सच्चा शरणम्
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सौन्दर्य लहरी- 18

सौन्दर्य लहरी संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है। आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है सौन्दर्य-लहरी में। उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा। अब यह आपके सामने प्रस्तुत है। ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ – सा प्रयास है यह। अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें। सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता। मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है। उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा। जो सहेजूँगा,यहाँ लाकर रख दूँगा। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवींग्यारहवीं, बारहवीं, तेरहवीं, चौदहवीं, पन्द्रहवींसोलहवीं और सत्रहवीं कड़ी के बाद आज प्रस्तुत है अठारहवीं कड़ी –


यदेतत्कालिन्दी तनुतरतरंगाकृति शिवे
कृशे मध्ये किंचिज्जननि तव यद्भाति सुधियाम्
विमर्दादन्योन्यं कुचकलशयोरन्तरगतं 
तनूभूतं व्योम प्रविशदिव नाभिं कुहरिणीम्॥76॥
यमुन लहरी सदृश नीली
सूक्ष्म अति तनु वस्तु कोई
प्रान्त कृश तव मध्य में
प्रतिभात होती सुधि जनों को
कुच कलश के बीच में पिसता हुआ
ज्यों नील नभ तनु
प्रविशता
गंभीर नाभी कुहरिणी में
हे कृशांगी!

स्थिरो गंगावर्तः स्तनमुकुलरोमावलिलता-
कलावालं कुण्डं कुसुमशरतेजोहुतभुतः
रतेर्लीलागारं किमपि तव नाभिर्गिरिसुते
बिलद्वारं सिद्धेर्गिरिशनयनानां विजयते॥77॥
नाभि रतिलीलानिकेतनि
बन गयी हो जाह्नवी की
या कि स्थिर आवर्त सरणी
कामशर के तेज से मंडित
हुताशन कुण्ड हो या
कुचकली की रोमलतिका
आलवालक गर्भ हो या
शंभुनयनानन्द सिद्धिविधायिनी
या गिरिगुहा हो
वह परम गंभीर लीलाधामिनी
माँ नाभि तेरी
विजयिनी हो, विजयिनी हो
नित हिमालयबालिके हे!

निसर्गक्षीणस्य स्तनतटभरेण क्लमजुषो
नमन्मूर्तेर्नारीतिलक शनकैस्त्रुट्यत इव
चिरं ते मध्यस्य त्रुटिततटिनीतीरतरुणा
समावस्थास्थेम्नो भवतु कुशलं शैलतनये॥78॥ 
प्रकृत्या क्षीणा
तुम्हारी गमन क्रम में दोलिता कटि
नाभि त्रिवली बीच पतली सी
पयोधर भार नमिता
तीर तटिनी के
तरुण ज्यों भग्न
मध्य झुके विटप हों
हो तुम्हारी क्षीण
नमिता कटि
कुशलिनी
शैलबाले!

कुचौ सद्यः स्विद्यत्तटघटितकूर्पासभिदुरौ
कषन्तौ दोर्मूले कनककलशाभौ कलयता
तव त्रातुं भंगादलमिति वलग्नं तनुभुवा
त्रिधा नद्धं देवि त्रिवलि लवलीवल्लिभिरवि॥79॥
आर्द्र यौवन मदोष्माजल से
तुम्हारे युग पयोधर
सुदृढ़ता से बद्ध
करके भिन्न कंचुकि के वसन को
चाहते हैं स्पर्श करना
बाहुमूलक कुक्षितट को
अतः स्वर्णकलश सदृश
उनको विचार मनोज ने फिर
रक्षणार्थ
सुबद्ध त्रिवली वल्लरी से
कस दिया है
कसमसाते उरजद्वय को
विशद पीनपयोधरे हे!

गुरुत्वं विस्तारं क्षितिधरपतिः पार्वति निजा-
न्नितम्बादाच्छिद्य त्वयि हरणरूपेण निदधे
अतस्ते विस्तीर्णो गुरुरयमशेषां वसुमतीं
नितम्बप्राग्भारः स्थगयति लघुत्वं नय्ति च॥80॥ 
हुई घटित विवाह वेला
जब तुम्हारी तब
दहेज स्वरूप
पिता नगपति हिमशिखर ने
अर्पित कर दिया था
तुम्हें अपनी अखिल गुरुता
अखिल निज विस्तार
इससे ही तुम्हारे
हैं नितम्ब युगल
सुगुरु विस्तीर्ण अतिशय दीख पड़ते
भार अपना डाल
स्थिरता दान करते
वसुमति को
और अपने भार से विस्तार से निज
मेदिनी का
सिद्ध कर देते लघुत्व
सुगुरुनितम्बिनि
पार्वती हे!

क्रमशः —

2 comments

  1. अति सुन्दर
    संस्कृत साहित्य की मनोरम रचनाऐं.प्रयास सराहनीय
    सादर वन्दन.

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