बुद्ध Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम् https://blog.ramyantar.com/category/नाटक/बुद्ध हिंदी ब्लॉग। साहित्य, भाषा, संस्कृति, लोक व शास्त्र से संयुक्त। कविता, कहानी, समीक्षा, निबन्ध, नाटक एवं अनुवाद का सहज प्रकाशन। लोक साहित्य का रंग भी। Sun, 30 Oct 2022 12:17:47 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.2 https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/03/cropped-favicon-4-32x32.png बुद्ध Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम् https://blog.ramyantar.com/category/नाटक/बुद्ध 32 32 करुणावतार बुद्ध: दस https://blog.ramyantar.com/2010/03/buddha-10.html https://blog.ramyantar.com/2010/03/buddha-10.html#comments Fri, 05 Mar 2010 18:35:00 +0000 करुणावतार बुद्ध- 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 के बाद प्रस्तुत है दसवीं कड़ी। करुणावतार बुद्ध (अगम्य-गम्य गिरि प्रान्तरों, कंदर खोहों तथा...

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करुणावतार बुद्ध- 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 के बाद प्रस्तुत है दसवीं कड़ी।

करुणावतार बुद्ध

(अगम्य-गम्य गिरि प्रान्तरों, कंदर खोहों तथा घोर विपिन में घूमते फिरते सिद्धार्थ के साथ लगी विद्वत मण्डली ने साथ छोड़ दिया। पंचभद्रीय विप्र उनके साथ लगे रहे। शयन-जागरण, उत्थान-परिभ्रमण सब में सिद्धार्थ एक ही चिन्ता में डूबते उतराते रहते-दुख क्या है, क्यों है, कैसे है और इससे निवृत्ति कैसे हो! कभीं सारी रात जल में खड़े रहते, कभीं नेत्र-प्रतिघातिनी सूर्य-किरणों को अपलक निहारते, कभीं कठोर आसन साधते, कभीं प्राणायाम में घंटो-घण्टों समय व्यतीत करते, कभी उपवास करते, कभी मौन रहते, कभी एक पादस्थिति में तरु शाखा पकड़कर खड़े रहते। कभीं समय निकलने पर संगस्थ विप्रों से मन की बातें करते, कभीं तत्व-चर्चा करते, कभीं फूट-फूट कर बिलख पड़ते, कभी पागलों-सा प्रलाप करते, कभीं कुछ गुनगुनाते, कभीं किसी को कुछ सुनाते-समझाते, कभी आकाश के विस्तार और उसकी गहन नीलिमा का अवलोकन करते, कभीं किसी गहन कूप की गहराई झाँकते, कभी खग-रव में अपना स्वर मिला देते, कभीं वन्यपशुओं को अपने गले लगाते, कभी आँखें मूँदे धूलि में लेट जाते, कभी आँखे अधमुखी छोड़ देते। इस प्रकार तपश्चर्या में कब दिन बीता, कब रात गयी, इसकी खोज खबर ही नहीं रहती। साथी ब्राह्मणों का संघट होने पर उनसे जीवन-चर्या, अध्यात्म-चर्या की दिशा-दशा निर्धारित करते। बीच-बीच में वार्ता-क्रम का विराम होता किन्तु उसमें भी उनका स्वगत भाषण चलता रहता । फिर वचन-प्रतिवचन की श्रृंखला प्रारंभ हो जाती।)

सिद्धार्थ: जीवन में दुःख क्यों है? धधकती हुई अग्निज्वाला को शीतल मणिमंडन समझ कर अंक में उठा लेना जैसे सुख का कारण नहीं हो सकता तथा हलाहल को सुधा समझ पी लेना जैसे अमरत्व का कारण नहीं है, वैसे ही विनाशी वस्तु को सुख समझकर अपनाने से सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती! एक ऐसी कोई सत्ता है जो समस्त परिवर्तनों में सदा एकरस है। उस को देखे बिना आंखें अतृप्त ही रहेंगी, उसके बिना हृदय की सेज सूनी ही रहेगी। उसका आलिंगन प्राप्त किये बिना बाहें फैली ही रहेंगी। उसको प्राप्त करने में ही जीव के जीवन की पूर्णता है। जिस जीवन का वह लक्ष्य है वहां सच्चा जीवन है।

एक ब्राह्मण: गौतम! आकाश में उड़ने के लिये केवल पंख ही आतुर नहीं होते, आकाश स्वयं निमंत्रण देता है कि कोई पंछी आये और मेरे उन्मुक्त व्योम में छलांग लगाये! हृदय के अंतर्देश में परमात्मा और उसके वहिर्देश में प्रपंच है। उभय-मध्य में संस्थित हृदय जब स्थूल प्रपंच का चिन्तन करता है तब क्रमशः जड़भावापन्न हो जाता है, और जब अन्तःस्थित चित्स्वरूप परमात्मा का चिन्तन करता है, तब चिदभावापन्न हो जाता है। हृदय को जड़ता के दलदल से निकाल कर चिदभूमि पर प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न ही तो साधना है। प्यारे! पानी की सार्थकता केवल इस बात में नहीं है कि मेघ बरसें बल्कि आदमी के कंठ में उसकी प्यास भी हो! वह पानी अर्थहीन हो जाता है, अगर उसे प्यासा कंठ न मिले।

सिद्धार्थ: विप्रवर! पानी की एक बूंद आकाश से मिट्टी पर गिर जाये तो वह धूल-धूसरित हो जाती है। वही पानी में गिर जाय तो अपना अस्तित्व मिटाकर उसी में समाहित हो जाती है। प्रवृत्ति के ही अनुसार फल। तप में, साधना में प्रवृत्ति ही दुख की आत्यंतिक निवृत्ति और परमानन्द की प्राप्ति को लक्ष्य करके होती है। जब तक लक्ष्य की सिद्धि न हो, तब तक साधना से निवृत्त हो जाना कायरता है। सुख और दुख अंतःकरण में होते हैं। अतः अंतःकरण को ऐसी स्थिति में ले जाना ही तपश्चर्या है द्विज, जिसमें उनका अनुभव ही नहीं हो! ऐसा जागरण ही तप है और यह करना ही होगा।

दूसरा ब्राह्मण: तरुण तापस! मेरी समझ में जीवन से बढ़कर जीवन का कोई मूल्य नहीं है। जीवन के सम्पूर्ण सौन्दर्य को परिपूर्णता के साथ जियो! जीवन के संगीत को सुनो। उठा लो जीवन की बांसुरी को, साध लो अंगुलियां। जीवन जीने की सार्थकता सोचा? क्यों है जीवन यात्रा?

सिद्धार्थ: जीवन यात्रा? विप्रवर! चलता रहता हूँ, पर वहीं रहता हूं। कहाँ रहता हूँ? जहाँ रहना चाहिये। कहाँ रहना चाहिये? स्वयं स्वरूप में। वह कैसा है- शांति स्वरूप और प्रकाश स्वरूप। चल में भी अचल होना चाहिये, यात्रा में भी स्थिर रहना चाहिये। पता नहीं यात्रा कब समाप्त हो जायेगी!

ब्राह्मण: तपश्वर्या तुम्हारे प्रश्नों का समाधान कर देगी, इसका क्या भरोसा? भावानुभाव की हत्या करके कुछ पा जाओगे, यह दुराशा है। अनुराग-उदधि में डूबो, विचार का बोझ विसर्जित कर दो। क्यों खोजने पाने का चक्रव्यूह रच रहे हो? क्या पाया तुमने अब तक? क्या मिटा सके तुम? तुम तो अपने आप को मिटा रहे हो। अनुपलब्धि के इस दुखान्तक खेल में हम तुम्हारे साथ नहीं रहेंगे। जगत दुख है, दुख है, मिथ्या है, मिथ्या है कहने से काम नहीं चलेगा।

(ब्राह्मण साथ छोड़ काशी की ओर प्रस्थान कर जाते हैं ।सिद्धार्थ व्यथित घूम रहे हैं ।) 

सिद्धार्थ: ओ विश्वविपदे! क्या तुम्हारा साम्राज्य अभेद्य है? मुझसे देखा नहीं जाता। कहाँ सुख-स्रोत खोजूँ?

(सिद्धार्थ माथ पीट-पीट कर गगन की ओर दृष्टि फैलाते हैं । आँखें अश्रुस्नात हैं । अधर विकंपित हैं । सहसा तपस्विनी दर्शित होती है ।)
 

तपस्विनी: देखो प्रिय! ज्ञान ही ज्ञान के लिये आतुर हो रहा है। स्वयं स्वयं का अनुसंधान कर रहा है। कैसी लीला है? कितना सुन्दर खेल है। जो खिलाड़ी है, वही खिलौना है और वही खेल है। देख भी वही रहा है। अपने खेल में स्वयं ही रीझ गया है। यही खेल की पूर्णता है। समय प्रतीक्षा कर रहा है तुम्हारे पकने की। जागो! अपने पास रहो! अपने सामने रहो! जो कुछ भी हो रहा है, वह विराट नाटक की एक अनादि नाटकीय योजना के अनुसार ही हो रहा है। चित् शक्ति लीला कर रही है।

संकल्प ही सारे प्रपञ्च का मूल् है। संकल्प ही न किया जाय! जो हो रहा है, होने दो! प्रिय! तुम संकल्पहीनता का अभ्यास करो! स्थिर हो जाओ! अभीं स्थिर हो जाओ! तुम स्थिर ही हो। तुममें गति है ही नहीं। तुम स्वयं पूर्ण हो! पूर्ण रहो! पूर्ण रहोगे! 

सिद्धार्थ: जो दिखायी दे रहा है, वह क्या है? यह दुःस्वप्न ही तो है। मुझे जो दर्शित हो रहा है, उसका परिचय?

तपस्विनी: दृश्य द्रष्टा से भिन्न नहीं है। अविद्या ने ही यह द्वैध उत्पन्न किया है। तुम असली स्वरूप में स्थित होकर दृश्य स्वरूप को समझ जाओगे! तपो, तपो!

