सच्चा शरणम् पर महात्मा बुद्ध के जीवन पर एक नाटक पूर्व में प्रकाशित किया गया है। महात्मा बुद्ध के साथ ही अन्य चरित्रों का सहज आकर्षण इन पर लिखी जाने वाली प्रविष्टियों  का हेतु बना और इन व्यक्तित्वों का चरित्र-उद्घाटन करतीं अनेकानेन नाट्य-प्रविष्टियाँ लिख दी गयीं। नाट्य-प्रस्तुतियों के क्रम में अब प्रस्तुत है अनुकरणीय चरित्र राजा हरिश्चन्द्र पर लिखी प्रविष्टियाँ। सिमटती हुई श्रद्धा, पद-मर्दित विश्वास एवं क्षीण होते सत्याचरण वाले इस समाज के लिए सत्य हरिश्चन्द्र का चरित्र-अवगाहन प्रासंगिक भी है और आवश्यक भी। ऐसे चरित्र दिग्भ्रमित मानवता के उत्थान का साक्षी बनकर, शाश्वत मूल्यों की थाती लेकर हमारे सम्मुख उपस्थित होते हैं और पुकार उठते हैं- असतो मां सद्गमय। पिछली प्रविष्टियों राजा हरिश्चन्द्र-एक एवं राजा हरिश्चन्द्र-दो एवं राजा हरिश्चन्द्र-तीन से आगे।


राजा हरिश्चन्द्र: तृतीय दृश्य

(राजा हरिश्चन्द्र का राजदरबार। हरिश्चन्द्र विकल, आँखे  जैसे किसी को खोज रही हैं । सहसा द्वारपाल का प्रवेश। )

 द्वारपाल : सत्यनिष्ठ महाराजाधिराज राजा हरिश्चन्द्र की जय हो। महाराज! एक अत्यंत क्रोधी ब्राह्मण द्वार पर बाँहें उठा-उठा कर चिल्ला रहा है। सबको गालियाँ दे रहा है। आप से मिलने की उसकी बड़ी बेचैनी है। वह तत्काल आपके दर्शन चाहता है।

राजा: विप्र देवता को आदर के साथ यहाँ ले आओ।

द्वारपाल: जो आज्ञा महाराज!

(द्वारपाल जाता है। जटाजूटधारी क्रुद्ध ब्राह्मणवेशी विश्वामित्र का प्रवेश।)

राजा: (उठ साष्टांग प्रणाम करते हुए) आइए विप्रवर! सपरिवार हम आपका अभिनन्दन करते हैं। आसनासीन होने की कृपा करें।

विश्वामित्र: रे क्षत्रिय कुल कलंक! बड़ा बना है बैठाने वाला। बैठ चुके, बैठ चुके। (हाथ उठाकर क्रोध से काँपते अधरों से) अरे पापिष्ट! धिक्कार है तेरी सत्यवादिता को। मिथ्यावाद का सहारा लेकर धर्मनिष्ठा का दुंदुभिनाद करते तुम्हें लज्जा नहीं आती है। कहाँ गया तेरा वचन! किस भाड़ में जल गया तेरा दान! कहाँ मर गया तेरा संकल्प! अरे नराधम मुझे पहचानता नहीं?

राजा: क्रोध शांत हो प्रभु! कुछ भ्रम हो रहा है। अपना परिचय देने का अनुग्रह करें।

विश्वामित्र: रे मू्ढ़! क्यों पहचानेगा तूँ? कुछ क्षण पहले की हो तो बात है। सारी पृथ्वी तूने मुझे दान कर दी थी। सारा राज्य मेरे हाथों में देकर क्या झूठे दानी बनने का स्वांग किया था! तुम्हारा पतन हो जायेगा। तू अभी स्वयं राजा बना बैठा है।

राजा: (पैरों पर गिरकर) महाराज! क्षमा कीजिए। स्वप्न में की गयी दान-क्रिया के पात्र को पहचान नहीं पाया। अब आपको जाना है। अपराध क्षमा हो। राज्य आपका है। आप राजा हैं। हम अनुचर। आपकी आज्ञा के अनुसार कार्य का निर्वाह करेंगे। मेरी सत्यनिष्ठा को कलंकित न करें देव! सत्य नहीं तो हम नहीं। अस्तित्व तो सत्य का है, व्यक्ति का नहीं। सत्य ही मेरा चिरंतन तारुण्य है। सत्य ही मेरा सनातन सौन्दर्य है। मेरी सत्यनिष्ठा नाशमय की परवाह नहीं करती। मेरी दानशीलता मेरे चेतना के क्षितिज पर निरविच्छिन्ना ज्योति-सरिता सी निरन्तर बहती रहती है। आप आज्ञा करें। दास स्वीकार करने को तत्पर है। 

विश्वामित्र: (टपकते हुए अश्रुजल से आर्द्र कपोलों को पोंछती हुई) अरे शेखी बखारने वाले पाखंडी! यदि तूँ सचमुच सूर्यवंशी है, यदि तुम्हें सचमुच अपने वचन का निर्वाह करना है तो दे मेरी पृथ्वी!

