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कविता

Ramyantar

जल ही जीवन का सम्बल है

अप् सूक्त : [जल देवता ]ऋचा –शं नो देवीर् अभिष्टय आपो भवन्तु पीतयेशं योर् अभिस्रवन्तु नः ….- –ऋग्वेद —————————————– जल ज्योतिर्मय वह आँचल हैजहाँ खिला –वह सृष्टि कमल हैजल ही जीवन का सम्बल है । ’आपोमयं’ जगत यह सारायही प्राणमय…

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मैथिली शरण गुप्त के जन्मदिवस (3 अगस्त) पर

हिन्दी साहित्य के उज्ज्वल नक्षत्र राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त का जन्मदिवस है कल। प्रस्तुत है उनका प्रसिद्ध और विख्यात गीत, ’सखि वे मुझसे कह कर जाते!’ – पढ़े भी और सुनें भी। सखि, वे मुझसे कहकर जाते, कह, तो क्या…

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तुम्हें कौन प्यार करता है ?

हे प्रेम-विग्रह !एक द्वन्द्व है अन्तर्मन में,दूर न करोगे ? मेरी चेतना के प्रस्थान-बिन्दु परआकर विराजो, स्नेहसिक्त !कि अनमनेपन से निकलकर मैं जान सकूँ कि तुम्हें प्यार कौन करता है ? क्या वह जो अपने प्राणों की वेदी परप्रतिष्ठित करता…

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तुम कौन हो ? …

तुम कौन हो ?जिसने यौवन का विराट आकाशसमेट लिया है अपनी बाहों में,जिसने अपनी चितवन की प्रेरणा सेठहरा दिया है सांसारिक गति को तुम कौन हो ?जिसने सौभाग्य की कुंकुमी सजावटकर दी है मेरे माथे पर,जिसने मंत्रमुग्ध कर दिया है…

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मैं कैसे प्रेमाभिव्यक्ति की राह चलूँ .

तुम आयेविगत रात्रि के स्वप्नों में श्वांसों की मर्यादा के बंधन टूट गयेअन्तर में चांदनी उतर आयीजल उठी अवगुण्ठन में दीपक की लौविरह की निःश्वांस उच्छ्वास में बदल गयीप्रेम की पलकों की कोरों से झांक उठा सावनऔर तन के इन्द्रधनुषी…

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दोनों हाँथ जोड़कर…

मैं अपनी कवितायेंतुम्हें अर्पित करता हूँजानता हूँकि इनमें खुशियाँ हैंऔर प्रेरणाएँ भीजो यूँ तो सहम जाती हैंघृणा और ईर्ष्या के चक्रव्यूह सेपर, नियति इनमें भी भर देती हैनित्य का संगीत । यह कवितायें तुम्हारे लियेइसलियेकि यह कर्म और कारण की…

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तू सदा ही बंधनों में व्यक्त है, अभिव्यक्त है

व्यथित मत होकि तू किसी के बंधनों में है, अगर तू है हवातू सुगंधित है सुमन के सम्पुटों में बंद होकरया अगर तू द्रव्य है निर्गंध कोईसुगंधिका-सा बंद है मृग-नाभि मेंया कवित है मुक्तछंदी तू अगरमुक्त है आनन्द तेरा सरस…

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तुम्हें सोचता हूँ निरन्तर…

तुम्हें सोचता हूँ निरन्तर अचिन्त्य ही चिन्तन का भाव बन जाता हैठीक उसी तरह, जैसे, मूक की मोह से अंधी आँखों में आकृति लेते हैं अनुभूति के बोल,जैसे,किसी प्रेरणा की निःशब्द गति भर देती है सुगन्ध से मेरी अक्रिय संवेदन-दृष्टि…

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सही कहा तुमने…..

वर्ष अतीत होते रहेपर धीरज न चुकाऔर न ही बुझातुम्हारा स्नेह युक्त मंगल प्रदीप, महसूस करता हूँ-तुम समय का सीना चीर करयौवन के रंगीले चित्र निर्मित करोगे,एक कहानी लिखोगे, जिसमें होगास्नेह-स्वप्न-जीवन का इतिवृत्त,और प्रतीक्षा में डबडबायी मेरी आँखेंपोंछ दोगे अपने…

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चुईं सुधियाँ टप-टप

चुईं सुधियाँ टप-टपआँखें भर आयीं । कैसे अवगुण्ठन को खोलतुम्हें हास-बंध बाँधा थाकैसे मधु रस के दो बोलबोल सहज राग साधा था, हुई गलबहियाँ कँप-कँपसाँसे बढ़ आयीं । कैसे उन आँखों की फुदकनमहसूसी थी मन के आँगनकैसे मधु-अधरों का कंपनगूँज…