सच्चा शरणम्
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मैं समर्पित साधना की राह लूँगा…


मुझसे मेरे अन्तःकरण का स्वत्व
गिरवी न रखा जा सकेगा
भले ही मेरे स्वप्न,
मेरी आकांक्षायें
सौंप दी जाँय किसी बधिक के हाँथों

कम से कम का-पुरुष तो न कहा जाउंगा
और न ऐसा दीप ही
जिसका अन्तर ही ज्योतिर्मय नहीं,
फिर भले ही
खुशियाँ अनन्त काल के लिये
सुला दी जायेंगी किसी काल कोठरी में,
या कि चेतना का अजस्र संगीत
मूक हो जायेगा निरन्तर,
या मन का मुकुर चूर-चूर हो जायेगा
क्षण-क्षण प्रहारों से

मैं समर्पित साधना की राह लूँगा
नियम-संयम से चलूँगा-
यदि चल सकूँगा ।

17 comments

  1. मैं समर्पित साधना की राह लूँगा
    नियम-संयम से चलूँगा-
    यदि चल सकूँगा । आप की ये पंक्तियां अन्तस्तल को छू गयीं ।

  2. बहुत ही ओजस्वी और प्रेरणादायक. शुभकामनाएं.

    रामराम.

  3. द्रढ़ निश्चय की राह पर अग्रसर ये रचना सुखद अनुभूति दे गयी …

    regards

  4. संकल्प अत्यन्त कठोर है। पर अच्छा आदर्श है।

  5. मैं समर्पित साधना की राह लूँगा
    नियम-संयम से चलूँगा-
    यदि चल सकूँगा ।
    यदि ठान लिजियेगा तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है।

  6. बहुत ही भावपुर्ण …………ऐसी कविताये ऐसे ही नही निकलती यह अंतहकर्ण की पुकार लगती है ……….बहुत खुब

  7. मैं समर्पित साधना की राह लूँगा
    नियम-संयम से चलूँगा-
    यदि चल सकूँगा ।
    जरूर चल सकेंगे कठिन मगर दुर्लभ नहीं शुभकामनायें

  8. सुन्दर प्रेरणादायक कविता |

    मुझसे मेरे अन्तःकरण का स्वत्व
    गिरवी न रखा जा सकेगा | -> इसी जज्बे की जरुरत है आज के समय मैं |

  9. समर्पित साधना की यह राह आपको सुखदायी हो …शुभकामनायें ..!!

  10. मैं समर्पित साधना की राह लूँगा
    नियम-संयम से चलूँगा-
    यदि चल सकूँगा ।

    aameen…

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