विलस रहा भर व्योमसोममन तड़प रहायह देख चांदनीविरह अश्रु छुप जाँय, छुपानाबादल तुम आना ।। 1 ।। झुलस रहा तृण-पातऔर कुम्हलाया-सामृदु गातधरा दग्ध,संतप्त हृदय की तृषा बुझानाबादल तुम आना।। 2 ।।