भोजपुरी स्तुति काव्य

शैलबाला शतक के छन्द पराम्बा के चरणों में अर्पित स्तवक हैं। यह छन्द विगलित अन्तर के ऐकान्तिक उच्छ्वास हैं। इनकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। भोजपुरी भाषा के इच्छुरस का सोंधा पाक हैं यह छन्द। इस रचना में भोजपुरी की लोच में, नमनीयता में सहज ही ओज-प्रासाद गुम्फित हो गया है। लोकभाषा की ’लोकवन्द्य’ शक्ति का परिचय देते हैं यह छन्द।

शैलबाल शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में हैं। इन चौबीस कवित्तों में प्रारम्भिक आठ कवित्त (शैलबाला शतक: एक एवं शैलबाला शतक: दो) काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं। प्रारंभिक छः प्रविष्टियों (शैलबाला शतक: एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः) में इन चौबीस कवित्त छन्दों को प्रस्तुत किया जा चुका है। इसके बाद की प्रविष्टियाँ सवैया छंद में रची गयी हैं, जो क्रमशः प्रस्तुत हैं। इस प्रविष्टि के साथ ही यह रचना इस ब्लॉग पर सम्पूर्ण हो रही है। शैलबाला शतक – सात, आठ, नौ, दसग्यारह एवं बारह के बाद प्रस्तुत है यह अंतिम प्रविष्टि-

भाव कै भूख न भीख कै भाषा सनेह क जानी न मीन न मेखा
कवनें घरी रचलै बरम्हा मोके हाँथे न माथे में नेह की रेखा
काँप उठि जम कै टँगरी उघरी हमरी करनी कै जो लेखा
एकहु बेर हमै करुनामयि पंकिल आँखि उघारि के देखा॥९७॥

एक स्वयं हम तीत करइला चढ़े दुसरे अघ नीम के रूखै
याद जबै जमदण्ड की आवै जिया झरबेर के काँट लौं सूखै
धीरज देत सुभाव तोहार पिटात तनय तन माई कै दूखै
पंकिल पूत भले हो कसाई पै माई सदा खरजूतिया भूखै॥९८॥

बीन के पुण्यन कै बिखरे तिनका जबहीं बिरची लघु छान्हीं
चोंथ कबारि किनारे करै करुनामयि काम की भीषन आन्हीं
खोदौं पहार कढ़ी चुहिया गर्हुआत बा पाप क पोटरि बान्हीं
पंकिल हे दुखिया क मतारी उठाइ ला गोद बिठाइ ला कान्हीं॥९९॥

काम से कइसों बचाइ ला माई ई धै बरियाई बिषय सरि गोतत
कोटिक दाँत निपोरी करीं पर छोड़ै न जइसे चहै तस जोतत
अवगुन पाप चमेली क तेल छुछुन्नर पंकिल माथे पै पोतत
तोरी कृपा अन्हियार मिटी पनबादर भानु के नाहिं अलोपत॥१००॥

ऊसर बा हमरी जिनगी करि दा गिरिनन्दिनि जीवन नन्दन
मानत हौं मोरि पीर बृथा न सही बिरहागि न व्याकुल क्रन्दन
पै एतनों सच हौ असमर्थ हूँ हो न सकै तेरो अर्चन बन्दन
चाह करौं तेरे पंकज पाँव की पंकिल धूरि लिलारे को चन्दन॥१०१॥

माँगौ नहीं सुगती मुकती बल बैभव ज्ञान गुमान बड़ो जस
साचों कहौं करुनामयि अम्ब तोहिं हमरी सुख सम्पति सरबस
जौ लगि पंकिल की जिनगी जग बीच रहै दुइ चारि दिना दस
रावरे नेह क गीत सदा हमरी सँसरी में बजै बँसुरी अस॥१०२॥

आलस पुंज रुचै भल भोजन घूमल चाहै न लाठे न डाँड़े
आनै क गूर औ आनै क घीव पै भोग लगावल चाहै लँ पाँड़े
डूबि मरीं चिरुआ भर पानी में फोरै घरे सिल ठेस पहाड़े
पंकिल तों सम माई की गोद में जीबो भलो चाहे मारे कि छाड़े॥१०३॥

एक त अइसे कपूत नलायक नाचन आवै न आँगन टेढ़ा
दूजे सवार सदा सिर काम बिलाए के पंथ कै लवले बा लेढ़ा
ना मन के थिर राखै कबौं गुन अवगुन बीच भिड़वले बा मेढ़ा
पंकिल काँहें न तूँ टस से मस होखैलू बइठि निहारैलू खेढ़ा॥१०४॥

भारत देश परोस में गंग औ काशीपुरी कुल भूसुर खाँटी
अइसन पाइ संजोग अभागा ई हीरा शरीर के कइलस माँटी
पूछी के पंकिल के कुकुरा बस डाँटन जोग जौ काटी की चाटी
माई बिपत्ति हरइया तोंहीं हँसवइया सबै दुख केहू न बाँटी॥१०५॥

नाहिं टिकै पद कंज तोरे डगरै मन मोर ज्यों थारी में पारा
तोंसे दयामयि कौन दुराव मनोज के आगे चलै नाहिं चारा
तूँ जग की दुखभंजनिहार हमार छली दुरबासना मारा
देही का तोंहिं दरिद्दर पंकिल ठाढ़ बा ले जल लोचन खारा॥१०६॥

अंतक आयसु से जननी दुतवा नटई तरवार से रेती
कौनों कमाई न का करबै मोरे गॉंवे न धाम सिवाने न खेती
पंकिल लीला तोरै महामाया सुतइबी त सूती चेतइबी त चेती
रंजिस नाहिं भली लरिका से तूँ गोदी में काँहें उठाइ न लेती॥१०७॥

मोर अन्हेरपुरी नगरी उर राज करै मन चौपट राजा
लूट मँची मनमानी भवानी टका सेर भाजी टका सेर खाजा
सूतल बाड़ू की जागलि माई तूँ ले तरवार खड़ा होइ भाँजा
पंकिल ताजा रहै तोहरे बल बाजै गहागह बिक्रम बाजा ॥१०८॥

—————————–समाप्त——————————