केवट प्रसंग रामायण के अत्यन्त सुन्दर प्रसंगों में से एक है, खूब लुभाता है मुझे। करुण प्रसंगों के अतिरेक में यह प्रसंग बरबस ही स्नेहनहास का अद्भुत स्वरूप लेकर खड़ा होता है। विचारता हूँ राम की परिस्थिति को, कैकयी की निर्दयता अपना काम कर चुकी है, पिता से बिछड़ने का दुःख अभी असह्य ही है। सब कितना करुण है। तभी लटपटा प्रेम ले उपस्थित होता है केवट। कितना जरूरी है इस केवट का प्रवेश दृश्यावली में! इस करुण समय में प्रेम की ऐसी ही अभिव्यक्ति तो वांछित थी जो विभोर भी करे और स्नेहनहास से हँसाये भी। राम के जीवन की घटनाओं का संतुलन है यह, बाबा तुलसी की महानतम काव्य-कथा में राम के वनगमन की करुण कथा में ही समुआया ’ड्रॉमेटिक रिलीफ’ है यह केवट।

इस केवट की मनोहारी कथा पढ़ता, गुनता हूँ तभी इसे और भीतर तक पिरोने, मिट्टी की गंध से सराबोर कर अन्तर में  ठहराने मलहवा बाबा चले आते हैं। इस बार भी आये! गंगा-मईया की प्रीति का यह गवैया सुरसरि के तीर खड़े दुनो भईया की कथा लेकर आ गया। मैं बाबा के स्वर में और तीर खड़े अवधपुरी के दोनों भाईयों के स्मरण में रम गया। केवट-केवट पुकारते राम दिखे। सुरसरि-पार जाना है न! कहाँ हो केवट? तीर पर खड़े हैं राम, व्याकुल। सुमन्त से विदाई के बाद स्वयं को ओझल कर देने की असीम व्याकुलता समाई है भीतर। और केवट! कहाँ है न जाने? राम पुकार रहे हैं केवट-केवट! विचित्र है, पर है तो है। जिसके नाम से भवसागर सूख जाय वह गंगा न पार कर सके। उसे नाव चाहिए? उस नाव का नाविक चाहिए? यदि भगवान की यही लीला है तो भक्त भी चतुर है, कपटी है – “माँगी नाव न केवट आना; कहैं तुम्हार मरम मैं जाना।” छिपकर किया जाने वाला प्रेम और भी मधुर हो जाता है।
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केवट नाव लेकर तो आता है पर सजग है, सतर्क है। उसे पता है कि राम के चरणकमल की धूलि मनुष्य बनाने वाली कोई जड़ी है। वह राम से शंकित नहीं, उनके चरण कमलों की धूलि से शंकित है। उत्कर्ष और अपकर्ष की विचित्र अवस्था में डाल दिया है केवट ने। राम रज हो गए हैं, रज राम हो गयी है। केवट तार्किक है। उसके पास  बाबा तुलसी की हुँकारी है- “छुवत शिला भई नारि सुहाई; पाहन ते न काठ कठिनाई।” अब क्या हो? तर्क के स्वांग में प्रेम झाँक रहा है। भक्ति की सरल कामना सिर उठा रही है- 
“बिना पग धोये नाथ नइया ना चढ़इबै हो”। 
अब चाहते ही हो, विवश हो कर पार जाना ही है तो पग-पखारने दो- 
“जो प्रभु अवशि पार गा चहहु। तौ पद पद्म पखारन कहहू।” 

केवट की चातुरी अब समझ आयी है। यह सब पग-प्रच्छालन की चाल है। चरण-धूलि में ही अपने जीवन की सार्थकता की पराकाष्ठा देखने वाला अनन्य भक्त है केवट। सजल कर रहा है अपनी विदग्धता को। सारे तर्क ही तिरोहित हैं, सारी आशंकाएँ ही निर्मूल हैं- यदि चरण-रज मिले। केवट पी ले चरणामृत, बस इतनी-सी साध है। 
अब कौन-सा चारा बचा है। 

“सुनि केवट के बचन प्रेम लपेटे अटपटे।
विहँसे करुणाअयन चितय जानकी लषण तन॥”

विहँसना ही पड़ता है केवट सरीखे आदमी के लिए। हँसी भी आती है, रुलाई भी। गद्गद भी करता है, गुदगुदाता भी है। यह कहने के अतिरिक्त बचा क्या है – “सोई करहु जेहि नाव न जाई।” सो – 

“काठे के कठवत में चरन पखारै रामा
चरन पखारि केवट पीयैं चरन अमरित हो”
(अति आनंद उमगि अनुरागा….)

