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Ramyantar

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चुईं सुधियाँ टप-टप

चुईं सुधियाँ टप-टपआँखें भर आयीं । कैसे अवगुण्ठन को खोलतुम्हें हास-बंध बाँधा थाकैसे मधु रस के दो बोलबोल सहज राग साधा था, हुई गलबहियाँ कँप-कँपसाँसे बढ़ आयीं । कैसे उन आँखों की फुदकनमहसूसी थी मन के आँगनकैसे मधु-अधरों का कंपनगूँज…

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हमसब की हरकतें : सच्ची-सच्ची

डिग (Digg) पर सफर करते हुए उसके आर्ट्स एंड कल्चर (Art & Culture) वर्ग से इस रोचक चित्रावली का लिंक मिला । कल्पनाशीलता और उसके प्रस्तुतिकरण दोनों ने लुभाया । मूल ब्लॉग से साभार, आपके सम्मुख भी ज्यों का त्यों…

Ramyantar, वृक्ष-दोहद

वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा: कवि प्रसिद्धियाँ व कवि समय

साहित्य के अन्तर्गत ’कवि-समय’ का अध्ययन करते हुए अन्यान्य कवि समयों के साथ ’वृक्ष-दोहद’ का जिक्र पढ़कर सहित्य की विराटता देखी। वृक्ष-दोहद का अर्थ वृक्षों में पुष्पोद्गम से है। यूँ तो दोहद का अर्थ गर्भवती की इच्छा है, पर वृक्ष…

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हार गया तन भी, डूब गया मन भी ।

समय की राह सेहटा-बढ़ा कई बारविरम गयी राह ही,मन भी दिग्भ्रांत-साअटक गया इधर-उधर । भ्रांति दूर करने कोदीप ही जलाया थाज्ञान का, विवेक का,देखा फिरखो गयीं संकीर्णतायेंव्यष्टि औ’ समष्टि की । स्व-प्राणों के मोह छोड़सूर्य ही सहेजा थाउद्भासित हो बैठी,…

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अपने प्रेम-पत्र में यही तो लिखा मैंने….

“जीवन के रोयें रोयें कोमिलन के राग से कम्पित होने दो,विरह के अतिशय ज्वार कोठहरा दो कहीं अपने होठों पर,दिव्य प्रेम की अक्षुण्णता कोसमो लो अपने हृदय में, औरअपने इस उद्दाम यौवन की देहरी परप्रतीक्षा का पंछी उतरने दो;फिर देखो-मैं…

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हे सूर्य !

हे बहु-परिचित सूर्य !नहीं पा रहा हूँ तुम्हें नये सिरे से पहचान,पहचान नहीं पा रहा ….उत्तरी हवा चल रही है । वैज्ञानिक कहता है-कृत्रिम-’हार्ट’ बना दूँगा,आँखें जाँय तो क्या, मृत कुत्ते की आँखें दूँगा ।और मस्तिष्क भी शायद,शायद वह भी…

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कभी तुमने अपनी गली में न झाँका

दूसरों की गली का लगाते हो फेराकभी तुमने अपनी गली में न झाँकातितलियों के पीछे बने बहरवाँसूकभी होश आया नहीं अपनी माँ का । सुबह शाम बैठे नदी के किनारेचमकते बहुत सीप कंकड़ बटोरे,सहेजा सम्हाला उन्हें झोलियों मेंगया भूल अपना…

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पंक्ति पर टिप्पणी

                             मेरी प्रविष्टि ’बस आँख भर निहारो मसलो नहीं सुमन को’ पर तरूण ने एक टिप्पणी दी –   ‘सबसे जबरदस्त पहली लाइन’ । मेरे लिये एक…

Hindi Ghazal, Ramyantar, Songs and Ghazals

बस आँख भर निहारो मसलो नहीं सुमन को

बस आँख भर निहारो मसलो नहीं सुमन कोसंगी बना न लेना बरसात के पवन को । वह ही तो है तुम्हारा उसके तो तुम नहीं होबेचैन कर रहा क्यों समझा दो अपने मन को । न नदी में बाँध बाँधो…