सिद्धार्थ: सही है, सही है! तपना होगा! तपना होगा!  अंधेरे को कोसने से प्रकाश की किरणें नहीं फूट जातीं। विषाद करने से वायु का रुख नहीं बदल जाता। इसी क्षण में जीना होगा, और इसी क्षण में इतनी परिपूर्णता से जीना होगा, जैसे कि दूसरा क्षण कभीं होगा ही नहीं। पूरा अस्तित्व इसी क्षण में ही मौजूद है। प्राण मेरे! बैठो अपने पास!

(एक विशाल वट-वृक्ष के नीचे आसन लगाकर बैठ जाते हैं। घोर तपस्या करते हैं, अन्न-फलादि त्याग देते है। शरीर को सुखा रहे हैं।)

जारी…

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करुणावतार बुद्ध: नौ https://blog.ramyantar.com/2010/01/buddha-9.html https://blog.ramyantar.com/2010/01/buddha-9.html#comments Sat, 02 Jan 2010 18:23:00 +0000 करुणावतार बुद्ध- 1, 2, 3, 4, 5,6,7, 8 के बाद प्रस्तुत है नौवीं कड़ी… करुणावतार बुद्ध (ब्राह्मण उन्हें नहीं छोड़ते, घेर लेते हैं। सिद्धार्थ आगत...

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करुणावतार बुद्ध- 1, 2, 3, 4, 5,6,7, 8 के बाद प्रस्तुत है नौवीं कड़ी…

करुणावतार बुद्ध

(ब्राह्मण उन्हें नहीं छोड़ते, घेर लेते हैं। सिद्धार्थ आगत चेष्टा स्फूर्त उठ जाते हैं।)

सिद्धार्थ: क्या भवितव्य है? ये वैदिक विशद अनुष्ठान, यह कुटिल कर्मकाण्डीय वितंडावाद-  आह! मुझे कहीं चैन नहीं! कहाँ पथ है, कौन-सा पाथेय है!

ब्राह्मण: तरुण तापस! तुम्हें हमारी बात मृषा लग रही है? ब्राह्मणों का विरद विस्मृत है तुम्हें? देखो, ब्राह्मण का संकल्प बड़ा वजनदार होता है। मेरे साथ प्रारब्ध और पुरुषार्थ के खेल खेलो!

सिद्धार्थ: ब्राह्मण नाम किसका है? क्या जीव ब्राह्मण है? क्या देंह ब्राह्मण है? क्या जाति ब्राह्मण है?  क्या ज्ञान ब्राह्मण है, क्या कर्म ब्राह्मण है? अथवा, क्या धार्मिक व्यक्ति ब्राह्मण है? जीव ब्राह्मण है, ऐसा हो नहीं सकता, यदि हो सकता तो सभी शरीरों को ब्राह्मण मानना पड़ेगा।  देंह ब्राह्मण है, ऐसा भी नहीं हो सकता, चाण्डाल से लेकर अन्य मनुष्यपर्यन्त सबके शरीर पंचभौतिक होने से एकरूप ही हैं। जाति ब्राह्मण है, ऐसा भी नहीं हो सकता, विभिन्न जाति वाले प्राणियों से अनेक जातिवाले बहुत से महर्षि उत्पन्न हुए हैं। तो क्या ज्ञान ब्राह्मण है? नहीं! बहुत से क्षत्रिय आदि अन्य भी परमार्थ को जानने वाले तत्वज्ञ हुए हैं। कर्म ब्राह्मण है, ऐसा भी नहीं, सभी प्राणियों को कर्मों से प्रेरित होकर क्रिया करते देखा जाता है। फिर क्यों ब्राह्मण-ब्राह्मण रटे जा रहे हो! ब्राह्मण नाम किसका है? मैं चला, आप अपनी ब्राह्मणी लकुट कमरिया सम्हालें!

(सिद्धार्थ उस समाज से विदा लेते हैं। रात्रि का पूर्वार्ध है। रात्रि के अंधेरे की परवाह नहीं करते हुए चले जा रहे हैं। कठोर श्रम से शरीर श्लथ है। फिर भी चलते जा रहे हैं।  एक अनिर्वच उत्साह भर गया है मन में ! कई रातें,  कई दिन वन-वन भटकते, गिरि गह्वरों की खाक छानते बीतते हैं।  लक्ष्य अप्राप्त है। द्वंद्व अभी भी गया नहीं है..)

सिद्धार्थ: किस कंदरा से क्लेश-निवृत्ति का रसायन खींच लाऊँ! किस अटवी से आनंद का अमृत प्राप्त करूँ! किस उपत्यका से अनासक्ति का श्रोत पाऊँ! किस नभ से निर्वाण की विद्युत लेखा का आहरण करूँ! किस सिंधु से सम्यक बोध का संधान पाऊँ! किस शैल माला से शांति का खजाना तलाशूँ! प्यासे मृग की तरह दौड़ रहा हूँ। मृगशावक सदृश सुपुत्र छोड़ा, मृगाक्षी जीवनसंगिनी छोड़ी, अमरावती-सी कपिलवस्तु छूटी, पुर छूटा, प्रियजन छूटे- सब छूटे! छूटा नहीं तो सिद्धार्थ का भटकाव। बंद तो आँखें हैं, पर अमंद कोलाहल का आवर्त जागृत है। क्या करूँ-

“इतो न किंचित, परतो न किंचित
यतो यतो यामि ततो न किंचित ..।”

प्रातः होने को है! रात्रि पिशाचिनी-सी थी! प्राची का लाल मुँह जैसे रक्त-स्नात महाकाल का है। क्षय की विजय पताका लहरा रही है। अक्षय का अवगुंठन हटाने को व्याकुल हूँ। पागल हूँ, पागल ही हूँ मैं। मेरा न गुरु, न प्रकाश, न पंथ!

(सिद्धार्थ व्यथित हैं, तभी भोर के प्रकाश में एक सरोवर दिखता है। स्नान करने को प्रवृत्त होते हैं। देखते हैं, एक गिलहरी बार-बार जल के पास जाती, उसमें अपनी पूँछ डुबाती और फिर पूँछ निकालकर बाहर रेत पर झटक देती है। झील को सुखाने का प्रयास है यह उसका , पूछने पर पता लगता है गिलहरी से। सोचने लगते हैं….)

सिद्धार्थ: जब यह तुच्छ नगण्य जीव अपने मनोबल से नहीं डिग रही तो मैं कैसा साधक कि क्लांत-श्लथ हो रहा हूँ! मर जाऊँगा, पर बिना बोध के विराम नहीं लूँगा! चलो गौतम- “तपतु”!

(सहसा प्रकाश बिखेरती तपस्विनी दृश्य होती है।)

तपस्विनी: सिद्धार्थ! ’मा विरम’, “तपसा देवा मृत्युमुपाघ्नयता”। तपो, तपो, तपो! मैं जानती हूँ तुम्हारा अभिप्रेत्य! उन्तीस वर्ष की उम्र में ’यश की धारा’ (यशोधरा) को छोड़ कर आये हो, अब ’धरा का यश’ तुम्हारी बाट जोह रहा है।

ध्यान से सुनो मेरी बात! मैं वही रमणी शक्ति हूँ, जो ’विश्वस्य शक्तिः परमासि माया’ है। सूनी कोख महामाया की गर्भगुफा  में तेरा सर्जक मैं ही हूँ। लुम्बिनी वन में वृक्ष की डाल पकड़कर खड़ी हो गयी थी वह और तुम अदभुत बालक सहज ही प्रसूत होकर सत पद चल पड़े थे, और प्रतिपद पर प्रस्फुटित कमल पुष्प खिल गये थे। वहाँ मैं ही थी! मैंने कहा न कि मैं तुम्हारे जीवन के महाकाव्य की सरस पंक्ति हूँ जो तुमसे अभी अपठित हूँ।

सिद्धार्थ: हे अदभुत रस की उद्घोषिका! हर आह में टपकी हुई मेरी विमला सलिल बिन्दु ही तो नहीं हो तुम?

तपस्विनी: क्यों घबरा गये! सुनो, अपना दीपक आप ही बनना है तुमको! तिमिर का व्यूह भेदना है। कैसा विराम, कैसा विश्राम, कैसी क्लांति, कैसी भ्रांति! तुम्हारे समान बस तुम्ही हो। पहले ही दिन जिस दिन तुमने जीवन का पहला प्रभात देखा, हर्ष से सर्वप्रथम ताली बजाने वाली मैं ही थी। मैं इस तट पर तो हूँ ही, उस तट पर भी तुमसे फिर भेंट होगी। तुम्हारा मूलाधार हूँ, तुम्हारा सहस्रार हूँ। मैं तुम्हारी इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा हूँ। मैं कौन हूँ, मैं कौन नहीं हूँ, मत पूछो..!

(तपस्विनी ओझल हो जाती है।)

सिद्धार्थ: तपस्विनी ने तो हर दुखती रग पर अपनी अँगुली रख दी। चलो मेरे प्राण! तपो, तपो! गौतम अब पीछे नहीं मुड़ेगा।

(आगे बढ़ते हैं, और घने वन में प्रवेश कर जाते हैं।)
क्रमशः-

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करुणावतार बुद्ध: आठ https://blog.ramyantar.com/2009/12/buddha-8.html https://blog.ramyantar.com/2009/12/buddha-8.html#comments Sun, 27 Dec 2009 06:13:00 +0000 करुणावतार बुद्ध- 1, 2, 3, 4, 5 ,6, 7 के बाद प्रस्तुत है आठवीं कड़ी… ब्राह्मण: इतनी विकलता क्यों वैरागी? परास्त पौरुष और आत्मघाती अधैर्य...

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करुणावतार बुद्ध- 1, 2, 3, 4, 5 ,6, 7 के बाद प्रस्तुत है आठवीं कड़ी…

ब्राह्मण: इतनी विकलता क्यों वैरागी? परास्त पौरुष और आत्मघाती अधैर्य के वशीभूत क्यों हो गये? तुम्हारा मन तो जैसे नदी के दूसरी ओर के अँधियार के सदृश हो गया है। कहने के लिये उस पार, सहने के लिए इस पार! अरे तरुणतापस! कुछ दिन रहो हमारे पास! यज्ञाग्नि की ऊष्मा से अपनी जड़ता जाड़ को तोड़ने का यत्न करो! सत्संगति की सुरभि से अपनी जीवन बगिया मँह-मँह करो!