राजा: तैयार हूँ देव! अब विलम्ब क्या! मैं तो पहले से ही सिंहासन खाली कर भूमि पर आसीन हूँ।

विश्वामित्र: दान के बाद की दक्षिणा कहाँ है?

राजा: (मंत्री की ओर देखकर) आमात्य! एक सहस्र स्वर्णमुद्रायें दक्षिणा-स्वरूप कोष से लाकर विप्र को प्रदान की जाँय।

विश्वामित्र: (तमतमाते हुए) रे अभिमानी! अभी क्या तुम कोष के अधिकारी ही बने बैठे हो! जब सब दान में दे दिया तो क्या खजाना खँगालने से बाज नहीं आयेगा। सारा राज्य, कोष, गृह, परिचर अब मेरे हैं। एक क्षण का भी विलम्ब किए बिना निकल जा यहाँ से। तुम्हारा शरीर, तुम्हारी धर्मपत्नी और तुम्हारे तनय के अतिरिक्त कुछ भी तुम्हारा नहीं है। बंधन, मर्यादा, लाज, शील, विवेक को तिलांजलि मत दो। जा बाहर! रही दक्षिणा की एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ! इसके लिए तुम्हें एक माह का समय देता हूँ। समय चुका तो मैं अपना ब्रह्मदंड गिरा कर तुम्हें चूर-चूर कर दूँगा।

राजा: विप्रदेवता! ब्रह्मदंड से अधिक मुझे सत्यदंड का भय है। मुझे आज्ञा दें। समय के भीतर ही आपकी दक्षिणा चुका दूँगा। वचन ही हमारा धन है। मैं चला। गुरुवर चरणों मे सादर प्रणाम है।

(राजा पत्नी शैव्या और पुत्र रोहिताश्व को लेकर राजमहल से बाहर निकल पड़ते हैं। पुत्र, पत्नी समेत अंजलि जोड़कर अपनी प्रिय प्रजा और पुरी को प्रणाम करते हैं।)

विश्वामित्र: (स्वगत) अभी तो तुम्हे लक्ष्मी भ्रष्ट किया है। अब तुम्हें सत्य भ्रष्ट करके ही दम लूँगा। (प्रकट) जा क्षत्रिय राजा! जल्दी जा! दानी मोह को भी छोड़ने में नहीं हिचकते। हाँ, ध्यान रखना अपने इतने बड़े दान की दक्षिणा का। माह की अवधि भूले नहीं।

(हरिश्चन्द्र चल पड़ते हैं। सोचते हैं कहाँ जाऊँ? सब तो दान दे दिया। उस ब्राह्मण की आँखे पीछे लगी हैं। पत्नी-पुत्र छाया की तरह पीछे-पीछे चले जा रहे हैं) 

रानी: मेरे प्राणनाथ! कहाँ चलेंगे? यात्रा के अपशकुन हो रहे हैं। सूर्य को परिवेश से घिरा हुआ देख रही हूँ। पीछे शब्दसहित धूम जैसी आकृति वाली घिरी बदली है। दाहिनी आँख फड़क रही है। सामने ही रिक्त घट पड़ा है। मन में अशान्ति-सी है। क्या होना है?

राजा: धर्मज्ञे! जीवन की सफलता किसमें है? मायावाद की मनोहारिता में, भोगवाद की सरसता में, बन्धु-बांधव की अनुरक्ति में नहीं; सत्य की उपासना में, सद्धर्म के आचरण में। जो हो रहा है या जो होगा सब हमारे करुणा वरुणालय प्रभु का खेल है। जीवन की चिन्ता नहीं, जीवनादर्श की चिन्ता करो। वास्तविक सुख और शान्ति उसके लिए है जो अपने को एक साथ ही वज्र के समान कठोर और पुष्प के समान सुकोमल बनाने में समर्थ होता है।

रानी: (आँसू पोंछती हुई) कहाँ चलना है?

राजा: सोचता हूँ काशी चलेंगे। यह त्रिभुवन से न्यारी है। भगवान भूतभावन शिव के त्रिशूल पर बसी है। वह किसी के राज्याधिकार में नहीं है। विश्वेश शिव हैं। धन नहीं, तन तो अपना है। हम अपना शरीर वहाँ बेचकर ब्राह्मण की दक्षिणा चुकाएँगे। शिवपुरी ही शरण है।

“गंगातरंग रमणीय जटाकलापं गौरी निरंतर विभूषित वामभागं।
नारायणप्रियमनंगमदापहारं वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाथ॥
वाराणसी पुरपते मणिकर्णिकेश वीरेश दक्षमखकाल विभोगणेश।
सर्वज्ञ सर्व हृदयैक निवासनाथ संसार दुःख गहनज्जगदीश रक्ष॥”

(पर्दा गिरता है।)