“मैं अकेलापन चुनता नहीं हूँ, केवल स्वीकार करता हूँ”।

’अज्ञेय’ की यह पंक्तियाँ मेरे निविड़तम एकान्त को एक अर्थ देती हैं । मेरा अकेलापन अकेलेपन के एकरस अर्थ से ऊपर उठकर एक नया अर्थ-प्रभाव व्यंजित करने लगता है । मेरा यह एकान्त संवेदना का गहनतम स्वाद चखते हुए, अनेकानेक अनुभूत-अनानुभूत सत्यों को खँगालते हुए मुझे सम्पूर्ण मानव जाति के अन्तःकरण से जोड़ता है ।फिर एकान्त में ठहरा हुआ यह मन-मस्तिष्क सम्पूर्ण समाज से अपने को व्यवहृत होते देखता है । स्मृति के अनगिन वातायन खुलते हैं । अपनी दैनंदिन जीवन-सक्रियता में बटोरी हुई सूर्य-मणियाँ स्मृति की गहरी अंधकार भरी गुफा में डाल दिया करता था, यह एकान्त शायद उन्हीं सूर्य-मणियों का पुनरान्वेषण है ।

इस पुनरान्वेषण में ’अज्ञेय’ पुनः याद आते हैं –

“क्या अकेला होकर ही मैं अधिक समाज-संपृक्त न हुआ होता ?”

मतलब, अकेला होना, सबके साथ होना है ?
सच ही तो है, साहित्य का भी एक अर्थ यही तो व्यंजित करता है – सहितौ – सबके साथ होना ।