सिद्धार्थ: जगत की जिस जटिल पहेली  ने मुझे आक्रान्त कर लिया है, उसे निर्मूल करें ब्राह्मण देव! दुख है तो क्यों है और वह मिटे कैसे ? व्यापक विश्वयातना से त्राण कैसे मिले? आप मेरी विकलता समझें! मुझे दिशा दें। मेरा आलोक बनें। मेरी विचलित उद्विग्न मति को स्तिथ प्रज्ञा का पाथेय दें।

ब्राह्मण: मनुष्य की बुद्धि बहुत थोड़ी दूर तक देख सकती है। जीवन की अखिल योजना परमात्मा के हाथ है। उसी को पूरी ज्यामिती का पता है। हमारे सम्पूर्ण जीवन के पूर्ण चक्कर को वह, केवल वही देख सकता है। पता नहीं कितने युगों से किस-किस रूप में हमारे जीवन की धारा बहती चली आ रही है। पता नहीं कैसे कैसे व्यतिरेक, विषमता, बाधा, दुख, आनंद, पुलक आदि में प्रवहित होती चली जा रही है और अनंत अंबुधि के वक्षस्थल में अपने को लय करके अपने स्रोत में सुख से सो जायेगी। हमारे इस जन्म के पहले भी तो हमारा जीवन-प्रवाह था और मृत्यु के अनंतर भी तो वह बना रहेगा। क्या उसे हम समग्र रूप में देख सकते हैं? हमारा देखना अधूरा है, अपूर्ण है, अस्त-व्यस्त है, खंडित है, विकृत है। अतः ’क्या’, ’कैसे’, ’क्यों’ की हम व्यर्थ चिन्ता करके व्यग्र क्यों हों? भविष्य को जिसने रचा है, वही उसकी सँभाल भी करेगा। तुम जिस गोरखधंधे में उलझे हो, जिस उलझन को सुलझाना चाहते हो उसमें और उलझना, सिर खपाना बच्चों-सी मूर्खता नहीं तो और क्या है!

दूसरा ब्राह्मण: और अरे सुदर्शन! जन्म-मरण के चक्रव्यूह को बेधने वाला अभिमन्यु कभीं पैदा ही नहीं हुआ। जिसने इसे रचा है, वही इसका रहस्य जानता है और उसी के साथ हम भीतर प्रवेश भी कर सकते हैं। प्रभु की शरण लो! उसके प्रकाश के बिना इस घोर तिमिर में एक डग आगे बढ़ना खतरे से खाली नहीं है। हृदय में उसकी मूर्ति, चित्त में उसकी स्मृति, प्राणों में उसकी प्रीति- यही तेरे प्रश्न का उत्तर है, तेरी समस्या का समाधान है, तेरी उलझन की सुलझन है। जिस प्रभु  ने गर्भ से तुम्हारी रक्षा की, जो प्रतिपल तुम्हें सम्हाल रहा है, क्या वह भविष्य में तुम्हें निराधार छोड़ देगा? एक पल भी उसके सहारे के बिना तुम टिक सकोगे? अतः उसकी चरण शरण ही कल्याणी है।

सिद्धार्थ: हाय रे , नर की दुर्बलता, दुर्दशा! वह बुरी तरह भाग रहा है शान्ति के लिये, आनंद के लिये, परितृप्ति के लिये और मिलता है उसको बदले में दुख, अशांति, ज्वाला, विछोह! नहीं समझ पा रहा हूँ आपकी प्रभु, परमात्मा, ईश्वर, आत्मा, समर्पण, सत्संग, प्रार्थना, परिक्रमा, शोध, बोध, विज्ञान, विश्वास, नीति, अनीति की बातें। अब तक कहाँ सोया है वह यदि परमात्मा है तो! अब तक क्यों खोयी है वह यदि आत्मा है तो! अब तक क्यों निरानंद हैं दिशायें यदि वह आनंद है तो! आप का यह यज्ञ-विधान, कर्मकाण्ड, वाह्याचार, आपकी स्वाहा-स्वधा सब आपको मुबारक हो! मेरा समाधान यहा नहीं है। मेरे चरण इस परिक्रमा के लिये नहीं बने हैं। बहुत हो गया। वसुधे तेरी पीर की प्रकृति ये हविष्य-भोजी पंडे-पुजारी नहीं जान सकते हैं। जगत दुखहारी यदि कोई ’हरि’ है तो हमें अपना परिचय दे, परिचय दे!

(दोनों हाथ उठाकर फूट-फूट कर रोने लगते हैं। )

ब्राह्मण: अरे योगी! दीख पड़ने वाली विपरीतता और प्रतिकूलता में जब ’जीवनधन राम’ का छिपा हुआ हाथ दिख जाय तो फिर हँसे बिना नहीं रह पाओगे! स्वांग में छिपे हुए देवता का सभी रूप हृदय को लुभाने वाला है। चाहे वह जिस रूप में आये, उसके चरण सदैव तुम्हारे हृदय पर ही रहेंगे। यह तो युद्ध-क्षेत्र है प्यारे! यह तो कर्मभूमि है! इसमें कैसा घबराना? तुम उसके विराट अभिनय के एक पात्र हो! बैठो मेरे पास! “महाजनो येन गतः सपंथा।”

सिद्धार्थ: मैं बंधन-क्रंदन कुछ भी नहीं मानूँगा। दिशा नहीं देखूँगा, दिन-क्षण नहीं गिनूँगा। मैं तो उद्दाम पथिक हूँ।

(आँखें मूँद लेते हैं। अंतराल में पूर्वदृष्टा तपस्विनी प्रकट दिखायी पड़ती है। वह आगे बढ़ने का अंगुलि निर्देश करती है। उसकी मधुर प्रेरक हँसी में अमृत-वर्षण है। सिद्धार्थ बड़बड़ाने लगते हैं-)

नई दिशा का स्वर्ण द्वार खुलने में अभी कितनी देर है। बचें या मरें, नाव खे कर पार ले जाना है। पृथ्वी का जितना दुःख है, पाप है, जितना अमंगल है, जितनी हिंसा है, जितना हलाहल है- सब तरंगित हो उठे हैं मेरे सामने। फिर भी नाव खे कर ले चलनी है। अखिल विश्व के दुख-दुरितों के हाहाकार में अनंत आशा को चित्त में लेकर जाना है, जाना है, आगे जाना है।

(तपस्विनी फिर मुस्करा कर अंगुलि का इशारा करती है ।)

ब्राह्मणों रख दो अपनी निन्दा-स्तुतिवाणी! रखे रहो अपने साधुत्व का अभिमान! मुझे प्रलय-पयोधि पार करना है। नये सृजन की नई विजय-ध्वजा फहराना है।

ब्राह्मण: चेतो तरुण वयस! ’हरिं नराः भजंति येति दुस्तरं तरंतिते।” हठवादी नहीं बनो!

सिद्धार्थ: (आँखें बंद किये ) आदेश आया है। बन्दरगाह का समय समाप्त हुआ। अज्ञात समुद्र के तीर पर अज्ञात है वह देश। वहीं के लिये प्रचण्ड आह्वान जग उठा है। टूट पड़े आँधी, उमड़े तूफान, सिद्धार्थ को तीर पार कर अज्ञात देश जाना है।

(तपस्विनी मुस्करा कर अँगुलियाँ हिला रही है। सिद्धार्थ उस मंदस्मित में खो गये हैं।)
अगली प्रविष्टियों में जारी….
Photo Source: Scan from Frontline (Dec.18, 2009).

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करुणावतार बुद्ध: सात https://blog.ramyantar.com/2009/12/buddha-7.html https://blog.ramyantar.com/2009/12/buddha-7.html#comments Sat, 19 Dec 2009 18:33:00 +0000 करुणावतार बुद्ध- 1, 2, 3, 4, 5 ,6 के बाद प्रस्तुत है सातवीं कड़ी- पंचम दृश्य (राजकुमार सिद्धार्थ गहन निराशा और विषाद के बोझ में दबे...

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करुणावतार बुद्ध- 1, 2, 3, 4, 5 ,6 के बाद प्रस्तुत है सातवीं कड़ी-

पंचम दृश्य

(राजकुमार सिद्धार्थ गहन निराशा और विषाद के बोझ में दबे मंथर गति बढ़े जा रहे हैं। स्थान अज्ञात, दिशा अज्ञात और लक्ष्य अप्राप्त है। अभी वही वन प्रांतर है)

सिद्धार्थ: सारी रात अज्ञात पथ पर भटकता रहा। सोच रहा था पर्याप्त दूरी को मेरे चरण नाप चुके होंगे, किन्तु दिनमणि की किरणों में साफ दिख रहा है कि अभीं तो वही बीहड़ वन-वीथि  है। अभी वही तरु-संकुल वनप्रांतर है जहाँ अनजाने कहाँ खोया, सोया द्वंद्वाक्रांत मन शाश्वत सुख की तलाश में तड़प रहा है। लगता है मैं स्वयं से ही मात खा गया हूँ अब और अपनी ही धमनियों के उबलते रक्त से स्नान कर रहा हूँ।

(कुछ ही दूरी पर एक तरु-तृणाच्छादित पर्ण कुटीर से छनकर कुछ स्वर सुनायी पड़ रहे हैं। कुछ वैदिक कर्मकाण्डरत द्विज शास्त्र-चर्चा में रत हैं। यज्ञ के धुँएं का आवर्त दृश्य हो रहा है। सिद्धार्थ स्वतः ही उधर पग बढ़ा देते हैं। इन्हें याज्ञिक ब्राह्मणों का दल घेर लेता है।)

