यह ब्लॉग वर्ष 2008 से निरंतर गतिमान् है-कभी चटक, कभी मद्धिम।
विविध विषयों पर लिखा जाता रहा है इस ब्लॉग पर। साहित्य की विधाओं की खूब आँखमिचौनी है यहाँ। कविता तो इस ब्लॉग का प्राण है, पर आलेखों, निबन्धों व नाटकों ने इस ब्लॉग को जीवंत बनाया है। जीवन, संस्कृति, प्रेम, करुणा, सहभाग, सृष्टि, पर्यावरण, स्त्री और सौन्दर्य की अभिव्यक्ति है यहाँ- इसलिये ही तो यह रम्यांतर है।
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तेहिं तर ठाढ़ि हिरनियाँ : सोहर
अम्मा सोहर की पंक्तियाँ गुनगुना रही हैं – “छापक पेड़ छिउलिया कि पतवन गहवर हो…”। मन टहल रहा है अम्मा की स्वर-छाँह में। अनेकों बार अम्मा को गाते सुना है, कई बार अटका हूँ, भटका हूँ स्वर-वीथियों में। कितनों को...
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