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Poetry

Poetry, Ramyantar

मैं मच्छरदानी नहीं लगाता तो इसका मतलब है …

Mosquito net (Photo credit: quinet) मच्छरदानी लगाना मेरे कस्बे में सुरक्षित व सभ्य होने की निशानी है । मैं मच्छरदानी नहीं लगाता तो इसका मतलब है कि मैं हाईस्कूल की जीव विज्ञान की पुस्तक का सबक भूल गया हूँ ,…

Poetry, Ramyantar

खामोशी हर प्रश्न का जवाब है

Silence – A Fable (Photo credit: thepeachmartini) मुझे नहीं लगता कि खामोशी जवाब नहीं देती। मैं समझता हूँ खामोशी एक तीर्थ है जहाँ हर बुरा विचार अपनी बुराई धो डालता है । ये हो सकता है की तीर्थ के रास्ते…

Poetry, Ramyantar, Songs and Ghazals

मुंह की कालिख को पोंछ उंगली से गाल का तिल बना दिया तुमने

क्या करिश्मा है इस बुझे दिल को, कितना खुशदिल बना दिया तुमने अब तो मुश्किल को भी मुश्किल कहना, बहुत मुश्किल बना दिया तुमने। पाँव इस दर पै आ ठिठक जाते, हाँथ उठते भी तो सलीके से आँख नम, क्या…

Poetry, Ramyantar

वास्तविक अन्तिम उपलब्धि

मैं चला था जिंदगी के रास्ते पर मुझे सुख मिला । मैंने कहा,” बड़ी गजब की चीज हो आते हो तो छा जाते हो जीवन में अमृत कण बरसाने लगते हो, सूर्य का उगना दिखाते हो झरनों का गिरना, नदियों…

Love Poems, Poetry, Ramyantar

क्यों रह रह कर याद मुझे आया करते हो?

नीरवता के सांध्य शिविर में आकुलता के गहन रूप में उर में बस जाया करते हो । बोलो प्रियतम क्यों रह रह कर याद मुझे आया करते हो ? आज सृष्टि का प्रेय नहीं हिय में बसता है मिले हाथ…

Capsule Poetry, Poetry, Ramyantar

अभी तक मैं चल रहा हूँ, चलता ही जा रहा हूँ

(१) “बहुत दूर नहीं बहुत पास “ कहकर तुमने बहका दिया मैं बहक गया । (२) “एक,दो,तीन…..नहीं शून्य मूल्य-सत्य है “ कहा फिर अंक छीन लिए मैं शून्य होकर विरम गया । (३) तुम हो जड़ों के भीतर, वृन्त पर…

Love Poems, Poetry, Ramyantar

यह कैसा संवाद सखी !

यह कविता तब लिखी थी जब हिन्दी कविता से तुंरत का परिचय हुआ था । स्नातक कक्षा की कविताओं को पढ़कर कवि बनने की इच्छा हुई – कविता लिख मारी। यह कैसा संवाद सखी ? प्रेम-विरह-कातर-मानस यह तेरी दरस सुधा…

Capsule Poetry, Poetry, Ramyantar

समय का शोर

जब ध्वनि असीम होकर सम्मुख हो तो कान बंद कर लेना बुद्धिमानी नहीं जो ध्वनि का सत्य है वह असीम ही है । चलोगे तो पग ध्वनि भी निकलेगी अपनी पगध्वनि काल की निस्तब्धता में सुनो समय का शोर तुम्हारी…

Love Poems, Poetry, Ramyantar

प्रेम-विस्मृति

तुम बैठे रहते हो मेरे पास और टकटकी लगाए देखते रहते हो मुझे, अपने अधर किसलय के एक निःशब्द संक्षिप्त कम्पन मात्र से मौन कर देते हो मुझे और अपने लघु कोमल स्पर्श मात्र से मेरा बाह्यांतर कर लेते हो…

Poetry, Ramyantar

अब तुम कहाँ हो मेरे वृक्ष ?

छत पर झुक आयी तुम्हारी डालियों के बीच देखता कितने स्वप्न कितनी कोमल कल्पनाएँ तुम्हारे वातायनों से मुझ पर आकृष्ट हुआ करतीं, कितनी बार हुई थी वृष्टि और मैं तुम्हारे पास खड़ा भींगता रहा कितनी बार क्रुद्ध हुआ सूर्य और…