ब्राह्मण: अरे ओ तरुण तपस्वी,  आ जा हमारे साथ! किस कुटुम्ब की भरी-पूरी कोख में शून्यता भरी है तुमने। तुम तो अदभुत पुरुष लग रहे हो। घुँघुराली भ्रमरवत अलकें चन्द्र-भाल को चूम रही हैं। कर्णांतदीर्घ लोचन हैं। आजानुबाहु, विशाल वक्ष और वृषभ-स्कंध तुम्हारे महापुरुष होने की कहानी कह रहे हैं। देख रहा हूँ तुम्हारे उत्तम ज्योतिषीय लक्षण। अपना परिचय दो! ओ अनाहूत अभ्यागत! हमारी उत्सुकता शान्त करो।

सिद्धार्थ: वन्दनीय देव! मेरा परिचय आप इतना ही समझ लें कि मैं मनोरथों के निर्गंध पुष्प एकत्र करने वाला व्यथित प्राण युवा पुरुष हूँ। कभी कहीं का राजा बनने वाला मैं, जब विश्व पीड़ा पुकारने चली आयी, तो उसका त्राण करने दौड़ पड़ा। पुर, परिजन छोड़ते नहीं थे। उनकी अनगढ़ अर्गला तोड़ कर निर्जन निशा में खुले आकाश के नीचे निकल आया हूँ। मैं चिर सुख का अमृत-कलश खींच लाने के लिये निकला हूँ, दिशा-दिशा में उड़ जाना चाहता हूँ इस निमित्त। आकुल हैं प्राण धरती को जरा, व्याधि, विपन्नता, मरण से मुक्त करने के लिये।

ब्राह्मण: हे राजकुमार! कर्म प्रशंसनीय़ वही हो सकता है जो किसी प्रशंसनीय़  उद्देश्य का साधक हो। तुम्हारी थकी हुई वाणी बता रही है कि तुम्हारे बार-बार द्वार थपकाने पर भी तुम जो ढूँढ़ रहे थे, वह मिला नहीं। फैली हुई तेरी अँजुरी में दिव्य-वरदान का सुमन खिला नहीं। क्या द्वार सभी जानते हो? मरुभूमि में पानी की खोज में इधर-उधर दौड़ना बुद्धिमानी का काम नहीं। जगत के स्वरूप को पहचानने का यत्न करो। जब वह झूठा प्रमाणित हो जाय तो अपनी कार्यशैली को तदनुरुप बनाने का प्रयास करो। प्रकृति के चिरन्तन, शाश्वत नियमों से सब आबद्ध हैं। काल-चक्र की गति से कौन बचा है?

सिद्धार्थ: विप्रवर! यदि मेरी वीणा भग्नतंतु है, तो क्यों? क्यों मस्तक झुका हुआ है, चरण विजड़ित हैं? मेरा जहाँ कोई नहीं है वहाँ से क्यों लगता है कोई मुझे पुकार रहा है? मुझे बताओ! मैं अगणित जन्मों में कहाँ-कहाँ जन्मा हूँ, किन-किन लोकों की यात्रा की है, किन-किन सुख-दुखों से दो चार हुआ हूँ! कैसे समाप्त होगी यह विश्व-वेदना? कौन करेगा?

सिद्धार्थ गौतम बुद्धब्राह्मण: ओ तरुण! तूँ यहाँ आँखों के नीर से नहीं, शान्ति से खेल। तूँ यहाँ विषाद से नहीं, आह्लाद से पुलकित हो! स्वप्न की गोद में नहीं, सत्य के कंधे पर बैठ। पश्चाताप का नहीं, प्रेम का आलिंगन कर! तुझे वियोग का बटोही नहीं, संयोग का तीर्थंकर बनना चाहिये। न जाने कब से कितनी मृत्युओं के द्वार को लाँघता यह जीवन चलता आया है। न जाने कितनी बार और इस मृत्यु के पार-द्वार जाना पड़ेगा। दीख पड़ने वाली विपरीतता और प्रतिकूलता में जब ’जीवन-धन’ का छिपा हुआ हाथ दिख जाये तो फिर हँसे बिना रहा कैसे जायेगा! यह तो युद्धक्षेत्र है प्यारे! यह तो कर्मभूमि है न! इसमें घबराये कि गये!

भविष्य की ओर से निश्चिन्त हो जाना ही वर्तमान को आनंदमय बनाना है। हमें देखो! हमारी इस निश्चिन्तता और अलमस्ती की तह में प्रभु पर अखंड निर्भरता है। उसकी वात्सल्यमयी गोद में अपने को डाल देना है। उसके विशाल वक्षस्थल में अपने को छुपाकर, सब ओर से आँखें मूँदकर, माँ की छाती का दूध पीना है, और लोक-परलोक सब भूल जाना है। जननी से एकाकार हो जाना है। यहाँ जगत या जगत व्यथा को स्मरण करने का कैसा यत्न! माँ के स्तन से मुँह लगाया कि संसार मिटा, फिर भविष्य की निगोड़ी चिन्ता और लोक-परलोक का अस्तित्व ही कहाँ रहा? तुम तो सदा-सदैव उसकी शीतल गोद में सुरक्षित हो। वह तुम्हें अपनी छाती में छिपाये हुए चुम्बनों की वर्षा से तुम्हारे रोम-रोम को नहला रही है। भविष्य के गर्भ में क्या है, भावी क्या है, इसकी चिन्ता करने वाले हम कौन?

सिद्धार्थ:  हर दिन की पुनरावृत्ति एक हानि जैसी लग रही है, जैसे उसने कुछ मेरा छीन लिया। आज फिर आकर वह कल की कहानी में जुड़ गया। हे विप्रवर! सामने क्षणिक सुख की मृगमरीचिका दिखाकर दुख के आवर्त में डुबो देने वाले दिन को जी करता है हाथ बढ़ाकर पकड़ लूँ, और उसकी छाती चीरकर समयातीत आनंद की अक्षय थाती हथिया लूँ।  यह देखिये सामने, कितने स्वाधीनभाव से फुदक रहा है यह शुक! उसे भय नहीं है। इतने पास आकर वह चारा चुग रहा है। यह स्वाधीनता उसकी निजी सम्पत्ति है। इसने यह मुक्तता, यह अभय कहाँ से पाया? जिधर फुदक-फुदक कर जाना चाह रहा है, उधर जा रहा है। क्या यह सच बखान रहा है कि समय को मत कोसो। समय सुन्दर है।

ब्राह्मण: तुम्हारा वह परम आराध्य कौन है जिसके हित यह योगी वाला फेरा है। तुम्हारी वह वेदना क्या है जो तुम्हारी वाणी में गूँज रही है? तुम्हारी स्मृति में वह कौन है जो तुम्हारे संकल्पों को मथ रहा है? प्रेम से भी मधुर तुम्हारी कौन-सी निधि है? बताओ तो सही वासना से विसु्ध और विछोह से गीली अपनी उपलब्धि-तृषा को!

सिद्धार्थ: विप्र! मैं उस निरपेक्ष तत्व को कौन-सी भाषा दूँ  जिसकी मुझे खोज है। वह हमारी परिभाषा में नहीं बँध सकता। सीमा से असंपृक्त उस महाकाश की टोह लेना चाहता हूँ, जिसमें दिशायें जन्म लेती हैं और काल बहता है। जिसमें सृजन, प्रलय, बन्धन, अंधकार, पाप, पुण्यादि सब तिरोहित हो जाते हैं। मुझे दुःखान्तक खेल का अंत और सुःखान्तक खेल का प्रकाश करने वाले सर्व-सर्वत्र के जागरण की ललक है, तृषा है, व्यथा है। क्या मुझे उस लोक का दर्शन करा देंगे! मैं तो आगत विगत अनागत के उस उत्स को आक्रान्त कर देना चाहता हूँ जिससे दुःखान्त लीला की कल्लोलिनी प्रवहमान है।

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करुणावतार बुद्ध- 1, 2, 3, 4, 5 के बाद प्रस्तुत है छठीं कड़ी-

करुणावतार बुद्ध

सिद्धार्थ: यह कौन-सा अतलान्त स्पर्श मेरे मन-प्राणों को छूकर चला गया है! यह कैसा मृदुल स्पर्श मेरे सिर को शीतलता प्रदान कर रहा है!  यह किसका चुम्बन मेरे कपोलों से आ जुड़ा है! लगता है मेरी जन्मदात्री माँ और पालनहार पिता, दोनों मेरे समीप आ गये हैं। ओ ज्योतिर्मय स्वर! मैं तुम्हें नमन करता हूँ। तुम्हारी पंक्तियाँ ध्वनित कर रही हैं- “मुझे शब्द दो !” तुम्हारे शब्दों की टेर जैसे मुझे घेर कर कह रही है- “मुझे अर्थ दो”, और अर्थ उत्कंठित होकर गुहार कर रहे हैं- “मुझे सार्थकता दो !” तुम्हारी दृष्टि मुझे सहला-सहला कर कह रही है- ’दृष्टि को विस्तार दो! क्षण को विराट बना दो! कर्मधारय बनो! ओ रे, अव्ययीभाव, द्वंद्व को निस्तार दे दो!’

