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September 2014

Ramyantar, नाटक

बतावत आपन नाम सुदामा (नाट्य) – दो

पिछली प्रविष्टि से आगे –  दृश्य द्वितीय (द्वारिकापुरी का दृश्य। वैभव का विपुल विस्तार। धन-धान्य का अपार भण्डार। धनिक, वणिक, कुबेर हाट सजाये। संगीतागार, मल्लशाला, शुचि गुरुकुल, प्रशस्त मार्ग, गगनचुम्बी अट्टालिकाओं की मणि-माला, विभूषित अखण्ड शृंखला, सुसज्जित घने विटप एवं…

Audio, Ramyantar, लोक साहित्य

कब सुधिया लेइहैं मन के मीत

सहज, सरल, सरस भजन। बाबूजी की भावपूर्ण लेखनी के अनेकों मनकों में एक। छुटपन-से ही सुलाते वक़्त बाबूजी अनेकों स्वरचित भजन गाते और सुलाते। लगभग सभी रचनायें अम्मा को भी याद होतीं और उनका स्वर भी हमारी नींद का साक्षी…

Ramyantar, नाटक

बतावत आपन नाम सुदामा (नाट्य) – एक

दृश्य प्रथम (सुदामा की जीर्ण-शीर्ण कुटिया। सर्वत्र दरिद्रता का अखण्ड साम्राज्य। भग्न शयन शैय्या। बिखरे भाण्ड, मलिन वस्त्रोपवस्त्रम। एक कोने विष्णु का देवविग्रह। कुश का आसन। धरती पर समर्पित अक्षत-फूल। तुरन्त देवार्चन से उठे सुदामा भजन गुनगुना रहे हैं। सम्मुख…