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चिंतन

Contemplation, चिंतन

शिशिर-बाला

साढ़े छः बजे हैं अभी । नींद खुल गयी है पूरी तरह । पास की बन्द खिड़की की दरारों से गुजरी हवा सिहरा रही है मुझे । ओढ़ना-बिछौना छोड़ चादर ले बाहर निकलता हूँ । देखता हूँ आकाश किसी बालिका…

Contemplation, चिंतन

तुमने मुझे एक घड़ी दी थी…

तुम्हें याद है…तुमने मुझे एक घड़ी दी थी-कुहुकने वाली घड़ी । मेरे हाँथों में देकर मुस्करा कर कहा था, “इससे वक्त का पता चलता है । यह तुम्हें मेरी याद दिलायेगी । हर शाम चार बजे कुहुक उठेगी । आज…

Contemplation, चिंतन

अकेला होना, सबके साथ होना है ?

“मैं अकेलापन चुनता नहीं हूँ, केवल स्वीकार करता हूँ”। ’अज्ञेय’ की यह पंक्तियाँ मेरे निविड़तम एकान्त को एक अर्थ देती हैं । मेरा अकेलापन अकेलेपन के एकरस अर्थ से ऊपर उठकर एक नया अर्थ-प्रभाव व्यंजित करने लगता है । मेरा…

Contemplation, चिंतन

भोर की हवा, मेरी नियति, श्लोक-पठन

हमेशा बाहर की खिड़की से एक हवा आती है और चुपचाप कोई न कोई संदेश सुना जाती है । भोर की नित्य शीतलता से सिहर गयी यह हवा क्या कहने, समझाने आती है रोज सुबह, पता नहीं ? पर फूल-पत्तियों,…

Contemplation, Essays, चिंतन

मैं क्या हूँ? जानना इतना आसान भी तो नहीं

अपनी कस्बाई संस्कृति में हर शाम बिजली न आने तक छत पर लेटता हूँ। अपने इस लघु जीवन की एकरस-चर्या में आकाश देख ही नहीं पाता शायद अवकाश लेकर। और फिर आकाश को भी खिड़कियों से क्या देखना। तो शाम…

Contemplation, Essays, चिंतन

सब कुछ ने मन का चैन हर लिया है

कुछ पाने, न पाने की बेचैनी, जीवन की शान्ति और अन्तर्भूत आनन्द को पाने की छटपटाहट में कई बार मन उद्विग्न हो जाया करता है। अपना आन्तर जीवन तनाव और बेचैनी का जीवन महसूस होता है, जो पीड़ित है, असुरक्षित…

Contemplation, Stories, चिंतन

सबका पेट भरे

एक महात्मा हैं, उनके पास जाता रहता हूँ। महात्मा से मेरा मतलब उस गैरिकवस्त्र-धारी महात्मा से नहीं, जिनके भ्रम में इस पूरी दुनियाँ का निश्छल मन छला जाता है। महात्मा से मेरा अर्थ महनीय आत्मा से है। बात-बात में उन्होंने…

Contemplation, चिंतन

ज्ञान जीवन के लिये हो

Morning (Photo credit: soul-nectar) मेरे एक मित्र सामान्य ज्ञान के धुरंधर पंडित हैं। वे विविध प्रकार की सूचनायें एकत्र करने के लिये पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं आदि को पढ़ते रहते हैं । वे रेडियो तथा टी0वी0 आदि द्वारा अपनी जानकारी का भण्डार…

Article | आलेख, Contemplation, चिंतन

चौथी शरण की खोज

’बच्चन’ का एक प्रश्न-चिह्न मस्तिष्क में कौंध रहा है, उत्तर की खोज है – “भूत केवल जल्पना है औ’ भविष्यत कल्पना है वर्तमान लकीर भ्रम की और क्या चौथी शरण भी ? स्वप्न भी छल जागरण भी।“ वह चौथी शरण…

Contemplation, Essays, चिंतन

किसने बाँसुरी बजायी

जरा और मृत्यु के भय से यौवन के फ़ूल कब खिलने का समय टाल बैठे हैं? जीवित जल जाने के भय से पतंग की दीपशिखा पर जल जाने की जिजीविषा कब क्षीण हुई है? क्या कोयल अपने कंठ का मधुर…