नहीं, नहीं, ऐसे अब हम नहीं रहेंगे। एक पल भी और अब हम नहीं सहेंगे। अब नहीं मुड़ेंगे, न किसी तट से जुड़ेंगे। आगे बढ़ेंगे, बढ़ेंगे, बढ़ेंगे।

(वनदेवता की वाणी तरु-तरु, तृण-तृण से अनुगुंजित होती है। सिद्धार्थ अवाक खड़े रह जाते हैं। उनकी आँखों से दो बूँद छलक जाती है।)
Karunavatar_Buddhaवनदेवता: महामना! समय के रंध्र से अपने विजय-रथ को निकालो! तुम्हारे अनेक जन्मों के पुण्य तुम्हारे मर्त्य-जीवन में यश और वैभव बन कर उगे थे। तुम्हारे पूर्व-जन्मों की कृतियाँ ही इन लोकों में बिखरी हैं। तुम्हारे तप की स्मृतियाँ, तुम्हारे धर्म की पताकायें अनेक लोकों में लहरायेंगी। तुम्हारे पूर्वजन्म के कलुष, संशय, काम-क्रोध, मोह, लोभ के संस्कार जो तुम्हारे मर्त्य जीवन की अर्गलायें थीं, वे अब स्वप्न की तरह बिखर जायेंगी।  तुम्हारा चैतन्य-विलास विश्व की अज्ञान से अंधी आँखों का काजल होगा। ओ तेजस्वी तनय! तुम्हें आशीर्वाद दूँ इस के पूर्व मेरा सजल प्रणाम स्वीकार करो!
सिद्धार्थ: मैं अखिल धरा की पीड़ा का शमन कर सकूँ, यह वर दो। सारा संसार दुखी है, दुखमोचन कर सकूँ।
वनदेवता: ओ विभूति! तुम चले ही इसीलिये हो। सब होगा, सब होगा। तुम्हारे चरण नहीं हारेंगे। बढ़े चलो,चढ़े चलो। तिमिर-गुहा को चीर-चीर ज्योति-पंथ प्रशस्त करो! जो पिछली मोड़ पर छूट गये, जो तपती रेत से घबरा कर ठिठक गयेम ओ पथिक! उन सबके लिये तूँ आज राह ढूँढ़ दे।
(अरुणोदय आसन्न है। प्रातः विहंग की ध्वनि सुनायी पड़ती है। सहसा वन-प्रांतर अदृश्य हो जाता है। ब्राह्मणों की एक जोड़ी पुष्करिणी में स्नान कर सिद्धार्थ के समीप आ जाती है।)
पहला ब्राह्मण: ओ बटोही! पलभर तो ठहर, जरा मेरी भी सुन लो! तुम राजकुमार हो, मुझे पता है। यह भी पता है कि तुम किस पीड़ा का वरण किये त्वरित चरण चले जा रहे हो। सुनो, सुनो! जीवन की शाश्वत मान्यतायें जीवन की आदर्शोन्मुखी भावना से ही संभावित हैं। वैष्णवी वृत्ति लेकर भक्ति-मार्ग का वरण करो! ईश्वरावलम्बन ही मार्ग है।
दूसरा ब्राह्मण: चिन्तन की बंजर भूमि में क्यों कदमताल करने चल पड़े हो! हरि से नेह लगाओ! “हरि से लागा रहु रे भाई, तेरी बनत-बनत बन जाई!”
सिद्धार्थ: मेरे प्रश्नों का उत्तर दो विप्रवर! क्या रोग, जरा, व्याधि  दुख को मिटाना मानव का अभिप्रेत नहीं! क्या तुम यह कर सकते हो? अब शास्त्रार्थ का समय नहीं है।
(सिद्धार्थ उनसे हाँथ छुड़ा, मुक्त होकर आगे बढ़ जाते हैं।)

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करुणावतार बुद्ध: पाँच https://blog.ramyantar.com/2009/12/buddha-5.html https://blog.ramyantar.com/2009/12/buddha-5.html#comments Wed, 09 Dec 2009 07:41:00 +0000 करुणावतार बुद्ध- 1, 2, 3, 4 के बाद प्रस्तुत है पाँचवीं कड़ी- (चतुर्थ दृश्य ) (सिद्धार्थ तीव्र गति से चले जा रहे हैं  गहन रात्रि...

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करुणावतार बुद्ध- 1, 2, 3, 4 के बाद प्रस्तुत है पाँचवीं कड़ी-

(चतुर्थ दृश्य )

(सिद्धार्थ तीव्र गति से चले जा रहे हैं  गहन रात्रि है। सहसा आकाश में बादल उमड़ आते हैं, और रिमझिम बूँदाबादी होने लगती है। वे बलात खिंचे-से चले जा रहे हैं, कोई स्वर जैसे उन्हें पुकार रहा है। )

वनदेवता: चलो सिद्धार्थ! तुम्हें वहाँ तक जाना है, जहाँ निखिल यात्रा विश्राम बन कर थम गयी है। जहाँ दिशाओं का स्वप्न नहीं जगा है। जहाँ काल अपने पंख समेट कर सोया है और जहाँ जीवन अमृत का छन्द बना गुंजरित है। तुम्हारी यात्रा वहाँ तक है।

सिद्धार्थ: ओ अमृतकंठ! कोई अंध ज्वाला मेरे प्राणों में लिपटी जा रही है। क्षण भर पहले का स्फुरित पद-न्यास श्लथ हो गया है। पर मैं चल निकला तो चल निकला। निशीथिनी तमिस्रा के दुकूल में धरती लेटी है। पावसी घन चातक को रुलाये दे रहा है। बूँदों से प्रक्षालित पौधे मन मारे नमित खड़े हैं। जुगनू ऐसे लग रहे हैं जैसे तड़ित तरुओं के प्राण निकल रहे हों। बरबस मुझे कोई गहन वन में खींचे चले जा रहा है। गौतम की गति को कौन और क्यों प्रभावित कर रहा है! यह कैसी कल्पनातीत अवस्थिति है, जैसे काल ने सम्पूर्ण वेग से अपना रथ चला दिया है और मैं इस निविड़ता में बहा चला जा रहा हूँ।

वनदेवता: ओ ब्रह्माण्ड  को ज्योतित करने निकले अमल ज्योतिपुंज! ओ अनंत के अभ्र! अपनी तृषित धरती को अमृत दो। बोध-स्रोतस्विनी की सदानीरा धारा सृष्टि को नहला दो। कृतार्थ कर दो जगत की चिर अभिलषित निर्वाण-पीठिका को! कुछ ही कदमों पर एक तपस्विनी का कुटीर तुम्हारी प्रतीक्षा में कब से मुक्त कपाट है। दो प्रवीण ब्राह्मण तुम्हारे संग चलकर पथ-दर्शन करेंगे। मैं वनदेवता तुम्हारा आह्वान कर रहा हूँ।

Buddha

(एक पर्ण-कुटीर दृष्टिगत होती है। वहीं एक मंदस्मिता श्वेतकेशा श्वेतवसना दिव्य नारी बैठी हैं। सिद्धार्थ सादर प्रणाम करके साश्चर्य उस रात्रि में ज्योतित करती  नारी-मूर्ति को निहारने लगते हैं।)

सिद्धार्थ: ओ ज्योतिर्मयी! कौन हो तुम? ओ तरल स्नेहा! कौन हो तुम?

तपस्विनी: वत्स! अभी मैं तुम्हारा वह पता हूँ, जिसे तुम नहीं जानते। मैं वह नेपथ्य हूँ जिसे तुम्हारी आँखें अभी देख नहीं पातीं। सुनो!  मैं तुम्हारे जीवन के महाकाव्य की सरस पंक्ति हूँ। तुम मेरा परिचय स्वतः ही पा जाओगे जब कभीं कोमल कातर कामनाओं से तुम्हारा पद्मगात्र कलुषित होने लग जायेगा, जब क्षुद्र विजय-पराजय का हर्ष-विषाद तुम्हारे करुणा-कलित अंतर को तृषित कर देगा। मैं उस तपोदेश की आत्मा हूँ जहाँ अपावन अश्रु नहीं उगते। मैं उस शून्य की रत्नगर्भा धरित्री हूँ, जहाँ आलिंगन का सुख नहीं। उस निर्वेद की तटवासिनी हूँ जहाँ स्मृतियों का मेला नहीं लगता। तुम्हें तुम्हारी संपदा की खबर देने को ही इधर खींच लिया कि दिग्भ्रमित न होना।

सुनो सत्यसंध! तुम अनेकों बार इन नक्षत्र लोकों के यात्री रहे हो। सुनो बोधरूप! अगणित लोकों में तुम्हारे असंख्य परिचित तुम्हारे तेज-वलय में विलीन हो उठे हैं। मैं तुम्हारे अभिनंदन में ही खड़ी थी। निर्भय होकर आगे बढ़ो। बाधाओं की भीड़ मिलेगी- संगी मत बन जाना! अकेलेपन का बल पहचानना। मैं साथ रहूँगी। मैं तुम्हारे अनंत जीवन की तपस्या हूँ। मैं तुमसे कभी अलग नहीं हूँ। मेरा परिचय तो तुम्हें मिलेगा ही जब तुम परम-पुरुष के संकल्पों के साथ एकाकार हो जाओगे। फिर क्या रह जायेगा तुम्हारे लिये पाना। तुम्हें मेरा परिचय तब मिल जायेगा जब तुम मेरे सर्वरूप के महातीर्थ में निमज्जित हो जाओगे। मैं तुम्हारे पीछे लगी रहूँगी तुम्हारी सुदक्षिणा संगिनी। उठो, चलो!

यह लो, तुम्हारे श्रद्धालु उर, करुणार्द्र चित्त, विरक्त प्राण के बदले यह ज्योतियों की माला है। इसकी दिव्य सुरभि न तुम्हें थकने देगी, न भ्रमित होने देगी। सुनो! जो प्रतीत होता है, वह पूर्ण नहीं होता।  चले चलो! विरमो मत!

(अदृश्य हो जाती है। सिद्धार्थ विमुग्ध हैं।) 

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करुणावतार बुद्ध: चार https://blog.ramyantar.com/2009/11/buddha-4.html https://blog.ramyantar.com/2009/11/buddha-4.html#comments Sat, 28 Nov 2009 18:30:00 +0000 पिछली प्रविष्टियों करुणावतार बुद्ध- एक, दो, तीन के बाद चौथी कड़ी- तृतीय दृश्य (यशोधरा का शयनकक्ष। रात्रि का प्रवेश काल ही है। राहुल लगभग सो...

