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	<title>Article on Authors Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</title>
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	<description>हिंदी ब्लॉग। साहित्य, भाषा, संस्कृति, लोक व शास्त्र से संयुक्त। कविता, कहानी, समीक्षा, निबन्ध, नाटक एवं अनुवाद का सहज प्रकाशन। लोक साहित्य का रंग भी।</description>
	<lastBuildDate>Sun, 09 Jun 2024 08:50:05 +0000</lastBuildDate>
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	<title>Article on Authors Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</title>
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		<title>रामजियावन दास बावला: भोजपुरी के तुलसीदास</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2010/04/blog-post_30.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 30 Apr 2010 09:53:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article on Authors]]></category>
		<category><![CDATA[भोजपुरी]]></category>
		<category><![CDATA[ऑडियो]]></category>
		<category><![CDATA[भोजपुरी के तुलसीदास]]></category>
		<category><![CDATA[भोजपुरी साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[रामजियावन दास ’बावला’]]></category>
		<category><![CDATA[लोक]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>रामजियावन दास बावला को पहली बार सुना था एक मंच पर गाते हुए! ठेठ भोजपुरी में रचा-पगा ठेठ व्यक्तित्व! सहजता तो जैसे निछावर हो गई...</p>
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<p>रामजियावन दास बावला को पहली बार सुना था एक मंच पर गाते हुए! ठेठ भोजपुरी में रचा-पगा ठेठ व्यक्तित्व! सहजता तो जैसे निछावर हो गई थी इस सरल व्यक्तित्व पर! ’बावला’ भोजपुरी गीतों के शुद्ध देशज रूप के सिद्धहस्त गवैये हैं! सोच कर नहीं लिखा कभी, मुक्त-स्रोत धारा फूट पड़ी! गीत निकल पडे! भोजपुरी के तुलसीदास हैं बावला! भोजपुरी के अनगिन गुनगुनाए जाने वाले गीत इस कवि के कंठ से निकले रत्न हैं हमारे अंचल में ! </p>



<p>बावला बावले-से अपने में मग्न अपनी रोज की दिनचर्या के उपक्रम में भोजपुरी का श्रेष्ठतम रचते रहे, प्रसिद्धि से अनजान, अप्रकाशित, अलिखित! हमारे गाँवों, देहातों में गाये जाते रहे बावला। उनके मुँह से बहुतों ने सुना, फिर गाया, फिर-फिर गाया; पर बावला का नाम प्रकाश में नहीं आया! गीत फैलते रहे, .कविता बहती रही! <a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0"><strong>स्व० विद्यानिवास मिश्र</strong></a> का ध्यान औचक ही खींचा इन गीतों ने। कुछ बात बनती दिखी। वाचिक परम्परा के साहित्य में जुड़ते-से लगे बावला! विद्यानिवास जी की पारखी दृष्टि ने गँवई विभूति की फक्कड़, निस्पृह साधना को पहचान लिया!  उनके प्रयास से रामजियावन दास बावला के गीतों का एक संकलन <strong>’गीतलोक</strong>’ प्रकाशित हो चुका है, जिसकी भूमिका स्वयं विद्यानिवास मिश्र जी ने लिखी है!</p>



<h3 class="has-luminous-vivid-orange-color has-text-color wp-block-heading">रामजियावन दास बावला का जन्म, अध्ययन  व प्रारंभिक जीवन</h3>



<div class="wp-block-media-text has-media-on-the-right is-stacked-on-mobile is-vertically-aligned-center is-image-fill has-background" style="background-color:#ffd0ae;grid-template-columns:auto 32%"><figure class="wp-block-media-text__media" style="background-image:url(https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2010/04/Bawala.jpg);background-position:21% 56.00000000000001%"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2010/04/Bawala.webp 320w" type="image/webp" /><img fetchpriority="high" decoding="async" width="320" height="240" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2010/04/Bawala.jpg?x47177" alt="रामजियावन दास बावला" class="wp-image-264 size-full" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2010/04/Bawala.jpg 320w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2010/04/Bawala-300x225.jpg 300w" sizes="(max-width: 320px) 100vw, 320px" /></picture></figure><div class="wp-block-media-text__content">
<p class="has-text-align-left">१ जून सन १९२२ को तत्कालीन बनारस स्टेट के चकिया (अब चन्दौली ज़िले की एक तहसील ) के भीखमपुर गाँव के अतिसामान्य लौहकार परिवार में जन्मे रामजियावन छः भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं! पिता श्री रामदेव जातीय व्यवसाय में निमग्न पूरे परिवार को <em>’रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पिउ&#8230;.’</em> के सिद्धान्त पर जीना सिखाते। बावला ने संतोष का सूत्र  पकड़ लिया, जो बावला के जीवन के प्रत्येक आयाम में निखरा पड़ा है। पिता-बड़े पिता रोज शाम को कंठ-कंठ में बसी रामायण पढ़ते/सुनते तुलसी बाबा वाली। बावला भी मगन होकर सुनते! राम बस गए मन में, राम की भक्ति ठहर गयी जीवन में। </p>
</div></div>



<p>परिवार में भी पढ़ने लिखने की जरूरत नहीं दिखायी गयी। रामजियावन दास का मन भी न लगा, अक्षर-ज्ञान की कक्षा ही ली। कहने को तीन तक पढ़े। चौथी में फेल हुए, फिर भाग चले। सो पढ़ना-लिखना नहीं आया! <em>’पढ़ो-लिखो नहीं तो  भैंस चराओ’ </em>का सर्वमान्य सिद्धान्त सधा बावला पर। बावला ने कहावत जीने की सोची, भैंस चराने लगे। यह परिवार के काम में उनके हिस्से का काम हो गया। </p>



<p>उस समय से निरंतर  ’बावला’ राम भजते, लोक-व्यवहार निभाते, घर-दुआर की पहरेदारी करते, अपने हिस्से का काम मुस्तैदी से करते मिलेंगे! आज के पाँच-सात पहले तक यही उनका क्रम-नियम था! अब उम्र ने कुछ  निराश कर दिया होगा उन्हें, यह अलग बात है! इस भैंस चराई के उपक्रम में ’मानस’ के दोहे-चौपाईयाँ मन में उतारते-गुनगुनाते, फिर उन्हें अपने रस में घोलते! लोक के चितेरे तुलसी की अभ्यर्थना और क्या हो सकती थी, सिवाय इसके कि उनकी एक-एक चौपाई, एक-एक दोहा पग रहा था भोजपुरी के रस में! पुनः रची जा रही थी रामायण, उसी प्राणवत्ता के साथ!</p>



<h3 class="has-luminous-vivid-orange-color has-text-color wp-block-heading">बावला का कृतित्व: कैसे बने भोजपुरी के तुलसीदास</h3>



<p>बालपन से रामजियावन भैंस चराते अपने गाँव के निकट की पहाड़ियों पर दूर तक निकल जाते! मन में <a href="https://blog.ramyantar.com/2012/12/malahavababa.html">रामायण के विविध प्रसंग</a> घूमते रहते। मानस के अनेकों चरित्र का मानस साक्षात्कार बावला को विभोर कर देता। एक दिन यूँ ही चन्दौली की रम्य पहाड़ियों (विंध्य श्रृंखला) में विचरते राजदरी जलप्रपात के समीप बावला ने पास के ही गाँव ’धुसुरियाँ’ के कोलभीलों को देखा। ’मानस’ की वीथिका में टहलता मन औचक ही इन वनवासियों के साक्षात्कार से चिहुँक पड़ा। इन वनवासियों में वनवासी राम दिखे, भावविगलित बावला हतवाक! युग-काल से परे राम के समय से जोड़ लिया खुद को बावला ने। वनवासी राम से पूछते बावला के कंठ ने अनायास ही गा दिया-</p>


<blockquote>
<p>&#8220;कहवां से आवेला कवने ठहयां जइबा, <br />बबुआ बोलता ना <br />के हो देहलेस तोहके बनवास&#8230;&#8221;</p>
</blockquote>
<div style="text-align: justify;"> प्रारम्भ ले चुकी थी बावला की सर्जना। <b>&#8220;राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है,&#8221;</b> पुनः चरितार्थ हो चुका था। तुलसी बाबा ने अपनी संजीवनी पिला दी थी इस नए भोजपुरी-तुलसी को। अब ’रामजियावन’ सच्चे अर्थों में ’बावला’ बन चुके थे। गीत बनते रहे, जाने अनजाने कई कवित्त, सवैये रचे जाते रहे, बात अलग है कि भैंस कहीं दूर खो जाती, बावला बाद में बड़े श्रम से उसे ढूँढ़ते।</div>
<div style="text-align: justify;"> </div>
<div style="text-align: justify;">रामजियावन दास बावला ने जो अनुभूत किया, गाया। जो महसूस किया, गाया। जो देखा, उसे गाया। जो भोगा, उसे गाया। ’बावला’ और गीत एक दूसरे के पर्याय हैं। गँवई संवेदना के भीतर तक घुसे, ईश्वर भक्ति को विस्तरित किया ग्राम-समाज-देश की भक्ति की। यथार्थ को जिया तो उसे भी पूरी सामर्थ्य से गाया। ’बावला’ अभी भी गा रहे हैं, ८८ वर्ष की आयु में भी उनका कंठ-स्वर मद्धिम नहीं हुआ है। बावला अब भी हम जैसे युवाओं के लिए एक पाठ हैं, जिसे निरन्तर पढ़ा जाना चाहिए। जिसकी अर्थमय गहराई में उतरना चाहिए!</div>
<div> </div>
<div style="text-align: justify;">रामजियावन दास बावला के स्वर में उनका परिचय सुनिए और एक गीत, रिकॉर्डिंग मिल गयी मुझे एक मित्र के पास। गुणवत्ता काफी सुधारने के बाद भी आप के सुनने लायक हो पायी हो, तो श्रम सार्थक होगा मेरा। कई जगहों पर खंडित भी थी रिकॉर्डिंग, कुछ हिस्सा निकाल पाया हूँ उसमें से। एकाध वीडियो भी मिले हैं! यदि वह देने लायक हो सके तो उन्हें पुनः प्रस्तुत करूँगा। </div>
<p><iframe src="https://archive.org/embed/KavyaPathByRamJiyavanDasBawala" width="500" height="140" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p><p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/04/blog-post_30.html">रामजियावन दास बावला: भोजपुरी के तुलसीदास</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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		<title>मुक्तिबोध की हर कविता एक आईना है</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2009/11/blog-post_13-5.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Nov 2009 20:19:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article | आलेख]]></category>
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		<category><![CDATA[अमृता भारती]]></category>
		<category><![CDATA[मुक्तिबोध]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी कवि]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8220;मुक्तिबोध की हर कविता एक आईना है- गोल, तिरछा, चौकोर, लम्बा आईना। उसमें चेहरा या चेहरे देखे जा सकते हैं&#160;। कुछ लोग इन आईनों में...</p>
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<p style="text-align: justify;">आज गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्मदिवस है, एक <a href="http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%97%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%A8_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%B5_%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%A7">अप्रतिम सर्जक</a> का <a href="https://blog.ramyantar.com/2008/11/ob-birthday-bachchan.html">जन्मदिवस</a>। याद करने की बहुत-सी जरूरतें हैं इस कवि को। मुक्तिबोध प्रश्नों की धुंध में छिपे उत्तरों की तलाश करते हैं- चोट पर चोट खाकर, आघात पर आघात सहकर। जो उपलब्ध होता है वह है उद्घाटित अन्तर्निहित सत्य। आदमी और आदमी के मन से जुड़ता है इस कवि का संबंध- इतनी गहराई से कि संबंधों की परिभाषा से इतर होता है एक नवीन संबंध का सृजन। चिन्तन और अभिव्यक्ति में एक-सी छटपटाहट, एक-सा आक्रोश, एक-सा संवेदन। मुक्तिबोध को स्मरण करते हुए अमृता भारती के आलेख <strong><span class="underline" style="text-decoration: underline;">मुक्तिबोध् : सत्-चित्-वेदना-स्मृति</span></strong> से एक महत्वपूर्ण अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ-</p>



