सच्चा शरणम्
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अनुभूति..

ज देखा तुम्हें अन्तर के मधुरिल द्वीप पर !
निज रूपाकाश में मधुरिम प्रभात को पुष्पायित करती,
हरसिंगार के कुहसिल फूल-सी,
प्रणय-पर्व की मुग्ध कथा-सी बैठी थीं तुम !
अपने लुब्ध नयनों से ढाँक कर ताक रहा था तुम्हें !
औचक ही तुमने मुझे देख लिया ! अकारण ही सहसा आ गयी लाज तुम्हें !
वसन के समान ही छा गया रंग का आवरण !

यह आवरण किस लिए ?
विभोर मेरी वासना को थकने मत दो !
मेरी लालसा को भटकने दो तुम्हारे दृष्टि-निकुंज में !
तुम्हारी आँखों के उदार गगन का आश्रय चाहिए मेरे  वासना सघन नेत्रों को !

मैं कुछ पगला गया हूँ ! मत्त-सा !
खिंचता हूँ इधर-उधर सोच की तरह !
प्यास है अनोखी एक !
ज्योत्सना को शरीर में प्रवहित करने की सोचता हूँ,
अवश होना चाहता हूँ अपनी ही रागिनी छेड़,
निथरना चाहता हूँ सुख-सा दुख में,
झरना चाहता हूँ मोह-सा प्रेम में !

अपने हृदय कुसुम की सिहरती पंखुड़ी पर आ पड़ी ओस की बूँद-सा सिहराओ मुझे 
कि प्रेम का अनन्त आकाश उसमें अपना मुख निहारे
और निहाल हुआ जाय !
यह मत सोचना कि अवधि कितनी ?
उतनी ही जितनी पलको की हाँथों में थमे आँसू की उम्र !
पलकों की हाँथों से सरका कि उसमें झिलमिलाती आकृति क्षण भर में खोयी !

अनुभूति ने काम कर दिया अपना !

23 comments

  1. '' ………………………………………………………..

    I no longer love her, that's certain, but how I loved her.
    My voice tried to find the wind to touch her hearing.

    Another's. She will be another's. As she was before my kisses.
    Her voice, her bright body. Her infinite eyes.

    I no longer love her, that's certain, but maybe I love her.
    Love is so short, forgetting is so long.

    Because through nights like this one I held her in my arms
    my soul is not satisfied that it has lost her.

    Though this be the last pain that she makes me suffer
    and these the last verses that I write for her. '' [ ~ Pablo Neruda ]

  2. बहोत ही अच्छी लगी आज की पोस्ट…

  3. एक आचार्य की कविता पर दूसरे आचार्य द्वारा पाब्लो नेरुदा की पंक्तियाँ।

    अनुभूति ने काम कर दिया अपना 🙂

    He was a Poet, sure a lover too,
    Who stood on Latmus’ top, what time there blew
    Soft breezes from the myrtle vale below;
    And brought in faintness solemn, sweet, and slow
    A hymn from Dian’s temple; while upswelling,
    The incense went to her own starry dwelling.
    But though her face was clear as infant’s eyes,
    Though she stood smiling o’er the sacrifice,
    The Poet wept at her so piteous fate,
    Wept that such beauty should be desolate: बस ऐंवे ही 🙂

    यह कविता मुझे 'प्रेमपत्र' से टपक पड़ी शब्द निर्झरिणी सी लगी। किसके लिए रचे कवि?

  4. अति सुन्दर ! कैसी-कैसी तो उपमाएं हैं-
    "हरसिंगार के कुहसिल फूल सी"
    "प्रणय-पर्व की मुग्ध कथा-सी"
    "वसन के समान ही छा गया रंग का आवरण !"
    कैसे-कैसे रूपक
    दृष्टि निकुंज
    ह्रदय कुसुम
    प्रेम का अनंत आकाश
    अद्भुत…अभूतपूर्व रचना.
    मैं नहीं पूछूँगी "किसके लिए रचे कवि?"

  5. अत्यन्त सुंदर भाव…बढ़िया प्रस्तुति के लिए आभार

  6. Music, when soft voices die,
    Vibrates in the memory–
    Odours, when sweet violets sicken,
    Live within the sense they quicken.
    –Shelly

    अनुभूति ने काम कर दिया अपना.

  7. अति सुंदर और नायाब, शुभकामनाएं.

    रामराम

  8. शब्दों और भावों से आप वैसे ही खेलते हैं जैसे शतरंज का खिलाड़ी मोहरों से …सुंदर रचना।

  9. यहाँ हिंदी अपने पराकाष्ठा पर है…. अनुभूति भी चरम पर है.

  10. भाषा और भावनाओं पर तो आपकी पकड़ हमेशा की तरह मजबूत है पर छंदमुक्त कविता में जिस प्रवाह की जरूरत होती है उसकी कमी खली…

  11. "वसन के समान ही छा गया रंग का आवरण !"—.बढ़िया प्रस्तुति!!!

  12. हिमांशु और यह शब्द-मोह ! कितने ताज्जुब की बात है! बुनकर ने तो, जैसा कि बुनता रहा है, बेहतरीन कपड़ा बुना.. पर दर्जी सुस्त रहा!

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