शैलबाला शतक नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह छन्द! शैलबाला-शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में हैं। इन चौबीस कवित्तों में प्रारम्भिक आठ कवित्त (शैलबाला शतक: एक एवं शैलबाला शतक: दो) काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं। पिछली छः प्रविष्टियों (शैलबाला शतक: एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः) में इन चौबीस कवित्त छन्दों को प्रस्तुत किया जा चुका है। इसके बाद की प्रविष्टियाँ सवैया छंद में रची गयी हैं, जो क्रमशः प्रस्तुत हैं। शैलबाला शतक-सात के बाद प्रस्तुत है अगली कड़ी- 
Shailbala Shatak 37-48

पूत भयों अस लोलक लइया सबै पुरुखा की बड़ाई बहाई
माई की ड्यौढ़ी पै दारू सजावत सावन के अन्हरे अस धाई
भारी गरूर न एको सहूर सदा घिघियात फिरै मुँह बाई
माई न आँख चोरइहैं कबौं केतनो यदि होइहैं बेटउवा गदाई ॥३७॥

बाँधि गरे रसरी बखरी बखरी घिसियावै बला धै नकेला
पंकिल कै बिधिना भयो बाम कि कागहिं आजु सिखावै कबेला
पेट खलाइ कहौं बिलखाइ बिलाइ गई बल बुद्धि झमेला
माई दुलारे क दूध पियावहु बीतल जाले कलेवा की बेला॥३८॥

की रउरी गति धूमिल ह्वै गइ की बघवा कै बुढ़ाइल काया
की महिसासुर भइलैं बली की ग्रसी रउरो कलिकाल की माया
की हम रावरे कोख क पूत न आयों कहीं से उठउवा पराया
कौन सी चूक परी जो पै झोंकत पंकिल चाहत आँचर छाया ॥३९॥

जोरि के तोरति क्यों रुख तूँ मन कीष नचावत काम मदारी
मैल भरे मति बैल से छैल की फैलि रही कुविचार अन्हारी
आगम की सुधि दे कर कंकन किंकिनि नूपुर की झनकारी
पंकिल प्रान को अम्ब अनन्द री राखहु अंक दुलारि मतारी ॥४०॥

पूरनमासी के मंजु मयंक सी आनन की जेहि के सुघराई
नैननि कज्जल रेख सुधा अधरान पै हीरक हास सुहाई
सोभत सिन्दुर कुंकुम भाल कपोलन ते छलकै अरुनाई
कामिनि कामविनासिनि की पिय कि संग मोरे हिये बसु माई ॥४१॥

अम्ब तोहैं बिधि चारमुखी शिव पंच मुखी नहिं जानै यथारथ
मौन षडानन शेष सहस्रमुखी पटकैं फन फूंकि अकारथ
बानिहुं की गति नाहिं जहाँ तँह पंकिल का करिहैं पुरुषारथ
तूँ अपनी दिसि देखि दयामयि पूत कपूत को कीजै कृतारथ ॥४२॥

मंत्र तोहार न बूझि परी मोहिं माई कोउ केतनो समुझइहैं
अरचन बंदन ध्यान बिधान हमैं जननी सपनों नाहिं अइहैं
पंकिल के रोअहु नाहिं आवत ए मतवा तोहैं कइसे रिझइहैं
आस इहै कि निरास के ले जननी अपनी गोदिया से लगइहैं ॥४३॥

माई हो माई मोरे पपवा से रंगाइल बा यमराज क खाता
कवने नछत्तर में ए कुलच्छन कै रचलैं तकदीर बिधाता
अइसन पूत परैं भरसाईं निबाहा तोहीं अब माई क नाता
पूत कपूत सुने बहु पंकिल पै न सुनी कहुँ माता कुमाता ॥४४॥

जौं अपनो कुल बोरन बूझि के माई हमैं घर से दुरिअइबू
आपन शील सुभाव सम्हारि के बाद में बइठि बड़ा पछितइबू
पंकिल पूतै रही न त तूँ केकरे बल से महतारी कहइबू
जौ उर में उमगी दुधवा तब लै केहिके गोदिया में पियइबू ॥४५॥

तू अनुकूल रहा तब का प्रतिकूल बिरंचि लकीर के खींचे
तोर दई सुख सम्पति सौगुन रीतै न कोटिहुँ हाँथ उलीचै
होत बृहस्पति सो वक्ता जड़ मूक तुम्हारी कृपा रस सीचे
राखहु पंकिल माथ हमार कृपामयि पंकज पाँव के नीचे ॥४६॥

नाहिं भुलइलो चढ़वली कबौं जननी पग पै चिरुआ भर पानी
अच्छत चन्नन फूल सुगंधित ले कइली न कबौं अगवानी
अइसो कपूत बदै होंकरै लू करेजे क के करुना तोरे जानी
पंकिल की खोजिया करिहा अपनी दिशि देखि महेश परानी ॥४७॥

जीवन कै हमरे फुलवा जननी अपने सुधि ताग में गूहा
आपन अम्ब सुधा उर छीर पियाइ जियावा तनय दुधमूहाँ
पंकिल तोहिं तबै सुमिरै जब आइ गिरै विपदा गिरि ढूहा
का करबू सुत रोवै तबै जब पेट में कूदन लागत चूहा ॥४८॥

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