<div class="wp-block-media-text has-media-on-the-right is-stacked-on-mobile has-background" style="background-color:#ffe7f2"><div class="wp-block-media-text__content">
<p>&#8220;मुक्तिबोध की हर कविता एक आईना है- गोल, तिरछा, चौकोर, लम्बा आईना। उसमें चेहरा या चेहरे देखे जा सकते हैं&nbsp;। कुछ लोग इन आईनों में अपनी सूरत देखने से घबरायेंगे और कुछ अपनी निरीह-प्यारी गऊ-सूरत को देखकर आत्मदर्शन के सुख क अनुभव करेंगे। मुक्तिबोध ने आरोप, आक्षेप के लिये या भय का सृजन करने के लिये कविता नहीं लिखी- फिर भी समय की विद्रूपता ने चित्रों का आकार ग्रहण किया है- आईनों का। ’अंधेरे में’ कविता इस संग्रह का सबसे बड़ा और भयजन्य आईना है।&#8230; </p>



<p>&#8230;.लौटते हुए खिड़की पर कुहरा नहीं होता था- न डिब्बे में एकान्त- बस पटरियाँ बजती रहतीं थीं और यात्रियों की आवाजें- इन सबके बीच मुक्तिबोध की कविता चलती रहती थी- कहीं कोई नहीं टोकता था- कहीं कोई नहीं रोकता था- बस, कविता चलती रहती थी- अविराम &#8230;.।&#8221;</p>
</div><figure class="wp-block-media-text__media"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/11/Muktibodh.Poet_.Muzib_.webp 238w" type="image/webp" /><img decoding="async" width="238" height="320" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/11/Muktibodh.Poet_.Muzib_.jpg?x47177" alt="मुक्तिबोध" class="wp-image-356 size-full" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/11/Muktibodh.Poet_.Muzib_.jpg 238w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/11/Muktibodh.Poet_.Muzib_-223x300.jpg 223w" sizes="(max-width: 238px) 100vw, 238px" /></picture></figure></div>
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		<title>के० शिवराम कारंत : मूकज्जी का मुखर सर्जक</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2009/10/blog-post_10-2.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 09 Oct 2009 20:26:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article on Authors]]></category>
		<category><![CDATA[K. Shivaram Karanth]]></category>
		<category><![CDATA[Kannada Literature]]></category>
		<category><![CDATA[कन्नड़ रचनाकार]]></category>
		<category><![CDATA[के० शिवराम कारंत]]></category>
		<category><![CDATA[ज्ञानपीठ पुरस्कार]]></category>
		<category><![CDATA[मूकज्जी]]></category>
		<category><![CDATA[रचनाकार]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>के० शिवराम कारंत Kota Shivaram Karanth &#8211; भारतीय भाषा साहित्य का एक उल्लेखनीय नाम, कन्नड़ साहित्य की समर्थ साहित्यिक विभूति, बहुआयामी रचना-कर्म के उदाहरण-पुरुष!  सर्जना...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>के० शिवराम कारंत</strong> Kota Shivaram Karanth &#8211; भारतीय भाषा साहित्य का एक उल्लेखनीय नाम, कन्नड़ साहित्य की समर्थ साहित्यिक विभूति, बहुआयामी रचना-कर्म के उदाहरण-पुरुष!  सर्जना में सत्य और सौन्दर्य के प्रबल जिज्ञासु कारंत जीवन को सम्पूर्णता और यथार्थता में निरखने की निरंतर चेष्टा अपने कर्म में करते रहे। और इसीलिये ज्ञान के बहुविध क्षेत्रों में उनका प्रवेश होता रहा, कला के अनेक आयाम उन्होंने छुए। अपने प्रिय पाठकों की दृष्टि में एक स्वाधीन, निर्भय और निष्कपट व्यक्तित्व का नाम है के० शिवराम कारंत। साहित्य की अनेकों विधाओं में उनका समर्थ लेखन उन्हें एक विराट सर्जक की प्रतिष्ठा देता है। उत्कृष्ट उपन्यासकार, कुशल नाटककार, अन्यतम शोधकर्ता व आलोचक, प्रशंसित शब्दकोशकार व विश्वकोशकार, बहुचर्चित आत्मकथा लेखक व महनीय सम्पादक के रूप में डॉ० के० शिवराम कारंत कन्नड़ साहित्य को सार्वत्रिक प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं।</p>





<p style="text-align: justify;"><strong><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/10/ಶಿವರಾಮ_ಕಾರಂತ.webp 512w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" class="size-medium wp-image-4422 alignright" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/10/ಶಿವರಾಮ_ಕಾರಂತ-186x300.jpg?x47177" alt="K Shivaram Karanth" width="186" height="300" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/10/ಶಿವರಾಮ_ಕಾರಂತ-186x300.jpg 186w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/10/ಶಿವರಾಮ_ಕಾರಂತ.jpg 512w" sizes="auto, (max-width: 186px) 100vw, 186px" /></picture></strong></p>
<h3><span style="color: #ff6600;">के0 शिवराम कारंत : K. Shivaram Karanth</span></h3>
<p style="text-align: justify;"><strong>जन्म:</strong> १० अक्टूबर, १९०२, कोटा, कर्नाटक; <strong>मातृभाषा:</strong> कन्नड़; <strong>व्यवसाय:</strong> स्वतंत्र लेखन; <strong>पुरस्कार / सम्मान:</strong> डी०लिट० (मानद, कर्नाटक वि०वि०, मैसूर वि०वि०, मेरठ वि०वि०), पद्म भूषण (आपातकाल में लौटा दिया), साहित्य अकादमी पुरस्कार-१९५९, भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार-१९७७ एवं अन्य कई पुरस्कार/सम्मान; <strong>प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ:</strong> <strong>नाटक- </strong>गर्भगुडि, एकांत नाटकगलु, मुक्तद्वार, गीतानाटकगलु,विजय, बित्तिद बेले, मंगलारति, <strong>उपन्यास:</strong> चोमन दुड़ि, मरलि मण्णिगे, बेट्टद जीव, मुगिद युद्ध, कुडियर कुसु, चिगुरिद कनसु, बत्तद तोरे, समीक्षे, अलिद मेले, ओंटि दानि, मूकज्जिय कनसुगलु (ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त), केवल मनुष्यरु, मूजन्म, इळ्येम्ब, कन्निडु कणारू, <strong>कहानी-संग्रह &#8211;</strong> हसिवु, हावु, <strong>निबंध-</strong> ज्ञान, चिक्कदोड्डवरू, हल्लिय हत्तु समस्तरु, <strong>कला-विषयक-</strong> भारतीय चित्रकले, यक्षगान बयलाटा (साहित्य अकादेमी), चालुक्य वास्तुशिल्प, कला-प्रपंच, यक्षगान, भारतीय शिल्प, <strong>आत्मकथा-</strong> हुच्चु मनस्सिन हत्तु मुखगलु, <strong>विश्वकोश-शब्दकोश,विज्ञान विषयक-</strong> बाल प्रपंच, विज्ञान प्रपंच(चार खंड) विचित्र खगोल, हक्किगलु, अन्य- जीवन रहस्य, जानपद गीते, विचार साहित्य निर्माण, बिडि बरहगलु  ।</p>





<h3 class="has-vivid-red-color has-text-color wp-block-heading">कोटा शिवराम कारंत का लेखन कर्म</h3>



<p>लेखन कारंत जी के लिये अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करना है। समग्र जीवन-दृष्टि के धनी कारंत वर्तमान को विगत के स्वीकार के साथ जीना चाहते हैं। पुरानी परिपाटी से उदाहरण लेना और फिर उसे वर्तमान जीवन की कसौटी पर कसना, प्रचलित मान्यताओं को ज्यों का त्यों न स्वीकारना बल्कि सातत्य में उनकी प्रासंगिकता का पुनरीक्षण करना आदि कारंत जी के व्यक्तित्व व उनकी सर्जना की अन्यतम विशेषताएं हैं, और इसीलिए वे विद्रोही हैं। विद्रोही हैं तो साहसी भी हैं- चौंतीस वर्ष की उम्र में तीन खण्डों के बाल-विश्वकोश का सम्पादन, उनतालीस वर्ष की उम्र में एक लघु शब्दकोश का निर्माण, सत्तावन वर्ष की उम्र में विज्ञान आधारित चार खण्डों का विश्वकोश विज्ञान प्रपंच का प्रणयन, तीन खण्डों की कृति ’भारतीय कला और मूर्तिकला’ की रचना आदि।</p>



<p><a href="https://bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%A4" target="_blank" rel="noreferrer noopener">डॉ० कारंत </a>की प्रत्येक रचना अन्याय के विरुद्ध आग्रह रखने का भाव अपने अन्तर में सँजोये प्रस्तुत होती है। न्याय और एकाधिकार की न्यून उपस्थिति भी उनका अन्तर भड़का देती है। वस्तुतः डॉ० कारंत की सम्पूर्ण रचना-गतिविधियों का केन्द्र मनुष्य और उसका समग्र व्यक्तित्व है और इसीलिये वे एक परिबुद्ध मानवतावादी के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं।</p>



<p>मानव की सम्पूर्ण अनुभूति को अभिव्यक्त करती लेखनी यह उदघोषित करती है कि साहित्य कुछ और नहीं वस्तुतः इस जीवन का ही प्रतिफल है। डॉ० रणवीर रांग्रा से बातचीत करते हुए डॉ० कारंत ने कहा है- </p>



<blockquote class="wp-block-quote has-medium-font-size is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p class="has-medium-font-size">&#8220;अपने आसपास के प्राणियों के प्रति संवेदनशील रहते हुए ही जीवन जीना चाहिये। यदि मैं अपने पर्यावरण के प्रति उदासीन रहता हूँ तो मेरा जीना रुक जाता है। जब भी मैं अतीत को मुड़ कर देखता हूँ, कृतज्ञता की भावना से अभिभूत हो उठता हूँ। मैं अपने लोगों का ऋणी हूँ- उनका भी जो जीवित हैं और जो बीत गये हैं उनका भी। मैं सम्पूर्ण सृष्टि का ऋणी हूँ जो मेरे, मेरे समकालीनों और मेरे पूर्वजों सरीखे मनुष्यों का भार वहन कर रही है। यदि हमारे पूर्वजों ने हमें अपना चिन्तन, ज्ञान और अनुभव न दिया होता तो हम अपनी संस्कृति के बहुत बड़े दाय से वंचित रह जाते। मुझ पर इतने लोगों का ऋण है कि मुझे लेखन के माध्यम से अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध कर अपना कर्त्तव्य पूरा करना चाहिये- मेरा वह लेखन वर्त्तमान और विगत तथा दूर और निकट के जीवन के प्रति योगदान के रूप में चाहे कितना ही अकिंचन क्यों न हो!&#8221;</p>
<cite>रणवीर रांग्रा : भारतीय साहित्यकारों से साक्षात्कार</cite></blockquote>



