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Ramyantar, भोजपुरी, लोक साहित्य, शैलबाला शतक, स्तोत्र

शैलबाला शतक – भोजपुरी स्तुति काव्य : बारह

शैलबाला शतक नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह छन्द! शैलबाला-शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली…

Ramyantar, भोजपुरी, लोक साहित्य, शैलबाला शतक, स्तोत्र

शैलबाला शतक – भोजपुरी स्तुति काव्य : ग्यारह

शैलबाला शतक नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह छन्द! शैलबाला-शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली…

Capsule Poetry, Poetry, Ramyantar

कविता : इंतज़ार उसका था

[एक.] सलीका आ भी जाता सिसक उठता झाड़ कर धूल पन्नों की पढ़ता कुछ शब्द सुभाषित ढूंढ़ता झंकारता उर-तार राग सुवास गाता रहस-वन मन विचरता। मैं स्वयं पर रीझ तो जाता पर इंतज़ार उसका था। [दो.] साँवली-सी डायरी में एक…

Ramyantar, Songs and Ghazals

ग़ज़ल – चाँदनी या मुख़्तसर सी धूप लाना, भूलना मत

नज़र में भरकर नज़र कुछ सिमट जाना, भूलना मत। देखना होकर मगन फिर चौंक जाना, भूलना मत। मौज़ खोकर ज़िन्दगी ग़र आ किनारों में फँसे नाव अपनी खींचकर मझधार लाना, भूलना मत। न पाया ढूढ़कर भी दर्द दिल ने बेखबर…

Capsule Poetry, Ramyantar, Verse Free

मेरे प्यारे मज़दूर

मैं जानता हूँ तुम्हारे भीतर कोई ’क्रान्ति’ नहीं पनपती पर बीज बोना तुम्हारा स्वभाव है। हाथ में कोई ‘मशाल’ नहीं है तुम्हारे पर तुम्हारे श्रम-ज्वाल से भासित है हर दिशा। मेरे प्यारे ’मज़दूर’! यह तुम हो जो धरती की गहरी…

Poetic Adaptation, Ramyantar, Translated Works, सौन्दर्य-लहरी

सौन्दर्य लहरी – 21

स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाद्याभिरभितो, निषेवे नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः। किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो, महासंवर्ताग्निविरचयति नीराजनविधिं ॥95॥ स्वशरीरोद्भूत किरणसमूह अणिमादिक सुसेवित जो स्वरूप त्वदीय नित करता निषेवित अहं भावित कौन सा आश्चर्य शंभुसमृद्धि वह साधकशिरोमणि तृणसदृश गिनता प्रलय का प्रज्ज्वलित पावक दहन भी…

Poetic Adaptation, Ramyantar, Translated Works, सौन्दर्य-लहरी

सौन्दर्य लहरी – 20

नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसङ्कोचशशिभिः तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ। फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलय-कराग्रेण ददतां दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमह्नाय ददतौ ॥88॥ पद तुम्हारे निज सुधाकर नख अवलि से स्वर्गललना के सरोरुह पाणितल को संकुचित देते बना हैं चण्डि! तेरे चरणद्वय देवेन्द्रवन स्थित कल्पतरु…

Ramyantar

को सजनी निलजी न भई, अरु कौन भटू जिहिं मान बच्यौ है

१. (राग केदार) पकरि बस कीने री नँदलाल। काजर दियौ खिलार राधिका, मुख सों मसलि गुलाल॥ चपल चलन कों अति ही अरबर, छूटि न सके प्रेम के जाल। सूधे किए अंक ब्रजमोहन, आनँदघन रस-ख्याल॥ २. (राग सोरठ) मनमोहन खेलत फाग…

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सौन्दर्य लहरी (छन्द संख्या 81-87)

सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्य रूपांतर करीन्द्राणां शुण्डान् कनककदलीकाण्डपटली-मुभाभ्यामूरुभ्यामुभयमपि निर्जित्य भवति।सुवृत्ताभ्यां पत्युः प्रणतिकठिनाभ्यां गिरिसुतेविधिज्ञे जानुभ्यां विबुधकरिकुम्भद्वयमसि॥81॥करिवरों के शुण्ड कोकंचन कदलि के खंभ द्वय कोकर दिया करतीं पराजित युगल जंघायें तुम्हारीजानुजो पति को प्रणति करतेसुवृत्त हुए कठिन हैंजीतती उनसेविवुध करि कुम्भ द्वयहे…