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प्राचीन कवि

Ramyantar, प्रसंगवश

ग्रीष्म-1: ग्रीष्म-गरिमा-2

ग्रीष्म श्रूंखला में ब्रजभाषा से निकली यह ’ग्रीष्म-गरिमा’ आपके सम्मुख है, कवि हैं अल्पज्ञात कवि ’सत्यनारायण’। पहली कड़ी के बाद आज दूसरी कड़ी – ग्रीष्म-गरिमा जबै अटकत आपस में बंस, द्रोह दावानल पटकत आय । खटकि चटकत करिवे निज ध्वंस,…

Ramyantar, प्रसंगवश

ग्रीष्म-1: ग्रीष्म-गरिमा-1

गर्मी की बरजोरी ने बहुतों का मन थोर कर दिया है, मेरा भी। वसंत का मगन मन अगन-तपन में सिहुर-सा गया है। कोकिल कूकने से ठहरी, भौरा गुंजरित होने से, फिर अपनी क्या मजाल कि इस बउराती लूह के सामने…

Ramyantar

फाग-छंद ( संकलित ) – 2

बिहारी  फाग-रंग चढ़ गया है इन दिनों सब पर ! नदा कर चुप बैठा हूँ, ये ओरहन सुनना ठीक नहीं । अपना कौन-सा रंग है ख़ालिस कि रंगूँ उससे ! सो परिपाटी का रंग चढ़ा रहा हूँ । मेरा उद्यम…

Ramyantar

फाग-छंद ( संकलित ) – 1

घनानंद (राग केदारौ)  फाग-रंग चढ़ गया है इन दिनों सब पर ! नदा कर चुप बैठा हूँ, ये ओरहन सुनना ठीक नहीं । अपना कौन-सा रंग है ख़ालिस कि रंगूँ उससे ! सो परिपाटी का रंग चढ़ा रहा हूँ ।…