<h3 class="has-text-align-center has-luminous-vivid-orange-background-color has-background wp-block-heading"><strong>स्वयं लेखक के शब्दों में उनकी पुस्तकों पर एक दृष्टि</strong></h3>



<div class="wp-block-media-text is-stacked-on-mobile" style="grid-template-columns:23% auto"><figure class="wp-block-media-text__media"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/1369_PagleManKeDusChehre_L.webp 400w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="400" height="618" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/1369_PagleManKeDusChehre_L.jpg?x47177" alt="" class="wp-image-4423 size-full" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/1369_PagleManKeDusChehre_L.jpg 400w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/1369_PagleManKeDusChehre_L-194x300.jpg 194w" sizes="auto, (max-width: 400px) 100vw, 400px" /></picture></figure><div class="wp-block-media-text__content">
<p>&#8220;मैं अपने मन को पागल क्यों कहता हूँ? इसका कारण यह नहीं है कि यह पागलपन नहीं चाहता बल्कि उसे मैं पसन्द करता हूँ। ऐसे पागलपन के कारण अनेक ऐसे साहस करके जिन्हें करना नहीं चाहिए, मुझे अपनी और दुनिया का पागलपन समझ में आया है।… विष्णु के यदि दस अवतार हैं तो मेरे ध्येय ने सोलह अवतार लिये। देशप्रेम, स्वदेशी प्रचार, व्यापार, पत्रकारिता अध्यात्म साधना, कला के विभिन्न रूप फोटोग्राफी, नाटक, नृत्य, चित्रकला, वास्तुकला, संगीत सिनेमा-इतना ही नहीं समाज- सुधार, ग्रामोद्धार, शिक्षा के नये नये प्रयोग, उद्योग यह सब मेरे कार्य क्षेत्र रहे। और भी नये-नये प्रयोग चल ही रहे हैं।&#8230;. केवल अपनी खिड़की से बाहर झाँकनेवालों को भले ही इन सब परिवर्तनों में कोई परस्पर- सम्बन्ध न दीखे पर वास्तविकता ऐसी नहीं है। इस यात्रा में कोई और व्यक्ति यदि मेरे साथ होता तो उसे पता चलता कि यह सब यात्रा के अलग-अलग पड़ाव हैं।…&#8221;</p>
</div></div>



<div class="wp-block-media-text is-stacked-on-mobile" style="grid-template-columns:22% auto"><figure class="wp-block-media-text__media"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/10423_Mookajjee_L.webp 300w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="300" height="464" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/10423_Mookajjee_L.jpg?x47177" alt="" class="wp-image-4424 size-full" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/10423_Mookajjee_L.jpg 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/10423_Mookajjee_L-194x300.jpg 194w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></picture></figure><div class="wp-block-media-text__content">
<p>&#8220;मेरी पुस्तक ’मूकज्जी’ में यौन के मानवीय, अतीन्द्रिय व अन्य विविध पक्षों की चर्चा है, जो हमारे अतीत इतिहास में विकसित होते रहे गुहा-मानव से प्रारंभ होकर वर्तमान युग तक के लम्बे इतिहास-काल को समेटती है। यहाँ चर्चा है यौन की सर्जक शक्ति की, यौन के धार्मिक प्रतीक के रूप की, वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में यौन-स्थिति की। इन सबका तर्क-संगत पद्धति से विवरण है- यौन, एक सर्जक-शक्ति; यौन, एक धार्मिक प्रतीक; यौन, देवी-देवता के रूप में; यौन पौराणिक गाथाओं में; यौन वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में आदि।&#8221;</p>
</div></div>



<hr class="wp-block-separator has-alpha-channel-opacity is-style-wide"/>



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		<title>सीताकान्त महापात्र : समय और शब्द के कवि</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2009/09/blog-post_17-3.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Sep 2009 06:42:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article on Authors]]></category>
		<category><![CDATA[Odia Literature]]></category>
		<category><![CDATA[उड़िया साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[ज्ञानपीठ पुरस्कार]]></category>
		<category><![CDATA[रचनाकार]]></category>
		<category><![CDATA[सीताकान्त महापात्र]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>यथार्थ और अनुभूति के विरल सम्मिश्रण से निर्मित कविता के कवि डॉ० सीताकांत महापात्र का जन्मदिवस है आज। हिन्दी जगत में भली भाँति परिचित अन्य...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p>यथार्थ और अनुभूति के विरल सम्मिश्रण से निर्मित कविता के कवि डॉ० सीताकांत महापात्र का जन्मदिवस है आज। हिन्दी जगत में भली भाँति परिचित अन्य भाषाओं के कवियों में उड़िया के इस महत्वपूर्ण हस्ताक्षर का स्थान अप्रतिम है। डॉ० नामवर सिंह इन्हें ’समय और शब्द का कवि’ कहते हैं। इनके अनुसार समय को शब्द में और शब्द को समय में बदलना ही कवि की काव्य-साधना है जिसकी अन्तिम परिणिति संभवतः एक नयी शब्दहीनता है। डॉ० नामवर सिंह कवि की पुस्तक ’तीस कविता वर्ष’ की भूमिका लिखते हुए डॉ० सीताकान्त की शब्द-चिन्ता का रहस्य ढूँढ़ते मिलते हैं-</p>



<blockquote class="wp-block-quote has-medium-font-size is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p class="has-medium-font-size">जिसका विकल्प नहीं, वही कविता का संकल्प है। कवि की तलाश वही शब्द है- आदि शब्द, अनुभव मूल में निहित शब्द। क्या इसलिये कि प्रत्येक अनुभव शब्द्से अनुविद्ध है? क्या सीताकान्त की शब्द चिन्ता का रहस्य यही है? कौन जाने? कवि के सिवा और कौन जानता है कि अन्ततः टिकते हैं शब्द ही। शब्द को अक्षर कहा गया है। समय का क्या? आया और गया। किसकी मजाल है जो उसे पकड़ रखे। क्या इसीलिये कवि अपने समय को शब्द में बदलता रहता है।</p>
<cite>डॉ० नामवर सिंह : तीस कविता वर्ष पुस्तक की भूमिका</cite></blockquote>



<h3 class="wp-block-heading">डॉ० सीताकान्त महापात्र का काव्य संसार</h3>



<p>डॉ० सीताकान्त महापात्र का काव्य-संसार हिन्दी के पाठक के लिये पूर्णतया परिचित है । वह हिन्दी में भी उतने ही समादृत हैं जितने उड़िया में । विश्व की अनेकों भाषाओं में उनकी रचनाओं के अनुवाद कविता की संप्रेषणीयता एवं आज के संक्रमण काल में कविता की गंभीर प्रकृति व उसकी अर्थवत्ता के स्वीकार के प्रति आश्वस्त करते हैं । कविता को अनवरत साधना और तपस्या का पर्याय मानने वाले इस कवि की एक कविता में &#8211; जिसका शीर्षक है <strong>’समय का शेष नाम’</strong>  &#8211; कवि कविता को जन्म-जन्मांतर की वर्णनातीत साधना सिद्ध करता है &#8211;</p>



<p>&#8220;कभी-कभी लगता है<br>अब हमारे चारों ओर रुद्ध हो रहे<br>बेशुमार शब्द, शब्द ही शब्द<br>खचाखच, रेल-पेल, हाव-भाव,<br>घटाटोप शब्दों पर<br>शब्द रूप, शब्द रस<br>शब्द गंध, शब्द स्पर्श<br>न तुम मुझे देख पाती, न मैं तुम्हें<br>मेरे हाथ से बिछुड़कर खो जाती<br>शब्दों की भीड़ में तुम<br>डूब जाती शब्दों के समुद्र में<br>उन्हीं शब्दों के ढेर को उलीच कर<br>मैं खो जाता तुम्हें<br>कान या नाक में पानी भरने पर<br>याद करता तुम्हें<br>इतना कहने कि<br>सारे शब्द मरने के बाद जो रहता है, वही है प्रेम<br>और सारे शब्द चुक जाने के बाद जो बचता है, वह है कविता।&#8221;</p>





<p style="text-align: justify;"><strong><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/09/Sitakant_Mahapatra.webp 512w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-4429 alignright" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/09/Sitakant_Mahapatra-257x300.jpg?x47177" alt="सीताकान्त महापात्र" width="153" height="178" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/09/Sitakant_Mahapatra-257x300.jpg 257w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/09/Sitakant_Mahapatra.jpg 512w" sizes="auto, (max-width: 153px) 100vw, 153px" /></picture></strong></p>
<h3><span style="color: #ff6600;">परिचय</span></h3>
<p style="text-align: justify;"><strong>जन्म</strong>: 17 सितम्बर, 1937- महँगा, जिला-कटक (उड़ीसा); <strong>मातृभाषा</strong>: उड़िया; <strong>शिक्षा:</strong> एम०ए० (इलाहाबाद), डी०ओ०डी०एस० (कैम्ब्रिज), पी-एच०डी० (उत्कल वि०वि०); <strong>पुरस्कार-सम्मान</strong>: फेलो इण्टरनेशनल अकादमी ऑफ पोएट्स, भाभा फेलोशिप, साहित्य अकादेमी पुरस्कार (1974), सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (1983), भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान (1993) आदि; प्रमुख <strong>साहित्यिक कृतियाँ</strong>: दीप्ति ओ द्युति, अष्टपदी, शब्दार आकाश (साहित्य अकादेमी), समुद्र, चित्र नदी, आरा दृश्य, सूर्य तृष्णार, इत्यादि व हिन्दी में अनेकों कविता पुस्तकें अनुदित यथा लौट आने का समय, समय का शेष नाम, तीस कविता वर्ष, अपनी स्मृति की धरती आदि। अनेकों अन्य भाषाओं में रचनाओं का अनुवाद।</p>





<p>सीताकान्त महापात्र आधुनिक कवि हैं &#8211; शिल्प में भी, कथ्य में भी, परन्तु परम्परा से संयुक्त। परम्परा का स्वीकार, उसकी प्रकृति-विकृति का सम्यक परीक्षण एवं उससे प्राप्त सम्पदा का वर्तमान की जटिलता के सांगोपांग विवेचन में उपयोग, डॉ० सीताकान्त की कविता की मूल विशेषतायें हैं। आधुनिकता परम्परा से सार्थक रूप से समन्वित होकर एक नयी अभिव्यंजना की पृष्ठभूमि रचती है। यह समन्वय केवल भावात्मक व बौद्धिक स्तर पर नहीं है इस कवि में, बल्कि उनकी पूरी सर्जना और उनके व्यक्तित्व में भी सहज ही परिलक्षित है। परम्परा और आधुनिकता के सम्बंध को व्याख्यायित करते हुए डॉ० सीताकान्त कहते हैं-</p>