’सोई करहु जेहि नाव न जाई’ कह राम स्वयं केवल अपराध से बचना चाहते हैं, अनुगृहीत करना नहीं चाहते। वह इस पैर धोने की चाल खूब समझते हैं और मन्द मुस्काते पार उतरते हैं। कुछ न देने का संकोच घेर कर खड़ा है। बाबा तुलसी तो सीता से मणि मुद्रिका दिलवाते हैं, पर हमारे मलहवा  बाबा सीधी-सीधी बात जानते हैं –
“देवे लगलैं राम अपने हाथे कै मुंदरवा हो”
केवट ले क्यों?
“ना लेबे राम तोहार हाथे कै मुंदरवा हो”
राम नहीं मानते- 
देवे लगलें राम जब डाली भर सोनवां हो
केवट क्यों मानने लगे? 
ना लेबे राम तोहार डाली भर सोनवां हो

वह तो पा चुका है – “नाथ आज मैं काह न पावा।” यह क्या स्वर्ण-मुद्रिका दे रहे हो नाथ!  भवसागर में अटकी पड़ी नाव के खेवइया हो राम! तुमसे कैसी उतराई। केवट भाव-विह्वल है, सजल है। फिर भी विदग्ध है-

“तूँ त हउवा भवसागर के तरवइया रामा 
केवट से केवट नाहिं लेवैं अब खेवइया हो” – 
बिरादरी का मामला है। तुम भवसागर के तरवइया हो, हम गंगा-सरि के। तुमसे उतराई कैसे ले सकते हैं? ’स्टाफ’ की बात है। केवट ग़ज़ब है।
ग़ज़ब हमारे मलहवा बाबा भी हैं। तुलसी बाबा की लोक संवेदना के असली पहरुए। लोक काव्य की विशिष्टता से सजा कर बाबा अंतिम पंक्तियाँ गाने लगते हैं, भक्ति उमग रही है, विनय साक्षात हो गया है, शरणागत का स्वर आकार लेने लगा है- 
“गहिरी बा नदिया देखा नइया बा पुरानी रामा
खेलन वाला अलख अनारी रामा।”
मलहवा बाबा और केवट दोनों एकरूप हो गा रहे हैं। अनन्य भक्ति सजल होकर बह रही है। केवट गंगा का सलोना बेटा है, अरज लगा रहा है-

“भवसागर से परवाँ उतारा गंगा माई हो ।

मलहवा बाबा ने गाया : वीडियो


 (यह वीडियो तो बस यूट्यूब पर अपलोड करने के लिए एकाध चित्र लगाकर बना दिया गया है। ऑडियो भी बहुत अच्छा नहीं था, क्योंकि रिकॉर्डिंग यंत्र ही नहीं था बेहतर कोई उस वक़्त। तेज वॉल्यूम कर काम चलाईये। अनुभूति अपना काम करेगी ही।)

गीत का पाठ

सुरसरि तीरवाँ खड़े है दुनो भईया रामा
अवधपुरी के रहवइया दुनो भईया रामा
सुरसरि पार के जवइया दुनो भइया रामा
केवट-केवट राम पुकारैं रामा।

भोरे में नइया डोलल आवैला केवटवा हो
भोरे में तीरवाँ ………
बिना पैर धोये नाथ नइया ना चढ़इबै हो
बिना पैर धोये…..।

काठे के कठवत में चरन पखारै रामा
चरन पखारि केवट पीयैं चरन अमरित हो
अगवाँ जे बइठैलें राम-लछमण सीता जी
पीछवाँ ले बइठैं गंगा माई की जल फइली
भोरे में तीरवाँ ………..।

खेवत खेवत केवट घटवा में गइलैं रामा
देवे लगलैं राम अपने हाथे कै मुंदरवा हो
ना लेबे राम तोहार हाथे कै मुंदरवा हो
देवे लगलें राम जब डाली भर सोनवां हो
ना लेबे राम तोहार डाली भर सोनवां हो

नदिया में नारि के खेवइया पड़ि रामजी हो
तूँ त हउवा भवसागर के तरवइया रामा 
केवट से केवट नाहिं लेवैं अब खेवइया हो
गहिरी बा नदिया देखा नइया बा पुरानी रामा
खेलन वाला अलख अनारी रामा

बुढ़िया मलाहिन अरज करत बा हो
भवसागर से परवाँ उतारा गंगा माई हो
सुरसरि तीरवाँ खड़े हैं दुनो भइया रामा ।

आवा हो जग नाव के खेवइया,  स्वर: जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य