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Ramyantar, वृक्ष-दोहद

रूपसी गले मिलो! कि कुरबक फूल उठे (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)

यूँ तो अनगिनत पुष्प-वृक्षों को मैंने जाना पहचाना नहीं, परन्तु वृक्ष-दोहद के सन्दर्भ में ’कुरबक’ का नाम सुनकर मन में इस पुष्प के प्रति सहज ही उत्कंठा हो गयी। मैंने इसे पहचानने का प्रयास किया। प्रथमतः जैसा कुछ ग्रंथों में…

Ramyantar, वृक्ष-दोहद

फूलो अमलतास ! सुन्दरियाँ थिरक उठी हैं (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)

स्वर्ण-पुष्प वृक्ष की याद क्यों न आये इस गर्मी में। कौन है ऐसा सिवाय इसके जो दुपहरी से उसकी कान्ति चुराकर दुपहर से भी अधिक तीव्रता से चमक उठे और सारा जीवन सारांश अभिव्यक्त करे। वह कौन-सी जीवनी शक्ति है…

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तुम्हें सोचता हूँ निरन्तर…

तुम्हें सोचता हूँ निरन्तर अचिन्त्य ही चिन्तन का भाव बन जाता हैठीक उसी तरह, जैसे, मूक की मोह से अंधी आँखों में आकृति लेते हैं अनुभूति के बोल,जैसे,किसी प्रेरणा की निःशब्द गति भर देती है सुगन्ध से मेरी अक्रिय संवेदन-दृष्टि…

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टिप्पणी अदृश्य होकर करते हैं हम …

आशीष जी की यह पोस्ट पढ़कर टिप्पणी नियंत्रण का हरबा-हथियार (मॉडरेशन) हमने भी लगाया ही था कि पहली टिप्पणी अज्ञात साहब की ही आ गयी । रोचक है, और उपयोगी भी । कितना सच्चा अर्थ पकड़ा है उन्होंने मेरी कविता…

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सही कहा तुमने…..

वर्ष अतीत होते रहेपर धीरज न चुकाऔर न ही बुझातुम्हारा स्नेह युक्त मंगल प्रदीप, महसूस करता हूँ-तुम समय का सीना चीर करयौवन के रंगीले चित्र निर्मित करोगे,एक कहानी लिखोगे, जिसमें होगास्नेह-स्वप्न-जीवन का इतिवृत्त,और प्रतीक्षा में डबडबायी मेरी आँखेंपोंछ दोगे अपने…

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रमणियों की ठोकर से पुष्पित हुआ अशोक (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा )

वृक्ष-दोहद की संकल्पना के पीछे प्रकृति के साथ मनुष्य का वह रागात्मक संबंध है जिससे प्रेरित होकर अन्यान्य मानवीय क्रिया-कलाप वृक्ष-पादपों पर आरोपित कर दिये जाते रहे हैं। प्रकृति के साथ मनुष्य के  यह रागात्मक सम्बन्ध वस्तुतः उसके आनन्द को…

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चुईं सुधियाँ टप-टप

चुईं सुधियाँ टप-टपआँखें भर आयीं । कैसे अवगुण्ठन को खोलतुम्हें हास-बंध बाँधा थाकैसे मधु रस के दो बोलबोल सहज राग साधा था, हुई गलबहियाँ कँप-कँपसाँसे बढ़ आयीं । कैसे उन आँखों की फुदकनमहसूसी थी मन के आँगनकैसे मधु-अधरों का कंपनगूँज…

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हमसब की हरकतें : सच्ची-सच्ची

डिग (Digg) पर सफर करते हुए उसके आर्ट्स एंड कल्चर (Art & Culture) वर्ग से इस रोचक चित्रावली का लिंक मिला । कल्पनाशीलता और उसके प्रस्तुतिकरण दोनों ने लुभाया । मूल ब्लॉग से साभार, आपके सम्मुख भी ज्यों का त्यों…

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यह हँसी कितनी पुरानी है ?

हँसते हुए यह कभी नहीं सोचा था, कि यह हँसी कितनी पुरानी है और किसका अनुकरण कर मानव की हँसी की प्रवृत्ति विकसित हुई होगी?  खींसे निपोरकर, दाँत दिखाते हुए हँसना, खिलखिलाते हुए तोंद हिलाते हुए हँसना, आवाज निकालते चिल्लाते…