सच्चा शरणम्
All rights are reserved @ramyantar.com.

भोर की हवा, मेरी नियति, श्लोक-पठन

हमेशा बाहर की खिड़की से एक हवा आती है और चुपचाप कोई न कोई संदेश सुना जाती है । भोर की नित्य शीतलता से सिहर गयी यह हवा क्या कहने, समझाने आती है रोज सुबह, पता नहीं ? पर फूल-पत्तियों, वृक्षों, वनस्पतियों, दिग-दिगन्तों से सानुराग गलबहियाँ करती यह हवा मेरे सोये मन को, मस्तिष्क को चेतन कर चिंतन का एक छोर थमा जाती है ।

सोचता हूँ यह हवा गति है । सापेक्ष गति ही जीवन है । जीवन एक नियति । जीवन की यह नियति- दिन, महीने की नियति, संवत्सर की नियति या एक पूरे युग की नियति है । हर क्षण और हर युग अपनी नियति में अन्य क्षणों और युगों से अलग होता है । जैसे अभी हवा के स्पर्श से उपजी अनुभूति की नियति, या विशेष क्षण के अपर हो जाने के बाद निर्मित हुए इस लेखन-क्षण की नियति । और इस सबके अन्दर या बाहर चलता रहता है आदमी – मेरी तरह – अपनी नियति के साथ या अपनी नियति पर ही कदम रखता हुआ ।

अभी जब यह लिख कर उठूँगा, तो कुछ देर बाद नहा-धो कर कुछ श्लोक पाठ करुँगा । कई बार कई अवसरों पर अनगिनत श्लोकों का पाठ भर कर लिया करता हूँ । सोचता हूँ, यह श्लोक का पढ़ भर लेना भी एक कार्य है, एक प्रयोजन – अच्छी और बुरी नियति से जुड़ी एक कथा बनती जाती है इस श्लोक पठन से । अनेकों प्रातः-चेतन मनुष्यों द्वारा पढ़े जाते गये ये श्लोक युगों-युगों से पढ़े जा रहे होंगे, और धीरे-धीरे इस पृथ्वी के लिये पृथ्वी पर ही घटित होने वाली एक कथा निर्मित हो गयी होगी । यह कथा शाप की कथा होगी या फिर वरदान की भी । ऐसा भी होता होगा कि कई बार यह शाप और वरदान की कथायें एक दूसरे का प्रतिबन्ध और प्रतिकार्य बन जाती होंगी, और फिर निर्मित होती होगी श्लोक पठन से निर्मित कथा की नियति…..

अभी मैं चला – अपनी नियति वहन करता, समष्टिगत नियति से अपनी व्यष्टिगत नियति को बटोरता – रोज की तरह ।

12 comments

  1. प्रात चिंतन -ऋषि मुनियों की ही परम्परा का निर्वाह करते हुए !

  2. बड़ा ही सार्थक है ऐसे दिन शुरु करना..बड़ा उम्दा लेखन..बहता हुआ.

  3. सभी कुछ यहीं तो थिर था, मित्र ! बस दृष्टा का सँकेत होते ही यह वैसा दिखने लग पड़ता है । श्लोकपाठ स्व-प्रस्तावना नहीं तो क्या है ? आपने उच्चरित किया.. इहा आगच्छ इहं तिष्ठ और मानिये कि देव आकर बैठ गये.. इत्यादि

  4. शोधपरक आलेख. यही आलेख की नियति रही होगी.

  5. बहुत बढ़िया ….अच्छी लगी आपकी रचना…

  6. हमारे अहसास की है ऐसी लगन,
    यही है अपनी नियति का वहन ।।

  7. भोर की हवा ! आपके लिए आदर भाव जाग रहा है. भोर में उठे तो बहुत दिन हो गए…

  8. भोर का सुख यहाँ नगरों में कहाँ।

  9. ओह, आज की भोर वास्तव में सुहानी थी। वाहन के वातानुकूलन को बन्द कर बयार में कविता करने को प्रेरित करती हुई!
    ॠषि अच्छी ॠचायें इसी समय रचते रहे होंगे!

  10. बहुत धन्यवाद इस चिंतन के लिये. बिल्कुल ताजगी लिये.

    रामराम.

  11. सुबह से शाम तक के काम काज के बाद देर रात तक जाग कर खुद की पढाई निपटाना ..मेरे नसीब में ऐसी सुबह शायद ही हो, आप भाग्यवान हैं

  12. एक अपना ही शेर याद हो आया, कभी लिखा था
    “सुबह की इस दौड़ में हैं थक के भूले हम
    लुत्फ़ क्या होता है अलसाये सबेरों में”

    समष्टिगत नियति से अपनी व्यष्टिगत नियति को बटोरता – रोज की तरह…और मैं शब्दों की भाव-भंगिमा पर चकित हो आप को देखता हूँ

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *