सौन्दर्य-लहरी Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम् https://blog.ramyantar.com/category/सौन्दर्य-लहरी हिंदी ब्लॉग। साहित्य, भाषा, संस्कृति, लोक व शास्त्र से संयुक्त। कविता, कहानी, समीक्षा, निबन्ध, नाटक एवं अनुवाद का सहज प्रकाशन। लोक साहित्य का रंग भी। Wed, 26 Jun 2024 14:09:31 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/03/cropped-favicon-4-32x32.png सौन्दर्य-लहरी Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम् https://blog.ramyantar.com/category/सौन्दर्य-लहरी 32 32 सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 95-102) https://blog.ramyantar.com/2016/04/saundarya-lahari.html https://blog.ramyantar.com/2016/04/saundarya-lahari.html#comments Sun, 17 Apr 2016 11:27:00 +0000 सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्य रूपांतर स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाद्याभिरभितो,निषेवे नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः।किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो,महासंवर्ताग्निविरचयति नीराजनविधिं ॥95॥स्वशरीरोद्भूत किरणसमूहअणिमादिक सुसेवितजो स्वरूप त्वदीय नितकरता निषेवितअहं भावितकौन सा...

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इस प्रविष्टि में सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 95-102) का हिन्दी रूपांतर प्रस्तुत है।

सौन्दर्य लहरी के यह मनहर छन्द आचार्य शंकर की अद्भुत काव्य प्रतिभा के प्रतिबिम्ब हैं। इन छन्दों में शिव और शक्ति की प्रगाढ़ रागात्मक लीला का विभोर होकर गान किया है आदि शंकर ने।

इस ब्लॉग पर अब तक 94 छन्दों के काव्यानुवाद विभिन्न प्रविष्टियों में प्रकाशित हो चुके हैं। सभी प्रविष्टियाँ सौन्दर्य लहरी श्रेणी को क्लिक कर पढ़ी जा सकती हैं।

सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्य रूपांतर

Saundarya_Lahari

स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाद्याभिरभितो,
निषेवे नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः।
किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो,
महासंवर्ताग्निविरचयति नीराजनविधिं ॥95॥
स्वशरीरोद्भूत किरणसमूह
अणिमादिक सुसेवित
जो स्वरूप त्वदीय नित
करता निषेवित
अहं भावित
कौन सा आश्चर्य
शंभुसमृद्धि वह
साधकशिरोमणि
तृणसदृश गिनता
प्रलय का प्रज्ज्वलित
पावक दहन भी
अभय नीराजन बना लेता
स्वरूपविलासिनी हे!

समुद्भूतस्थूलस्तन भरमुरश्चारुहसितं
कटाक्षे कन्दर्पाः कतिचन कदम्बद्युति वपुः।
हरस्य त्वद्भ्रांतिं मनसि जनयन्ती सुवदने
भवत्यां ये भक्ताः परिणतिरमीषामियमुमे॥96॥
वक्ष भर जाता पयोधरपीन से
मुख पर उभरता
मधुर हास
कटाक्ष में
कंदर्प जाते अमित भर हैं
पुलकपूर कदम्बद्युति वपु
भक्त में सारूप्य भरती
तुम स्वकीय ललाम छवि से
जो बनाती हैं स्ववल्लभ
चन्द्रशेखर शंभु मन भी भ्रान्त
कायाकल्पनी हे!

कलत्रं वैधात्रं कतिकति भजन्ते न कवयः
श्रियो देव्याः को वा न भवति पतिः कैरपि धनैः।
महादेवं हित्वा तव सति सतीना-मचरमे
कुचभ्या-मासङ्गः कुरवक-तरो-रप्यसुलभः॥97॥
कौन कौन न कवि
कलत्र विरंचिवामा को बनाते
कौन कौन धनाढ्य वैभवशील
लक्ष्मीपति न होता
पावनी
तुम श्रेष्ठ
सर्वसतीगणों में अग्रगण्या
छोड़ कर शिव को
अलभ्य अतीव
कुरवक विटप को भी
स्पर्श कर लेना
तुम्हारा उरज
सतीशिरोमणि हे!

गिरामाहुर्देवीं द्रुहिणगृहिणीमागमविदो
हरेः पत्नीं पद्मां हरसहचरीमद्रितनयाम् ।
तुरीया कापि त्वं दुरधिगमनिस्सीममहिमा
महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषि ॥98॥
तुम्हें आगमविज्ञ
ब्रह्मा की प्रिया
कहते गिरा हैं
विष्णुगृहिणी रमा
शंकरसहचरी
गिरिसुता कहते
किन्तु तुम कोई तुरीया
वेद संस्तुतिता
न ज्ञेया
अगम महिमामयी
सारी श्रृष्टि को
करती भ्रमित हो
हे महामाये अगम्ये
परब्रह्मसुपट्टमहिषी!

कदा काले मातः कथय कलितालक्तकरसं
पिबेयं विद्यार्थी तव चरणनिर्णेजनजलम् ।
प्रकृत्या मूकानामपि च कविताकारणतया
कदा धत्ते वाणीमुखकमलताम्बूलरसताम् ॥99॥
अम्ब हम विद्यार्थीगण
कब अलक्तकरागरंजित
रुचिर तेरे कंजपद का
दिव्य चरणोदक पियेंगे
प्रकृत्या जो मूक
उनको भी कवित्व प्रदान करता
पान कर जिसको गिरा
करती सुधारित मुखकमल की
अति रुचिर ताम्बूलरसता
गुणरसामृत चरणकमले!

सरस्वत्या लक्ष्म्या विधि हरि सपत्नो विहरते
रतेः पतिव्रत्यं शिथिलपति रम्येण वपुषा ।
चिरं जीवन्नेव क्षपित-पशुपाश-व्यतिकरः
परानन्दाभिख्यं रसयति रसं त्वद्भजनवान् ॥100॥
हे भगवती
भक्त तेरा
हो गिरापति
रमापति हो
विधि मुकुन्द सपत्न सदृश
विहार करता है
दयामयि
रम्यवपु से
कामकामिनि
रतिपतिव्रत शिथिल करता
मुक्त हो पशुपाश से
परब्रह्म में रमण करता
चिरंजीवी भक्त तेरा
हे परब्रह्माभिधेया!

निधे नित्यस्मेरे निरवधिगुणे नीतिनिपुणे 
निराघातज्ञाने नियमपरचित्तैकनिलये । 
नियत्या निर्मुक्ते निखिलनिगमान्तस्तुतिपदे 
निरातङ्के नित्ये निगमय ममापि स्तुतिमिमाम्॥101॥
हे निधे
नित्यस्मिते हे
हे असीम गुणान्विते हे
सर्वनीतिविधा प्रवीणे
हे अवाधितज्ञानशीले
हे नियमपरिचितहृदयलीने
नियति निर्मुक्तजा हे
हे निखिल निगमादिसंस्तुत
युगल संपूजित चरण हे
निर्भये हे
अहो नित्ये
कर्ण कुहरों बीच
मेरा स्तुति वचन भी
करो धारण
जननि
सर्वगुणागरी हे!

प्रदीप ज्वालाभि-र्दिवसकर-नीराजनविधिः
सुधासूते-श्चन्द्रोपल-जललवै-रघ्यरचना ।
स्वकीयैरम्भोभिः सलिल-निधि-सौहित्यकरणं
त्वदीयाभि-र्वाग्भि-स्तव जननि वाचां स्तुतिरियम् ॥102॥
यह वचन स्तुति अम्ब
तेरी ही गिरा में तुम्हें अर्पित
है तथा विध
यथा नीराजनसमर्पित
दिवसमणि को
प्रज्ज्वलित दीपक लिए
या चन्द्रमणि से स्रवित जल ले
अर्घ्यरचना कर सुपूजा
की गयी रजनीश की हो
या पयोनिधि सलिल से ही
अर्चना हो नीरनिधि की
स्तुतिगिरा सारी हमारी
है तुम्हारी बैखरी ही
वस्तु तेरी तुम्हीं को अर्पित
करो स्वीकार हे माँ!

—-सम्पूर्ण—-

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सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 88-94) https://blog.ramyantar.com/2016/04/saundarya-lahari-20.html https://blog.ramyantar.com/2016/04/saundarya-lahari-20.html#respond Sun, 10 Apr 2016 22:10:00 +0000 सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्य रूपांतर नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसङ्कोचशशिभिःतरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ।फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलय-कराग्रेण ददतांदरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमह्नाय ददतौ ॥88॥पद तुम्हारेनिज सुधाकर नख अवलि...

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इस प्रविष्टि में सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 88-94) का हिन्दी रूपांतर प्रस्तुत है।

सौन्दर्य लहरी के यह मनहर छन्द आचार्य शंकर की अद्भुत काव्य प्रतिभा के प्रतिबिम्ब हैं। इन छन्दों में शिव और शक्ति की प्रगाढ़ रागात्मक लीला का विभोर होकर गान किया है आदि शंकर ने।

इस ब्लॉग पर अब तक 80 छन्दों के काव्यानुवाद विभिन्न प्रविष्टियों में प्रकाशित हो चुके हैं। सभी प्रविष्टियाँ सौन्दर्य लहरी श्रेणी को क्लिक कर पढ़ी जा सकती हैं।

सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्य रूपांतर

नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसङ्कोचशशिभिः
तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ।
फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलय-कराग्रेण ददतां
दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमह्नाय ददतौ ॥88॥
पद तुम्हारे
निज सुधाकर नख अवलि से
स्वर्गललना के सरोरुह पाणितल को
संकुचित देते बना हैं
चण्डि!
तेरे चरणद्वय
देवेन्द्रवन स्थित कल्पतरु का
भी सदा उपहास करते हैं
बिचारा कल्पतरु तो
पाणि किसलय से
उन्हीं को फलप्रदाता
स्वर्गस्थित जो,
किन्तु तेरे चरण
सर्व दरिद्रजन को ही निरंतर
बाँटते फिरते अमित धन-
नित चरणधनवर्षिणी हे!

ददाने दीनेभ्यः श्रियमनिशमाशानुसदृशी-
ममन्दं सौन्दर्यं प्रकरमकरन्दं विकिरति।
तवास्मिन् मन्दारस्तबकसुभगे यातु चरणे
निमज्जन् मज्जीवः करणचरणःष्ट्चरणताम् ॥89॥
क्षीनजन को बाँटते श्री
नित्य जो आशानुरूपी
जो अमंद
सुरूप छवि मकरंद नित
करते प्रवाहित
उन्हीं तव
मंदारपुष्पसुगुच्छ-सम
रमणीय पद में
जीव मेरा
षडेन्द्रिय पदधर भ्रमर सम
नित निमज्जन करे
हे सौभाग्यसुखसर्जक पदाब्जे!

पदन्यासक्रीडा परिचयमिवारब्धुमनसः
स्खलन्तस्ते खेलं भवनकलहंसा न जहति।
अतस्तेषां शिक्षां सुभगमणिमञ्जीररणित-
च्छलादाचक्षाणं चरणकमलं चारुचरिते ॥90॥
भवन में
कल राजहंस
समीप तेरे खेलते हैं
वे तुम्हारे चरणन्यास
सुकेलि अति लीला ललित का
प्राप्त करना चाहते परिचय
निपुण अभ्यासमन से
सुभग मणिझंकार से
पार्श्वस्थ राजमराल गण को
तुम किया करती सुशिक्षित
चरणपंकजचारुचरिते!

गतास्ते मञ्चत्वं द्रुहिणहरिरुद्रेश्वरभृतः
शिवः स्वच्छच्छायाघटितकपटप्रच्छदपटः।
त्वदीयानां भासां प्रतिफलन रागारुणतया
शरीरी शृङ्गारो रस इव दृशां दोग्धि कुतुकम् ॥91॥
मंचपद तेरे
विधाता हरि महेश्वर देवता त्रय
स्वच्छ छाया से स्वकीया घटित होकर
चन्द्रशेखर
लग रहें ज्यों धवल प्रच्छदपट
तुम्हारी विमल चादर
अंग की आभा अरुण तेरी
हुयी उनमें स्फुटित है
प्रेम रस परिपूर्ण
ज्यों स-तन श्रृंगाररस ही
हुआ प्रतिबिम्बित वहाँ
दृगहर
सुभगश्रृंगारिणी हे!

अराला केशेषु प्रकृति सरला मन्दहसिते
शिरीषाभा चित्ते दृषदुपलशोभा कुचतटे।
भृशं तन्वी मध्ये पृथुरुरसिजारोहविषये
जगत्त्रातुं शम्भोर्जयति करुणा काचिदरुणा ॥92॥
अलक से कुटिला
प्रकृत्या मंदस्मिति से
सहज सरला
अंग में
लावण्यभरिता
अमित सुमन शिरीष मृदुता
शैल सदृश कठोरता कुच बीच
कटि में क्षीणता अति
जघन में पृथुता वरोरुह
प्रथित कोई एक अरुणा
शंभु की करुणा विजयिनी
करे जग का त्राण
जग कल्याण
अरुणा भगवती हे!

कलङ्कः कस्तूरी रजनिकर बिम्बं जलमयं
कलाभिः कर्पूरै-र्मरकतकरण्डं निबिडितम्।
अतस्त्वद्भोगेन प्रतिदिनमिदं रिक्तकुहरं
विधि-र्भूयो भूयो निबिडयति नूनं तव कृते ॥93॥
चन्द्रविम्ब
सुगंध मरकतमणि विनिर्मित
पात्र जलमय
मृगमदांक जहाँ कलंक
कपूर विधु षोडस कलायें
ह्रासतागत जान
तेरे भोग से
शशि कृष्णपक्षक
शुक्ल में पूर्णत्व से
भरते उस विधि
भूरिभोगे!

