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छन्दबद्ध कविता

Ramyantar

प्रणय-पीयूष-घट हूँ मैं

Sarracenia    © Karen Hall प्रणय-पीयूष-घट हूँ मैं। आँख भर तड़ित-नर्तन देखता मेघ-गर्जन कान भर सुनता हुआ  पी प्रभूत प्रसून-परिमल  ओस-सीकर चूमता निज अधर से   जलधि लहरों में लहरता  स्नेह-संबल अक्षय वट हूँ मैं। देखता खिलखिल कुसुम तरु सुरभि हाथों…

Ramyantar

तुम को क्या हो गया…

तुम को क्या हो गया आज तुम इतने व्याकुल हो मेरे मन व्यक्त कर सकेगी क्या वाणी उर के गहन सिन्धु का मंथन ॥ सरिजल के तरंग की गाथा पूछ पूछ हारा तट तरु से दिनमणि-किरण-दग्ध सिकता की व्यथा जाननी…

Ramyantar, Translated Works

यह कैसे हुआ मीत….

‘मोहरे वही, बिसात भी वही और खिलाड़ी भी…/ यह कैसे हुआ मीत /….’ बहुत पहले सुना था इस गीत को । कोशिश की, गीतकार का नाम पता चल जाय पर जान न सका उस वक्त । कुछ लोगों ने कहा,…

Ramyantar

तुम क्यों उड़ जाते काग नहीं !

तुम क्यों उड़ जाते काग नहीं ! व्याकुल चारा बाँटते प्रकट क्यों कर पाते अनुराग नहीं । दायें बायें गरदन मरोड़ते गदगद पंजा चाट रहे क्या मुझे समझते वीत-राग फागुन की बायन बाँट रहे, हे श्याम बिहँग, इस कवि-मन की…