<p><strong><em>&#8220;परम्परा रक्त में घुली रहती है, आँख-कान उसी क़ायदे से देखते हैं, दिमाग नए क़ायदे से देखना सीखता है, समझता है। बहुत कुछ नहीं भी समझता। वही टेंशन, तनाव, द्वंद्व, विरोधाभास की नई परंपरा बनता है और मैं उसे कविता में खींच लेता हूँ। वैसे परंपरा कोई निर्दिष्ट बिन्दु नहीं है। वह इतिहास का कारागार भी नहीं है। यथार्थ को देखने का क़ायदा परम्परा से मिलता है, वास्तविक आधुनिकता तो परम्परा का नवीनतम रूप है, उसका नव-कलेवर है, आत्मिक उद्वर्तन है।&#8221;</em></strong> (भारतीय साहित्यकारों से साक्षात्कार : डॉ० रणवीर रांग्रा )</p>



<p>समकालीन भारत के दक्षतम कवियों में शुमार इस कवि ने कविता को नई काव्य-चेतना और नई संभावनायें दीं हैं। उन्होंने परम्परा और आधुनिकता का सार्थक समन्वय किया है। वे दुख और वेदना में भी मानव के गहनतम आनन्द की खोज अपनी कविता में करने वाले, पारंपरिक प्रतीकों का प्रयोग करने वाले, विराट फलक पर जीवन के इंद्रधनुषी आयाम प्रकट करने वाले कालजयी कवि हैं। आज इस कवि का पुण्य स्मरण मेरे मुझमें असीम श्रद्धा का सन्निवेश कर रहा है। विनत!</p>



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		<title>हजारी प्रसाद द्विवेदी की रचनाओं में मानवीय संवेदना</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2009/08/%e0%a4%b9%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%a6%e0%a5%80.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 18 Aug 2009 20:00:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article on Authors]]></category>
		<category><![CDATA[मानवीय संवेदना]]></category>
		<category><![CDATA[रचनाकार]]></category>
		<category><![CDATA[हजारी प्रसाद द्विवेदी]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी साहित्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>ऋग्वेद में वर्णन आया है : ‘शिक्षा पथस्य गातुवित’, मार्ग जानने वाले , मार्ग ढूढ़ने वाले और मार्ग दिखाने वाले, ऐसे तीन प्रकार के लोग...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2009/08/%e0%a4%b9%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%a6%e0%a5%80.html">हजारी प्रसाद द्विवेदी की रचनाओं में मानवीय संवेदना</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-drop-cap">ऋग्वेद में वर्णन आया है :<strong> ‘शिक्षा पथस्य गातुवित</strong>’, मार्ग जानने वाले , मार्ग ढूढ़ने वाले और मार्ग दिखाने वाले, ऐसे तीन प्रकार के लोग होते हैं। साहित्यिकों की गणना इस त्रिविध वर्ग में होती है। सबसे अधिक योग्यता मैं उनकी मानता हूँ जो मार्ग ढूंढ़ने वाले होते हैं, जो नये मार्ग खोजते हैं, बहुत हिम्मत से आगे बढ़ते जाते हैं। </p>



<p>हजारी प्रसाद द्विवेदी जी मानव संवेदना की अटवी में कुछ ऐसे ही मार्ग-संधानकर्त्ता की पृष्ठभूमि रचने वाले साहित्यकार हैं जहाँ है सब के केन्द्र के मनुष्य, उसका संघर्ष, उसकी जिजीविषा और ‘मानव तुम सबसे सुन्दरतम’ की अप्रतिहत आस्था। अशोक के फूल की ये पंक्तियाँ द्विवेदी जी के मानवीय संवेदना के चितेरे होने का प्रतिफलन ही तो हैं-</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>‘‘समूची मनुष्यता जिससे लाभान्वित हो, एक जाति दूसरी जाति से घृणा न करके प्रेम करे, एक समूह दूसरे समूह को दूर रखने की इच्छा न करके पास लाने का प्रयत्न करे, कोई किसी का आश्रित न हो, कोई किसी से वंचित न हो। इस महान उद्देश्य से ही हमारा साहित्य प्रणोदित होना चाहिये।’’</p>
</blockquote>



<h3 class="wp-block-heading">मानवीय संवेदनाओं का चितेरा साहित्यकार</h3>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignright size-full is-resized"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/08/Hajari-Prasad-DwediE0A4B5E0A587E0A4ACE0A4A6E0A581E0A4A8E0A4BFE0A4AFE0A4BE.webp 240w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="240" height="320" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/08/Hajari-Prasad-DwediE0A4B5E0A587E0A4ACE0A4A6E0A581E0A4A8E0A4BFE0A4AFE0A4BE.jpg?x47177" alt="हजारी प्रसाद द्विवेदी की रचनाओं में मानवीय संवेदना" class="wp-image-416" style="width:253px;height:auto" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/08/Hajari-Prasad-DwediE0A4B5E0A587E0A4ACE0A4A6E0A581E0A4A8E0A4BFE0A4AFE0A4BE.jpg 240w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/08/Hajari-Prasad-DwediE0A4B5E0A587E0A4ACE0A4A6E0A581E0A4A8E0A4BFE0A4AFE0A4BE-225x300.jpg 225w" sizes="auto, (max-width: 240px) 100vw, 240px" /></picture></figure>
</div>


<p>मानव संवेदनाओं के सहभागी के रूप में, उसके चितेरे साहित्यकार के रूप में हजारी प्रसाद द्विवेदी यह उद्घोषित करते हुये दीखते हैं कि जीवन किस प्रकार का है, यह हमें नहीं देखना चाहिये। जहाँ उत्तम जीवन है, वहीं उत्तम विचार संभव है -यह तो सामान्य नियम हुआ। लेकिन किसी कारण अन्दर अन्दर एक चिन्तन प्रवाह होता है, तद्नुसार वाह्य का जीवन नहीं बनता। फिर भी अन्तर में परम रमणीय उन्नत विचार हो सकते हैं। दुनियाँ में सब कुछ कार्य-कारण के नियम से चलता, तो भगवान को कोई तकलीफ नहीं देनी पड़ती । आरोग्यवान शरीर में आरोग्यवान मन हो, इस सामान्य नियम के लिये असंख्य अपवाद हुये हैं और होंगे। </p>



<p>द्विवेदी जी संसार में बरतने वाले सामान्य जनों के लिये अत्यंत प्रेम रखकर, चित्त में उनके लिये पक्षपात रखकर सर्वोत्तम साहित्य का सृजन करने वाले कालजयी रचनाकार हैं &#8211; उनमें मानवीय संवेदना के लिये विकारों से परिपूर्ण निर्लिप्तता है। उनमें बुखार के प्रति हमदर्दी दिखाने वाले वैद्य का लक्षण है। बुखार को ठीक पहचान कर उसके निवारण के लिये दवा भी बताते हैं-</p>



<div class="wp-block-cover is-light" style="min-height:300px;aspect-ratio:unset;"><span aria-hidden="true" class="wp-block-cover__background has-light-green-cyan-background-color has-background-dim-30 has-background-dim"></span><div class="wp-block-cover__inner-container is-layout-flow wp-block-cover-is-layout-flow">
<div class="wp-block-group"><div class="wp-block-group__inner-container is-layout-constrained wp-block-group-is-layout-constrained">
<p class="has-black-color has-text-color has-link-color wp-elements-e6e13974e031aff234509e5cfa93b7f6">‘‘डरना किसी से भी नहीं । लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं।’’</p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color wp-elements-a24dbda8b5b74095d826f7a8837bae80">‘‘जो मेरा सत्य है वह यदि वस्तुत: सत्य है, तो वह सारे जगत का सत्य है, व्यवहार का सत्य है, परमार्थ का सत्य है &#8211; त्रिकाल का सत्य है।’’</p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color wp-elements-21e02b0a1f8b0c6c79f7391e291a33e9">‘‘देख बाबा, इस ब्रह्माण्ड का प्रत्येक अणु देवता है, त्रिपुर सुन्दरी ने जिस रूप में तुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है, उसी की पूजा कर।’’ (बाणभट्ट की आत्मकथा)</p>
</div></div>
</div></div>



<h3 class="wp-block-heading">सर्जना आख़िर है क्या? </h3>



<p>श्री रामदरश मिश्र ने कहा है-&nbsp;<em>‘‘आखिर सर्जना है क्या? वह मनुष्य के भावों, संवेदनाओं और विचारों की एक कलात्मक अन्विति है।&#8221;&nbsp;</em>लेकिन पंडित जी की सर्जना यहीं रुकती नहीं, वे इससे बड़ी सर्जना करते हैं- वह है मानवीय जिजीविषा, विश्वास और मूल्यों की सर्जना। उनके शोध भी, उनकी आलोचना भी, उनके उपन्यास भी, उनके निबंध भी, उनके भाषण भी, उनकी बातचीत भी, उनका व्यवहार भी उसी मनुष्य की खोज और सृष्टि करते हैं जो गतिशील है, जो अपनी अपार जिजीविषा को लिये हुये इतिहास की दुर्गम घाटियाँ पार करता आ रहा है।</p>



<p>वे मानव धर्म की स्थापना मनुष्य के आदर्शों का सरलीकरण करके नहीं करते, उसे उसके द्वंद्व में देखते हैं। मनुष्य के भीतर पशु और देवता का द्वंद्व चलता रहता है, चलता आ रहा है। उसके भीतर की प्राकृतिक पशुता बार-बार सिर उठाती है किन्तु उसका अर्जित देवत्व बार-बार उसे नीचे ढकेलता है। नाखून पशुता की निशानी हैं। नाखून बार-बार बढ़ते हैं, मनुष्य बार-बार उन्हें काटता है। वह नहीं चाहता कि उसकी पशुता उसपर हावी हो जाय। नाखून के बढ़ने और काटने का संघर्ष लगातार चला आ रहा है और पंडित जी विश्वास व्यक्त करते हैं कि कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़े, मनुष्य एक दिन इन्हें काटकर ही रहेगा।</p>



<h3 class="wp-block-heading">मानवीय संवेदना के रसवादी साहित्यकार द्विवेदी जी</h3>



<p><a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B9%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A6_%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A5%80" target="_blank" rel="noreferrer noopener">द्विवेदी जी</a> मानवीय संवेदना के <strong>‘भावानुभावव्यभिचारीभावसंयोगात्रसनिष्पित्त:</strong>’ के स्वयंसिद्ध रसवादी साहित्यकार हैं- <strong><em>&#8220;There is always a difference between an eager man wanting to read a book and a tired man wanting a book to read&#8221;.</em></strong> </p>



<p>हजारी प्रसाद जी समय को आक्रांत करते हैं, समय काटते नहीं। मानव संवेदना की किताब का इतना उत्सुक वाचक हिन्दी साहित्य में तो दुर्लभ ही है, विश्व साहित्य में भी शायद विरला ही मिले। उनके साहित्य में वस्तुनिष्ठा है, जीवन निष्ठा है और साथ-साथ लोकनिष्ठा है। द्विवेदी जी मानवीय संवेदना को समेटे हुये जब मनुष्य और सृष्टि का स्पर्श करते हैं तो जड़ वस्तु जड़ नहीं रह जाती और मनुष्य निरीह प्राणी नहीं रह जाता-</p>



