के पात्र
पर पदकंज तेरे उन्हें कर देते अमित श्री दान
जो समय विधि से किया करते त्वदीय उपासना हैं
न आश्चर्य इसमें
देवि तेरे चरणद्वय अरविन्द
अद्भुत
नलिन चरणे!
——————
समय विधि: देवि-उपासना की तीन तंत्र-विधियों ’कौल, मिश्र एवं समय’ में से एक विधि। बिना किसी वाह्य आचार एवं वस्तु के किसी बाह्य स्थान (महाकाश) पर संपादित न होकर अन्तःस्थित ’हृदयाकाश’ में संपादित होने वाली आराधना। कुण्डलिनी जागरण की अनन्य उपलब्धि के उपरान्त सहस्रार में सम्पन्न शिव-शक्ति की मानसिक आराधना।

नमोवाकं ब्रूमो नयनरमणीयाय पदयो-
स्तवास्मै द्वन्द्वाय स्फुटरुचिरसालक्तकवते
असूयत्यत्यन्तं यदभिहननाय स्पृहयते
पशूनामीशानः प्रमदवनकङ्केलितरवे॥85॥
रम्य नयनानन्द
तेरे युगल चरणों में
नमन हैं
जो अलक्तक राग रंजित
रुचिर सुषमा के सदन हैं
पाद ताड़न की अभीप्सा ललक ले
जिस मंजुपद की
प्रमदवन के बीच संस्थित
हैं प्रमुग्ध अशोक पादम
देख पशुपति
हैं किया करते असूया
उस विटप से
नित नमस्कृति उन पदों में
हे नयनरमणीयचरणे!

मृषा कृत्वा गोत्रस्खलनमथ वैलक्ष्यनमितं 
ललाटे भर्तारं चरणकमले ताडयति ते
चिरादन्तःशल्यं दहनकृतमुन्मूलितवता
तुलाकोटिक्काणैः किलिकिलितमीशानरिपुणा॥86॥ 
मृषा भी सुन
गोत्रस्खलिता अन्य वनिता नाम की ध्वनि
भर्तृ शंभु ललाट
लज्जा विनत को
ताड़ित तुम्हारे कंज पद करते
मनोभव देख यह
चिरकाल पालित
शत्रुता शिव से
कलेवर दहन
करता विसर्जित
जो रही कंटक सदृश
चुभती सदा उसके हृदय में
छूम् छनन् छन् पजनी ध्वनि से
विजय करता ध्वनित निज
शिव हुताशनदग्ध मनसिज
प्रेमलीला चारिणी हे!

पदं ते कीर्तीनां प्रपदमपदं देवि विपदां 
कथं नीतं सद्भिः कठिनकमठीकर्परतुलाम्
कथं वा बाहुभ्यामुपयमनकाले पुरभिदा
यदादाय न्यस्तं दृषदि दयमानेन मनसा॥87॥ 
पद तुम्हारे कीर्तिदाता
पद
विपत्ति विनाशकारी
किस तरह कहते सुधी
यह कमठपीठ समान
कर्कश
दयासंयुत शंभु ने
किस भाँति
इस पद को स्वकर ले
कर दिया पाषाण पर स्थापित
रही समुपस्थिता जब
हर स्वकीय विवाह वेला
मृदुचरणपीठस्थली हे!

क्रमशः —

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