पुरारातेरन्तःपुरमसि ततस्त्वच्चरणयोः
सपर्यामर्यादा तरलकरणानामसुलभा।
तथा ह्येते नीताः शतमखमुखाः सिद्धिमतुलां
तव द्वारोपान्तस्थितिभिरणिमाद्याभिरमराः ॥94॥
पट्टमहिषी शंभु की
तुम शंभु अंतःपुरनिवासिनि
सपर्यामर्याद
हो दुष्प्राप्य अजितेन्द्रिय जनों को
किन्तु द्वारोपान्त ही
तेरे सुलभ अणमादि की स्थिति
अतः पा जाते वही हैं
देव देवेन्द्रादि सत्वर
अतुल सिद्धि विभव
परमशिवसंगिनी सिद्धिप्रदा हे!

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सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 81-87) https://blog.ramyantar.com/2015/12/saundarya-lahari-19.html https://blog.ramyantar.com/2015/12/saundarya-lahari-19.html#respond Sun, 13 Dec 2015 03:02:00 +0000 सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्य रूपांतर करीन्द्राणां शुण्डान् कनककदलीकाण्डपटली-मुभाभ्यामूरुभ्यामुभयमपि निर्जित्य भवति।सुवृत्ताभ्यां पत्युः प्रणतिकठिनाभ्यां गिरिसुतेविधिज्ञे जानुभ्यां विबुधकरिकुम्भद्वयमसि॥81॥करिवरों के शुण्ड कोकंचन कदलि के खंभ द्वय कोकर दिया...

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सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 81-87) का हिन्दी रूपांतर प्रस्तुत है। यह मनहर छन्द आचार्य शंकर की अद्भुत काव्य प्रतिभा के प्रतिबिम्ब हैं। शिव और शक्ति की प्रगाढ़ रागात्मक लीला का विभोर होकर गान किया है आदि शंकर ने।

इस ब्लॉग पर अब तक 80 छन्दों के काव्यानुवाद विभिन्न प्रविष्टियों में प्रकाशित हो चुके हैं। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं, तेरहवीं, चौदहवीं, पन्द्रहवीं, सोलहवीं, सत्रहवीं और अठारहवीं कड़ी के बाद आज प्रस्तुत है उन्नीसवीं कड़ी के रूप में सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 81-87) का हिन्दी रूपांतर।

सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्य रूपांतर

सौन्दर्य लहरी - १९करीन्द्राणां शुण्डान् कनककदलीकाण्डपटली-
मुभाभ्यामूरुभ्यामुभयमपि निर्जित्य भवति।
सुवृत्ताभ्यां पत्युः प्रणतिकठिनाभ्यां गिरिसुते
विधिज्ञे जानुभ्यां विबुधकरिकुम्भद्वयमसि॥81॥
करिवरों के शुण्ड को
कंचन कदलि के खंभ द्वय को
कर दिया करतीं पराजित
 युगल जंघायें तुम्हारी
जानु
जो पति को प्रणति करते
सुवृत्त हुए कठिन हैं
जीतती उनसे
विवुध करि कुम्भ द्वय
हे शैलवाले!

पराजेतुं रुद्रं द्विगुणशरगर्भौ गिरिसुते
निषङ्गौ जङ्घे ते विषमविशिखो बाढमकृत
यदग्रे दृश्यन्ते दशशरफलाः पादयुगली-
नखाग्रच्छद्मानः सुरमुकुटशाणैकनिशिताः॥82॥
काम ने जब प्रथम
चाहा रुद्र को करना पराजित
विजय हित गिरिजे!
तुम्हारी जंघ को तरकस बनाया
बाण अपने द्विगुण उसमें भर दिया फिर
पंचशर ने
चरण अंगुलि नखस्वरूपी
अग्र बाणों के फलक हैं दीखते
अत्यंत ही हैं तीक्ष्ण
सुरगण के मुकुट की शाण पर चढ़कर हुए द्युतिमान
जंघ निषंगिनी हे!

श्रुतीनां मूर्धानो दधति तव यौ शेखरतया
ममाप्येतौ मातः शिरसि दयया धेहि चरणौ
ययोः पाद्यं पाथः पशुपतिजटाजूटतटिनी 
ययोर्लाक्षालक्ष्मीररुणहरिचूड़ामणिरुचिः॥83॥ 
समादृत मूर्धन्य
जिनको उपनिषद रखते स्वशिर पर
गंग शंकर जटाजूट पयस्विनी
पादाम्बु जिनका
विष्णु चूड़ामड़ि अरुण
जिसकी रुचिर युग चरण छवि श्री
वही जननी
निज युगल तुम चरण
मेरे माथ पर भी
द्रवित हो रख दो दयाकर
माँ कृपा करुणामयी हे!

हिमानी हन्तव्यं  हिमगिरिनिवासैकचतुरौ
निशायां निद्राणं निशि च परभागे च विशदौ
वरं लक्ष्मीपात्रं श्रियमतिसृजन्तौ समयिनां 
सरोजं त्वत्पादौ जननि जयतिश्र्चित्रमिह किम्॥84॥
कमल हिम से नष्ट हो जाते
परंतु हिमाद्रि पर भी
पदकमल तेरे सदा छविमान रहते हैं प्रफुल्लित
कमल रजनी बीच हो जाते निमीलित
किन्तु तेरे पदकमल रहते अहर्निशि
विकसमान प्रफुल्ल पुलकित
कमलगण तो हैं रमा के पात्र
पर पदकंज तेरे उन्हें कर देते अमित श्री दान
जो समय विधि# से किया करते त्वदीय उपासना हैं
न आश्चर्य इसमें
देवि तेरे चरणद्वय अरविन्द
अद्भुत
नलिन चरणे!

#समय विधि: देवि-उपासना की तीन तंत्र-विधियों ’कौल, मिश्र एवं समय’ में से एक विधि।
बिना किसी वाह्य आचार एवं वस्तु के किसी बाह्य स्थान (महाकाश) पर संपादित न होकर अन्तःस्थित ’हृदयाकाश’ में संपादित होने वाली आराधना।
कुण्डलिनी जागरण की अनन्य उपलब्धि के उपरान्त सहस्रार में सम्पन्न शिव-शक्ति की मानसिक आराधना।

नमोवाकं ब्रूमो नयनरमणीयाय पदयो-
स्तवास्मै द्वन्द्वाय स्फुटरुचिरसालक्तकवते
असूयत्यत्यन्तं यदभिहननाय स्पृहयते
पशूनामीशानः प्रमदवनकङ्केलितरवे॥85॥
रम्य नयनानन्द
तेरे युगल चरणों में
नमन हैं
जो अलक्तक राग रंजित
रुचिर सुषमा के सदन हैं
पाद ताड़न की अभीप्सा ललक ले
जिस मंजुपद की
प्रमदवन के बीच संस्थित
हैं प्रमुग्ध अशोक पादम
देख पशुपति
हैं किया करते असूया
उस विटप से
नित नमस्कृति उन पदों में
हे नयनरमणीयचरणे!

