’बच्चन’ का एक प्रश्न-चिह्न मस्तिष्क में कौंध रहा है, उत्तर की खोज है –

“भूत केवल जल्पना है
औ’ भविष्यत कल्पना है
वर्तमान लकीर भ्रम की
और क्या चौथी शरण भी ?
स्वप्न भी छल जागरण भी

वह चौथी शरण क्या है ? उत्तर की तलाश में ’विनोबा’ की बात याद में उतर आयी –

“गीता के आधार पर अकेला मनुष्य सारी दुनियाँ का मुकाबला कर सकता है।”

लगा ‘चौथी शरण’ का समाधान हो गया। वह ‘आदमी’ ही है चौथी शरण। अखंड निर्लिप्त कर्मयोगी ‘मनुष्य’ ही भूत-भविष्य एवं तथाकथित भ्रमित वर्तमान की अर्गला तोड़ सकता है। कर्मयोग में न प्रसन्नता है न द्वेष। न विकर्म है, न अकर्म। न फलाकांक्षा है, न परिग्रह। वह चौथी शरण मानव स्वयं में स्वयं का उद्धारक है। कृष्ण के “कर्मण्येवाधिकारस्ते’ में निःसन्देह उसी ‘चौथी शरण’ का ही मंडन है और भूत, भविष्य, वर्तमान के जल्पना, कल्पना और भ्रम का खंडन। गीता ने समस्या हल कर दी।

भोगवादियों के अनुसार हम न तो वर्तमान को मात्र यथार्थ मानते हैं और न वैरागियों की तरह उसको स्वप्नवत मानते हैं। हम उसको कर्मभूमि मानते हैं क्योंकि वह हमें व्यक्ति-निर्माण करने के अपने अधिकार को किसी मूल्य पर छोड़ने नहीं देती। वस्तुतः भविष्य होता ही नहीं। निर्माण एवं सृजन की भावभूमि वाली कर्मकुशलता हमें योगी बनाती है और यही योग ही हमारी चौथी शरण है-

“योगः कर्मसु कौशलम् “


हम तो अस्तित्ववादियों की भाँति जीवन को क्षणवादी भी नहीं मानते, क्योंकि वह क्षण-क्षण करके हमें जीवन की समग्रता प्रदान करने वाला होता है। हमारी चाह है, कर्मफल की आशा का दंश न झेलते हुए निरंतर कर्म में लगे रहने की। फल तो आनुषंगिक है। इसी लिये जीवन का सूत्र ‘चौथी शरण’ कृष्ण ने बता दिया-

“तस्मात् योगी भवार्जुनः”।


पर क्या अर्जुन को ही …………।