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प्रेम कविता

Ramyantar

प्रणय-पीयूष-घट हूँ मैं

Sarracenia    © Karen Hall प्रणय-पीयूष-घट हूँ मैं। आँख भर तड़ित-नर्तन देखता मेघ-गर्जन कान भर सुनता हुआ  पी प्रभूत प्रसून-परिमल  ओस-सीकर चूमता निज अधर से   जलधि लहरों में लहरता  स्नेह-संबल अक्षय वट हूँ मैं। देखता खिलखिल कुसुम तरु सुरभि हाथों…

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तरुणाई क्या फिर आनी है ..

तरुणाई क्या फिर आनी है ! चलो, आओ ! झूम गाओ प्रीति के सौरभ भरे स्वर गुनगुनाओ हट गया है शिशिर का परिधान वसंत के उषाकाल में पुलकित अंग-अंग संयुत झूमती हैं टहनियाँ रसाल की और नाचता है निर्झर गिरि…

Ramyantar

कैसे ठहरेगा प्रेम जन्म-मृत्यु को लाँघ …

तुम आते थे मेरे हृदय की तलहटी में मेरे संवेदना के रहस्य-लोक में मैं निरखता था- मेरे हृदय की श्यामल भूमि पर वन्यपुष्प की तरह खिले थे तुम । तुम आते थे अपने पूरे प्रेमपूर्ण नयन लिये निश्छल दूब का…