मृषा कृत्वा गोत्रस्खलनमथ वैलक्ष्यनमितं 
ललाटे भर्तारं चरणकमले ताडयति ते
चिरादन्तःशल्यं दहनकृतमुन्मूलितवता
तुलाकोटिक्काणैः किलिकिलितमीशानरिपुणा॥86॥ 
मृषा भी सुन
गोत्रस्खलिता अन्य वनिता नाम की ध्वनि
भर्तृ शंभु ललाट
लज्जा विनत को
ताड़ित तुम्हारे कंज पद करते
मनोभव देख यह
चिरकाल पालित
शत्रुता शिव से
कलेवर दहन
करता विसर्जित
जो रही कंटक सदृश
चुभती सदा उसके हृदय में
छूम् छनन् छन् पजनी ध्वनि से
विजय करता ध्वनित निज
शिव हुताशनदग्ध मनसिज
प्रेमलीला चारिणी हे!

पदं ते कीर्तीनां प्रपदमपदं देवि विपदां 
कथं नीतं सद्भिः कठिनकमठीकर्परतुलाम्
कथं वा बाहुभ्यामुपयमनकाले पुरभिदा
यदादाय न्यस्तं दृषदि दयमानेन मनसा॥87॥ 
पद तुम्हारे कीर्तिदाता
पद
विपत्ति विनाशकारी
किस तरह कहते सुधी
यह कमठपीठ समान
कर्कश
दयासंयुत शंभु ने
किस भाँति
इस पद को स्वकर ले
कर दिया पाषाण पर स्थापित
रही समुपस्थिता जब
हर स्वकीय विवाह वेला
मृदुचरणपीठस्थली हे!

क्रमशः —

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सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 76-80) https://blog.ramyantar.com/2015/09/saundarya-lahari-18.html https://blog.ramyantar.com/2015/09/saundarya-lahari-18.html#comments Wed, 09 Sep 2015 00:18:00 +0000 सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्य रूपांतर यदेतत्कालिन्दी तनुतरतरंगाकृति शिवेकृशे मध्ये किंचिज्जननि तव यद्भाति सुधियाम्विमर्दादन्योन्यं कुचकलशयोरन्तरगतं तनूभूतं व्योम प्रविशदिव नाभिं कुहरिणीम्॥76॥ यमुन लहरी सदृश नीलीसूक्ष्म अति तनु...

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सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 76-80) का हिन्दी रूपांतर प्रस्तुत है। यह मनहर छन्द आचार्य शंकर की अद्भुत काव्य प्रतिभा के प्रतिबिम्ब हैं। शिव और शक्ति की प्रगाढ़ रागात्मक लीला का विभोर होकर गान किया है आदि शंकर ने।

इस ब्लॉग पर अब तक 75 छन्दों के काव्यानुवाद विभिन्न प्रविष्टियों में प्रकाशित हो चुके हैं। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं, तेरहवीं, चौदहवीं, पन्द्रहवीं, सोलहवीं और सत्रहवीं कड़ी के बाद आज प्रस्तुत है अठारहवीं कड़ी के रूप में सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 76-80) का हिन्दी रूपांतर-

सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्य रूपांतर

यदेतत्कालिन्दी तनुतरतरंगाकृति शिवे
कृशे मध्ये किंचिज्जननि तव यद्भाति सुधियाम्
विमर्दादन्योन्यं कुचकलशयोरन्तरगतं 
तनूभूतं व्योम प्रविशदिव नाभिं कुहरिणीम्॥76॥
यमुन लहरी सदृश नीली
सूक्ष्म अति तनु वस्तु कोई
प्रान्त कृश तव मध्य में
प्रतिभात होती सुधि जनों को
कुच कलश के बीच में पिसता हुआ
ज्यों नील नभ तनु
प्रविशता
गंभीर नाभी कुहरिणी में
हे कृशांगी!

स्थिरो गंगावर्तः स्तनमुकुलरोमावलिलता-
कलावालं कुण्डं कुसुमशरतेजोहुतभुतः
रतेर्लीलागारं किमपि तव नाभिर्गिरिसुते
बिलद्वारं सिद्धेर्गिरिशनयनानां विजयते॥77॥
नाभि रतिलीलानिकेतनि
बन गयी हो जाह्नवी की
या कि स्थिर आवर्त सरणी
कामशर के तेज से मंडित
हुताशन कुण्ड हो या
कुचकली की रोमलतिका
आलवालक गर्भ हो या
शंभुनयनानन्द सिद्धिविधायिनी
या गिरिगुहा हो
वह परम गंभीर लीलाधामिनी
माँ नाभि तेरी
विजयिनी हो, विजयिनी हो
नित हिमालयबालिके हे!

निसर्गक्षीणस्य स्तनतटभरेण क्लमजुषो
नमन्मूर्तेर्नारीतिलक शनकैस्त्रुट्यत इव
चिरं ते मध्यस्य त्रुटिततटिनीतीरतरुणा
समावस्थास्थेम्नो भवतु कुशलं शैलतनये॥78॥ 
प्रकृत्या क्षीणा
तुम्हारी गमन क्रम में दोलिता कटि
नाभि त्रिवली बीच पतली सी
पयोधर भार नमिता
तीर तटिनी के
तरुण ज्यों भग्न
मध्य झुके विटप हों
हो तुम्हारी क्षीण
नमिता कटि
कुशलिनी
शैलबाले!

कुचौ सद्यः स्विद्यत्तटघटितकूर्पासभिदुरौ
कषन्तौ दोर्मूले कनककलशाभौ कलयता
तव त्रातुं भंगादलमिति वलग्नं तनुभुवा
त्रिधा नद्धं देवि त्रिवलि लवलीवल्लिभिरवि॥79॥
आर्द्र यौवन मदोष्माजल से
तुम्हारे युग पयोधर
सुदृढ़ता से बद्ध
करके भिन्न कंचुकि के वसन को
चाहते हैं स्पर्श करना
बाहुमूलक कुक्षितट को
अतः स्वर्णकलश सदृश
उनको विचार मनोज ने फिर
रक्षणार्थ
सुबद्ध त्रिवली वल्लरी से
कस दिया है
कसमसाते उरजद्वय को
विशद पीनपयोधरे हे!

गुरुत्वं विस्तारं क्षितिधरपतिः पार्वति निजा-
न्नितम्बादाच्छिद्य त्वयि हरणरूपेण निदधे
अतस्ते विस्तीर्णो गुरुरयमशेषां वसुमतीं
नितम्बप्राग्भारः स्थगयति लघुत्वं नय्ति च॥80॥ 
हुई घटित विवाह वेला
जब तुम्हारी तब
दहेज स्वरूप
पिता नगपति हिमशिखर ने
अर्पित कर दिया था
तुम्हें अपनी अखिल गुरुता
अखिल निज विस्तार
इससे ही तुम्हारे
हैं नितम्ब युगल
सुगुरु विस्तीर्ण अतिशय दीख पड़ते
भार अपना डाल
स्थिरता दान करते
वसुमति को
और अपने भार से विस्तार से निज
मेदिनी का
सिद्ध कर देते लघुत्व
सुगुरुनितम्बिनि
पार्वती हे!

क्रमशः —

 

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सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 71-75) https://blog.ramyantar.com/2015/06/saundarya-lahari-17.html https://blog.ramyantar.com/2015/06/saundarya-lahari-17.html#respond Sun, 14 Jun 2015 08:35:00 +0000 सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्यानुवाद समं देवि स्कन्दद्विपवदनपीतं स्तनयुगं तवेदं नः खेदं हरतु सततं प्रस्नुतमुखम्।यदालोक्याशंकाकुलितहृदयो हासजनकःस्वकुम्भौ हेरम्बः परिमृशति हस्तेन झटिति॥71॥ संग हीयुग तनयषडमुख गजवदनपय स्रवित तेरे...

