विकल हूँ, पहचान लूँ मैं कौन-सी वह पीर है ! अभीं आया नहीं होता वसन्त तभीं उजाड़ क्यों हो जाती है वनस्थली, क्यों हवा किसी नन्दन-वन का प्रिय-परिमल बाँटती फिरती है गली-गली, और किसी सपनीली  रात में क्यों कोयल चीख-चीख…