कहानी कैसे बनी

पिताजी की संग्रहित की हुई अनेकों किताबों में एक है ‘कहानी कैसे बनी’। उसे महीनों पहले पढ़ना शुरु किया था। कुल आठ कहानियों की यह किताब मुझे अविश्वसनीय रचनाधर्मिता का उदाहरण लगी। मैंने इसे पूरा का पूरा पढ़ तो लिया पर उसका कथ्य, उसकी बनावट, उसका रचनात्मक कौशल– सब अन्तर में मथता रहा। आज अचानक उसकी चर्चा कर रहा हूं, क्योंकि आज उस कहानी की किताब के अप्रतिम सर्जक का जन्म-दिवस है।

‘कहानी कैसे बनी’ पुस्तक की पहली रचना के नाम पर ही पुस्तक का नामकरण है। मैंने सुना था कि कहानी कैसे बनी दुग्गल जी की एक विशिष्ट कहानी है, पर इसको पढ़ने के बाद मैं इसे कहानी नहीं समझ पाया क्योंकि पहली ही दृष्टि में यह मुझे अपने रचनात्मक स्वरूप में बहुत कुछ नाट्य-रूप की रचना या रेडियो-नाटक जैसी लगी थी। यद्यपि इसके कथानक का आग्रह बहुत कुछ कहानी जैसा ही लग रहा था। बाद में इस दुविधा का अंत तब हुआ जब एक साक्षात्कार पढ़ा जिसमें स्वयं ‘दुग्गल’ जी इसका रहस्य खोलते हैं और स्पष्ट करते हैं कि उत्कृष्ट अभिव्यक्ति के लिये माध्यम अथवा विधा का कोई बंधन नहीं है-
“हर विषय जिसको मैं हाथ में लेता हूँ वह अपना रूप खुद लेकर आता है। एक बात जो मैं कहना चाहता हूँ, यदि वह कहानी में ही बेहतरीन कही जा सकती है तो वह कहानी का रूप लेकर आती है। बहुत बड़े कैनवस में मैं जो बात कहना चाहता हूँ, उपन्यास बन जाती है। लेकिन एक दफा यह हुआ कि एक चीज़ जो नाटक की शक्ल में आयी थी, मैंने उसे कहानी की शक्ल में लिख लिया। यह इसलिये हुआ कि मेरा एक कहानी संग्रह छ्प रहा था और मेरे प्रकाशक को एक और कहानी की जरूरत थी। मैंने नाटक न लिखकर कहानी लिख डाली। वह कहानी ‘कहानी कैसे बनी’ नाम से छप गई। उसकी चर्चा भी हुई। लेकिन मेरे अंदर एक चुभन ही बनी रही कि मैने उस पात्र के साथ इंसाफ नहीं किया था। आखिर हारकर मैंने उसे नाट्क की भी शक्ल दी।”
Kartar Singh Duggal
Kartar Singh Duggal
Source:www.apnaorg.com

इस कहानी मे जाड़े की एक तूफानी रात में एक स्त्री अपने बेटे के साथ अपने पति की प्रतीक्षा कर रही है। घनघोर वर्षा वाली इस रात में वह एक पथिक को वर्षा थमने तक के लिये अपने घर में आश्रय दे देती है। पथिक एक कहानी लेखक है, और संयोग से स्त्री उसकी कहानियों की मुरीद। अनजाने में मन का साहचर्य निर्मित हो जाता है स्त्री और उस कहानी लेखक में। बातों- बातों में स्त्री के मन का सारा दर्द बह निकलता है। इस प्रवाह का कारण है कहानी लेखक से बातचीत के क्रम में उसके पति का टेलीफोन जिसमें वह यह सूचना देता है कि इस तूफानी रात्रि में वह एक मित्र के यहाँ रुक गया है और घर न आ सकेगा। स्त्री जानती है कि यह एक बहाना है क्योंकि ऐसी अनगिनत रातें प्रतीक्षा करते और अपने बेटे को कहानियाँ गढ़-गढ़ सुनाते बीत गयीं हैं। आज तो उसने टेलीफोन पर उस स्त्री की आवाज भी सुन ली है। स्त्री अपनी व्यथा, अपना दर्द, पति की बेवफाई का दर्द कहानी लेखक से बाँटती है और उससे अपनी पूरी संवेदना की साझेदारी और उसके दर्द की पूरी कथा सुन लेने का आग्रह करती है। इस क्रम में कहानी लेखक उससे बार-बार घर जाने का आग्रह भी करता है पर बाद में भावुकतावश उसे छोड़ कर जा नहीं पाता और पूरी रात रुकने का निश्चय करता है।

जन्म: 01 मार्च,1917-धमियाल, जिला रावलपिंडी (अब पाकिस्तान); मातृभाषा: पंजाबी; शिक्षा: आनर्ज़ (पंजाबी), एम0ए0 (अंग्रेजी); पुरस्कार/सम्मान: साहित्य अकादेमी पुरस्कार(1965), गालिब पुरस्कार (1976), सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार(1981) ; प्रमुख कृतियाँ : कंढ़े-कंढ़े, बन्द दरवाजा, परे मेरे, इक छिट चानन दी, मीलपत्थर, तिलघट, माझा नहीं मोया, हाल मुरीदाँ दा, माँ-प्यो जाये–सरद पूनम दी रात, मन परदेशी, एक सिफर-सिफर, ओह गये साजन, सत्त नाटक,मिट्ठा पानी, इक अक्ख एक नजर, इसके अतिरिक्त लगभग सभी के हिन्दी अनुवाद स्वयं।
वह यहाँ रुक गया है, इसकी सूचना देने के लिये कहानी लेखक अपनी पत्नी को फोन करता है, और लगभग वही बातें दुहराता है जो उस स्त्री के पति ने उस स्त्री से कहीं थीं। स्त्री यह बातें सुन लेती है और फिर एक निश्चय करते हुए कहानी लेखक को धक्का देते हुए घर से बाहर कर देती है, यह कहते हुए कि –
“मेरे साथ अन्याय हुआ। मैं एक और अपनी बहन के साथ अन्याय नहीं होने दूँगी। सब पुरुष एक जैसे होते हैं। लुटती स्त्री है। चले जाइये।” (कहानी कैसे बनी – कर्तार सिंह दुग्गल)
यह कहानी दुग्गल जी के मानवीय सौन्दर्य के सूक्ष्म पारखी होने का प्रमाण देती है। मुझे उन्हीं की कही गयी ये बात इस कहानी के संबंध में बताना मौजूँ लग रहा है कि कला का सम्बंध जीवन से बहुत गहरा होने के नाते वही कहानियाँ जीवित रहती हैं, जिनमें इंसान की महानता को व्यक्त किया गया है। अच्छी कहानी वह है जो अच्छे लोगों का जिक्र करती है, उन लोगों का जो अच्छे हैं, चाहे अच्छे बन चुके हैं, चाहे अच्छे बन रहे हैं।