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सौन्दर्य लहरी संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है। आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है सौन्दर्य-लहरी में।

उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा। अब यह आपके सामने प्रस्तुत है। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं, तेरहवीं, चौदहवीं, पन्द्रहवीं और सोलहवीं कड़ी के बाद आज प्रस्तुत है सत्रहवीं कड़ी।

सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्यानुवाद

समं देवि स्कन्दद्विपवदनपीतं स्तनयुगं 
तवेदं नः खेदं हरतु सततं प्रस्नुतमुखम्।
यदालोक्याशंकाकुलितहृदयो हासजनकः
स्वकुम्भौ हेरम्बः परिमृशति हस्तेन झटिति॥71॥
संग ही
युग तनय
षडमुख गजवदन
पय स्रवित तेरे कुच युगल का पान करते
जान जिनको भाल ही निज
गणाधिप शंकित
स्वशिर पर
फेर अपना शुण्ड
तुमको हैं बना देते हसित मुख
वे तुम्हारे दुग्ध उर्मिल
अम्ब युगल उरोज पयमुख
खिन्नता मेरी हरें
उत्तुंगपीनपयोधरे हे !

अमू ते वक्षोजावमृतरसमाणिक्यकुतुपौ
न संदेहस्पन्दो नगपतिपताके मनसि नः।
पिबन्तौ तौ यस्मादविदितवधूसंगरसिकौ
कुमारावद्यापि द्विरदवदनक्रौंचदलनौ॥72॥
निसंदेह
उरोज तव
माणिक्यघट अमृतभरित हैं
पी जिन्हें
अब तक तुम्हारे
द्विरद आनन स्कंद युगसुत
हैं कुमार बने
सदा रमणीरमण रस से
विरत हैं
कामिनी संगम न करता स्पर्श
हे नगपतिपताके !

वहत्यम्ब स्तम्बेरमदनुजकुम्भप्रकृतिभिः 
समारब्धां मुक्तामणिभिरमलां हारलतिकाम्।
कुचाभोगो बिम्बाधररुचिभिरन्तःशबलितां
प्रतापव्यामिश्रां पुरदमयितुः कीर्तिमिव ते॥73॥ 
जो गजासुर कुम्भजनिता
अमल मौक्तिकहार लतिका
सुललिता धारण किये है
देवि!
तेरा उरजमंडल
वही बिम्बाधर सुछाया से
तुम्हारे मध्यप्रान्तर
बीच दर्शित हो रहा है
अरुण अरुण विभा सुरंजित
लग रहा है
पुरदमन शशिभाल
कीर्ति प्रताप का ही
हो गया हो रचित
सम्मिश्रण मनोज्ञ
सुमध्यमे हे !

तव स्तन्यं मन्ये धरणिधरकन्ये हृदयतः 
पयःपारावारः परिवहति सारस्वतमिव।
दयावत्या दत्तं द्रविडशिशुरास्वाद्य तव यत्
कवीनां प्रौढानामजनि कमनीयः कवयिता॥74॥
जो तुम्हारे उरज से
द्रवमान निर्मल
दुग्ध धारा हृत्तलागत
उसे सारस्वत महोदधि
मानता मैं
हो दयाद्रि
जिसे कराया पान तुमने
द्रविड़सुत को    (द्रविड़सुत= शंकराचार्य)
श्रेष्ठ कविजन बीच
विश्रुत हो गया वह
शैलबाले !

हरक्रोधज्वालावलिभिरवलीढेन वपुषा
गभीरे ते नाभीसरसि कृतसंगो मनसिजः।
समुत्तस्थौ तस्मादचलतनये धूमलतिका 
जनस्तां जानीते तव जननि रोमावलिरिति॥75॥ 
शंभु की क्रोधाग्निज्वालामाल से
परिदग्ध काया
छिपा जा
गंभीर तेरी नाभिसरसी बीच
मनसिज
धूमलतिका नाभि गंभीरा वहिर्गत
हो गयी जो
जगत कहता है
वही रोमावलि तव
अचल तनये !

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सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 66-70) https://blog.ramyantar.com/2015/03/saundarya-lahari-16.html https://blog.ramyantar.com/2015/03/saundarya-lahari-16.html#respond Thu, 12 Mar 2015 19:54:00 +0000 सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्यानुवाद कराग्रेण स्पृष्टं तुहिनगिरिणा वत्सलतयागिरीशेनोदस्तं मुहुरधरपानाकुलतया करग्राह्यं शंभोर्मुखमुकुरवृन्तं गिरिसुते कथंकारं ब्रूमस्तव चुबुकमौपम्यरहितम्॥66॥ पाणि सेवात्सल्यवशजिसको दुलारा हिमशिखर नेअधरपानाकुलितजिसकोकिया स्पर्शित चन्द्रधर नेमुख मुकुर के वृन्त...

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सौन्दर्य लहरी आदि शंकर की अप्रतिम काव्य सर्जना व संस्कृत के स्तोत्र साहित्य की अनुपम उपलब्धि है। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है सौन्दर्य लहरी में।

इस ब्लॉग पर अब तक इस रचना के 60 छन्दों का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं, तेरहवीं, चौदहवीं और पन्द्रहवीं कड़ी के बाद आज प्रस्तुत है सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 66-70) का हिन्दी काव्यानुवाद।

सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्यानुवाद

saundarya-lahariकराग्रेण स्पृष्टं तुहिनगिरिणा वत्सलतया
गिरीशेनोदस्तं मुहुरधरपानाकुलतया 
करग्राह्यं शंभोर्मुखमुकुरवृन्तं गिरिसुते 
कथंकारं ब्रूमस्तव चुबुकमौपम्यरहितम्॥66॥
पाणि से
वात्सल्यवश
जिसको दुलारा हिमशिखर ने
अधरपानाकुलित
जिसको
किया स्पर्शित चन्द्रधर ने
मुख मुकुर के वृन्त सम
पकड़ा जिसे सविलास शिव ने
कौन वर्णन कर सकेगा
उस अमोलक
चिबुक का फिर
सत्य ही हैं ललित अनुपम
चिबुक तेरे
चारु-चिबुके!

भुजाश्लेषान्नित्यं पुरदमयितुः कंटकवती 
तव ग्रीवा धत्ते मुखकमलनालश्रियमियम्
स्वतः श्वेता कालागुरुबहुलजम्बालमलिना 
मृणालीलालित्यं वहति यदधो हारलतिका॥67॥
ग्रीव तेरी
शंभु के भुजश्लेष से
कंटकवती जो
मुख-कमल-नाल-सी
जो श्रीमयी, सुषमामयी है
स्वतः श्वेता
किन्तु कालागरु विलेपित
श्यामवर्णी
विलसती है ग्रीव में
अभिराम मुक्ताहार लतिका
परम रम्य मृणालिनी का
वह किए लालित्य धारण
भासती अत्यंत रुचिरा ग्रीव तेरी
चारुग्रीवे!