<p>‘‘जीना चाहते हो? कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो; वायुमण्डल को चूसकर, झंझा-तूफान को रगड़कर, अपना प्राप्य वसूल लो; आकाश को चूमकर अवकाश की लहरी में झूमकर उल्लास खींच लो। कुटज का यही उपदेश है &#8211;</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>भित्वा पाषाणपिठरं छित्वा प्राभंजनीं व्यथाम्<br>पीत्वा पातालपानीयं कुटजश्र्चुम्बते नभ: ।</p>
</blockquote>



<p>दुरन्त जीवन-शक्ति है! कठिन उपदेश है। जीना भी एक कला है। लेकिन कला ही नहीं, तपस्या है। जियो तो प्राण ढाल दो जिन्दगी में, मन ढाल दो जीवनरस के उपकरणों में।’’यह एक अनूठी कला है, एक निराली रसिकता है, जिसे हजारी प्रसाद जी ने आत्मसात किया।</p>



<h3 class="wp-block-heading">मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है</h3>



<p>मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है में यह कहते हुये कि <em>‘साहित्य केवल बुद्धि विलास नहीं है, वह जीवन की उपेक्षा करके नहीं रह सकता’</em>, उन्होंने यह संवेदित कर दिया है &#8211;<em>‘‘साहित्य के उपासक अपने पैर के नीचे की मिट्टी की उपेक्षा नहीं कर सकते। हम सारे बाह्य जगत् को असुन्दर छोड़कर सौन्दर्य की सृष्टि नहीं कर सकते। सुन्दरता सामंजस्य का नाम है। जिस दुनिया में छोटाई और बड़ाई में, धनी और निर्धन में, ज्ञानी और अज्ञानी में आकाश-पाताल का अंतर हो, वह दुनिया बाह्य सामंजस्यमय नहीं कही जा सकती और इसीलिये वह सुन्दर भी नहीं है। इस बाह्य असुन्दरता के ‘ढूह’ में खड़े होकर आन्तरिक सौन्दर्य की उपासना नहीं हो सकती। हमें उस बाह्य असौन्दर्य को देखना ही पड़ेगा। निरन्न, निर्वसन जनता के बीच खड़े होकर आप परियों के सौन्दर्य-लोक की कल्पना नहीं कर सकते।&#8221; </em></p>



<p>&#8220;<em>साहित्य सुन्दर का उपासक है, इसीलिये साहित्यिक को असामंजस्य को दूर करने का प्रयत्न पहले करना होगा, अशिक्षा और कुशिक्षा से लड़ना होगा, भय और ग्लानि से लड़ना होगा। सौन्दर्य और असौन्दर्य का कोई समझौता नहीं हो सकता। सत्य अपना पूरा मूल्य चाहता है। उसे पाने का सीधा और एकमात्र रास्ता उसकी कीमत चुका देना ही है। इसके अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता नहीं है।’’</em></p>



<p>द्विवेदी जी ‘फ्रायड’ के <em>Homo-Psycologicus </em>(मन:प्रधान मानव) को नहीं जानते। वे ‘मार्क्स’ के <em>Homo-Economicus</em> (अर्थस्य पुरुषोदास) को नहीं पहचानते। वे बुद्धिवादियों के <em>Homo-Shapian</em> (बुद्धिप्रधान मानव) से भी वाकिफ नहीं हैं। वे एक सामान्य समन्वित मानव की सावित इन्सान की जिन्दगी का जायका पहचानते हैं। उनका रचनाकार जिजीविषा में मशगूल है और यही उनकी मानवीय संवेदना की यथार्थ वैज्ञानिकता है। </p>



<h3 class="wp-block-heading">मनुष्य की जय यात्रा में विश्वास रखने वाले साहित्यकार</h3>



<p>द्विवेदी जी अपनी रचना में जीवन की सुगंध का अनुभव करना चाहते हैं, जीवन की प्रतिष्ठा देखना चाहते हैं। उपनिषद का अभिवचन है-<strong> ‘‘अन्नमयं हियोम्यमन: आपोमया: प्राणा: तेजोमय वाक् ।</strong>’’ मनुष्य का तेज उसकी वाणी में प्रकट होता है। वह तेज हृदय की भावना से आता है, जीवन की प्रतीतियों से उत्पन्न होता है। ये प्रतीतियाँ जितनी व्यापक और उदात्त होंगी, उनका आशय जितना भव्य और सुन्दर होगा, उतना सुमांगल्य और सौमनस्य सिद्ध होगा। श्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी’ ने लिखा है कि &#8211;</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>‘‘जिन लोगों ने द्विवेदी जी को भाषण देते हुये देखा होगा उन्होंने खुद उनके व्यक्तित्व में भी इस छटपटाहट को जरूर लक्ष्य किया होेगा।&#8230;&#8230;मनुष्य द्विवेदी जी की दृष्टि में चित् का स्फुरण है। इस मनुष्य में उनकी आस्था कभी खंडित नहीं होती। वे मनुष्य की जय-यात्रा में अखंड विश्वास रखते हैं।’’ मानवीय संवेदना के इस चितेरे को उस साहित्य को साहित्य कहने में ही संकोच होता है ‘जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गतिहीनता, परमुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके।’’</p>
</blockquote>



<h3 class="wp-block-heading">जीवन निष्ठा और द्विवेदी जी का साहित्य</h3>



<p>जैनेन्द्र कुमार ने कहा है कि,‘<strong>‘मुझको सूझता है कि साहित्य वह है, जिसमें हित सत् के साथ है।</strong> ‘हित’ के साथ जो ‘स’ लगा है, उसे सत् का प्रतीक हम मान लें। सत् और हित इन दोनों को साथ रखना बड़ी कला है। साहित्य की और शायद जीवन की कला वही है।’’ द्विवेदी जी ने मानवीय संवेदना के प्रस्तुतीकरण में सच में ही ‘सत्’ को ‘हित’ के साथ बनाये रखा है, और यह भाव अनन्त काल तक हमें संवेदित करता रहेगा, क्योंकि साहित्य तो कभीं असमर्थ हुआ नहीं है, हो नहीं सकता। जीवन निष्ठा और साहित्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी में एकरूप हो गये हैं। मानवीय संवेदना की चित्त में जो गहरी अनुभूति हुयी है, वह भाषा में सुन्दर रूप लेकर अपनी नित्यता को प्रतिष्ठित करना चाहती है। <a href="https://blog.ramyantar.com/2008/10/namvar-singh.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">श्री नामवर जी</a> ने इस तथ्य को बड़ी सदाशयता से स्वीकार किया है &#8211;</p>



<p>‘‘प्रसाद जी की श्रद्धा ने तो अपनी स्मिति रेखा से ज्ञान, इच्छा और क्रिया के त्रिपुर को ही आकाश में एकजुट किया था, द्विवेदी जी की सर्जनात्मक कल्पना तो जाने कितनी असम्बद्ध वस्तुओं को एक सूत्र में बाँधती चलती है।’’&#8230;&#8230;‘‘आशय यह है कि वे ‘कोई तैयार सत्य उठाकर हमारे हाथ पर नहीं धरते।’’ जो कुछ भी है वह अपना अनुभूत सत्य। गहरी पीड़ा के बीच से निकले कुछ अनुभव-कण। और ऐसे चमकते हुए कण द्विवेदी जी के निबंधों में यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरे पड़े हैं &#8211; कहीं फूलों के ढेर में और कहीं धूल या राख की राशि में।’’(हजारी प्रसाद द्विवेदी:संकलित निबंध : भूमिका)</p>



<h3 class="wp-block-heading">स्वकीय जीवनानुभूति से रचा पगा साहित्य </h3>



<p>निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी उस कोटि के रचनाकार हैं जिन्होंने आगत विगत अनागत मानव की संवेदना के हार में गुंथे पुष्पों को अपनी स्वकीय जीवनानुभूति का रस दिया है। ‘विचार-प्रवाह’ के ‘मानव-सत्य’ शीर्षक निबंध में उन्होंने लिखा है &#8211;</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p><em>जिस काव्य या नाटक या उपन्यास के पढ़ने से मनुष्य में अपने छोटे संकीर्ण स्वार्थों के बन्धन से मुक्त होने की प्रेरणा नहीं मिलती तथा ‘महान एक’ की अनुभूति के साथ अपने-आपको दलित द्राक्षा के समान निचोड़ कर ‘सर्वस्य मूलनिषेचनं’ के प्रति तीव्र आकांक्षा नहीं जाग उठती, वह काव्य और वह नाट्य और वह उपन्यास दो कौड़ी के मोल का भी नहीं है।</em></p>
<cite>हज़ारी प्रसाद द्विवेदी </cite></blockquote>



<p>‘चारु-चन्द्रलेख’ में उन्होंने अक्षोभ्य भैरव से कहलवाया है &#8211;<em> ‘‘देख रे, अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र हर समय साथ-साथ नहीं चलते। देवी के चरणों में सिर रखकर शपथ कर कि तू सीधे जनता से सम्पर्क रखेगा, किसी को छोटा और किसी को बड़ा नहीं मानेगा, धरती को बपौती नहीं धरोहर समझेगा, सामन्ती प्रथा का उच्छेद करेगा। ऐसा करके ही तू वीर विक्रमादित्य की परम्परा का उत्तराधिकारी होगा।’’</em></p>



<p>निश्चय ही श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी मानव संवेदना के अप्रतिम स्रष्टा हैं, जैसा कवि चण्डीदास ने दुहराया &#8211;</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>‘‘शुनह मानुषभाइ<br>सबार ऊपरे मानुष सत्य<br>ताहार ऊपरे नाइ।’’</p>
</blockquote>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2009/08/%e0%a4%b9%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%a6%e0%a5%80.html">हजारी प्रसाद द्विवेदी की रचनाओं में मानवीय संवेदना</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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		<title>मास्ति वेंकटेश अय्यंगार : Masti Venkatesh Iyengar</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2009/06/masti-venkatesh-iyengar.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Jun 2009 19:04:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article on Authors]]></category>
		<category><![CDATA[Kannada Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Masti Venkatesh Iyengar]]></category>
		<category><![CDATA[रचनाकार]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>गहन मानवतावाद के पोषक और मानव मात्र में अटूट आस्था रखने वाले कन्नड़ के प्रख्यात साहित्यकार डॉ० मास्ति वेंकटेश अय्यंगार ने कन्नड़ कहानी को उल्लेखनीय...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p>गहन मानवतावाद के पोषक और मानव मात्र में अटूट आस्था रखने वाले कन्नड़ के प्रख्यात साहित्यकार डॉ० मास्ति वेंकटेश अय्यंगार ने कन्नड़ कहानी को उल्लेखनीय प्रतिष्ठा दी। सृजनात्मकता की असीम संभावनाओं से लबरेज ’मास्ति’ (मास्ति का साहित्यिक नाम श्रीनिवास था, और इसी नाम से उन्होंने अपना अधिकांश साहित्य रचा, पर पूरे कर्नाटक में वे ’मास्ति’ के नाम से ही प्रसिद्ध थे, और स्वयं भी इसी नाम से संबोधन उन्हें प्रिय था ) के साहित्य ने कन्नड़ साहित्य को आस्था का साहित्य दिया और शाश्वत मूल्य को अभिव्यक्त करती लेखनी जनप्रिय होती गयी। </p>