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पिछली प्रविष्टियों करुणावतार बुद्ध- एक, दो, तीन के बाद चौथी कड़ी-

तृतीय दृश्य

(यशोधरा का शयनकक्ष। रात्रि का प्रवेश काल ही है। राहुल लगभग सो ही गया है। सिर झुकाये राजकुमार सिद्धार्थ समीप में स्थित हैं।)

यशोधरा:  प्राण वल्लभ! आज मैं तुम्हारी आँख बनकर भर आँख तुमको देखना चाहती हूँ। उठाओ अपना यह मुख। मुझे तुम्हारे इन बुदबुदाते अधरों का नहीं, छलछलाये नेत्रों का विश्वास है। कभी तो मेरे सामने एक प्राण, एक सुगंध, एक नाम बनकर बैठो! तुम्हारे एकान्त की नेत्र-भाषा, तुम्हारे देह की उष्णता, तुम्हारे कंठ की बाँसुरी, तुम्हारे बाहु-स्पर्श को मैं अपने स्मरण का काव्य बनाना चाहती हूँ ।इस मानवीय सुगंध से बड़ा उत्सव और क्या हो सकता है !

(कंधों पर बाहें रख देती है।)
बुद्ध महाभिनिष्क्रमणसिद्धार्थ:  (आँखें ऊपर उठाकर अपलक यशोधरा को देखते हैं) सुनो, सुकुमारी! क्या तुम्हारे हाथों से आलिंगित होने का आनन्द अक्षुण्ण है? जब निमिष उड़ने लगते हैं बावरे पखेरु की तरह पंख फैलाये, तो  क्या तुम्हारा आलोक दिखा नहीं देता है भीतर बहता हुआ शोक का झरना? हे मृदुलते! तुम्हारा विलास विश्रृंखलित होगा, कान्ति विलुप्त होगी, गंध नष्ट होगी, निर्मूल लतिका की तरह पंखुड़ियाँ झड़ जायेंगी। रात बीत रही है। तुम सो जाओ! मैं भी थक गया हूँ। बातें फिर कभी।
(यशोधरा बिलख कर सिद्धार्थ से लिपट जाती है। धीरे-धीरे जम्हाई लेती हुई सोने की मुद्रा में आ जाती है।)

यशोधरा:  इधर-उधर की बातें छोड़ो मेरे प्रिय! कुछ काम की बातें करो।

सिद्धार्थ:  काम का काम तमाम करने का संकल्प लो प्रिये! जीवन की सार्थकता को चूमो! एक गीत है जो निरन्तर गूँज रहा है, यह तुच्छ को त्यागने के लिये ही न! सुनो प्रिये!
यशोधरा:  नहीं, नहीं सुनना मुझे यह अनर्गल शब्द! आओ हम एक दूसरे की बाँहों में समा जाँय। मेरी बाँहों को सहारा दो प्राणनाथ! हम सुख की नींद सोयें। लाडला सो रहा है। शैय्या रोती है। रात ढली जा रही है। इस व्यथा-कथा को स्नेह वरुणा में डुबो दो नाथ!
(ढुलक जाती है ।धीरे-धीरे नींद उसे घेर लेती है। कक्ष में सन्नाटे का स्वर गूँजने लगता है। सब सो गये हैं, पर सिद्धार्थ अभी भी जगे हैं। )

सिद्धार्थ:  प्रिया और पुत्र तो सो गये किन्तु समीर का स्वर अभी भीं जगा है। क्या सुन रहा हूँ मैं?


(सिद्धार्थ चौंक कर उठ बैठते हैं। फिर कह उठते हैं- )
हे स्वर! तूँ बड़ा सुन्दर है, जीवनदायी है। तूँ अंधकार को अलोक में, तमस को सत्व में, जड़ को चेतन में परिणत कर देता है। स्वर! मैं अपने व्यग्र हृदय के साथ तेरे पास  आया हूँ। मैं अपनी सुख और शान्ति से ऊब गया हूँ। मेरी आत्मा नूतन आनन्द के लिये तड़प रही है। तुम ऐसी माधुरी दो कि मैं विस्मृति त्याग जागृति  के जल  में निमग्न हो जाऊँ। मेरे जीवन की उत्तेजित भावनाओं और उद्वेलित तरंगों को इस तरह व्यवस्थित करो कि मैं विश्व के रहस्यमय संगीत का एक अंग बन जाऊँ। ऐसा राग भरो कि मेरा हृदय विभोर हो उठे और मैं एक नयी मुस्कान के साथ उस आदर्श के पथ पर चल दूँ, जिसने मेरे अन्तस्तल में क्रान्ति कर दी है। मुझे अन्तर्जगत में पैठने का साहस दो। सत्य, शांति और आनन्द वाह्यलोक की वस्तुएं नहीं, यह समझ गया हूँ मैं। इस परिवर्तनशील वाह्यलोक में नित्य सत्य, नित्य आनन्द, नित्य शांति मृगजल की भाँति ही तो हैं। अब मैं सीमा के बंधन में नहीं रुकूँगा। निरंतर गति के लिए निरंतर आत्मदान की जरूरत है। अब अज्ञात के चरणों में स्वयं को उलीच कर ही पूर्ण बनूँगा।
(मन में संकल्प करते हैं। मुट्ठियाँ बँध जाती हैं।)

सोओ मेरे लाल! सोती रहे यशोधरा! अब मैं चलूँ। जगाने फिर कभी आ जाऊंगा।

(धीरे से द्वार खोल बाहर आ जाते हैं। एक अदृश्य स्थान की ओर घिसटते हुए-से प्रवृत्त होते हैं- सब कुछ अज्ञात।)
(ब्रह्ममूहूर्त के पूर्व ही यशोधरा के नेत्र खुलते हैं। चकित हो चारों ओर ढूँढ़ती है। सिद्धार्थ नहीं दिखते। आशंका सही हो जाती है। स्वामी छोड़कर चले गये हैं।)

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करुणावतार बुद्ध: तीन https://blog.ramyantar.com/2009/11/buddha-3.html https://blog.ramyantar.com/2009/11/buddha-3.html#comments Thu, 19 Nov 2009 22:14:00 +0000 करुणावतार बुद्ध सारथी:  भूपाल! नगरी तो ऐसी सजी-सँवरी थी, जैसे अमरावती ही वहाँ उतर आयी हो। सुन्दरियाँ नृत्य-गीत में रत थीं। चंदन की सुगंध से...

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कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं मानवता की चेतना का संस्कार करने हेतु। पुराने पन्नों में अनेकों बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने को प्रेरित करते हैं। इनकी अमित आभा धरती को आलोकित करती है, और ज्ञान का प्रदीप उसी से सम्पन्न होकर युगों-युगों तक मानवता का कल्याण करता रहता है। करुणावतार बुद्ध नामक यह प्रविष्टियाँ ऐसे ही महानतम चरित्रों का पुनः स्मरण हैं। पहली और दूसरी कड़ी के बाद प्रस्तुत है तीसरी कड़ी- 

करुणावतार बुद्ध

सारथी:  भूपाल! नगरी तो ऐसी सजी-सँवरी थी, जैसे अमरावती ही वहाँ उतर आयी हो। सुन्दरियाँ नृत्य-गीत में रत थीं। चंदन की सुगंध से गलियाँ महक रहीं थीं। फूलों की वृष्टि हो रही थी। कौन-सा सुख नहीं बरस रहा था! कुमार भिखारी को देख कर पूछने लगे-  “क्या यह अकेला इस धरती पर घूमने वाला प्राणी है?”

ध्यानस्थ बुद्ध मैंने कहा- “वृद्ध सबको होना है । नियति का यह खेल है । श्रीमंत भी तत्काल श्रीहीन हो जाते हैं।” उनके यह पूछने पर कि क्या मैं, मेरी यशोधरा भी जरा-जीर्ण हो सकती हैं, मैंने हूँ-हूँ कहते हुए बात टालनी चाही, पर वह नहीं माने तो हाँ-हाँ कहना पड़ा। क्या बताऊँ कि वे कितने व्यथित हो गये? बोले-“क्या अर्थ है ऐसे जीवन का?”

महाराज! रथ अभी कुछ ही दूर चला था कि एक कोने में पड़ा हुआ एक गलित कुष्ठ रोगी बिलख रहा था। उसकी गतिविधि की टोह में डूबे सिद्धार्थ स्वयं को गलित कुष्ठ रोगी मान बैठे। “मैं, मेरी यशोधरा भी यह दिन देखेंगे?”– यह पूछते-पूछते उनका गला सूखा जा रहा था। मैंने समझाने का प्रयास किया-“रोगव्याधि शरीर का धर्म है, आप चिन्ता न करें”, किन्तु विश्वव्याधि से वे इतने व्यथित हो गये कि रथ में ही निढाल होकर लेट गये। समझा बुझा कर रथ तीव्र-गति से लौटाने को ही था कि महाराज! एक और घटना घट गयी।

राजा:  क्या? क्या? क्या घटना घटी सारथी?

सारथी:  हे प्रजावत्सल! रथ के वेग में अनजाने ही एक बोझिल गतिमयता समा गयी थी। मुझे लग रहा था दुनिया मानो छाया-छाया, टुकड़े-टुकड़े में बँटी किसी दर्पण में प्रतिबिम्बित माया हो। लग रहा था मार्ग में कोई कापालिक अशुभ मंत्र पढ़ रहा हो। आत्मा तड़प-तड़प कर जैसे निचुड़े शरीर से आगे बढ़ने को आतुर थी। एक मर्मांतक चीख वायु को बींध रही थी। आकाश से एक स्वर लहरी सुनायी पड़ रही थी जैसे, जिसे सब सुन रहे थे- वनस्पतियाँ, पखेरू और राजकुमार भी। आपके पुत्र के तो जैसे सौ-सौ कान हो गये हों। वह पागल-से हो गये थे। इधर-उधर फटी-फटी नजरें दौड़ाते, लम्बी गर्म श्वांसे छोड़ रहे थे। अचानक ही चार कंधों पर रखा हुआ एक शव श्मशान भूमि की ओर जा रहा था। एक पिता अपने नवयुवक पुत्र के विदा हो जाने पर छाती पीट-पीट कर रो रहा था। ’राम-नाम सत्य है’ की कर्णभेदी आवाज कलेजा विदीर्ण कर रही थी।

सिद्धार्थ ने पूछा- “यह क्या ?”