गले रेखास्तिस्रो गतिगमकगीतैकनिपुणे 
विवाहव्यानद्धप्रगुणगुणसंख्याप्रतिभुवः
विराजन्ते नानाविधमधुररागाकरभुवां
त्रयाणां ग्रामाणां स्थितिनियमसीमान इव  ते॥68॥ 
कंठ की त्रय रेख राजित
यों सुशोभित हो रही है
यथा वैवाहिक घड़ी की
मांगलिक सूत्रावली हो त्रिगुण गुण ग्रथिता
तुम्हारे प्राण वल्लभ की पिन्हाई
या कि
नानाविधि मधुर रागादि की
प्रकटस्थली है
राग त्रय
गांधार माध्यम षड्ज की
अथवा नियमिका
ग्राम त्रय सीमा सदृश हो
गतिगमकगीतैकनिपुणे!

मृणालीमृद्वीनां तव भुजलतानां चतसृणां 
चतुर्भिः सौन्दर्यं सरसिजभवः स्तौति वदनैः।
नखेभ्यः संत्रस्यन् प्रथममथनादन्धकरिपो-
श्वतुर्णां शीर्षाणां सममभयहस्तार्पणधिया॥69॥
चार मृदु भुजवल्लरी
तेरी मनोज्ञ मृणालिनी-सी
चतुर्वदन विरंचि जिसके
अविर्वच लावण्य का नित
गान करते हैं
उन्हें है त्रास
अंधक प्राणहर (शिव) का
कर दिया विधिमुख प्रथम
नख धात्र से जिसने विदारित
निज चतुर्मुख रक्षणार्थ
प्रयास है यह स्तवन तेरा
जो विरंचि बखानते
तव बाहुसुषमा
अभयदा हे!

नखानामुद्योतैर्नवनलिनरागं विहसतां 
कराणां ते कान्तिं कथय कथयामः कथमुमे
कयाचिद्वा साम्यं भजतु कलया हन्त कमलं 
यदि क्रीडल्लक्ष्मीचरणतललाक्षारसचणम्॥70॥ 
हम तुम्हारे
युगल करतल कान्ति का
किस भाँति
वर्णन कर सकेंगे
नवल कुवलय राग का भी
जहाँ संस्थित
पाणितल की मंजु नख अवली
सदा उपहास करती
यदि कथंचित
साम्य ही उसका
कहीं करता समुद्धृत
स्वलीलामग्न
लक्ष्मीचरणतललाक्षारुणंकित
यदि कहीं अम्बोजदल हो
स्यात् वैसा ही
उमे हे!

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सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 61-65) https://blog.ramyantar.com/2015/01/saundarya-lahari-15.html https://blog.ramyantar.com/2015/01/saundarya-lahari-15.html#respond Sat, 10 Jan 2015 21:58:00 +0000 सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्यानुवाद प्रकृत्या‌‌ऽऽरक्तायास्तव सुदति दंतच्छदरुचेःप्रवक्ष्ये सादृश्यं जनयतु फलं विद्रुमलतान बिबं तद्बिबं प्रतिफलन रागादरुणितंतुलामध्यारोढुं कथमिव विलज्जते कलया ॥६१॥सुभग स्वाभाविक अरुणिमाधरतुम्हारे अधर पल्लवकौन ऐसा...

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सौन्दर्य लहरी आदि शंकर की अप्रतिम काव्य सर्जना व संस्कृत के स्तोत्र साहित्य की अनुपम उपलब्धि है। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है सौन्दर्य लहरी में।

इस ब्लॉग पर अब तक इस रचना के 60 छन्दों का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं, तेरहवीं कड़ी और चौदहवीं कड़ी के बाद आज प्रस्तुत है सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 61-65) का हिन्दी काव्यानुवाद।

सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्यानुवाद

प्रकृत्या‌‌ऽऽरक्तायास्तव सुदति दंतच्छदरुचेः
प्रवक्ष्ये सादृश्यं जनयतु फलं विद्रुमलता
न बिबं तद्बिबं प्रतिफलन रागादरुणितं
तुलामध्यारोढुं कथमिव विलज्जते कलया ॥६१॥
सुभग स्वाभाविक अरुणिमाधर
तुम्हारे अधर पल्लव
कौन ऐसा है तुलित हो
जो अधर की अरुणिमा से
फल जनन से हीन
समता है कहाँ विद्रुमलता की
रंचमात्र कला बराबर
भी न हो सकता खड़ा सम्मुख
बिम्बफल रक्ताभ तेरे अधर दल के
जगत की सब वस्तु अरुणिम
प्राप्त कर तेरी ललाई
गड़ गईं संकोच में और लाज में
हे चारुदशने! 

स्मितज्योत्स्ना जालं तव वदन चंद्रस्य पिबतां
चकोराणामासीदति रसतया चंचु जडिमा
अतस्ते शीतांशोरमृत लहरीमाम्ल रुचयः
पिबंति स्वच्छंदं निशि निशि भृशं कांजिकधिया ॥६२॥
तव वदनविधुस्रवित
मधु ज्योत्सा सुधारस पान करते
हो गयी है चञ्चु जड़िमा
प्राप्त अखिल चकोरकों की
अतः निशि निशि अम्लरुचि
स्वच्छंद
निशिपति सुधालहरी पान करते
जाड्यवारण हित
विमुग्ध चकोर खगगण
हे सुहासिनि चन्द्रवदने!
हे मधुर मधुरस्मिते हे!

अविश्रांतं पत्युर्गुणगण कथाम्रेडनजपा
जपापुष्पच्छाया तव जननि जिह्वा जयति सा
यदग्रासीनायाः स्फटिक  दृषदच्छच्छविमयी
सरस्वत्या मूर्तिः परिणमति माणिक्य वपुषा ॥६३॥
जपा कुसुपोमय तुम्हारी
जननि
जिह्वा विजयिनी हो
अविश्रान्त
स्वभर्तृगुणगणगान में
तल्लीन है  जो
स्फटिक तुल्या छविमयी
वागीश्वरी
आसीन जिस पर
निखरती
माणिक्यवपुषा
अरुणवर्णमयी
जननि हे!

रणे जित्वा दैत्यानपहृत शिरस्त्रैः कवचिभिः
निवृत्तैश्चंडांश त्रिपुरहर निर्माल्य विमुखैः
विशाखेंद्रोपेंद्रैः शशिविशद कर्पूरशकला
विलीयंते मातस्तव वदन तांबूल कबलाः ॥६४॥
जीत दैत्यों को समर में
कवच मुकुटादिक हरण कर
पहुँचते षडवदन इन्द्र उपेन्द्र
सम्मुख त्रिपुरहर के
किन्तु शंभु प्रसाद वंचित
जानते चण्डांश अधिगत
अतः
शशिसम स्वच्छ अति
कर्पूरखंड सुगंध संयुत
वे तुम्हारे वदन के
ताम्बूल कवलों को
मुदितमन
कर लिया करते सकल स्वीकार
शोभाधार मातः!

