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कविता

Ramyantar, Translated Works

अति प्रिय तुम हमसे अनन्य हो गये..

चारुहासिनी (मेरी भतीजी) की जिद है, इसलिये ये स्वागत-गीत यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ । उसके स्कूल में इस स्वतंत्रता दिवस पर गाने के लिये रचनायें दी थीं – उनमें यह भी था । उसकी जिद है कि “अपना तो…

Ramyantar

मैंने जो क्षण जी लिया है ….

मैंने जो क्षण जी लिया है उसे पी लिया है , वही क्षण बार-बार पुकारते हैं मुझे और एक असह्य प्रवृत्ति जुड़ाव की महसूस करता हूँ उर-अन्तर क्षण जीता हूँ, उसे पीता हूँ तो स्पष्टतः ही उर्ध्व गति है, क्षण…

Ramyantar

जागो मेरे संकल्प मुझमें ….

जागो मेरे संकल्प मुझमें कि भोग की कँटीली झाड़ियों में उलझे, भरपेट खाकर भी प्रतिपल भूख से तड़पते स्वर्ण-पिंजर युक्त इस जीवन को मुक्त करूँ कारा-बंधों से, दग्ध करूँ प्रेम की अग्नि-शिखा में । मेरा मनोरथ सम्हालो मेरे प्रिय !…

Ramyantar

कैसे ठहरेगा प्रेम जन्म-मृत्यु को लाँघ …

तुम आते थे मेरे हृदय की तलहटी में मेरे संवेदना के रहस्य-लोक में मैं निरखता था- मेरे हृदय की श्यामल भूमि पर वन्यपुष्प की तरह खिले थे तुम । तुम आते थे अपने पूरे प्रेमपूर्ण नयन लिये निश्छल दूब का…

Ramyantar, Translated Works

बचपन, यौवन, वृद्धपन….

बचपन ! तुम औत्सुक्य की अविराम यात्रा हो, पहचानते हो, ढूढ़ते हो रंग-बिरंगापन क्योंकि सब कुछ नया लगता है तुम्हें । यौवन ! तुम प्रयोग की शरण-स्थली हो, आजमाते हो, ढूँढ़ते हो नयापन क्योंकि सबमें नया स्वाद मिलता है तुम्हें…

Ramyantar

गुरु की पाती –

शिक्षक-दिवस पर प्रस्तुत कर रहा हूँ ’हेनरी एल० डेरोजिओ”(Henry L. Derozio) की कविता ’To The Pupils’ का भावानुवाद – मैं निरख रहा हूँ नव विकसनशील पुष्प-पंखुड़ियों-सा सहज, सरल मंद विस्तार तुम्हारी चेतना, तुम्हारे मस्तिष्क का, और देख रहा हूँ शनैः…

Ramyantar

इस तरह नष्ट होती है वासना !

मेरा एक विद्यार्थी ! या और भी कुछ । कई सीमायें अतिक्रमित हो जाती हैं । आज निश्चित अंतराल पर की जाने वाली खोजबीन से उसकी एक चिट्ठी मिली । घटना-परिघटना से बिलकुल विलग रखते हुए आपके सम्मुख लिख रहा…

Ramyantar, Religion and Spirituality

कई बार निर्निमेष अविरत देखता हूँ उसे

कई बार निर्निमेष अविरत देखता हूँ उसे यह निरखना उसकी अन्तःसमता को पहचानना है मैं महसूस करता हूँ नदी बेहिचक बिन विचारे अपना सर्वस्व उड़ेलती है फिर भी वह अहमन्य नहीं होता सिर नहीं फिरता उसका; उसकी अन्तःअग्नि, बड़वानल दिन…

Ramyantar

दिनों दिन सहेजता रहा बहुत कुछ …

(१)दिनों दिन सहेजता रहा बहुत कुछजो अपना था, अपना नहीं भी था,मुट्ठी बाँधे आश्वस्त होता रहाकि इस में सारा आसमान है;बाद में देखा,जिन्हें सहेजता रहा क्षण-क्षणउसका कुछ भी शेष नहीं,हाँ, जाने अनजाने बहुत कुछलुटा दिया था मुक्त हस्त-वह साराद्विगुणित होकर…

Ramyantar

मैं समर्पित साधना की राह लूँगा…

मुझसे मेरे अन्तःकरण का स्वत्वगिरवी न रखा जा सकेगाभले ही मेरे स्वप्न,मेरी आकांक्षायेंसौंप दी जाँय किसी बधिक के हाँथों कम से कम का-पुरुष तो न कहा जाउंगाऔर न ऐसा दीप हीजिसका अन्तर ही ज्योतिर्मय नहीं,फिर भले हीखुशियाँ अनन्त काल के…