मैंने जीवन के ध्रुव सत्य मरण की ओर संकेत किया। उन्होंने बलिष्ठ निर्जीव काया को क्षण भर में मुट्ठीभर राख में बदलते देखा। उनके प्राण हाहाकार कर उठे। पूछा- “इस अवस्था में कौन जाते हैं ?“

मैंने कहा- “सब। आप, हम, देवि यशोधरा, नृप, रानी- सब के सब जन्मे हुए प्राणी कालचक्र के कलेवा बन कर रहते हैं। इस कालचक्र को कोई टाल नहीं सकता।”

हे अन्न दाता! राजकुमार ने कहा- “सारथी! लौट चलो! जान गया जीवन  में मनुष्य को सुखों से कहाँ मिलना? दुख ही मिलते हैं। अब नहीं रुकूँगा। विश्व-वेदना को निर्मूल करके ही मानूँगा। मेरी आँखों की कोर में जब आँसू खड़ा रहेगा, तभी जिन्दगी दिल खोल कर बातें करेगी। उठो, चलो सिद्धार्थ! दुख तुम्हारी खोज में तुम्हारे द्वार पर आया है। देशान्तर, कालान्तर, देहान्तर, रूपान्तर की अक्षर यात्रा की अब बेला आ पहुँची है। सारथी, रथ फेरो! देखो, सूर्यमंडल से सूर्यग्रहण ज्यादा अद्भुत है।”

इस तरह वे न जाने कहाँ खो गये। रथ आया, रथ के साथ उनका शरीर भी लौटा, किन्तु मन कहीं छूट गया। मैंने प्रकृतस्थ करने का प्रयास किया, पर वो बोलते रहे, बड़बड़ाते रहे-

“अकेलापन है राह। क्षयनाश, व्यवधान, परिवर्तन, मृत्यु, कुटिलता, माया- अब तुमसे अंतिम विदा। सारथी मेरे! सुख का क्या पीछा करना? मुझसे पूछना मत, दुख का रंग कैसा है? न जाने कितने मन्वंतरों से सो रहे हैं मेरी हड्ड़ियों में सारे क्षोभ, सारे विषाद।”

ऐसा ही न जाने क्या-क्या उच्चरित करते रहे। फिर सो गये। महाराज! उन पर विशेष निगरानी रखी जाय!

राजा:  (दीर्घ श्वांस लेते हुए) महारानी! कुछ अघटित घटने के संकेत मिल रहे हैं। विचित्र स्वप्न कई दिनों से देख रहा हूँ। देखिये, आगे विधाता क्या-क्या दिखाता है?

रानी:  प्राणनाथ! मेरा पुत्र मुझे बार-बार न जाने क्यों ज्योतिर्मय कमल-सा दिखता है। मैं तो यह सुनकर डर गयी थी, जब वह एक रात मेरी गोद में लेटा हुआ बड़बड़ा रहा था-

“अपने प्राणों पर मैंने यह देह जीवनधर्म समझकर धारण की है। मेरी व्यक्तिसत्ता विश्वसत्ता है।”

राजन! पुत्र को सांसारिकता के मधुकोषपीठ में उलझाये रखना जरूरी हो गया है। हम हारने के पहले ही सचेत हों, यही अच्छा है।

राजा:  हाँ रानी! कल किसी युक्ति से सिद्धार्थ को संसार-राग में डुबाने का पूरा प्रयास करुँगा। 

क्रमशः-

चित्र: फ्लिकर से साभार!

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करुणावतार बुद्ध: दो https://blog.ramyantar.com/2009/11/buddha-2.html https://blog.ramyantar.com/2009/11/buddha-2.html#comments Thu, 19 Nov 2009 00:07:00 +0000 करुणावतार बुद्ध: (द्वितीय दृश्य ) (सारथी प्रवेश करता है । प्रणाम की मुद्रा में सिर झुकाकर राजा की आज्ञा माँगता है ।) राजा:  सारथी !...

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कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं मानवता की चेतना का संस्कार करने हेतु। पुराने पन्नों में अनेकों बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने को प्रेरित करते हैं। इनकी अमित आभा धरती को आलोकित करती है, और ज्ञान का प्रदीप उसी से सम्पन्न होकर युगों-युगों तक मानवता का कल्याण करता रहता है। यह प्रविष्टियाँ ऐसे ही महानतम चरित्रों का पुनः स्मरण हैं। पहली कड़ी के बाद प्रस्तुत है दूसरी कड़ी।

करुणावतार बुद्ध: (द्वितीय दृश्य )

(सारथी प्रवेश करता है । प्रणाम की मुद्रा में सिर झुकाकर राजा की आज्ञा माँगता है ।)

राजा:  सारथी ! मेरे लाडले की नगर दर्शन की अभिलाषा तृप्त हो गयी?

सारथी:  हे प्रजावत्सल! आज तक आपकी सेवा में व्यतीत हुई आयु भर में मैंने कभी ऐसा सारथ्य किया, न कभी ऐसा रथी देखा और न ऐसी विलक्षण अश्वगति देखी। ऐसी होनी भी नहीं देखी महाराज, जैसी इस यात्रा में घटित हुई।
 
राजा:  क्या? कैसा? बताओ, बताओ!
 
buddha-in-meditationसारथी:  महाराज, आपके नयनों के तारे ने जैसे ही रथ पर पाँव रखा, वैसे ही मुझे लगा जैसे रथ को किसी ने अमोघ संजीवनी विद्या से अभिमंत्रित कर दिया है। एक अवर्णनीय सुरभि ने रथ को वलयित कर लिया। घोड़े मेरी लगाम के बंधन से मुक्त हो जैसे विचरने लगे। सिद्धार्थ, जो यूँ तो शांत हैं, वाचाल हो गये। कभी स्फुट, कभी अस्फुट शब्दों में कुछ उच्चरित करने लगे जैसे किसी अदृश्य जीवन-संगी के हाथों में हाथ डाल दिया हो। “समय हो गया है, बहुत बेला बीत चुकी’, ’सुन रहा हूँ’, ’बहुत हो चुका, अब नहीं चूकूँगा’, ’क्षमा करना, प्राण! चलो,चलो’ आदि अनेक असंबद्ध बातें बोलते रहते थे। मुझे आवश्यकतानुसार कभी पूछते, कभी मुस्कराते, फिर रोते, आँसू पोंछते, उदास होते, आँखे बंद कर लेते, धरित्री को नमन करते, यहाँ-वहाँ, रुको-चलो आदि संवेगों में ही उनका समय बीत गया। कहते थे –

“मुझे व्यक्ति से समय बना दिया गया है। अब मुझे अहोरात्र जागना है।मेरा कोई गोत्र नहीं , कोई नाम नहीं। मैं अजन्मा हूँ। मेरे लिये अब कोई सूर्योदय नहीं, कोई सूर्यास्त नहीं, कोई रंग नहीं, कोई राग नहीं।….”

राजा:   प्रिय सारथी! यह मैं क्या सुन रहा हूँ? अरे, ऐसी कोई घटना तो नहीं घटी कि तुम इतने उद्विग्न-से हो रहे हो?
 
सारथी:  हे भाग्यविधाता! कुछ कहते नहीं बन रहा है वह दृश्य विधान। अभी मैं कुछ ही क्षण चला था चमचमाते नगर के राजमार्ग पर कि औचक घने वृक्षों से भरा जंगल मिल गया। मैं स्तब्ध था कि यहाँ कैसे? वहाँ की हवा विचित्र थी। न उसमें शीतलता ही थी न जलन। एक काँसे का पात्र काँपती हँथेलियों में सम्हाले दीन-हीन एक भिखारी ठीक सामने खड़ा हो गया। वह रिरिया रहा था –

तुम्हारे चरणों में आ पड़ा हूँ , निहार लो हे दयालु भगवन!
हमारी बिगरी जनम-जनम की सँवार दो हे दयालु भगवन!

उस गरीब की धूसर-धूमिल लटें मलिन कंधों को छू रही थीं। चीथड़े पहने था। रीढ़ की हड्डी धनुषाकार हो गयी थी। धँसी-धँसी-सी आँखों की पलकों में पर्याप्त श्यामलता थी। वाणी कंपित थी। पाँव डगमगा रहे थे। लाठी बड़ी कठिनाई से सम्हाल पा रहा था। पलकों में भूख समाई थी। कंपित वाणी में बोला-
 
“दया करो दानी। बड़ी दूर से आ रहा हूँ। फटे पैर और इस जीर्ण शरीर से आगे चला नहीं जाता। इस चेहरे पर पड़ी झुर्रियों की सैकड़ों लकीरें  और इनमें भरे पसीने को तुम नहीं देखोगे तो कौन देखेगा? मैले-मैले, काले-काले हाँथ-पाँव वाले को तुम्हीं ठुकरा दोगे तो फिर दुनिया में और कौन सहारा देने वाला है। एक बार मेरी ओर दया से देख लो बस यही चाहता हूँ। हे दानी! मेरी एक ही चाह है कि तुम्हारे मधुर कोमल चरणों पर अपनी सारी लघुता समेटे मिट जाऊँ। बोलो, देते हो मुझे मेरी भीख?”
 
इतना कहते-कहते वह लुढ़क गया था। सिद्धार्थ कूद पड़े नीचे। बाँहों भर भेंटा उसे। फफक-फफक कर खूब रोये। अंग-रक्षक किसी को रोक नहीं पा रहा था। उनकी गर्म श्वाँसे जैसे कह रहीं थीं- “मैं दुख मिटा कर रहूँगा। यह देखा नहीं जाता।”
 
(फटी-फटी आँखों से सारथी का मुख निहारते हुए-)
राजा:  आह! मेरा पुरुषार्थ यह भी नहीं कर सका कि एक दिन भी उदासीन बेटे को दुनिया के दुख से दूर रख सकूँ। फिर क्या हुआ? वत्स बोलो!

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करुणावतार बुद्ध: एक (नाट्य) https://blog.ramyantar.com/2009/11/buddha.html https://blog.ramyantar.com/2009/11/buddha.html#comments Tue, 17 Nov 2009 21:22:00 +0000 करुणावतार बुद्ध (प्रथम दृश्य ) (प्रातःकाल की बेला। महल में राजा और रानी चिन्तित मुद्रा में।)   शुद्धोधन:  सौभाग्यवती! कल अरुणोदय की बेला थी। अभी...

