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कविता

Ramyantar

तुम क्यों उड़ जाते काग नहीं !

तुम क्यों उड़ जाते काग नहीं ! व्याकुल चारा बाँटते प्रकट क्यों कर पाते अनुराग नहीं । दायें बायें गरदन मरोड़ते गदगद पंजा चाट रहे क्या मुझे समझते वीत-राग फागुन की बायन बाँट रहे, हे श्याम बिहँग, इस कवि-मन की…

Ramyantar

तुमने चुपके से मुझे बुलाया ..

Photo Source : Google तुमने चुपके से मुझे बुलाया । पूजा की थाली लेकर साँझ सकारे हाथों में, तुम चली बिखर गयी अरुणाभा दीपक में चली हवा साड़ी सरकी ’सर’ से  सर से दीपक भकुआया कँपती लौ ने संदेश पठाया…

Ramyantar

मुझे मौन होना है

मुझे मौन होना है  तुम्हारे रूठने से नहीं, तुम्हारे मचलने से नहीं, अन्तर के कम्पनों से सात्विक अनुराग के स्पन्दनों से । मेरा यह मौन  तुम्हारी पुण्यशाली वाक्-ज्योत्सना को  पीने का उपक्रम है, स्वयं को अनन्त जीवन के भव्य प्रकाश…

Ramyantar

स्वलक्षण-शील

’महाजनो येन गतः..’ वाला मार्ग भरी भीड़ वाला मार्ग है नहीं रुचता मुझे, जानता हूँ  यह रीति-लीक-पिटवइयों की निगाह में  निषिद्ध है, अशुद्ध है । चिन्ता क्या !  मेरी इस रुचि में (या अरुचि में) बाह्य और आभ्यन्तर, प्रेरणा और…

Ramyantar

तरुणाई क्या फिर आनी है ..

तरुणाई क्या फिर आनी है ! चलो, आओ ! झूम गाओ प्रीति के सौरभ भरे स्वर गुनगुनाओ हट गया है शिशिर का परिधान वसंत के उषाकाल में पुलकित अंग-अंग संयुत झूमती हैं टहनियाँ रसाल की और नाचता है निर्झर गिरि…

Ramyantar, Translated Works

नये साल में रामजी…

उल्लास की संभावनायें लेकर आता है नववर्ष । न जाने कितनी शुभाकांक्षायें, स्वप्न, छवियाँ हम सँजोते हैं मन में नये वर्ष के लिये । अनगिन मधु-कटु संघात समोये अन्तस्तल में विगत वर्ष का विहंग उड़ जाता है शून्य-गगन में ।…

Ramyantar

शायद, आज मैं मिलूँगा तुमसे !

आज सुबह धूप जल्दी आ गयी नन्दू चच्चा को महीने भर का काम मिल गया छप्पर दुरुस्त हो गया आज बगल वाली शकुन्तला का “सर्दी नहीं पड़ेगी” की भविष्यवाणी फेल हो गयी – पन्ना बाबा चहक उठे रेखवा की अम्मा…

Ramyantar

अधूरी कविता …

एक पन्ना मिला । पन्ने पर फरवरी २००७ लिखा है, इसलिये लगभग तीन साल पहले की एक अधूरी कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ । अधूरी इसलिये कि उस क्षण-विशेष की संवेदना और भाव-स्थिति से अपने को जोड़ नहीं पा रहा…

Ramyantar

स्वर अपरिचित …

बीती रात मैंने चाँद से बातें की । बतियाते मन उससे एकाकार हुआ । रात्रि  के सिरहाने खड़ा चाँद तनिक निर्विकार हुआ , बोला – “काल का पहिया न जाने कितना घूमा न जाने कितनी राहें मैं स्वयं घूमा और…

Ramyantar

पराजितों का उत्सव : एक आदिम सन्दर्भ -४

पराजितों का उत्सव : एक आदिम सन्दर्भ -१ पराजितों का उत्सव : एक आदिम सन्दर्भ -२ पराजितों का उत्सव : एक आदिम सन्दर्भ -३ से आगे….. और इसीलिये, शायद इसीलिये — थपेड़े खा-खा कर सुरक्षित-खामोश बच जाने को धार की,…