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What I feel

Contemplation, Ramyantar, चिंतन

तुमने मुझे एक घड़ी दी थी…

तुम्हें याद है…तुमने मुझे एक घड़ी दी थी-कुहुकने वाली घड़ी । मेरे हाँथों में देकर मुस्करा कर कहा था, “इससे वक्त का पता चलता है । यह तुम्हें मेरी याद दिलायेगी । हर शाम चार बजे कुहुक उठेगी । आज…

Ramyantar

याद कर रहा हूँ तुम्हें, सँजो कर अपना एकान्त …

उन दिनों जब दीवालों के आर-पार देख सकता था मैं अपनी सपनीली आँखों से, जब पौधों की काँपती अँगुलियाँ मेरी आत्मा को सहला जाती थीं, जब कुहासे की टटकी बूँदे बरस कर भिंगो देती थीं मन-वसन, जब पारिजात-वन का तारक-पुष्प…

Contemplation, Ramyantar, चिंतन

अकेला होना, सबके साथ होना है ?

“मैं अकेलापन चुनता नहीं हूँ, केवल स्वीकार करता हूँ”। ’अज्ञेय’ की यह पंक्तियाँ मेरे निविड़तम एकान्त को एक अर्थ देती हैं । मेरा अकेलापन अकेलेपन के एकरस अर्थ से ऊपर उठकर एक नया अर्थ-प्रभाव व्यंजित करने लगता है । मेरा…

Contemplation, Ramyantar, चिंतन

भोर की हवा, मेरी नियति, श्लोक-पठन

हमेशा बाहर की खिड़की से एक हवा आती है और चुपचाप कोई न कोई संदेश सुना जाती है । भोर की नित्य शीतलता से सिहर गयी यह हवा क्या कहने, समझाने आती है रोज सुबह, पता नहीं ? पर फूल-पत्तियों,…

Ramyantar

नर्गिस की बेनूरी या “गुण ना हेरानो गुणगाहक हेरानो हैं”

इस हिन्दी चिट्ठाकारी में कई अग्रगामी एवं पूर्व-प्रतिष्ठित चिट्ठाकारों की प्रविष्टियाँ सदैव आकृष्ट करती रहतीं हैं कुछ न कुछ लिखने के लिये । मेरे लेखन का सारा कुछ तो इस चिट्ठाजगत के निरन्तर सम्मुख होते दृश्य के साथ निर्मित होता/अनुसरित…

Contemplation, Essays, Ramyantar, चिंतन

मैं क्या हूँ? जानना इतना आसान भी तो नहीं

अपनी कस्बाई संस्कृति में हर शाम बिजली न आने तक छत पर लेटता हूँ। अपने इस लघु जीवन की एकरस-चर्या में आकाश देख ही नहीं पाता शायद अवकाश लेकर। और फिर आकाश को भी खिड़कियों से क्या देखना। तो शाम…