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कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं मानवता की चेतना का संस्कार करने हेतु। पुराने पन्नों में अनेकों बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने को प्रेरित करते हैं। इनकी अमित आभा धरती को आलोकित करती है, और ज्ञान का प्रदीप उसी से सम्पन्न होकर युगों-युगों तक मानवता का कल्याण करता रहता है। अगली कुछ प्रविष्टियाँ ऐसे ही महानतम चरित्रों का पुनः-स्मरण हैं। प्रस्तुत है करुणावतार बुद्ध की पहली कड़ी। 

करुणावतार बुद्ध

(प्रथम दृश्य )

(प्रातःकाल की बेला। महल में राजा और रानी चिन्तित मुद्रा में।)
 
शुद्धोधन:  सौभाग्यवती! कल अरुणोदय की बेला थी। अभी अलसाई आखों से नींद विदा हुई नहीं थी। मैं अपलक निहार रहा था भरी-पूरी देहयष्टि वाले अपने राजदुलारे को। प्रासाद के एक एकांत कोने में वह अनमना बुदबुदाते हुए घूम रहा था। मुखमण्डल बता रहा था, वह सारी रात सोया नहीं है। उसके विद्युम से अरुण अधरों  से कढ़े अप्रासंगिक बोल को मैं सुन रहा था-
 
“नभ से उतरो कल्याणी किरणों ! हमारा देय शंखजल स्वीकारो। हमारे शेष प्रश्न को अशेष कर दो। लौटो ओ सम्यक दिन । लौटो, हमारी मृत चेतनाओं को धूपाभिषित कर दो। जी चुका मैं भूत। अशेष करना है हमें यह आज का संघर्ष ताकि अनागत विश्व का यश बन जाये। हम देहजीवी नहीं दृष्टि-जीवी हैं। मेरी उदासी भरी जीवन की उषा को उत्सवगर्भा बना दो।”
 
रानी:  हे राजाधिराज! क्यों कह रहा था सिद्धार्थ यह सब? यह अबूझ पहेली कैसी? कौन-सी उदासी? कौन-सा उत्सव? कौन-सा शेष प्रश्न? कैसा सम्यक दिन? क्या देव शंखजल?
 
शुद्धोधन:  सुमुखि ! यही तो अपनी आकुलता है। कुछ समझ में नहीं आ रहा है, उस पुत्र का क्या है उद्वेग? कलेजे पर हाथ रख कर वह कह रहा था-
 
“देश का, न काल का-मैं किसी का ताबेदार नहीं। जिन्हें तुम अपना समझते हो, जिन्हें तुम अपनी पहचान बताते हो, जिन्हें तुम प्रतीकों की तरह उठाये-उठाये देश और काल में सदियों से चल रहे हो, क्या तुम इन्हें उठाकर एक किनारे नहीं रख सकते? चलो, मेरी प्रार्थना! अब सृष्टि-सुख की भाषा बनकर चलो! मुझे अपनी शाश्वती के पास लौटना ही होगा, लौटना ही होगा।”
 
रानी:  और, और विरदश्रेष्ठ! और कुछ भी उच्चरित किया उसके अधरों ने?

शुद्धोधन:  हाँ, हाँ भद्रशीले ! बोले जा रहा था –

“आज से मैं विद्रोही हूँ, भयंकर विद्रोही। सुख के विरुद्ध, दुख के विरुद्ध विद्रोह। विद्रोह , अब यही मेरा मान है, यही मेरा अरमान है। हे कोमल पुष्पों! अब तुम्हारा सौरभ और सौन्दर्य मुझे बंदी नहीं बना सकता। हे पिंजरे के शुक-मैना! अब तुम्हारे गान मुझे भूल-भुलैयों में नहीं फँसा सकते। हे पवन! अब त्रिविद प्रवाह की मुझे जरा भी परवाह नहीं। हे अगरु सुगंध! तेरी मादकता अब मुझे मुग्ध नहीं कर सकेगी। हे सूर्य! तेरा असह्य ताप मुझे तेरे सामने नतमस्तक नहीं कर सकेगा। अरे स्वार्थवादी मनुष्यों! देखना, तुम्हारी स्वार्थांधता और तुम्हारा पाखंड मेरे वज्र हाथों से चूर-चूर हो जायेगा।”
 
सुन्दरी! उसके अज्ञात शरीर कम्पन, हृदय के उच्छलन और मन की तड़पन को मैं अदृश्य बैठा हुआ निर्ममता से झेल रहा हूँ।
 
(रानी सिसकते हुए राजा से लिपट जाती है ।)
रानी:  राजन! विधाता कौन-सा दिन दिखायेगा? मैं अपने लाल को अपने गालों से सटा लूँगी। उसका विषाद बोझिल मुख बार-बार चूमूँगी। उसे दुलराऊंगी, सहलाऊंगी, बहलाऊंगी। माँ की ममता का धागा समेटकर राग की रसरी में उसे बाँधकर , यह पगली माँ उसके प्रस्थान के पथ पर पाषाण शिला-सी बिछ जायेगी।
 
(स्वयं अपनी डबडबायी आँखों को पोंछकर संयत होता राजा )
राजा:  मेरी माया! क्या-क्या नहीं सुना मैंने? क्या कह रहा था वह मेरी आँखों की पुतली- “छोटे-छोटे सुखों की खोज में तूँ भटकता फिरता है। अनन्त आनन्द का स्वप्न मेरा विनोद है। रागासक्ति से तूँ जकड़ा हुआ है। निर्ममता मेरे जीवन की शक्ति है। तेरा काम अनन्त काल तक भटकना है, मेरा लक्ष्य अनन्त में जा मिलना है। खोखले संसार! तेरा और मेरा क्या संग है!”
 
रानी:  स्वामी! मैं उसकी पीर की तासीर बचपन से ही तलाशने लगी थी, पर उसे जान पायी नहीं, समझ पायी नहीं। अपनी आत्मा के उस सुन्दर प्रतिबिम्ब में मैं ढूँढ़ती रह गयी उसके निस्रब्ध अंतःकरण में व्याकुलता की वह आग, अधीरता की वह ज्वाला, विरह की वह पीड़ा। जब वह एक अबोध बालक था, तभी से एकान्त में बैठकर एक नीरव संगीत का आनन्द लूटने के लिये अपनी माँ की गोद से उठ-उठकर भाग जाया करता था। प्रेम ने उसके हृदय को आनन्दमय बना दिया था। विरह ने उसके जीवन को करुणामय बना दिया था। उसके मुखमंडल की मुद्रा, उसके नयनों की सजलता और उसकी मौनता के जादू का चित्र इस घड़ी मेरी आँखों के आगे मूर्तिमान हो गया है। अब कुछ करो न प्रजावत्सल! कि वह गृहासक्त हो, राज-पाट सम्हाल ले।
 
राजा:  तन्वी! मैं सोचता था और सन्तुष्ट हो रहा था कि मेरे हृदय की अग्नि अब शान्त हो गयी है। विश्व की सर्वश्रेष्ठ अनिंद्य सुन्दरी यशोधरा से पाणिग्रहण करा कर उसे रस-पिपासु मिलिंद बनाना चाहा, किन्तु मेरा वैसा सोचना आज व्यर्थ सिद्ध हुआ। सिद्धार्थ चंपक वन का चंचरीक निकला। वह बिना राग के निराला रमता राम हो गया। उसे एक नयी चूमने वाली उमंग, रोमांचित कर देने वाली धारा, पागल बना देने वाली खुशी डँवाडोल कर रही है। सोचा था , यशोधरा की जीवनदायी स्मृति, उसके सुधामय प्रेम का आस्वादन,  उसके जीवन का रस- उसे एक नये रंग में रँग डालेगा। उसके अंग में उमंग भरेगी। आँखों में हँसी उतरेगी, शब्दों में मुग्धता आयेगी। किन्तु मेरा मोहभंग होता चला जा रहा है। उसको देखकर तो मुझे ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे वह राजपुत्र ही नहीं है। सदा का भिखारी है, वेदना से विह्वल है।
 
रानी:  ओह! अब स्मृति में ताजी हो रही है वही बेला आर्य! जब बालकेलि में आकर अपने हाँथों से मेरी आँखें बन्द कर इठलाने लगता और कहता- माँ, वह दरवाजा खोल दो! मुझे डर लग रहा है। मेरे चारों तरफ का जो दृश्य है विषाद मिश्रित हँसी का है। नैराश्यपूर्ण आशा का है। मैं फूल की सुगंध में छिप जाना चाहता हूँ, पर प्रवेश के लिये द्वार ही नहीं सूझता। सुबह की संगीत-धारा में अपने को बहा देना चाहता हूँ, पर अंततः अपने को स्तंभित पाता हूँ। अनन्त आकाश में विचरण करने के लिये उड़ना चाहता हूँ, पर मेरे हाँथ सिर्फ हवा को चीरकर रह जाते हैं। वह प्रवेश द्वार खोल दो ना माँ! “
 
राजा:  क्या करूँ गुणमयी! वह सबों का दुलारा होकर भी उदास है। वह अपनी समस्त आकांक्षाओं को लेकर भी वैरागी है, एक कोमल आनन रखते हुए भी कठोर है। राजधानी सजायी थी उसको रिझाने के  लिये। दुख, पीड़ा, रोग, वैराग्य, जरा, व्याधि, मरण, विलाप सबको रोक रखने का आदेश दिया था, कि ये राजकुमार के दृष्टिपथ में न आयें। केवल मोद और प्रसन्नता बरसे।

रानी ! सूर्य अब मध्याह्न व्योम की ओर अग्रसर हो रहे हैं। सारथी आता ही होगा। उसे अभी बुलवाता हूँ। राजकुमार की इस समय क्या स्थिति है, इसे जानने की इच्छा हो रही है।
(सारथी को बुलाने का आदेश)

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