फागुन का महीना आते ही हवा में जैसे अनदेखा रंग घुल जाता है – आँगन, मन और स्मृतियाँ सब एक साथ होरी गाने लगते हैं। प्रेम नारायण ‘पंकिल’ की यह होरी “पिया संग खेलब होरी” उस फागुनी रसराज्य की कविता है, जहाँ सखी के होंठों पर प्रतीक्षा है, आँखों में स्मृति है और मन में बस एक ही अभिलाषा – पिया के संग रंगों में भींगने की।
सखि ऊ दिन अब कब अइहैं,
पिया संग खेलब होरी।
बिसरत नाहिं सखी मन बसिया
केसर घोरि कमोरी
हेरि हिये मारी पिचकारी
मली कपोलन रोरी
पीत मुख अरुन भयो री–
पिया संग खेलब होरी।
अलक लाल भइ पलक लाल भइ
तन-मन लाल भयो री
चुनरी सेज सबै अरु नारी
लाल ही लाल छयौ री
आन कोउ रंग न रह्यौ री–
पिया संग खेलब होरी।
भ्रमित भई तब भरि अँकवरिया
धरि अँगुरिन की पोरी
पंकिल गुन-गुन गावन लागे
प्रेम सुधा-रस बोरी
अचल सुख उदय भयो री–
पिया संग खेलब होरी।
रचनाकार: प्रेम नारायण पंकिल
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