विपंच्या गायंती विविधमपदानं पशुपते
स्त्वयारब्धे वक्तुं चलितशिरसा साधुवचने
तदीयैर्माधुर्यैरपलपित तंत्रीकलरवां 
निजां वीणां वाणी निचुलयति चोलेन निभृतम् ॥६०॥
भारती
जब वीण पर
त्रिपुरारिगुणगायन  निमग्ना
मधुर स्वर में
’साधु साधु’ बखानती तुम
सिर हिला कर
धन्य वह वाणी मधुरिमा
मंद होता
वीण का स्वर
शारदा लज्जायमाना
चोल में अपनी विपञ्ची
बन्द कर लेतीं गिरा चुपचाप
सुमधुरभाषिणी हे!

क्रमशः—

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सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 56-60) https://blog.ramyantar.com/2014/08/saundarya-lahari-14.html https://blog.ramyantar.com/2014/08/saundarya-lahari-14.html#respond Sat, 30 Aug 2014 22:40:00 +0000 सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्य रूपांतर दृशा द्राघीयस्या दरदलितनीलोत्पलरुचादवीयांसं दीनं स्नपय कृपया मामपि शिवेअनेनायं धन्यो भवति न च ते  हानिरियतावने वा हर्म्ये वा समकर निपातो...

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सौन्दर्य लहरी आदि शंकर की अप्रतिम काव्य सर्जना का अन्यतम उदाहरण है। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है सौन्दर्य लहरी में।

इस ब्लॉग पर अब तक इस रचना के 55 छन्दों का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं, और तेरहवीं कड़ी के बाद आज प्रस्तुत है सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 56-60) का हिन्दी काव्यानुवाद।

सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्य रूपांतर

दृशा द्राघीयस्या दरदलितनीलोत्पलरुचा
दवीयांसं दीनं स्नपय कृपया मामपि शिवे
अनेनायं धन्यो भवति न च ते  हानिरियता
वने वा हर्म्ये वा समकर निपातो हिमकरः ॥५६॥
दूरदृष्टि मनोहरा तव
नील कंजदलाभिरामा
सींच दे मुझ दीन को भी सदय निज करुणा सलिल से
अहहः होंगे धन्य मेरे प्राण
तेरी इस कृपा से
रंच भर तेरी न होगी हानि
द्युतिमय चन्द्र किरणें
एक सम ही हैं प्रकाशित युगल को करती निरंतर
हो भले वह विपिन प्रान्तर या कि राजमहल
शिवे हे! 

अरालं ते पालीयुगलमगराजन्य तनये
न केषामाधत्ते कुसुमशर कोदंडकुतुक
तिरश्वीनो यत्र श्रवणपथमुल्लंघ्य विलस
अपागं व्यासंगो दिशति शरसंधानधिषणा॥५७॥
युगल तेरी श्रवण बाली
चक्र सी शोभायमाना
कौन है उनको न जो
कोदण्ड मनसिज का कहेगा
कर उलंघन
कर्ण पथ का
कुटिल नयन कटाक्ष जिनसे
वाणवेधनबुद्धि
रखते हैं
अहो गिरिराजतनये!

Saundarya-Lahariस्फुरद्गण्डाभोग प्रतिफलितताटंकयुगलं
चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथरथ
यमारुह्य द्रुह्यत्यवनिरथमर्केंदुचरणं
महावीरो मारः प्रमथपतये सज्जितवते॥५८॥
मानता हूँ
मुख तुम्हारा
हैं जहाँ ताण्टंक गुम्फित
युगल
प्रतिबिम्बित जहाँ पर
परम रम्य कपोल तेरे
चार चक्रों से सुसज्जित
मनोभव के रथ सदृश मैं
बैठ जिसमें
महाबीर मनोज
रवि शशि चक्र भू रथ के रथी
कामारि का मन
क्षुब्ध कर देता
कुसुमशर काम
चारु कपोलिनी हे!

सरस्वत्याः सूक्तीरमृतलहरीकौशलहरीः 
पिबन्त्याः शर्वाणि श्रवणचुलुकाभ्यामविरलं 
चमत्कारश्लाघाचलितशिरसः कुण्डलगणो
झणत्कारैस्तारैः प्रतिवचनमाचष्ट इव ते ॥५९॥
कर्ण कुहरों से
मनोहरणी
सुधारस सूक्ति लहरी
तुम सरस्वतिमुखस्रवित का
पान करती मग्न अविरत
वचचमत्कृति मुग्ध
जब करती प्रशंसा में चलित शिर
कर्ण कुण्डल खनक जाते
तार के झंकार के मिस
प्रतिवचन प्रस्फुटित करते
वदन से
शर्वाणि मातः!

असौ नासावंशस्तुहिनगिरिवंशध्वजपटि
तवदीयो नेदीयः फलतु फलमस्माकमुचित
वहत्यंतर्मुक्ताः शिशिरकर निश्वास गलितं 
समृद्ध्या यत्तासां बहिरपि च मुक्तामणिधरः॥६०॥
यह तुम्हारी नासिका का वंश मनहर
घटित जिसमें
शिशिरतर निःश्वास की अंतस्थ
मौक्तिकमालिका है
वहिर्प्रान्त
समृद्धि जिसकी
धार्य मुक्तामणिधरी है
वही नासावंश तेरा
हम अकिंचन दीन के हित
अहो! हिमगिरिवंशध्वजिनी! 
हो उचित फलदानकर्ता॥

क्रमशः—

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सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 51-55) https://blog.ramyantar.com/2014/08/saundarya-lahari-2.html https://blog.ramyantar.com/2014/08/saundarya-lahari-2.html#respond Wed, 06 Aug 2014 23:51:00 +0000 सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्यानुवाद   गते कर्णाभ्यर्णं गरुत एव पक्ष्माणि दधतीपुरां भेत्तुश्चित्तप्रशमरसविद्रावणफले इमे नेत्रे गोत्राधरपतिकुलोत्तंस कलिकेतवाकर्णाकृष्ट स्मरशरविलासं कलयतः ॥५१॥जो कर्णान्तदीर्घ विशाल तेरे युगल दृग अभिरामपलक...

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सौन्दर्य लहरी आदि शंकर की अप्रतिम काव्य सर्जना का अन्यतम उदाहरण है। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है सौन्दर्य लहरी में।

इस ब्लॉग पर अब तक इस रचना के 50 छन्दों का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवीं ग्यारहवीं, बारहवीं कड़ी के बाद आज प्रस्तुत है सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 51-55) के अनुवाद की तेरहवीं प्रविष्टि।

सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्यानुवाद

 

गते कर्णाभ्यर्णं गरुत एव पक्ष्माणि दधती
पुरां भेत्तुश्चित्तप्रशमरसविद्रावणफले 
इमे नेत्रे गोत्राधरपतिकुलोत्तंस कलिके
तवाकर्णाकृष्ट स्मरशरविलासं कलयतः ॥५१॥
जो कर्णान्तदीर्घ विशाल तेरे
युगल दृग अभिराम
पलक सायकयुक्त
उनको खींच कर अपने श्रवण तक
मन्मथ किया करता बाण का संधान तीव्र अचूक
सपदि जिससे विद्ध होते त्रिपुरहर वैराग्यवंचित
विकल कर देता नयन का बाण
हिमगिरिवंश कलिके!

