एक पन्ना मिला । पन्ने पर फरवरी २००७ लिखा है, इसलिये लगभग तीन साल पहले की एक अधूरी कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ । अधूरी इसलिये कि उस क्षण-विशेष की संवेदना और भाव-स्थिति से अपने को जोड़ नहीं पा रहा और इसलिये भी कि एक प्रविष्टि का काम हो जायेगा ….

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दौड़ो !
आओ !
बटोर लो !
मेरे अन्तर में
गहुआ कर फूल उठा है पारिजात-वन,

दृष्टि मेरी,
मेरी जिह्वा
और गमन मेरा
झोरता है पुष्प-तरु को 
बिखर जाता है सुन्दर हरसिंगार चहुँओर !

पारिजाती हो गया है अस्तित्व मेरा
सहला रही है सृष्टि को यह गंध ।