तुम को क्या हो गया आज तुम इतने व्याकुल हो मेरे मन
व्यक्त कर सकेगी क्या वाणी उर के गहन सिन्धु का मंथन ॥

सरिजल के तरंग की गाथा पूछ पूछ हारा तट तरु से
दिनमणि-किरण-दग्ध सिकता की व्यथा जाननी चाही मरु से,
मुखर न हुए मौन व्रत-धारी केवल सिहर गया उनका तन॥

अपनी पीर नहीं कह पाते नभ के सूरज चाँद सितारे
शांत प्रकृति इंगित करती है मौन सरीखा शास्त्र न प्यारे,
नीरव ढुलक अमोलक आँसू करता मृदु कपोल प्रक्षालन॥

धरा मौन, गिरि मौन, मौन नभ अनुपम मौन सुमन की श्वाँसें
सृष्टि चक्र अनकहा चल रहा शाश्वत प्रेरित हरि इच्छा से,
कितना शीतल कितना सुरभित नहीं बता पाता है चंदन॥

क्या न निहारा है अनुरागी नयनों का नीरव अभिनन्दन
किस स्वर्गीय तृप्ति से कम है नित निःशब्द बाहु के बंधन,
कितना मोहक होता पगले अनबोले अधरों का चुम्बन॥