<p>परमसत्ता की असीम अनुकंपा एवं बुद्धिमत्ता में उनकी असीम श्रद्धा है। इसी श्रद्धा के वातायन से मास्ति निरखते हैं हमारी सांस्कृतिक और नैतिक सर्वोच्चता, और फिर उनकी रचनाओं में अभिव्यक्त होने लगती है जीवन की सार्थकता और अर्थवत्ता। यद्यपि अनेकों बार संशय होता है मास्ति को पढ़ते हुए कि कहीं शाश्वतता और मूल्यवत्ता को गहराई से कवर करने वाला यह रचनाकार मानुषिक स्वभाव, उसकी नियति और मानुषिक दुर्बलता के प्रति सहानुभुति को अपनी आँखों से ओझल तो नहीं कर रहा!</p>





<p style="text-align: justify;"><strong><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/06/Venkatesh_Iyengar2B25C225A92BKamat2527s2BPotpourri_thumb255B25255D.webp" type="image/webp" /><img decoding="async" class="alignright" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/06/Venkatesh_Iyengar2B25C225A92BKamat2527s2BPotpourri_thumb255B25255D.jpg?x47177" border="0" data-evernote-lazy-src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/06/Venkatesh_Iyengar2B25C225A92BKamat2527s2BPotpourri_thumb255B25255D.jpg?x47177" /></picture></strong></p>
<h3><span style="color: #ff6600;">मास्ति वेंकटेश अय्यंगार : Masti Venkatesh Iyengar</span></h3>
<p style="text-align: justify;"><strong>जन्म:</strong> 6 जून, 1891- मास्ति, जिला कोलार(कर्नाटक);<strong> निधन:</strong> 6 जून, 1986; <strong>मातृभाषा</strong>: तमिल; <strong>लेखन</strong>: कन्नड़;<strong> पुरस्कार/सम्मान:</strong> साहित्य अकादेमी पुरस्कार-1968, डी० लिट०-कर्नाटक वि०वि०, फेलो-साहित्य अकादेमी-1974, भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार-1983;<strong> प्रमुख कृतियाँ:</strong> काव्य<em>&#8211;</em>अरुण, मलर, मूकन मक्कलु, मानवी, संक्रान्ति; उपन्यास: चेन्नबसव  नायक, चिक्क वीरराजेन्द्र, सुबण्णा, शेषम्मा; नाटक: यशोधरा, काकन कोटे, पुरंदरदास; आत्मकथा: भाव (तीन भागों में); संपादन: जीवन (मासिक)। </p>





<p>मास्ति वेंकटेश अय्यंगार के मानवतावाद का श्रोत है उनका यह विश्वास कि मानव उस अदृश्य शक्ति के हाथ का खिलौना है। यह अटूट आस्था भाव ही उनके साहित्य की अन्तर्धारा का निर्माण करती है, और यह रचनाकार अपने आत्मकथ्य में बोल पड़ता है &#8211;<strong> &#8220;हमारा साहित्य ईश्वर को स्वीकार करे या नकार दे, यह कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है। ईश्वर के हर्ष और विषाद से हमें कुछ लेना देना नहीं है। हमें तो मनुष्य के सुख-दुख की चिन्ता होनी चाहिये। मनुष्य में ऐसी आस्था दे जो उसे जीवन के सुख-दुख को समान भाव से स्वीकार करने की शक्ति प्रदान करती रहे।&#8221; </strong></p>



<p><a href="https://blog.ramyantar.com/2009/08/%e0%a4%b9%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%a6%e0%a5%80.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">मानव के प्रति ऐसी आस्था</a> रखने वाला यह सर्जक साहित्य के प्रति कितनी उत्कृष्ट और उदात्त भावना रखता है, इसे भी देखें &#8211;<strong> &#8221; मानव के उत्थान के लिये साहित्य बड़ा सशक्त माध्यम है। वह मनुष्य को पशु से देवता बनाता है। मानवोन्नति के लिये ज्ञान, भक्ति और कर्म तीन मार्ग बताये गये हैं । उनके अलावा चौथा साहित्य मार्ग भी है। साहित्य का मार्ग सर्वोत्तम मार्ग है।&#8221;</strong></p>



<p><a href="http://lh4.ggpht.com/_21h5Tz52DZo/Simr2qjogjI/AAAAAAAAAT4/GNPpBX_vld4/s1600-h/subanna10.png"></a>मास्ति के रचनाकर्म की विशेषता है कि वह अपनी अभिव्यक्ति में अत्यन्त सरल और प्रभावी होता है। इस सरलता में मास्ति पिरोते हैं भाव-भावना के मनके और फिर निर्मित होती है अत्यन्त प्राणवंत, अर्थयुक्त रचना प्रक्रिया जिससे मास्ति पाठक को हर क्षण विभोर करते चलते हैं। पाठक तत्क्षण ही समझता है उनका मंतव्य और वस्तुतः यही रचनाकर्म का उद्देश्य ही है। लेखक और पाठक का अन्तराल निर्मित ही नहीं होता मास्ति की रचनायें पढ़ते हुए।  मास्ति के कृतित्व ने बहुत से महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय कृतियों और पात्रों का सृजन किया है जो सम्पूर्ण कन्नड़ साहित्य में आदर्श रूप में पूर्ण प्रतिष्ठित और समादृत हैं। इस महनीय़ व्यक्तित्व का पुण्य स्मरण!</p>
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		<title>एन०वी० कृष्ण वारियर की कविता: सूरज की मृत्यु</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2009/05/blog-post_13-8.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 12 May 2009 23:28:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article on Authors]]></category>
		<category><![CDATA[Literary Classics]]></category>
		<category><![CDATA[Kerala Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Malayalam Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Malayalam Poet]]></category>
		<category><![CDATA[N. V. Krishna Warrier]]></category>
		<category><![CDATA[Sahitya Akademy Award]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आज एन०वी० कृष्ण वारियर (N. V. Krishna Warrier) का जन्मदिवस है। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित एन०वी० कृष्ण वारियर मलयालम साहित्य के बहुप्रतिष्ठित और समादृत...</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-drop-cap">आज <strong>एन०वी०</strong> <strong>कृष्ण</strong> <strong>वारियर</strong> (<a href="https://en.wikipedia.org/wiki/N._V._Krishna_Warrier">N. V. Krishna Warrier</a>) का जन्मदिवस है। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित एन०वी० कृष्ण वारियर मलयालम साहित्य के बहुप्रतिष्ठित और समादृत कवि-साहित्यकार हैं। हिन्दी में छपे एक साक्षात्कार से इस कवि को पहले पहल जाना, और उसमें छपी इनकी कविताओं के अंशों ने भीतर तक प्रभावित किया मुझे। आज इस कवि का स्मरण करते हुए इनकी कविता सूरज की मृत्यु का वही अंश प्रस्तुत आपके लिये भी।</p>



<hr class="wp-block-separator has-alpha-channel-opacity is-style-wide"/>



<h3 class="wp-block-heading" id="0-%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%9C-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%81-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%B6">सूरज की मृत्यु कविता का एक अंश</h3>



<p>यह हिन्दी अनुवाद किसने किया, यह वास्तविक रूप से ज्ञात नहीं। परंतु इस कविता को लिया है डॉ० रणवीर रांग्रा द्वारा लिये गये उनके साक्षात्कार से। अनुवाद शायद रांग्रा जी का ही हो।</p>



<pre class="wp-block-verse">हमारा सूरज क्षितिज पर उतरता जा रहा था<br>लेकिन हमारी क्षमा अस्त हो चुकी थी<br>हमने सूरज को गोली मार कर गिरा दिया<br>समुन्दर लाल हो गया<br>पल भर के लिये सिर्फ<br>फिर वह काला हो गया<br>आकाश काला हो गया<br>पृथ्वी काली हो गयी<br>कालिमा घनी होती रही<br>अब भी वह घनी होती ही रहती है<br>सूरज में जो मरा वह क्या था ?<br>वह हमारी रोशनी थी<br>हमारी मानवता थी।</pre>



<hr class="wp-block-separator has-text-color has-pale-pink-color has-alpha-channel-opacity has-pale-pink-background-color has-background is-style-wide"/>



<div class="wp-block-group"><div class="wp-block-group__inner-container is-layout-constrained wp-block-group-is-layout-constrained">
<h3 class="wp-block-heading" id="1-%E0%A4%8F%E0%A4%A8%E0%A5%A6%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A5%A6-%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3-%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%AF"><strong>एन०वी०</strong> <strong>कृष्ण</strong> <strong>वारियर</strong> : परिचय</h3>


<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignright size-full is-resized"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/05/N.V.2BKrishna.webp 320w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="320" height="200" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/05/N.V.2BKrishna.jpg?x47177" alt="N.V.Krishna" class="wp-image-507" style="width:420px;height:auto" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/05/N.V.2BKrishna.jpg 320w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/05/N.V.2BKrishna-300x188.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 320px) 100vw, 320px" /></picture></figure>
</div>


<p><strong>जन्म:</strong> 13 मई, 1916 &#8211; नेरुविश्शेरि, जिला त्रिचूर (केरल); <br><strong>शिक्षा:</strong> साहित्य शिरोमणि, एम०ए० एम० लिट०; <br><strong>पुरस्कार/सम्मान:</strong> साहित्य अकादेमी पुरस्कार-1979, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार-1971 एवं अन्य। <br><strong>प्रमुख कृतियाँ:</strong> नीटा कवितगल (1951), कुरेक्कुतिनीनता कवितगल (1951), कोच्चुतोम्मन (1955), गांधीय गौडसेय (1967), वल्लतोलिंट काव्य शिल्पं (1977), ए हिस्ट्री ऑफ मलयालम मीटर (1978), आदि। <br><strong>अन्य:</strong> ’मातृभूमि’ का सम्पादन (1950-1968), <strong>संस्थापक निदेशक:</strong> केरल राज्यभाषा संस्थान (1968-1975), ’कुंकुम’ साप्ताहिक के मुख्य सम्पादक, इत्यादि। <br><strong>निधन:</strong> 12 अक्टूबर, 1989</p>
</div></div>



<hr class="wp-block-separator has-text-color has-pale-pink-color has-alpha-channel-opacity has-pale-pink-background-color has-background is-style-wide"/>



<p>साहित्यिक विभूतियों पर केन्द्रित अन्य आलेख&nbsp;<a href="https://blog.ramyantar.com/category/article/article-on-authors">Article on Authors</a>&nbsp;श्रेणी पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।</p>
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		<title>कृष्णचन्द्र बेरी : बनारस के प्रकाशन पुरुष</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2009/03/krishna-chandra-beri.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 10 Mar 2009 05:07:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article on Authors]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Literary Figures]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Pracharak Sansthan]]></category>
		<category><![CDATA[Krishnachandra Beri]]></category>
		<category><![CDATA[Publisher]]></category>
		<category><![CDATA[Varanasi]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बनारस के प्रकाशन-संस्थानों में हिन्दी प्रचारक संस्थान एवं इसके प्रकाशक-निदेशक श्री कृष्णचन्द्र बेरी का एक विशेष महत्व है। महत्व मेरी दृष्टि में इसलिये है कि...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p>बनारस के प्रकाशन-संस्थानों में <strong>हिन्दी प्रचारक संस्थान</strong> एवं इसके प्रकाशक-निदेशक श्री कृष्णचन्द्र बेरी का एक विशेष महत्व है। महत्व मेरी दृष्टि में इसलिये है कि इस संस्थान ने मेरी पठन-रुचि को तुष्ट करने में बड़ी भूमिका निभायी है। मेरे जैसे सामान्य आर्थिक पृष्ठभूमि के अध्येता और पाठक के लिये पुस्तकों के अतिशय मूल्य के कारण अपनी पुस्तक-रुचि के बलिदान के अलावा कोई चारा नहीं था। </p>



