मेरी अपनी एक ज़िद है रहने की, कहने की  और उस ज़िद का एक फलसफ़ा । यूँ तो दर्पण टूट ही जाता है पर आकृति तो नहीं टूटती न ! उसने मेज पर बैठी मक्खी को मार डाला कलम की…