विभक्तत्रैवर्ण्यं व्यतिकरितनीलांजनतया
विभाति त्वन्नेत्रत्रितयमिदमीशानदयिते
पुनः स्रष्टुं देवान्द्रुहिणहरिरुद्रानुपरता
न्रजः सत्वं विभ्रतम इति गुणानां त्रयमिव ॥५२॥
हे शंभुप्राणाधिकप्रिये!
नील अंजन खचित तेरे जो नयन त्रय हैं त्रिवर्णी
सत्व रज तम त्रिगुणमय
श्वेताभ श्यामल वर्ण लोहित
कालधर्मज विगत काय
त्रिदेव
ब्रह्मा विष्णु शिव का पुनः
कर देते सृजन हैं

पवित्रीकर्तुं नः पशुपति पराधीन हृदये
दयामित्रैर्नेत्रैररुण धवलश्यामरुचिभिः 
नदः शोणो गंगा तपनतनयेति ध्रुवममुम्‌   
त्रयाणां तीर्थानामुपनयसि सम्भेदमनघम्‌ ॥५३॥
धवल श्यामल अरुण तीनों नेत्र तेरे
दयामित्त स्वरूप
शोण सुरसरि सूर्यतनया का बनाते अमल संगम
सत्य यह ध्रुव सत्य
तुम त्रय सरित संगम तीर्थ
पावन पतित सेवक को बनाने हेतु
पशुपति पराधीन हृदाम्बुजे हे!

निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती
तवेत्याहुः संतो धरणिधर राजन्यतनये
त्वदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयतः
परित्रातुं शंके परिहृतनिमेषास्तव दृशः ॥५४॥
सत्पुरुष कहते
तुम्हारे नयन पलकों का उभरना और गिर जाना
अखिल संसार का
उद्भव प्रलय है
खुले दृग तो विश्व उद्भव
बन्द पलकों से प्रलय है
अतः जगरक्षणमना ही
कर दिया तुमने विसर्जित नयन पलक निपात अपना
हे धरणिधरराजतनये!

तवापर्णे कर्णे जपनयनपैशुन्यचकिताः
निलीयन्ते तोये नियतमनिमेषाः शफरिकाः 
इयं च श्रीर्बद्धच्छदपुटकवाटं कुवलयं 
जहाति प्रत्युषे निशि च विघटय्य प्रविशति ॥५५॥
देख तेरे श्रवणस्पर्शित चक्षु
मुद्रित पलक भीता
डूब जातीं सलिल में पैशुन्य चकिता मछलियाँ हैं
प्रात में कर बंद स्वीय कपाट
कुवलय छवि निकलती खोल देती द्वार मुद्रित
श्री निशागम काल में आ पुनः कर जाती प्रवेश
विभावरी में, अपर्णे हे!

क्रमशः—

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सौन्दर्य लहरी के कुल 45 छन्द हिन्दी रूपांतर के साथ इस ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुके हैं। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवीं, ग्यारहवीं के बाद आज प्रस्तुत है बारहवीं कड़ी के रूप में सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 46-50) का हिन्दी रूपांतर।

सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्यानुवाद

भ्रुवौ भुग्ने किं चिद्‌भुवनभयभंगव्यसनिनि
त्वदीये नेत्राभ्यां मधुकररुचिभ्यां धृतगुणम्‌ ॥
धनुर्मन्ये सव्येतरकरगृहीतं रतिपतेः
प्रकोष्ठे मुष्टौ च स्थगयति निगूढान्तरमुमे ॥४६॥
कुटिल भृकुटि युगल नयन की
ओ भुवनभयहारिणी हे!
तुल्यताधृत ज्यों शरासन
सुसज्जित मधुकरमयी अभिराम प्रत्यंचा जहाँ है
वाम करतल में स्वयं  धारण किए
जिसको मदन है
भ्रू धनुष के मध्य उसकी मुष्टि स्थापन की
सुसंगत बन गयी सम्यक व्यवस्था है॥

अहः सूते सव्यं तव नयनमर्कात्मकतया
त्रियामां वामं ते सृजति रजनीनायकतया ।
तृतीया ते दृष्टिर्दरदलितहेमाम्बुजरुचिः
समाधत्ते सन्ध्यां दिवसनिशयोरन्तरचरीम्‌ ॥४७॥
प्रकट करता है
दिवाकर को नयन दक्षिण तुम्हारा
वाम लोचन से तुम्हारे
सोम का होता सृजन है
विकच स्वर्ण विमल कमल सम
रूपवंत तृतीय लोचन
हे त्रिनयने!
समुद्भासित हो रहा ज्यों
दिवस निशि के मध्य
संध्या समासीना॥

विशाला कल्याणी स्फुटरुचिरयोध्या कुवलयैः
कृपाधाराधारा किमपि मधुराभोगवतिका ।
अवन्ती दृष्टिस्ते बहुनगरविस्तारविजया
ध्रुवं तत्तन्नामव्यवहरणयोग्या विजयते ॥४८॥
दृष्टि कल्याणी तुम्हारी विशालाख्या
कमलिनी ज्यों
वह अयोध्या पद्मरुचिरा
कृपाधाराधराधारा
भोगवति मथुरा वरेण्या
दृष्टि जयवन्ती अवन्ती
बहुनगर विस्तार विजया
व्यवहृता तद्नाम संज्ञक
दृष्टिभंगी
विजयिनी हे!

कवीनां सन्दर्भस्तवकमकरन्दैकरसिकं 
कटाक्षव्याक्षेपभ्रमरकलभौ कर्णयुगलम्‌
अमुश्चन्तौ दृष्ट्वा तव नवरसास्वादतरला-
वसूयासंसर्गादलिकनयनं किंचिदरुणम्‌ ॥४९॥
कवि भणितपद पुष्प गुच्छ
मरंद गंध रसार्द्र
कर्ण तक पसरे तुम्हारे
नवल नव रस स्वाद लोलुप
भ्रमर शिशुवत चपल लोचन
कर्णकोर न छोड़ते हैं,
देख यह ईर्ष्या विवश हो
भालस्थित जो चक्षु तेरे
सहज किंचित लालिमा
स्वीकारते
हे अरुण नयने!

शिवे शृंगारार्द्रा तदितरजने कुत्सनपरा
सरोषा गंगायां गिरिशचरिते विस्मयवती 
हराहिभ्यो भीता सरसिरुहसौभाग्यजननी
सखीषु स्मेरा ते मयि जननि दृष्टिः सकरुणा ॥५०॥
हर हृदीश्वर हेतु
अति शृंगारमयि स्नेहाम्बुतरला
इतर जनहित उपेक्षामयि
देवसरिता हित सरोषा
शिव चरित्र विमुग्धिता विस्मयवती
शिव सर्पभीता
कमलिनी
सौभाग्यजननी
सखीगणहित मधु सुहासा
मुझ अकिंचन हेतु
तेरी दृष्टि करुणामयि
जननि हे!

क्रमशः—
 

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