<p>ऐसे समय में जब मेरी अध्येता-वृत्ति अनेकानेक पुस्तकों का पारायण चाहती थी, पुस्तकें खरीद कर पढ़ना असम्भव लगता था। कई प्रकाशकों के सूची-पत्र मंगा लिये थे, केवल कम मूल्य की पुस्तकों की खोज के क्रम में। इसी प्रक्रिया में हिन्दी प्रचारक संस्थान के सूची-पत्र ने आकृष्ट किया। कम मूल्य की पुस्तकें और उपयोगी और मूल्यवान पुस्तकें साफ ही दिख गयीं मुझे। अनेकों किताबें धीरे-धीरे मंगा कर पढ़ लीं और पुस्तक-पठन की प्रक्रिया ने गति पकड़ ली। मैंने कई बार हिन्दी प्रचारक संस्थान की यात्रा की और प्रकाशक तथा प्रकाशन दोनों से जुड़ा। </p>



<h3 class="wp-block-heading">कृष्णचन्द्र बेरी : हिन्दी प्रकाशन जगत के शलाका-पुरुष</h3>



<p>आज इस प्रकाशन-संस्थान के संस्थापक <strong>श्री कृष्णचन्द्र बेरी</strong> का जन्म-दिवस है। कृष्णचन्द्र बेरी केवल बनारस की पत्रकारिता और प्रकाशन व्यवसाय के शलाका-पुरुष ही नहीं थे, अपितु पूरे भारतीय प्रकाशन जगत में उनका स्थान अन्यतम है। चालीस से भी अधिक पुस्तकों के लेखक तथा विभिन्न गोष्ठियों में पढ़े गये १०० से अधिक प्रबंधों के प्रणेता श्री बेरी ने अपनी बाल्यावस्था से ही संघर्षशीलता और कर्तव्य-भावना से हिन्दी प्रकाशन और पुस्तक-व्यवसाय में अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा का परिचय दे दिया। हिन्दी प्रचारक संस्थान की ’प्रचारक बुक-क्लब’ और ’प्रचारक ग्रंथावली परियोजना’ जैसी योजनाओं का प्रारंभ कर उन्होंने एक नए युग का सूत्रपात किया।</p>



<h3 class="wp-block-heading">व्यक्तित्व एवं कृतित्व</h3>



<p style="text-align: justify;"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/03/1399145_777018195706531_909031871678179402_o.webp 697w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" class="size-medium wp-image-4452 alignright" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/03/1399145_777018195706531_909031871678179402_o-204x300.jpg?x47177" alt="प्रकाशकनामा - कृष्णचन्द्र बेरी" width="204" height="300" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/03/1399145_777018195706531_909031871678179402_o-204x300.jpg 204w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/03/1399145_777018195706531_909031871678179402_o.jpg 697w" sizes="auto, (max-width: 204px) 100vw, 204px" /></picture>श्री कृष्णचन्द्र बेरी का जन्म काशी मे १० मार्च १९२० को हुआ। बचपन से ही आप पिता श्री निहालचन्द्र बेरी के पुस्तक व्यवसाय से जुड गये। विद्यासागर कालेज तथा स्काटिश चर्च कालेज, कलकत्ता में एक मेधावी छात्र के रूप में आप सदैव उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण होते रहे, किंतु सामाजिक और राष्ट्रीय संघर्ष के विघ्न ने स्नातक की शिक्षा पूरी न होने दी। पुस्तक व्यवसाय के सिलसिले में सोलह वर्ष की आयु में आपने मलाया, बर्मा, पूर्वी बंगाल आदि अनेक स्थानों की यात्रा की। १६ वर्ष की उम्र में ही बंगाल छात्र फेडरेशन के बड़ा बाजार शाखा के मंत्री बने। भारतीय स्वंतंत्रता संग्राम के प्रसंग में नेता जी सुबास चन्द्र बोस के सम्पर्क में आये।</p>
<p>सोलहवें वर्ष में ही हिटलर की आत्मकथा ’मेनकांम्फ’ का पहला हिन्दी अनुवाद <strong>मेरा जीवन संग्राम</strong> नाम से प्रस्तुत किया। प्रकाशक, लेखक और सम्पादक तीनों ही रूपों में आप प्रसिद्ध हैं। चार बार ’अखिल भारतीय हिन्दी प्रकाशक संघ’ के अध्यक्ष रह चुके बेरी जी को आपके वृहद कार्यों के फलस्वरूप इंडियन इन्स्टिट्यूट आफ पब्लिशिंग की ओर से १९९१ में ’हाल आफ फ़ेम’, फेडरेशन आफ इंडियन पब्लिशर की ओर से ’श्रेष्ठ प्रकाशक पुरस्कार’, नागरी प्रचारणी सभा-काशी द्वारा ’प्रकाशक शिरोमणि’ अलंकरण दिया गया है।</p>



<p>इसके अतिरिक्त भारतीय दलित साहित्य अकादेमी, हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, अ०भा० भोजपुरी परिषद आदि संस्थाओं ने आपको सम्मानित किया। आपका विशिष्ट ग्रंथ <strong>’पुस्तक प्रकाशन: संदर्भ और दृष्टि’</strong> और आपकी आत्मकथा ’<strong><a href="https://lalkila.blogspot.com/2013/03/blog-post_19.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">प्रकाशकनामा</a>’ </strong>हिन्दी प्रकाशन पर प्रकाश डालती महत्वपूर्ण कृतियां हैं।</p>
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		<title>करतार सिंह दुग्गल : कहानी कैसे बनी</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2009/03/kahani-kaise-bani.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Feb 2009 19:08:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article on Authors]]></category>
		<category><![CDATA[Literary Classics]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Literary Figures]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Literary Works]]></category>
		<category><![CDATA[Kartar Singh Duggal]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पिताजी की संग्रहित की हुई अनेकों किताबों में एक है कहानी कैसे बनी। उसे महीनों पहले पढ़ना शुरु किया था। कुल आठ कहानियों की यह...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p>पिताजी की संग्रहित की हुई अनेकों किताबों में एक है कहानी कैसे बनी। उसे महीनों पहले पढ़ना शुरु किया था। कुल आठ कहानियों की यह किताब मुझे अविश्वसनीय रचनाधर्मिता का उदाहरण लगी। मैंने इसे पूरा का पूरा पढ़ तो लिया पर उसका कथ्य, उसकी बनावट, उसका रचनात्मक कौशल– सब अन्तर में मथता रहा। आज अचानक उसकी चर्चा कर रहा हूं, क्योंकि आज उस कहानी की किताब के अप्रतिम सर्जक करतार सिंह दुग्गल का जन्म-दिवस है।</p>



<h3 class="has-text-color wp-block-heading" style="color:#e56e18">विशिष्ट कहानी &#8216;कहानी कैसे बनी&#8217; </h3>



<p>‘कहानी कैसे बनी’ पुस्तक की पहली रचना के नाम पर ही पुस्तक का नामकरण है। मैंने सुना था कि कहानी कैसे बनी दुग्गल जी की एक विशिष्ट कहानी है, पर इसको पढ़ने के बाद मैं इसे कहानी नहीं समझ पाया क्योंकि पहली ही दृष्टि में यह मुझे अपने रचनात्मक स्वरूप में बहुत कुछ नाट्य-रूप की रचना या रेडियो-नाटक जैसी लगी थी। यद्यपि इसके कथानक का आग्रह बहुत कुछ कहानी जैसा ही लग रहा था। बाद में इस दुविधा का अंत तब हुआ जब एक साक्षात्कार पढ़ा जिसमें स्वयं करतार सिंह दुग्गल इसका रहस्य खोलते हैं और स्पष्ट करते हैं कि उत्कृष्ट अभिव्यक्ति के लिये माध्यम अथवा विधा का कोई बंधन नहीं है-</p>



<p><strong><em>“हर विषय जिसको मैं हाथ में लेता हूँ वह अपना रूप खुद लेकर आता है। एक बात जो मैं कहना चाहता हूँ, यदि वह कहानी में ही बेहतरीन कही जा सकती है तो वह कहानी का रूप लेकर आती है। बहुत बड़े कैनवस में मैं जो बात कहना चाहता हूँ, उपन्यास बन जाती है। लेकिन एक दफा यह हुआ कि एक चीज़ जो नाटक की शक्ल में आयी थी, मैंने उसे कहानी की शक्ल में लिख लिया। यह इसलिये हुआ कि मेरा एक कहानी संग्रह छ्प रहा था और मेरे प्रकाशक को एक और कहानी की जरूरत थी। मैंने नाटक न लिखकर कहानी लिख डाली। वह कहानी ‘कहानी कैसे बनी’ नाम से छप गई। उसकी चर्चा भी हुई। लेकिन मेरे अंदर एक चुभन ही बनी रही कि मैने उस पात्र के साथ इंसाफ नहीं किया था। आखिर हारकर मैंने उसे नाटक की भी शक्ल दी।”</em></strong></p>



<figure class="wp-block-pullquote alignright" style="border-radius:25px"><blockquote><p>अच्छी कहानी वह है जो अच्छे लोगों का जिक्र करती है, उन लोगों का जो अच्छे हैं, चाहे अच्छे बन चुके हैं, चाहे अच्छे बन रहे हैं।</p></blockquote></figure>



<h3 class="wp-block-heading">कहानी कैसे बनी: कथानक</h3>



<p>इस कहानी मे जाड़े की एक तूफानी रात में एक स्त्री अपने बेटे के साथ अपने पति की प्रतीक्षा कर रही है। घनघोर वर्षा वाली इस रात में वह एक पथिक को वर्षा थमने तक के लिये अपने घर में आश्रय दे देती है। पथिक एक कहानी लेखक है, और संयोग से स्त्री उसकी कहानियों की मुरीद। अनजाने में मन का साहचर्य निर्मित हो जाता है स्त्री और उस कहानी लेखक में। बातों- बातों में स्त्री के मन का सारा दर्द बह निकलता है। इस प्रवाह का कारण है कहानी लेखक से बातचीत के क्रम में उसके पति का टेलीफोन जिसमें वह यह सूचना देता है कि इस तूफानी रात्रि में वह एक मित्र के यहाँ रुक गया है और घर न आ सकेगा। </p>



<p>स्त्री जानती है कि यह एक बहाना है क्योंकि ऐसी अनगिनत रातें प्रतीक्षा करते और अपने बेटे को कहानियाँ गढ़-गढ़ सुनाते बीत गयीं हैं। आज तो उसने टेलीफोन पर उस स्त्री की आवाज भी सुन ली है। स्त्री अपनी व्यथा, अपना दर्द, पति की बेवफाई का दर्द कहानी लेखक से बाँटती है और उससे अपनी पूरी संवेदना की साझेदारी और उसके दर्द की पूरी कथा सुन लेने का आग्रह करती है। इस क्रम में कहानी लेखक उससे बार-बार घर जाने का आग्रह भी करता है पर बाद में भावुकतावश उसे छोड़ कर जा नहीं पाता और पूरी रात रुकने का निश्चय करता है।</p>





