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शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य (तेरह)

शैलबाला शतक

भाव कै भूख न भीख कै भाषा सनेह क जानी न मीन न मेखा कवनें घरी रचलै बरम्हा मोके हाँथे न माथे में नेह की रेखाकाँप उठि जम कै टँगरी उघरी हमरी करनी कै जो लेखा एकहु बेर हमै करुनामयि…

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शैलबाला शतक: भोजपुरी काव्य रचना (बारह)

करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह छन्द! शैलबाला शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में हैं। इन चौबीस कवित्तों में प्रारम्भिक आठ कवित्त (शैलबाला शतक: एक एवं शैलबाला शतक: दो) काली के…

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शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य (ग्यारह)

शैलबाला शतक स्तुति नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह छन्द! शैलबाला-शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त…

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शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य (दस)

शैलबाला शतक शैलबाला शतक नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह छन्द! पिछली छः प्रविष्टियों (शैलबाला शतक:…

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शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य (नौ)

शैलबाला शतक: स्तुति काव्य नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह छन्द! शैलबाला-शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद…

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शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य (आठ)

शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य: 37-48  पूत भयों अस लोलक लइया सबै पुरुखा की बड़ाई बहाई माई की ड्यौढ़ी पै दारू सजावत सावन के अन्हरे अस धाई भारी गरूर न एको सहूर सदा घिघियात फिरै मुँह बाई माई न आँख…

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शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य (सात)

शैलबाला शतक नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है।करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह छन्द! शैलबाला-शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में…

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शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य (छः)

शैलबाला शतक भगवती पराम्बा के चरणों में वाक् पुष्पोपहार है। यह स्वतः के प्रयास का प्रतिफलन हो ऐसा कहना अपराध ही होगा। उन्होंने अपना स्तवन सुनना चाहा और यह कार्य स्वतः सम्पादित करा लिया। यह उक्ति सार्थक लगी- “जेहि पर…

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सरस भजन: कब सुधिया लेइहैं मन के मीत

कब सुधिया लेइहैं मन के मीत: प्रेम नारायण पंकिल कब सुधिया लेइहैं मन के मीत, साँवरिया काँधा। कहिया अब बजइहैं बँसुरी, दिनवा गिनत घिसलीं अँगुरीकेतना सवनवाँ गइलैं बीत, साँवरिया काँधा॥१॥ कहिया घूमि खोरी-खोरी, करिहैं कृष्ण माखन चोरीहँसि के लेइहैं सबके…

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सुरसरि तीरवाँ खड़े हैं दुनो भईया रामा: केवट प्रसंग

केवट प्रसंग रामायण के अत्यन्त सुन्दर प्रसंगों में से एक है, खूब लुभाता है मुझे। करुण प्रसंगों के अतिरेक में यह प्रसंग बरबस ही स्नेहनहास का अद्भुत स्वरूप लेकर खड़ा होता है। विचारता हूँ राम की परिस्थिति को, कैकयी की…