<h3><span style="color: #ff6600;">करतार सिंह दुग्गल : परिचय</span></h3>
<p style="text-align: justify;"><strong><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/03/kartar-singh-duggal.webp" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright" title="Kartar Singh Duggal" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/03/kartar-singh-duggal.jpg?x47177" alt="Kartar Singh Duggal" width="158" height="200" border="0" /></picture>जन्म:</strong> 01 मार्च,1917-धमियाल, जिला रावलपिंडी (अब पाकिस्तान); <strong>मातृभाषा:</strong> पंजाबी; <strong>शिक्षा:</strong> आनर्ज़ (पंजाबी), एम0ए0 (अंग्रेजी); <strong>पुरस्कार/सम्मान:</strong> साहित्य अकादेमी पुरस्कार(1965), गालिब पुरस्कार (1976), सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार(1981) ; <strong>प्रमुख कृतियाँ :</strong> कंढ़े-कंढ़े, बन्द दरवाजा, परे मेरे, इक छिट चानन दी, मीलपत्थर, तिलघट, माझा नहीं मोया, हाल मुरीदाँ दा, माँ-प्यो जाये–सरद पूनम दी रात, मन परदेशी, एक सिफर-सिफर, ओह गये साजन, सत्त नाटक,मिट्ठा पानी, इक अक्ख एक नजर, इसके अतिरिक्त लगभग सभी के हिन्दी अनुवाद स्वयं।</p>





<p>वह यहाँ रुक गया है, इसकी सूचना देने के लिये कहानी लेखक अपनी पत्नी को फोन करता है, और लगभग वही बातें दुहराता है जो उस स्त्री के पति ने उस स्त्री से कहीं थीं। स्त्री यह बातें सुन लेती है और फिर एक निश्चय करते हुए कहानी लेखक को धक्का देते हुए घर से बाहर कर देती है, यह कहते हुए कि-</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>मेरे साथ अन्याय हुआ। मैं एक और अपनी बहन के साथ अन्याय नहीं होने दूँगी। सब पुरुष एक जैसे होते हैं। लुटती स्त्री है। चले जाइये।</p>
<cite>कहानी कैसे बनी – करतार सिंह दुग्गल</cite></blockquote>



<p>यह कहानी <a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Kartar_Singh_Duggal" target="_blank" rel="noreferrer noopener">दुग्गल जी</a> के मानवीय सौन्दर्य के सूक्ष्म पारखी होने का प्रमाण देती है। मुझे उन्हीं की कही गयी ये बात इस कहानी के संबंध में बताना मौजूँ लग रहा है कि कला का सम्बंध जीवन से बहुत गहरा होने के नाते वही कहानियाँ जीवित रहती हैं, जिनमें इंसान की महानता को व्यक्त किया गया है। अच्छी कहानी वह है जो अच्छे लोगों का जिक्र करती है, उन लोगों का जो अच्छे हैं, चाहे अच्छे बन चुके हैं, चाहे अच्छे बन रहे हैं।</p>
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		<title>गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक : Gayatri Chakravorty Spivak</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2009/02/gayatri-chakravorty-spivak.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 06:44:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article on Authors]]></category>
		<category><![CDATA[Criticism]]></category>
		<category><![CDATA[English Literary Figures]]></category>
		<category><![CDATA[Post-marxism]]></category>
		<category><![CDATA[Spivak]]></category>
		<category><![CDATA[Subaltern]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तर-उपनिवेशवाद]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक (Gayatri Chakravorty Spivak) को उत्तर-उपनिवेशवादी सिद्धान्त के क्षेत्र में उनके स्थायी योगदान के लिये जाना जाता है। उनकी आलोचनात्मक कृतियों में अनेकों...</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p>गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Gayatri_Chakravorty_Spivak" target="_blank" rel="noreferrer noopener">Gayatri Chakravorty Spivak</a>) को उत्तर-उपनिवेशवादी सिद्धान्त के क्षेत्र में उनके स्थायी योगदान के लिये जाना जाता है। उनकी आलोचनात्मक कृतियों में अनेकों लेख, पुस्तकें, साक्षात्कार और अनुवाद सम्मिलित हैं, जिनका क्षेत्र उत्तर-संरचनावादी विचार और साहित्यिक आलोचनाओ से संबंधित है। इनका विषय का विस्तार &#8216;मार्क्सवाद&#8217; और उत्तर-मार्क्सवाद, &#8216;सबआल्टर्न&#8217; (subaltern) के लिये संघर्ष जो अपने अधिकार से च्युत कर दिये गये हैं, जिन्हें उत्तर-उपनिवेशवादी राष्ट्रों जैसे भारत, बांग्लादेश में राजनैतिक प्रतिनिधित्व से बाहर कर दिया गया है, श्रम के अंतर्राष्ट्रीय बंटवारे, अंतर्राष्ट्रीय विकास की राजनीति और मानव अधिकार के बारे में व्याख्यानों तथा 19वीं और 20वीं शताब्दी के साहित्य और पठन तक है।</p>



<p>स्पिवाक की ख्याति उत्तर-उपनिवेशवादी सैद्धान्तिक के रूप में विशेष रूप से यूरोपीय साहित्य और दर्शन के विषयों की आलोचना से सम्बन्धित है जो यूरोप की उपनिवेशवादी व्यवस्था का सैद्धांतिक समर्थन करते हैं। ऐसा हम उनके लेख संग्रहों जैसे- &#8216;In Other Worlds&#8217; और &#8216;Outside in Teaching Machine&#8217; और इनकी पुस्तकों जैसे &#8216; A Critique of Post-colonial Reason&#8217; में देखा जा सकता है । इस तरह का साहित्यिक आलोचना का ढंग कुछ अंश में उत्तर-उपनिवेश सिद्धान्तवादी &#8216; एडवार्ड सईद&#8217; (<a href="http://www.barenboim-said.org/index.php?id=119" target="_blank" rel="noreferrer noopener">Edward Said</a>) के &#8216;Orientlism&#8217; पर आधारित है।</p>



<p>अपनी सैद्धांतिक रचनाओं में स्पिवाक ने &#8216;उत्तर-उपनिवेशवाद&#8217; जैसी संज्ञा को ही खारिज कर दिया, क्योंकि उन्होंने अन्य विख्यात बौद्धिकों यथा एजाज अहमद(Eijaz Ahmad), आरिफ़ दर्लिक(<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Arif_Dirlik" target="_blank" rel="noreferrer noopener">Arif Dirlik</a>), माइकेल हार्डट (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Michael_Hardt" target="_blank" rel="noreferrer noopener">Michael Hardt</a>) और एण्टोनियो नेग्री (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Antonio_Negri" target="_blank" rel="noreferrer noopener">Antonio Negri</a>) के साथ ही यह लक्ष्य कर लिया था कि उत्तर-उपनिवेशवादी सिद्धांत बहुत अधिक मात्रा में अपने औपनिवेशिक प्रभुत्व के पुराने स्वरूप पर ही केन्द्रित है और इसलिये वह दक्षिण-विश्व (Global-South) के निर्धन राष्ट्रों पर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक की ढांचागत तालमेल की नीति (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Structural_adjustment" target="_blank" rel="noreferrer noopener">Structural Adjustment Policies</a>) एवं समकालीन आर्थिक वैश्विक प्रभुत्व के प्रभाव को आलोचित करने में पूर्णतया अक्षम है।</p>





<h3 class="has-text-color wp-block-heading" style="color:#ed7c2b">गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक : Gayatri Chakravorty Spivak</h3>



<p style="text-align: justify;"><em><strong><a style="margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: clear:right;" href="http://commons.wikipedia.org/wiki/File:Gayatri_Chakravorty_Spivak_at_Goldsmiths_College.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="zemanta-img-inserted zemanta-img-configured alignright" style="font-size: 0.8em;" src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/3/36/Gayatri_Chakravorty_Spivak_at_Goldsmiths_College.jpg/350px-Gayatri_Chakravorty_Spivak_at_Goldsmiths_College.jpg" alt="English: Gayatri Chakravorty Spivak at Goldsmi..." width="176" height="235" border="0" /></a>जन्म:</strong> 24/02/1942। <strong>स्थान:</strong> कलकत्ता। <strong>शिक्षा:</strong> बी0ए0-अंग्रेजी (आनर्स), प्रेसिडेन्सी कालेज, कलकत्ता; एम0ए0-अंग्रेजी, कार्नेल युनिवर्सिटी (यू0एस0); पीएच0डी0- कम्परेटिव लिटरेचर, कार्नेल युनिवर्सिटी; डी0लिट0-युनिवर्सिटी आफ टोरंटो एवं युनिवर्सिटी आफ लंदन। <strong>रचनायें:</strong> माईसेल्फ मस्ट आई रिमेक:द लाइफ एण्ड पोएट्री आफ डब्ल्यू0 बी0 यीट्स(1974), आफ ग्रेमेटोलोजी (1976), इन अदर वर्ल्डस:एसेज इन कल्चरल पोलिटिक्स(1987), सिलेक्टेड सबआल्टर्न स्टडीज-सं0(1988), द पोस्ट कोलोनिअल क्रिटिक (1990), थिंकिंग एकेडेमिक फ़्रीडम इन जेण्डर्ड पोस्ट-कोलोनिअलिटी (1993), आउटसाइड इन द टीचिंग मशीन (1993), इमैजिनरी मैप्स &#8211; महाश्वेता देवी की कहानियों का अनुवाद (1997), ब्रेस्ट स्टोरीज-महाश्वेता देवी की कहानियों का अनुवाद (1997), ओल्ड वीमेन- महाश्वेता देवी की कहानियों का अनुवाद (1999), ए क्रिटिक आफ़ पोस्टकोलोनिअल रीजन (1999), चोट्टी मुण्डा एण्ड हिज ऐरो-महाश्वेता देवी के उपन्यास का अनुवाद, आदि।</em></p>





<p>इसके अतिरिक्त &#8216;स्पिवाक&#8217; का प्रारंभिक वैचारिक लेखन उत्तर-उपनिवेशवादी सिद्धान्त के वैचारिक आधारों एवं सांस्कृतिक आलोचना से संबंधित है। &#8216;एडवर्ड सईद&#8217; और &#8216;होमी भाभा&#8217; के साथ स्पिवाक उत्तर-उपनिवेशवादी अध्ययन के क्षेत्र में एक प्रमुख बौद्धिक हस्ताक्षर मानी जाती हैं। 19वीं और 20वीं शताब्दी के आलोचनात्मक पाठ पर उनका अध्ययन, बंगाली लेखिका &#8216;महाश्वेता देवी&#8217; की रचनाओं के उनके अनुवाद एवं &#8216;सबाआल्टर्न&#8217; अध्ययन के क्षेत्र में उनका ऐतिहासिक अनुसंधान उनके रचनात्मक क्षितिज के निर्माण में आत्यन्तिक प्रभाव रखता है। उनके निबंध &#8216;Three Women&#8217;s Texts and a Critique of Imperialism&#8217; (1985), और &#8216;Can the Subaltern Speak?&#8217; बहुप्रशंसित, बहुसंदर्भित एवं उत्तर-उपनिवेशवादी सिद्धांत के उत्कृष्ट पाठ के तौर पर बहुप्रतिष्ठित हैं।</p>
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